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अध्याय 10 / 27 पढ़ने में 11 मिनट

आधा सच

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

शिवांश एक गहरे, बुख़ार भरे अँधेरे से ऊपर उठ रहा था, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी धीरे-धीरे पानी की सतह की तरफ़ आता है। पहले रोशनी, फिर तंबू की छत, फिर एक जानी-पहचानी ख़ुशबू, चंदन और किसी जंगली फूल की, और सबसे आख़िर में, एक दर्द जो जिस्म का नहीं, कहीं बहुत गहरे, कहीं और का था। जैसे किसी ने उसकी नींद में उसके सीने से कोई बहुत पुरानी चीज़ निकाल कर उसे दिखा दी हो, और फिर वापस छुपा दी हो।

उसके ज़ेहन में टुकड़े तैर रहे थे। पानी। चाँद। एक औरत का हाथ। और फिर कुछ बहुत बड़ा, चमकता हुआ, जिसकी तरफ़ उसका दिमाग़ देखना ही नहीं चाहता था, जैसे कोई हाथ आग से पीछे खींच लेता है।

"जाग गए! अरे साहब जाग गए! हे नागदेवता, तेरा लाख-लाख शुक्र! मैं तो कहता था ना, उस बावड़ी पर रात को मत जाओ! वहाँ जो अजगर रहता है, वो इस गाँव से पुराना है! मैंने ख़ुद उसकी फुफकार सुनी थी, कान के पर्दे फट गए थे मेरे!"

"काका, धीरे। साहब अभी कमज़ोर हैं। जाओ, गरम शोरबा ले आओ, और वो पीली जड़ वाली दवा भी। और किसी को अंदर मत भेजना, इन्हें आराम की ज़रूरत है।"

"जा रहा हूँ, जा रहा हूँ। पर मैं कहे देता हूँ, बिटिया, ये कोई मामूली साँप नहीं था। इतना बड़ा साया मैंने पूरे जीवन में नहीं देखा। ये उसी मणि का पहरा है। मंदिर जगा दिया इन्होंने, अब मंदिर किसी को सोने नहीं देगा।"

और मनोहर का डर वही झूठ था जिसकी किआरा को ज़रूरत थी। पूरा कैंप अब यही मान रहा था कि बावड़ी पर एक विशाल अजगर ने साहब पर हमला किया। किसी को शक नहीं था। सिवाय एक आदमी के, जो अब बेहोशी से बाहर आ रहा था, और जिसकी आँखों में सच अभी भी टिमटिमा रहा था।

"किआरा...? तुम ठीक हो? तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं? वहाँ... वहाँ कुछ था। बहुत बड़ा। और तुम... तुम उसके सामने खड़ी थीं।"

"मैं ठीक हूँ। लेटे रहो, हिलो मत। तुम्हें दो दिन बुख़ार रहा, शिवांश। मैं तुम्हें बावड़ी से यहाँ तक ले कर आई। बस।"

"दो दिन..." "पर मुझे याद है। पानी में एक याद। तुम्हारा हाथ। और फिर एक साँप, इतना बड़ा कि... और उसकी आँखें, किआरा, वो आँखें तुम्हारी थीं। मैंने तुम्हारी आँखें उसमें देखीं।"

"साँप था, शिवांश। एक बहुत बड़ा रेगिस्तानी अजगर, जैसे काका कह रहे थे। उसने तुम्हें डसा, और उसका ज़हर तुम्हारे ख़ून में चढ़ गया। तुमने जो देखा, वो ज़हर था। बुख़ार था। अँधेरा था। और डूबते होश में तुम्हारी आख़िरी नज़र मुझ पर थी, इसलिए तुमने मेरी आँखें उसमें देख लीं। बस इतनी-सी बात है।"

"ज़हर... हाँ। न्यूरोटॉक्सिन। कुछ ज़हर दिमाग़ पर असर करते हैं, चीज़ें दिखाते हैं, आवाज़ें सुनाते हैं। हाँ, यही होगा। यही होना चाहिए। कोई और समझ ही नहीं आती।"

"यही है। ज़हर आदमी को क्या-क्या दिखा देता है। कोई देवी देखता है, कोई भूत, तुमने एक नागिन देख ली। अब उसे भूल जाओ। जितनी जल्दी भूलोगे, उतनी जल्दी ठीक हो जाओगे।"

और उसने देखा कि शिवांश ने उसके झूठ को दवा की तरह पिया, घूँट-घूँट। और उसका हर शब्द उसे ख़ुद अंदर से काट रहा था। क्योंकि वो उस एक सच को मिटा रही थी, जो सौ साल में उन दोनों के बीच पहली बार सचमुच जागा था। वो उस पल को दफ़्न कर रही थी, जिसे वो अपने सीने में सबसे ऊपर रखना चाहती थी।

"पर एक बात समझ नहीं आती, किआरा। सपने में भी तुम्हीं थीं। बरसों से। और बावड़ी में भी तुम्हीं थीं। और अब यहाँ, जागते हुए, भी तुम्हीं हो। एक ही चेहरा, तीनों जगह। कोई ज़हर इतना सच्चा कैसे हो सकता है?"

"क्योंकि तुम एक अकेले आदमी हो, शिवांश, जिसने ख़ुद को एक ख़याल से बाँध रखा है। और जब आदमी अकेला होता है, तो हर सपने में, हर बुख़ार में, वो वही चेहरा भर देता है जिससे वो प्यार करना चाहता है। इसमें कोई जादू नहीं। बस अकेलापन है।"

पर झूठ चाहे कितना भी सधा हो, एक सच था जो कोई बुख़ार नहीं मिटा सकता था। उसके सपने की औरत और सामने खड़ी गाइड, अब एक ही चेहरा बन चुकी थीं। और किआरा उसकी आँखों में वो शक साफ़ देख रही थी, जिसे वो चाह कर भी मार नहीं पा रही थी।

"और वो तस्वीरें, किआरा। जो मैंने बनाई थीं। तुम्हारा चेहरा, और वो मरता हुआ आदमी तुम्हारी गोद में। मैंने वो तुम्हारे कैंप आने से हफ़्तों पहले बनाई थीं। ज़हर तो उस रात मेरे ख़ून में चढ़ा। फिर वो तस्वीरें किस ज़हर ने बनवाईं? उसका जवाब दो।"

"शिवांश..." "कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। कुछ जवाब सुन लेने के बाद, आदमी वो नहीं रह जाता जो वो पहले था। और मैं नहीं चाहती कि तुम बदलो। मैं चाहती हूँ तुम ज़िंदा रहो, और ख़ुश रहो, चाहे मुझसे दूर।"

उस रात, जब शिवांश सो गया, किआरा कैंप से निकल कर उस पुराने खंडहर की तरफ़ गई, जहाँ उसकी दुनिया की एक आवाज़ अब भी उसका इंतज़ार करती थी। सलाह के लिए। या शायद, डाँट के लिए।

"तूने अपना रूप खोल दिया, किआरा। एक इंसान के सामने। सौ साल की पहरेदारी, और तूने उसे एक रात में, एक मर्द के लिए, दाँव पर लगा दिया। मैंने तुझे यहाँ भेजा था खुदाई रोकने, अपना दिल गिरवी रखने नहीं।"

"वो मर जाता, भैरवी माँ। तक्षक का फन उसके ऊपर था। मेरे पास सोचने का एक पल भी नहीं था। मैं उसे दोबारा मरते नहीं देख सकती थी। एक बार जो देखा है, उसे दोबारा देखने से बेहतर है कि मैं ख़ुद मिट जाऊँ।"

"तो तूने अपने फ़र्ज़ को एक इंसानी साँस के लिए झुका दिया। सुन, बेटी। एक इंसान जो मर जाता है, वो अपना भेद क़ब्र में ले जाता है। पर एक इंसान जो याद रखता है, वो उस भेद को पूरी दुनिया में बिखेर देता है। जो इंसान याद रखता है, वो मरने वाले इंसान से हज़ार गुना ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"

"वो याद नहीं रखेगा। मैंने उसे यक़ीन दिला दिया है कि वो ज़हर का असर था। मैंने वो सच ज़हर के नीचे दबा दिया है।"

"तूने कुछ नहीं दबाया, किआरा। तूने उससे दोबारा प्यार कर लिया है। मैं उसकी बू तुझ पर से आती हुई सूँघ सकती हूँ। ठीक ऐसे ही शुरू हुआ था, सौ साल पहले। एक इंसान से प्यार ने पृथ्वी की जान ली थी। क्या तू उसे दूसरी बार भी उसी आग में झोंकेगी?"

"तुम मुझे वही पुराना ज़ख़्म दिखा कर डराना चाहती हो। पर मैं अब वो लड़की नहीं रही, माँ। सौ साल के ग़म ने मुझे कुछ सिखाया है। और मैंने ठान लिया है कि इस बार अंत अलग होगा।"

"अंत? अंत तो आ ही रहा है, किआरा, चाहे तू चाहे या न चाहे। नागमणि की रात अब गिनती के दिनों की दूरी पर है। जब चाँद ठीक मंदिर के शिखर पर आएगा, तब मुहर सबसे कमज़ोर होगी, और तब मणि किसी के भी हाथ लग सकती है। उस रात तक अगर वो इंसान तेरे और तेरे फ़र्ज़ के बीच खड़ा रहा, तो तू चुन नहीं पाएगी। और न चुनना, सबसे बुरा चुनाव होता है।"

"तो मैं दोनों को बचाने का रास्ता ढूँढ लूँगी, उस रात से पहले। तुमने मुझे लड़ना सिखाया है, माँ। हारना नहीं।"

"तो एक ही रास्ता है। ख़त्म कर दे इसे। कैंप छोड़ दे, ग़ायब हो जा, इससे पहले कि उसकी याद जड़ पकड़ ले। जो बीज अभी उगा है, उसे अभी उखाड़ना आसान है। कल पेड़ बन जाएगा, तो पूरी दुनिया जल जाएगी।"

"नहीं। इस बार मैं उसे नहीं छोड़ूँगी। और मैं उसे मारूँगी भी नहीं। मैं मणि भी बचाऊँगी, और उसे भी। तराज़ू के दोनों पलड़े, माँ। इस बार दोनों।"

"तू सबसे बड़ी भूल कर रही है, बेटी। अगर उसे सब याद आ गया, तो वो बस तेरा प्यार याद नहीं करेगा। उसे ये भी याद आएगा कि वो सब ख़त्म कैसे हुआ था। कि तूने मणि चुनी थी, और वो तेरी बाँहों में मरा था। और वो याद, किआरा, उसे तेरे पास नहीं लाएगी। वो उसे तेरे ख़िलाफ़ खड़ा कर देगी।"

और भैरवी की ये बात एक भविष्यवाणी थी, जिसे किआरा अभी सुनना नहीं चाहती थी। उसने उसे झटक दिया, जैसे कोई अनहोनी को झटक देता है। पर वो शब्द उसके पीछे-पीछे कैंप तक आए, अँधेरे में, हवा में लटके हुए।

जब वो लौटी, तो शिवांश का तंबू जल रहा था, एक अकेली लालटेन की रोशनी में। वो सोया नहीं था। वो बैठा था, कंबल ओढ़े, और उसकी आँखों में वो कमज़ोरी नहीं थी जो बीमार आदमी की होती है। एक फ़ैसला था। और वो उसी का इंतज़ार कर रहा था।

"मैंने सबको भेज दिया, किआरा। नव्या को, काका को, गार्ड को। मुझे तुमसे बात करनी है। अकेले में। और इस बार, मैं झूठ नहीं सुनूँगा।"

"शिवांश, तुम्हें आराम करना चाहिए। बुख़ार अभी पूरा उतरा नहीं है। कल बात कर लेंगे, जब..."

"मैंने पूरी रात कोशिश की, किआरा। एक वैज्ञानिक की तरह। मैंने तुम्हारी ज़हर वाली बात को हर तरफ़ से जाँचा। न्यूरोटॉक्सिन, बुख़ार, दहशत, सब। और वो टिकती नहीं। कोई ज़हर किसी आदमी को वो चेहरा नहीं दिखाता जो उसने सपने में देखने से पहले कभी देखा ही नहीं।"

"शिवांश, बस। तुम बीमार हो, थके हुए हो। तुम एक साये को सच बना रहे हो। मैं सिर्फ़ एक गाइड हूँ, इस गाँव की एक मामूली लड़की, जो..."

"बस। रुक जाओ। मैं और झूठ नहीं सुन सकता, किआरा। किसी का भी नहीं। और सबसे कम, तुम्हारा।"

और फिर वो चुप हो गया, कुछ पल के लिए, जैसे वो शब्द जोड़ रहा हो जो उसने पूरी रात अपने अंदर सँभाल कर रखे थे। और जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ में डर नहीं था। सिर्फ़ एक थकी हुई, पुरानी सच्चाई थी।

"मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ऐसी औरत के लिए रोते हुए काटी है, किआरा, जिससे मैं कभी मिला ही नहीं। हर रात। बचपन से। मैं उसका ग़म ढोता रहा, बिना जाने वो कौन है, कहाँ है, थी भी या नहीं। और अब वो औरत मेरे सामने खड़ी है। साँस लेती हुई। मेरे तंबू में, मेरी लालटेन की रोशनी में।"

"शिवांश, मत करो ये। तुम नहीं जानते तुम किसके सामने खड़े हो। जो सच तुम माँग रहे हो, वो तुम्हारी दुनिया जला देगा। और सिर्फ़ तुम्हारी नहीं, मेरी भी। मैंने सौ साल ये चेहरा इसीलिए छुपाया, ताकि किसी को इसे देखना न पड़े।"

"मुझे परवाह नहीं कि तुम क्या हो। मुझे परवाह नहीं कि मैंने उस बावड़ी में क्या देखा। नागिन, देवी, सपना, जो भी हो। मैंने बचपन से जिसे खोया है, वो तुम हो। मेरी रूह ने तुम्हें उसी पल पहचान लिया था, जिस दिन तुम रेत के तूफ़ान के साथ कैंप के दरवाज़े पर खड़ी थीं।"

और फिर उसने वो सवाल पूछा। धीरे से। बिना किसी शोर के। वही एक सवाल जिससे किआरा सौ साल से भाग रही थी, और जो अब उस अकेले इंसान के होंठों पर था, जिसके लिए वो उसका जवाब कभी दे नहीं सकती थी।

"बस मुझे एक सच बता दो। सिर्फ़ एक। और मैं फिर कभी कुछ नहीं पूछूँगा। ... तुम कौन हो, किआरा? सच में। तुम आख़िर कौन हो?"

और वो सवाल तंबू में लटक गया, लालटेन की काँपती लौ की तरह। वो एक सवाल जिससे वो एक सदी से भागती आई थी, आख़िरकार उसके सामने आ खड़ा हुआ था, उस एक चेहरे पर, जिसे वो कभी झूठ नहीं देना चाहती थी। किआरा ने होंठ खोले। और सौ साल में पहली बार, उसे ख़ुद नहीं पता था कि उन होंठों से जो अगला लफ़्ज़ निकलेगा, वो एक और झूठ होगा, या सच।

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