अध्याय 21 / 27 पढ़ने में 12 मिनट
आख़िरी मोहलत
नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi
नव्या के अपहरण ने सारे मुखौटे उतार दिए हैं। ठाकुर करमवीर, जिसने जिस ख़ज़ाने की सेवा की वो उसे भी निगलने वाला है, ये समझ कर टूटा और डरा हुआ कैंप में लौटता है और पहली बार दुश्मन के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाता है, जबकि घायल मनोहर किआरा का सच पा लेता है और नागिन जान कर भी उसे अपनी बेटी ही मानता है। बीती रात के सच से जुड़े दोनों प्रेमी और ये नया गठजोड़ मिलकर नागमणि की रात का जवाब बुनते हैं और नव्या को छुड़ाने की चाल चलते हैं। पर जब किआरा तक्षक के सामने नव्या के बदले ख़ुद को पेश करती है और उसे उकसाती है, तो घमंड में आकर तक्षक अपना असली मक़सद खोल देता है, कि उसे मणि की ताक़त नहीं चाहिए, वो तो मुहर तोड़कर उस
नव्या के तंबू का परदा अब भी फड़फड़ा रहा था, पर अंदर कोई नहीं था। पूरी रात शिवांश और किआरा ने रेगिस्तान छान मारा, हर टीला, हर बिल, हर सुराग़। कुछ नहीं मिला। तक्षक ने अपने शिकार को वहीं रखा था जहाँ कोई इंसानी पैर नहीं पहुँच सकता था। और सुबह, जब सूरज उगा, तो उसके साथ एक और चीज़ उगी, ज़मीन पर एक गाड़ी की गड़गड़ाहट।
पर इस बार वो गाड़ी लोहा ले कर नहीं आई थी। कोई भीड़ नहीं, कोई छड़ी घुमाता ठाकुर नहीं। जो आदमी उस जीप से उतरा, वो पहचान में ही नहीं आ रहा था। ठाकुर करमवीर सिंह। पर उसकी मख़मली अकड़ जा चुकी थी। उसके कपड़े मैले थे, चेहरा राख जैसा, और आँखों में वो चीज़ थी जो एक ठाकुर की आँखों में कभी नहीं होनी चाहिए, डर।
"मुझे... मुझे तुमसे बात करनी है। किआरा। शिवांश। मैं लड़ने नहीं आया। मेरे पास अब लड़ने के लिए कुछ बचा भी नहीं।"
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ वापस आने की, करमवीर? तुम्हारे लालच ने मनोहर काका को अधमरा किया, तुमने हमारा कैंप उजाड़ा, और आज तुम यहाँ खड़े हो, बात करने? निकल जाओ, इससे पहले कि मैं भूल जाऊँ कि तुम एक बूढ़े आदमी हो।"
"मैं जानता हूँ। मैं सब जानता हूँ। मैंने जो किया, उसकी कोई माफ़ी नहीं। पर सुन लो मुझे, बस एक बार। क्योंकि जो मैंने कल रात देखा, उसके बाद मेरा लालच, मेरा गुरूर, सब रेत में मिल गया।"
"क्या देखा तुमने, ठाकुर? ऐसा क्या देखा कि पीढ़ियों से मणि के पीछे भागता तुम्हारा ख़ानदान, आज तुम्हारे मुँह से मणि का नाम तक नहीं निकल रहा?"
"वो आदमी। नागपाल। जिसे मैं सरकारी अफ़सर समझता था, अपना साझेदार समझता था। कल रात मैंने उसे उस तहख़ाने के पास देखा। पर वो आदमी नहीं था, किआरा। मैंने उसकी परछाईं देखी, दीवार पर, मशाल की रोशनी में। वो परछाईं किसी इंसान की नहीं थी। वो एक... एक कुंडली मारे बैठे नाग की थी। और जब मैंने उससे अपना हिस्सा माँगा, तो वो हँसा, और बोला, तेरा हिस्सा? तू तो बस वो हथौड़ा था जिससे हमने दरवाज़ा खटखटाया। हथौड़े को हिस्सा नहीं मिलता, ठाकुर। हथौड़ा तोड़ कर फेंक दिया जाता है।"
और किआरा ने उस आदमी को देखा, उस लालची, घमंडी ठाकुर को, जो अब एक डरे हुए बच्चे की तरह काँप रहा था। सारी उम्र वो सबसे बड़ा शिकारी बनना चाहता था। और कल रात उसे पता चला कि जिस मेज़ पर वो बैठा था, वहाँ वो शिकारी नहीं, शिकार था।
"मैं ज़िंदगी भर सोचता रहा कि उस मणि में मेरे ख़ानदान की तक़दीर बंद है। सोना, ताक़त, राज। पर उसमें तक़दीर नहीं है, किआरा। उसमें मौत बंद है। पूरी दुनिया की मौत। और मैं, अपने लालच में, उस मौत का दरवाज़ा खोलने वाले हाथों को अपनी ज़मीन, अपने आदमी, अपना नाम दे रहा था। मुझे उस पाप से बचा लो। जो कहोगे, मैं करूँगा।"
"और हम कैसे मानें कि ये तुम्हारी एक और चाल नहीं है? तुमने हमें पहले भी धोखा दिया है, ठाकुर।"
"नहीं, शिवांश। ये चाल नहीं है। मैं झूठ की बू पहचानती हूँ, और इस आदमी के डर में कोई झूठ नहीं है। तक्षक ने आज एक ग़लती कर दी। उसने एक ऐसे आदमी को ठुकरा दिया जो उसके काम आ सकता था। और ठुकराए हुए लोग, सबसे वफ़ादार साथी बनते हैं।"
और उसी पल, एक तंबू की ओट से, एक और आवाज़ उभरी। धीमी, काँपती, पर उसमें एक ऐसा सवाल था जो कई दिनों से पक रहा था। मनोहर। सिर पर पट्टी बाँधे, एक लाठी के सहारे खड़ा, और उसकी आँखें सीधी किआरा पर टिकी थीं।
"बिटिया। एक बात पूछूँ? और तू सच बोलेगी? उस दिन, जब मैं गिरा था, मरने के क़रीब था... मुझे याद है। तेरे हाथ बरफ़ जैसे ठंडे थे। और तेरी हथेली से नीली रोशनी निकल रही थी। और वो साँप, जो पूरे रेगिस्तान से निकल आए थे, वो तेरी बात मान रहे थे। जैसे तू उनकी रानी हो।"
और किआरा वहीं रुक गई। सौ साल से जिस राज़ को उसने हर इंसानी आँख से छुपाया था, आज वो एक बूढ़े बावर्ची की सीधी, प्यार भरी नज़र के सामने नंगा खड़ा था। और उसने झूठ नहीं बोला। इस आदमी से नहीं। इस आदमी ने उसके लिए अपनी जान दे दी थी।
"हाँ, काका। सच पूछा है तो सच सुन लो। मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझते हो। मैं इस गाँव की गाइड नहीं हूँ। मैं सौ साल पुरानी हूँ, काका। मैं इच्छाधारी नागिन हूँ। इस मंदिर की, इस मणि की पहरेदार। जिन नाग-कथाओं को तुम रातों को सुनाते थे, मैं उन्हीं कथाओं की एक हूँ।"
और एक पल के लिए, मनोहर के चेहरे पर वही आया जिसका किआरा को सौ साल से डर था। दहशत। उसकी लाठी थरथराई, उसका मुँह खुला रह गया, और वो एक क़दम पीछे हटा। सौ साल का वो अकेलापन, वो हर बार का बिछड़ना, किआरा ने उस एक क़दम में फिर से जी लिया।
"नागिन... मेरी बिटिया... सौ साल पुरानी... मैं तुझे दूध पिलाता रहा, चाय पिलाता रहा, और तू..."
और फिर, वो हुआ जो सौ साल में कभी नहीं हुआ था। मनोहर की आँखों से वो दहशत उतरी, और उसकी जगह आँसू आ गए। उसने अपनी लाठी एक तरफ़ फेंकी, और दो क़दम आगे बढ़कर, अपनी दुबली-पतली, घायल बाँहें फैला दीं।
"नागिन हो, चुड़ैल हो, या ख़ुद नाग देवता की बेटी हो, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता! तूने मुझे मरते-मरते बचाया था। तूने मुझे बिटिया कहा था। और मैं एक बार बाप बन गया तो बन गया, बिटिया। सौ साल पुरानी हो तो हो, मेरे लिए तो तू वही लड़की है जो मेरी चाय पर नाक-भौं सिकोड़ती थी। इधर आ।"
और किआरा, सौ साल की वो नागिन जो पहाड़ चीर सकती थी, जो मौत को छू सकती थी, एक बूढ़े बावर्ची की घायल बाँहों में सिमट कर एक बच्ची की तरह रो पड़ी। सौ साल में पहली बार, किसी इंसान ने उसका पूरा सच जाना, और भागा नहीं। रुक गया। उसे अपना लिया।
"तुम्हारी चाय सच में बहुत कड़क होती है, काका।"
"अब चुप कर। और आज से मेरे सामने वो नकली मुस्कान मत लाना। बाप से क्या छुपाना। चल, अब बता, उस तक्षक के बच्चे से नव्या बिटिया को कैसे छुड़ाना है। मैं भी हूँ इसमें। ये बूढ़ी हड्डियाँ अभी टूटी नहीं हैं।"
और उस रात, टूटे मंदिर के एक कोने में, एक अजीब सी जमात बैठी। एक सौ साल पुरानी नागिन, उसका पुनर्जन्म लिया प्रेमी, एक टूटा हुआ ठाकुर, और एक घायल बावर्ची। दुनिया की सबसे कमज़ोर, और शायद सबसे सच्ची, फ़ौज। और उनके सामने एक ही सवाल था। नागमणि की रात, अब बस दो दिन दूर।
"तक्षक चाहता है कि हम मुझे उसकी वेदी तक ले आएँ, नव्या के बदले। वो सोचता है हम फँस गए हैं। एक तरफ़ नव्या की जान, दूसरी तरफ़ पूरी दुनिया। पर इस बार हम उसका तराज़ू नहीं मानेंगे। हमें दोनों को बचाना है। नव्या को, और मुहर को। और उसके लिए हमें एक तीसरा रास्ता चाहिए।"
"और वो तीसरा रास्ता अभी तक हमारे पास नहीं है, शिवांश। तुम्हारी याद में भी नहीं मिला। भैरवी की किताबों में भी नहीं। पर एक बात मैं जानती हूँ। नव्या को तक्षक के पास एक और रात नहीं छोड़ सकते। हमें उससे मिलना होगा। मुझे उससे मिलना होगा।"
"मैं जानता हूँ वो कहाँ रुकता है। नागपाल और उसके आदमी बावड़ी के उस पुराने सूखे कुएँ के पास डेरा डाले हैं। मैं तुम्हें वहाँ तक ले जा सकता हूँ। मेरे पास अब भी उस इलाक़े के काग़ज़ हैं, चाबियाँ हैं। जो मेरे लालच ने बंद किया, वही मेरा पछतावा खोल सकता है।"
और एक कच्ची सी योजना बनी। किआरा तक्षक से मिलेगी, नव्या के बदले ख़ुद को पेश करेगी, वक़्त ख़रीदेगी। और उसी दौरान, बाक़ी, उस डेरे की टोह लेंगे, नव्या तक पहुँचने का रास्ता ढूँढेंगे। ख़तरनाक। नाज़ुक। पर उनके पास इससे बेहतर कुछ नहीं था।
और अगली शाम, जब सूरज रेगिस्तान के किनारे लहू की तरह फैल रहा था, किआरा उस सूखे कुएँ के पास पहुँची। अकेली, ऊपर से। पर उसकी नज़रें अँधेरे में शिवांश को ढूँढ रही थीं, जो कहीं छाया में, इंतज़ार में था। और वहाँ, कुएँ की मुँडेर पर, एक आदमी बैठा था, बहुत आराम से, जैसे किसी पुराने दोस्त का इंतज़ार कर रहा हो। तक्षक।
"किआरा। आ ही गई। मुझे पता था। तू हमेशा आती है, जब कोई मासूम तराज़ू में हो। ये तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है, और मेरी सबसे बड़ी ताक़त। वो लड़की, नव्या, अभी ज़िंदा है। नीचे, अँधेरे में, डरी हुई, पर साँस लेती हुई। कब तक, ये तेरे ऊपर है।"
"उसे छोड़ दे, तक्षक। वो इस लड़ाई का हिस्सा नहीं है। तुझे पहरेदार चाहिए, तुझे एक नागिन चाहिए। मैं हूँ। मुझे ले ले। नागमणि की रात, मैं ख़ुद तेरी वेदी तक आऊँगी। पर नव्या को जाने दे।"
"कितना ख़ूबसूरत। तू फिर वही कर रही है। दूसरों के लिए ख़ुद को तराज़ू में रख रही है। सौ साल पहले पृथ्वी के लिए, आज इस अजनबी लड़की के लिए। तुझे लगता है ये कु़र्बानी तुझे महान बनाती है। मुझे तरस आता है तुझ पर।"
और तभी, छाया से, शिवांश निकल आया। योजना के ख़िलाफ़, पर वो ख़ुद को रोक नहीं पाया। तक्षक की नज़र उस पर पड़ी, और उसके चेहरे पर वो चौड़ी, ज़हरीली मुस्कान फैल गई।
"अरे! पृथ्वी भी आ गया। मेरी दावत पूरी हो गई। सौ साल बाद, फिर वही तीन चेहरे, उसी अँधेरे में। बस इस बार अंत अलग होगा, मेरे दोस्त। इस बार मैं जीतूँगा।"
"जीतेगा क्या, तक्षक? एक पत्थर? सौ साल से तू एक चमकते पत्थर के पीछे भाग रहा है। मणि की ताक़त। तक़दीर पलटने वाली रोशनी। तूने हमेशा यही चाहा, है ना? एक अमर नाग, जो और ताक़त का भूखा है। कितना छोटा सपना है तेरा।"
"छोटा? तू सौ साल मेरे साथ लड़ती रही, किआरा, और तुझे आज तक नहीं पता कि तू किससे लड़ रही है। तुझे लगता है मैं मणि की ताक़त चाहता हूँ? उस पत्थर के अंदर जो रोशनी है, वो मेरे लिए एक जुगनू है। मैं वो रोशनी नहीं चाहता।"
और तक्षक की वो चिकनी, मख़मली आवाज़ अचानक बदल गई। उसके नीचे से कुछ और उभरा। कुछ बहुत पुराना, बहुत गहरा, और बहुत ठंडा। किआरा ने महसूस किया कि उसकी रीढ़ में एक कँपकँपी दौड़ गई, वो कँपकँपी जो उसे सौ साल में सिर्फ़ एक चीज़ के आगे आई थी।
"मैं उस पत्थर की ताक़त नहीं चाहता, किआरा। मैं वो चाहता हूँ जो उस पत्थर में क़ैद है। तेरे पुरखों ने जिसे जेल समझ कर बंद किया, वो मेरे लिए जेल नहीं। वो मेरा मालिक है। मेरा देवता। मेरी जड़। वो अनादि भूख, जिसे तू राक्षस कहती है, मैं उसका ख़ून हूँ। उसका हरकारा। उसका वारिस।"
"नहीं... तू सिर्फ़ एक जलता हुआ नाग नहीं है। तू... तू उसका है। तू इस पूरे वक़्त उसे आज़ाद कराने आया था। मणि चुराने नहीं।"
"अब समझी? मैं इस मणि को अपनी तिजोरी में नहीं रखना चाहता। मैं इसे तोड़ना चाहता हूँ। चूर-चूर करना चाहता हूँ। सौ साल से मैं इसका इंतज़ार नहीं कर रहा, मैं इसके लिए काम कर रहा हूँ, इस मुहर को अंदर से कमज़ोर करता, दरार-दरार। और नागमणि की रात, जब चाँद उस सुराख़ पर आएगा, मैं वो दरवाज़ा खोल दूँगा, और अपने मालिक को इस दुनिया में वापस बुला लूँगा।"
"तुम... तुम सिर्फ़ मणि के लिए नहीं लड़ रहे। तुम पूरी सृष्टि को उसके हवाले करना चाहते हो। तुम कोई लालची दुश्मन नहीं हो। तुम एक... एक पुजारी हो। एक क़ैद भगवान के पुजारी।"
"तक्षक, सुन। अगर वो भूख आज़ाद हुई, तो वो सिर्फ़ इंसानों को नहीं निगलेगी। वो तुझे भी निगलेगी। नागों को भी। हम सबको। तू जिस मालिक को बुला रहा है, वो तेरा भी अंत होगा। ये पागलपन है!"
"अंत? तू समझती नहीं, किआरा। मैं बचना नहीं चाहता। सौ साल तूने सोचा मैं तुझसे तेरा प्यार, तेरी मणि, तेरा सिंहासन छीनने आया हूँ। कितनी छोटी सोच है तेरी। मैं तो बस एक ही चीज़ चाहता हूँ। जब मेरा मालिक जागे, तो उसका पहला निवाला मैं बनूँ। उसका हिस्सा। उसकी भूख का पहला कौर। ये मेरी हार नहीं है, किआरा। ये मेरी पूजा है। और नागमणि की रात, मेरी पूजा पूरी होगी।"
और उस सूखे कुएँ की मुँडेर पर, लहू जैसे डूबते सूरज के नीचे, किआरा और शिवांश को वो सच अपनी पूरी दहशत के साथ दिखा। सौ साल से जिसे वो एक जलता हुआ आशिक़, एक लालची दुश्मन, एक जौहर का चोर समझते आए थे, वो कुछ भी नहीं था। तक्षक एक ईर्ष्यालु नाग नहीं था। वो एक क़ैद देवता का पुजारी था, जिसने सौ साल मणि चुराने में नहीं, उसे तोड़ने में लगाए थे। और अब वो जीतने नहीं, अपने भगवान को खिलाने आया था। तराज़ू में अब एक जान नहीं, एक अजनबी लड़की नहीं, पूरी सृष्टि रखी थी। और घड़ी बस दो दिन दूर थी।
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