DesiHub

अध्याय 3 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

उधार की मुस्कान

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

शहर के उस हिस्से में, जहाँ कोचिंग के चमकते होर्डिंग ख़त्म हो जाते हैं और तंग गलियाँ शुरू होती हैं, एक छोटे से किराए के कमरे में, कियान ज़मीन पर बैठा नोटों की गड्डी गिन रहा था।

यहाँ न बुद्धू का मुखौटा था, न जम्हाइयाँ। यहाँ बस एक भाई था, एक पुरानी कॉपी, और उसमें पेंसिल से लिखा एक हिसाब जो हर महीने थोड़ा छोटा होता था।

"भैया! फिर से गिन रहे हो? तीन बार गिन चुके हो। पैसे बच्चे नहीं देते कि गिनते रहोगे तो बढ़ जाएँगे।"

"तुझे क्या पता, रोशनी। हिसाब में जादू होता है। तीन बार गिनो तो कभी-कभी सौ रुपये ज़्यादा निकल आते हैं।"

"झूठे! तुम्हारे हिसाब में तो हमेशा कम ही निकलते हैं। इसीलिए तो मुँह लटका रहता है।"

कियान हँसा, और उसने एक गड्डी अलग रखी, कॉपी में एक तारीख़ के आगे। उस तारीख़ के ऊपर एक नाम लिखा था, सेठ धनराज। सूदखोर।

"चल, बता। इस महीने का स्कूल टेस्ट कैसा गया? सच बताना, वरना मैं तेरी मैडम से पूछ लूँगा।"

"फर्स्ट आई! पूरी क्लास में। मैडम ने कहा, तू तो अपने पापा जैसी तेज़ है।"

कमरे में एक पल के लिए हवा रुक गई। कियान की मुस्कान वैसी ही रही, पर आँखें थोड़ी और गहरी हो गईं।

"पापा जैसी, हाँ। पर एक बात याद रख। पापा जैसी तेज़ बनना, पर पापा की तरह... सबको मत बताना कि कितनी तेज़ है। कुछ रोशनी अंदर रखनी पड़ती है, समझी?"

"तुम्हारी तरह? जो पूरे कॉलेज में बुद्धू बना घूमता है? मुझे पता है भैया, तुम दुनिया के सबसे होशियार हो। बस दुनिया को नहीं पता।"

कियान ने उसके सिर पर हाथ फेरा। इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक इंसान उसका सच जानता था, और वो दस साल की थी, और वो उसे कभी किसी को नहीं बताएगी। ये उन दोनों का राज़ था, पापा की तरह।

"भैया, वो जो छत वाला स्कूल था न, पापा का, जहाँ ग़रीब बच्चे मुफ़्त में पढ़ते थे। अब भी चलता है क्या? वो जो अनवर चाचा चलाते हैं?"

"चलता है, थोड़ा-थोड़ा। बच्चे अब भी छत पर जुटते हैं। किताबें कम पड़ती हैं, पर हिम्मत नहीं।"

"और उनकी किताबों के पैसे कौन भेजता है, चुपके से? मुझे पता है, भैया। तुम सोचते हो मुझे नहीं पता।"

कियान ने उसकी नाक हल्के से खींची और कुछ नहीं कहा। पर उसने उस गड्डी में से कुछ नोट अलग निकाल कर एक पुराने लिफ़ाफ़े में रख दिए, जिस पर लिखा था, छत वाला स्कूल।

एक तरफ़ सूदखोर का कर्ज़, दूसरी तरफ़ मरे हुए पिता का अधूरा सपना। कियान की हर कमाई इन्हीं दो जेबों में बँट जाती थी। अपने लिए वो कुछ नहीं रखता था। अपने नाम की तरह।

तभी दरवाज़े पर एक चमकती गाड़ी का हॉर्न बजा। कियान की मुस्कान एक पल में सिकुड़ गई। ये आवाज़ वो पहचानता था।

"वाह! घर कितना प्यारा है। छोटा है, पर दिल बड़ा है। और ये कौन है? नन्ही परी?"

"रोशनी, तू अंदर जा। होमवर्क कर। भाई से बात है मेरी।"

रोशनी अंदर चली गई, पर दरवाज़े की ओट से झाँकती रही। सिकंदर बिना बुलाए ज़मीन पर बिछी चटाई पर बैठ गया, जैसे घर उसका हो।

"कियान, अंकित तिवारी वाला काम, वो साल का सबसे बड़ा पर्चा। तारीख़ पक्की हो गई। कार्ड बन गया। अब बस तुझे हाँ कहना है।"

"भाई, वो पर्चा बहुत निगरानी वाला है। तीन बार बायोमेट्रिक, कैमरा, और मरे हुए लड़के का नाम। अगर पकड़ा गया, तो सिर्फ़ मैं नहीं, बहुत कुछ डूबेगा।"

"देख, कलाकार। तेरे पापा एक मास्टर थे, है न? बच्चों को पढ़ाते थे। तूने भी बस यही सीखा, पढ़ाना, हल करना। बाक़ी दुनिया रैंक ख़रीदती है, तू रैंक बनाता है। इसमें ग़लत क्या है? तू बस अपना हुनर बेच रहा है।"

कियान की जबड़े की हड्डी सख़्त हो गई। पापा का ज़िक्र, इस आदमी के मुँह से, किसी सौदे को मीठा करने के लिए। पर उसने कुछ नहीं कहा। ग़ुस्सा भी एक क़र्ज़ था, जो वो अभी चुका नहीं सकता था।

"पकड़ा गया, तो। तू पकड़ा नहीं जाता, कलाकार। और सुन, इस बार पैसा इतना है कि तेरा सारा कर्ज़ एक झटके में साफ़। सेठ धनराज का पूरा हिसाब। एक ही रात में तू आज़ाद।"

और वो एक शब्द, आज़ाद, कियान के भीतर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा गया। पर उसने चेहरा सपाट रखा।

"सोचूँगा, भाई।"

"सोच ले। पर ज़्यादा नहीं। कुछ दरवाज़े ज़्यादा देर खुले नहीं रहते। और तेरे जैसे लड़के के लिए, बंद दरवाज़ा बहुत महँगा पड़ता है।"

सिकंदर चला गया। कियान दरवाज़े पर खड़ा उसकी गाड़ी को जाते देखता रहा, और अंदर, रोशनी की क़िताबों की खुसर-पुसर उसे याद दिलाती रही कि वो ये सब क्यों कर रहा है।

उधर कॉलेज की छत पर, नित्या उसका इंतज़ार कर रही थी। और उसके बैग में एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ था, जिस पर एक अजनबी नाम लिखा था।

कियान पहुँचा, हमेशा की तरह देर से, हमेशा की तरह जम्हाई लेते। पर आज नित्या ने किताब नहीं खोली। उसने सीधे वो काग़ज़ मेज़ पर रखा।

"ये तुम्हारे बैग के पास गिरा था। इसे देखो। ये सवाल... ये देश के सबसे कठिन पर्चों के स्तर का है। और ये किसी 'समर' के नाम से हल हुआ है। कौन है समर?"

एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, कियान की जम्हाई रुकी। फिर वो सबसे स्वाभाविक तरीक़े से मुस्कुराया।

"अरे, वो! समर मेरा एक दोस्त है, कोचिंग वाला। बहुत तेज़ है, टॉपर टाइप। उसी से ये काग़ज़ माँग कर लाया था, सोचा आपको इम्प्रेस कर दूँगा।"

"इम्प्रेस? तुम? जिसे साइन थीटा का घर नहीं पता? तुम इस स्तर का काग़ज़ माँग कर क्यों लाओगे, कियान? इसमें से एक भी शब्द तुम्हें समझ नहीं आएगा।"

"बस यही तो बात है, मैडम। जो चीज़ समझ न आए, वही तो इम्प्रेसिव लगती है। जैसे आपके नोट्स। बहुत सुंदर, एक शब्द समझ नहीं आता।"

नित्या ने गहरी साँस ली। वो जानती थी कि झूठ है। पर सबूत सिर्फ़ एक काग़ज़ था, और लड़का हर सवाल को हँसी में उड़ा देता था।

"कियान, मैं टॉपर हूँ। मैं झूठ और सच का फ़र्क पहचानती हूँ, जैसे तुम ग़लत जवाब पहचानते हो। तुम कुछ छिपा रहे हो। और मैं पता लगा कर रहूँगी।"

और ठीक उसी पल, आसमान गड़गड़ाया। एक पल पहले धूप थी, अगले ही पल मोटी बूँदें छत पर बरसने लगीं। बेमौसम बारिश।

दोनों किताबें समेटते, भागते, तपरी के पास लगे एक पुराने तिरपाल के नीचे घुस गए। तिरपाल छोटा था। दोनों को एक ही कोने में सिमटना पड़ा।

"थोड़ा उधर हटो। किताबें भीग जाएँगी।"

"मैडम, उधर हटूँगा तो मैं भीग जाऊँगा। और मैं किताबों से सस्ता हूँ, ये मुझे पता है, पर इतना भी नहीं।"

नित्या हँस पड़ी। पहली बार, बिना ग़ुस्से के। बारिश की आवाज़ में, उस छोटे से तिरपाल के नीचे, दोनों के बीच की जंग एक डिग्री नरम हो गई।

"तुम हमेशा ऐसे क्यों रहते हो? हर बात मज़ाक। कभी सच में कुछ नहीं कहते।"

"क्योंकि सच बहुत भारी होता है, मैडम। और मज़ाक हल्का। जिसके कंधे पर बहुत बोझ हो, वो हल्की चीज़ें ढूँढता है। वरना डूब जाता है।"

"तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारी फ़ाइल देखी है। हर साल फेल। हर पर्चे में सबसे नीचे। पर एक बात अजीब है। तुम्हारे ग़लत जवाब भी... बहुत सोच-समझ कर ग़लत होते हैं। कोई सचमुच का बुद्धू इतनी सफ़ाई से ग़लत नहीं होता।"

"वाह, मैडम। मेरी तारीफ़ हो रही है कि मैं ग़लत भी क़ायदे से होता हूँ। ये तो अच्छा है। कोई तो हुनर निकला मुझमें।"

पर नित्या हँसी नहीं। उसकी नज़र उस लड़के के चेहरे पर टिकी रही, उस लड़के पर जो अपनी हर बात के आगे एक मज़ाक की दीवार खड़ी कर देता था, ताकि कोई अंदर न झाँक सके।

नित्या ने उसे देखा। बारिश की एक बूँद उसके बालों से टपकी। और एक पल के लिए, उस बुद्धू के चेहरे पर उसे एक ऐसा लड़का दिखा जिससे वो पहले कभी नहीं मिली थी।

"किसका बोझ, कियान?"

कियान ने जवाब नहीं दिया। उसने बस बारिश की तरफ़ देखा। और जब उसने दोबारा मुँह खोला, तो मुखौटा वापस आ चुका था।

"ख़ैर! बारिश रुक रही है। और मुझे लगता है आज हमने त्रिकोणमिति से ज़्यादा मौसम विज्ञान सीख लिया। ये भी तो पढ़ाई है, है न?"

नित्या ने सिर हिलाया। ये लड़का पहेली था। और वो पहेली अब सिर्फ़ उसकी स्कॉलरशिप नहीं, उसकी उत्सुकता भी बन चुका था।

पर उसी शाम, शहर के दूसरे कोने में, एक और कहानी अपना सबसे डरावना पन्ना खोल रही थी।

रोशनी का स्कूल। छुट्टी का वक़्त। बच्चे बाहर निकल रहे थे। और गेट के पास, एक काली गाड़ी से टिके, दो भारी-भरकम आदमी खड़े थे, जो किसी बच्चे को लेने नहीं आए थे।

उनमें से एक ने रोशनी को पहचाना। उसने अपने साथी को इशारा किया, और धीरे से मुस्कुराया, उस मुस्कान से जो डराने के लिए बनी होती है।

कियान को ख़बर तब मिली जब उसका फ़ोन बजा। स्क्रीन पर सिकंदर का नाम। उसने उठाया, और उसकी साँस रुक गई।

"कियान, एक बुरी ख़बर है। सेठ धनराज का सब्र ख़त्म हो रहा है। उसके आदमी आज तेरी बहन के स्कूल तक पहुँच गए। बस देखने। अभी तक बस देखने।"

कियान की मुट्ठी इतनी कस गई कि फ़ोन चटख़ने को हुआ। वो एक ही झटके में दरवाज़े से बाहर निकला, गली में, स्कूल की तरफ़ भागते हुए।

"सिकंदर, अगर उन्होंने रोशनी की तरफ़ आँख भी उठाई..."

"आँख कोई नहीं उठाएगा। अगर। अगर तू वो काम कर दे। अंकित तिवारी वाला पर्चा। एक रात, और सेठ का पूरा कर्ज़ ख़त्म, रोशनी के स्कूल से उसके आदमी ग़ायब, हमेशा के लिए।"

और अब कियान को समझ आया कि ये इत्तेफ़ाक़ नहीं था। सेठ के आदमी, ठीक उसी दिन, ठीक उस स्कूल पर। ये दबाव था। ये जाल था। और चारा उसकी बहन थी।

"अब सोचने का वक़्त नहीं है, कलाकार। हाँ या ना। पर याद रख, तू इस दलदल में इतना अंदर आ चुका है कि अब बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, और वो रास्ता आगे जाता है, पीछे नहीं।"

कियान की मुट्ठी काँप रही थी। एक तरफ़ उसका वादा था कि वो कभी पकड़ा न जाए। दूसरी तरफ़ उसकी बहन, स्कूल के गेट पर, अनजान, हँसती हुई, और उसके पीछे खड़े दो साये।

"रोशनी को छूने से पहले... वो मुझसे गुज़रेंगे। ठीक है, सिकंदर। मैं करूँगा वो पर्चा।"

जब तक वो स्कूल पहुँचा, वो दोनों आदमी जा चुके थे। रोशनी गेट पर खड़ी, दोस्तों के साथ हँस रही थी, अनजान, महफ़ूज़। कियान ने उसे दूर से देखा और एक लंबी, काँपती साँस ली।

"भैया! तुम यहाँ? आज तो कॉलेज होता है न तुम्हारा? क्या हुआ, मुँह क्यों उतरा है?"

"कुछ नहीं। बस तुझसे मिलने का मन कर गया। चल, आज आइसक्रीम खिलाता हूँ। आज तेरा भाई थोड़ा अमीर है।"

और वो 'थोड़ा अमीर' होना, कियान जानता था, किस क़ीमत पर आने वाला था। एक मरे हुए लड़के का नाम, तीन बायोमेट्रिक गेट, और एक रात जिसमें पकड़े जाने की सज़ा उसकी पूरी ज़िंदगी थी।

उस रात, रोशनी को सुला कर, कियान अपने कमरे की उस अँधेरी दहलीज़ पर बहुत देर तक बैठा रहा। वो, जो पूरे कॉलेज के सामने बुद्धू बना घूमता था, समझ चुका था कि इस बार दाँव उसकी बहन की मुस्कान का था।

और उधर, नित्या को नहीं पता था कि जिस लड़के को पास कराने की उसने क़सम खाई थी, वो अगले हफ़्ते अपनी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक इम्तिहान देने वाला था, एक ऐसा इम्तिहान जिसमें पास होने की सज़ा जेल थी।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

लास्ट बेंच वाला