Chapter 7 of 25 13 min read
मास्टरजी का सपना
लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi
नागपाल वाले उस पल से हिला हुआ कियान अपने तंग कमरे में लौटता है, जहाँ नन्ही रोशनी की ज़िद पर पापा की पुरानी टेप बजती है और बारह साल पुराना ज़ख़्म खुल जाता है, छत वाली मुफ़्त पाठशाला, नागपाल का रचा पेपर लीक घोटाला, और मरते पिता का वो वादा, नाम को कभी घोटाले से न छूने देना और कर्ज़ चुकने तक गुमनाम रहना। कॉलेज में नित्या उसके सहमने की वजह कुरेदती है, और आख़िर में एक ख़ाली गलियारे में नागपाल एक ठंडी लाइन बोल जाता है जो बता देती है कि वो जानता है ये लड़का किसका बेटा है।
उस रात कियान का कमरा हमेशा से छोटा लग रहा था। एक खिड़की, एक पंखा जो घूमने से ज़्यादा आवाज़ करता था, और दीवार पर एक टँगी हुई पुरानी घड़ी, जो बारह साल से एक ही वक़्त बता रही थी।
फ़र्श पर, एक टूटी हुई चटाई पर, नन्ही रोशनी अपनी कॉपी पर झुकी बैठी थी, ज़बान बाहर निकाले, जैसे गणित से नहीं, किसी दुश्मन से लड़ रही हो।
"भैया, ये सवाल ग़लत है। बिल्कुल ग़लत। इसमें लिखा है एक टोकरी में सत्ताईस आम हैं। सत्ताईस! इतने आम कोई एक टोकरी में रखता है क्या? किताब वाले पागल हैं।"
"हाँ... रख देता है कोई। गिन ले, रोशनी।"
"भैया, आप सुन ही नहीं रहे। आपकी आँखें यहाँ हैं, पर आप कहीं और हैं। आज कॉलेज में क्या हुआ? आप ऐसे बैठे हो जैसे मुझे डाँट खानी हो और आप भूल गए हो कि डाँटना किसे है।"
कियान चुप रहा। क्योंकि आज कॉलेज में जो हुआ था, उसे किसी बच्ची को कैसे बताता। आज उसने बारह साल बाद उस आदमी को इतने पास देखा था। वही आवाज़, वही सफ़ेद कपड़े, वही मुस्कान जो कभी गरम नहीं होती। और वही एक नाम, जो नागपाल की ज़बान से फिसला था, देवनाथ।
"कुछ नहीं हुआ, बुद्धू। बस एक बड़ा आदमी आया था कॉलेज। सबने उसके आगे कमर झुकाई, मैंने भी झुकाई, बस मेरी कमर थोड़ी ज़्यादा झुक गई, तो अब सीधी नहीं हो रही।"
"झूठे। ... अच्छा, पापा वाली टेप बजाओ। मुझे नींद नहीं आ रही, और आपको भी नहीं आ रही, दोनों को पापा की आवाज़ चाहिए।"
"आज नहीं, रोशनी। बहुत देर हो गई। कल सुबह स्कूल भी है तेरा।"
"बस एक मिनट। सिर्फ़ जहाँ पापा हँसते हैं वो वाला। उसके बाद मैं सो जाऊँगी, कसम से, आँख भी नहीं खोलूँगी।"
और कियान से मना नहीं हुआ। वो कभी उस चेहरे को मना नहीं कर पाता था। उसने अलमारी से एक पुराना, धूल भरा टेप रिकॉर्डर निकाला, वो अकेली चीज़ जो उनके पास पापा की बची थी, और काँपती उँगली से प्ले का बटन दबाया।
एक पल को सिर्फ़ खरखराहट हुई। फिर उस खरखराहट के बीच से, बारह साल के अंधेरे को चीरती हुई, एक आवाज़ उभरी। गरम, थकी हुई, और इतनी नरम कि कमरा एक पल के लिए बड़ा हो गया।
"आज छत पर बयालीस बच्चे थे। बयालीस! बरखा के बच्चे भी आ गए, नंगे पाँव, पर आँखों में वो चमक... अरे, वो चमक किसी कोचिंग में नहीं मिलती, बेटा। वो तो भूख से आती है। ज्ञान की भूख से।"
"पापा की आवाज़ कितनी अच्छी है न, भैया। जैसे कोई कहानी सुना रहा हो।"
कियान ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो आवाज़ उसे कमरे से उठा कर कहीं और ले जा रही थी। एक और छत पर। एक और वक़्त में। जब सब कुछ टूटा नहीं था।
और उसे वो छत याद आई। शहर के सबसे ग़रीब मोहल्ले के ऊपर, एक पक्की छत, जहाँ न कुर्सियाँ थीं, न पंखे, न फ़ीस। बस एक टूटा हुआ ब्लैकबोर्ड, ज़मीन पर बिछी दरियाँ, और तीस-चालीस बच्चे, जो कहीं और पढ़ नहीं सकते थे।
और उन बच्चों के बीच खड़े मास्टरजी, देवनाथ, हाथ में चॉक, कुर्ते पर चॉक की सफ़ेदी, और चेहरे पर वो हँसी जो किसी अमीर आदमी के पास नहीं होती।
"सुनो, बच्चो। ये जो नागपाल जी की बड़ी-बड़ी कोचिंग हैं न, वहाँ पढ़ाई बिकती है। पैसे दो, रैंक लो। पर मैं तुमसे कहता हूँ, जो चीज़ बिक जाए, वो ज्ञान नहीं, माल है। और तुम्हारा दिमाग़ माल नहीं है। वो भगवान की अमानत है।"
और उन सब बच्चों में सबसे आगे, सबसे तेज़, एक दुबला-पतला लड़का बैठा था। छोटा कियान। जिसकी उँगली हर सवाल पर सबसे पहले उठती थी।
"देख कियान, तेरे अंदर जो है न, वो इस पूरे शहर में किसी के पास नहीं। पर याद रखना, बेटा, दिमाग़ बड़ी चीज़ है, दिल उससे बड़ी। जिस दिन तेरा दिमाग़ किसी ग़रीब के काम आए, समझना पढ़ाई पूरी हुई। नहीं तो तू सिर्फ़ एक होशियार, बेकार आदमी है।"
और छोटा कियान हँसता था, और वादा करता था कि वो सबसे बड़ा आदमी बनेगा, और पापा के लिए एक बड़ा सा स्कूल बनवाएगा, जिसमें पंखे भी होंगे।
पर उस शहर में एक आदमी को ये मुफ़्त की छत बर्दाश्त नहीं थी। क्योंकि जहाँ ज्ञान मुफ़्त बँटता हो, वहाँ रैंक का धंधा कैसे चले।
और एक शाम, उस छत पर, नागपाल ख़ुद आया। बेदाग़ सफ़ेद कपड़े, सोने का चश्मा, और वो मुस्कान। उसने चारों तरफ़ बैठे नंगे पाँव बच्चों को देखा, जैसे कोई कीड़े-मकौड़ों को देखता है।
"मास्टर देवनाथ। शहर भर में तुम्हारी चर्चा है। मुफ़्त का मसीहा। पर मुफ़्त की चीज़ की कोई क़ीमत नहीं होती, मास्टर। मैं तुम्हें एक कुर्सी देता हूँ, मेरी कोचिंग में। मोटी तनख़्वाह। ये छत छोड़ो, नीचे आओ। इन कीड़ों को इनके हाल पर छोड़ दो।"
"नागपाल साहब, ये कीड़े नहीं, बच्चे हैं। और ज्ञान बिकाऊ नहीं है। आप रैंक बेचते हैं, मैं उम्मीद बाँटता हूँ। आपकी कुर्सी आपको मुबारक। मेरी ये छत मुझे। हम दोनों का काम अलग है।"
"उम्मीद। हम्म। जानते हो, उम्मीद सबसे सस्ती चीज़ है, और सबसे जल्दी टूटती है। तुमने आज मेरी बात नहीं मानी, मास्टर। कोई बात नहीं। पर याद रखना, इस शहर में जो मेरे रास्ते में आता है, उसका नाम मैं इतिहास से मिटा देता हूँ। जैसे ब्लैकबोर्ड से चॉक।"
और नागपाल चला गया। पर उसकी वो आख़िरी बात कोई धमकी नहीं थी। वो एक वादा था। और नागपाल अपने वादे निभाता था।
कुछ ही हफ़्तों बाद, शहर के सबसे बड़े इम्तिहान का पर्चा लीक हो गया। और छानबीन की वो पतली, ज़हरीली उँगली, न जाने कैसे, सीधे उस छत वाले स्कूल पर आ कर रुक गई। मास्टरजी के स्कूल पर।
काग़ज़ात बरामद हुए, जो किसी ने वहाँ रखे थे। गवाह खड़े हुए, जो किसी ने ख़रीदे थे। और अगली सुबह हर अख़बार में एक ही तस्वीर थी, मास्टरजी की, और नीचे एक ही शब्द, चोर। पर्चा चुराने वाला मास्टर।
जिस आदमी ने ज़िंदगी में एक पैसा नहीं चुराया, जिसने अपने बच्चों को ईमानदारी का पहला पाठ पढ़ाया, वो रातों-रात पूरे शहर का चोर बन गया। और छत वाला स्कूल, जिसकी ज़मीन पर पहले ही सेठ धनराज का कर्ज़ चढ़ा था, एक झटके में सील हो गया।
मास्टरजी ने बहुत लड़ने की कोशिश की। हर दरवाज़ा खटखटाया। पर नागपाल के पैसे के आगे हर दरवाज़ा बंद था। और एक ईमानदार आदमी, जब उसका नाम ही छिन जाए, तो उसके पास जीने को बचता ही क्या है।
वो टूट गए। अंदर से। और एक रात, कर्ज़ के काग़ज़ों और झूठे इल्ज़ामों के बोझ तले, मास्टरजी ने बिस्तर पकड़ लिया, और फिर कभी नहीं उठे।
कियान को वो आख़िरी रात याद थी। पापा का काँपता हाथ, उसके हाथ में। कमरे में दवाई की गंध। और पापा की वो आवाज़, जो अब भी गरम थी, पर बहुत, बहुत थकी हुई।
"कियान... मेरे बच्चे। मैं जा रहा हूँ, पर तुझे दो वादे देने हैं, और तुझसे दो लेने हैं। रोशनी को कभी अकेला मत छोड़ना। और ये कर्ज़, ये धनराज का कर्ज़, इसे चुका देना, ताकि हमारा सिर किसी के आगे न झुके।"
"और सुन... हमारा नाम, ये देवनाथ का नाम, अब बहुत घायल है। इसे अब कभी किसी घोटाले को मत छूने देना। कभी नहीं। और जब तक ये कर्ज़ न चुके, तू गुमनाम रहना, बेटा। छिपा रहना। कोई तुझे न देखे, न पहचाने। दुनिया की नज़र से दूर। ... वादा कर।"
और बारह साल के कियान ने, आँसू पीते हुए, वो वादा किया था। दो वादे। रोशनी। और नाम। और उसी रात, उसके पापा का हाथ उसके हाथ में ठंडा पड़ गया।
टेप में खरखराहट हुई, और पापा की आवाज़ फिर हँसी, किसी और दिन की, किसी और छत की। कियान चौंका। कमरा फिर छोटा हो गया। पंखा फिर आवाज़ कर रहा था। और उसने बटन दबा कर टेप रोक दिया।
रोशनी अब आधी नींद में थी, चटाई पर लुढ़की हुई। पर उसने एक आख़िरी सवाल पूछा, वो सवाल जो हर बार कियान का दिल चीर देता था।
"भैया... स्कूल में एक लड़की कह रही थी, हमारे पापा चोर थे। सच में थे क्या? ... मैंने उसे मारा नहीं, बस देख लिया ग़ुस्से से।"
"नहीं, रोशनी। सुन। तेरे पापा इस शहर के सबसे ईमानदार आदमी थे। सबसे ईमानदार। जिसने तुझसे ये कहा, उसके पापा भी उसे ये सच नहीं बता सकते, क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं पता। पर तू जानती है। और भैया जानता है। बस इतना काफ़ी है।"
और उस पल, उस छोटे से कमरे में, कियान की पूरी ज़िंदगी की पहेली एक तस्वीर बन गई। ये लड़का बुद्धू क्यों बनता है। ये अपनी चमक क्यों छिपाता है। ये किसी और के नाम पर इम्तिहान क्यों देता है।
क्योंकि गुमनाम रहना ही एकमात्र रास्ता था। अगर कियान असली कियान बनता, चमकता, आगे आता, तो नागपाल उसे पहचान लेता, और देवनाथ का घायल नाम एक बार फिर घसीटा जाता। इसलिए वो पीछे बैठता था। इसलिए वो हारता था। जान-बूझ कर।
"बस थोड़ा और, पापा। कर्ज़ का आख़िरी पहाड़ बचा है। एक-दो बड़े काम, और धनराज का हिसाब ख़त्म। फिर मैं ये मुखौटा उतार दूँगा। तब तक... न समर, न अंकित, न कोई और फ़र्ज़ी नाम। बस एक बुद्धू। लास्ट बेंच वाला। किसी को पता नहीं चलेगा।"
उसे नहीं पता था कि उसका ये आख़िरी पहाड़ चढ़ने से पहले, वो पुराना आदमी दोबारा उसकी ज़िंदगी में आ चुका था। और पुराने शिकारी पुराने शिकार की गंध कभी नहीं भूलते।
अगली सुबह। सरस्वती कॉलेज। छत वाली चाय की तपरी। पर आज नित्या के हाथ में चाय ठंडी हो रही थी, और उसका दिमाग़ कल के उस एक पल पर अटका था।
"कियान। कल नागपाल ने तुम्हें एक नाम से बुलाया। देवनाथ। और तुम्हारा चेहरा... मैंने आज तक किसी का चेहरा उस तरह सफ़ेद पड़ते नहीं देखा। मैं टॉपर हूँ, कियान, मुझे बहानों में उलझाना आसान नहीं। ये देवनाथ कौन है?"
"देवनाथ? ... अच्छा वो। वो मेरे मोहल्ले का दूधवाला है, मैडम। शक्ल मिलती है मुझसे। लोग अक्सर कन्फ़्यूज़ हो जाते हैं। बड़े लोग तो और भी, उनकी नज़र कमज़ोर होती है न पैसे गिन-गिन कर।"
"दूधवाला। ... कियान, नागपाल जैसा आदमी किसी दूधवाले का नाम नहीं जानता। उसने तुम्हें ऐसे देखा जैसे कोई भूत देखता है। और तुम काँप रहे थे। मैं मदद करना चाहती हूँ। पर तुम मुझे अंदर आने ही नहीं देते।"
और तभी कियान के अंदर कुछ बंद हो गया। एक दरवाज़ा। क्योंकि नित्या जितना पास आ रही थी, ख़तरा उतना बढ़ रहा था। और उसे बचाने का एक ही तरीक़ा था, उसे दूर रखना।
"मदद? मैडम, आप मुझे पास कराने आई हैं, मेरी ज़िंदगी की जासूसी करने नहीं। आपको अपनी स्कॉलरशिप चाहिए, मुझे मेरी नींद। बस इतना रिश्ता है हमारा। बाक़ी सब छोड़िए।"
बात कियान की ज़बान से निकली और नित्या के चेहरे पर एक थप्पड़ की तरह पड़ी। उसकी आँखें एक पल के लिए चमकीं, चोट से, ग़ुस्से से।
"ठीक है। जासूसी नहीं करूँगी। पर एक बात कान खोल कर सुन लो, कियान। मैं आज तक जिस भी सवाल के पीछे पड़ी हूँ, उसका जवाब निकाल कर ही दम लिया है। तुम भी एक सवाल हो। और मैं हारना नहीं जानती।"
नित्या उठ कर चली गई। और कियान वहीं बैठा रहा, ठंडी चाय के साथ। उसने उसे दूर धकेल दिया था, और ये चोट उसे ख़ुद पर भी उतनी ही लगी थी। पर उसके पास और चारा नहीं था।
"माफ़ कर दो, मैडम। पर आप जिस सवाल के पीछे पड़ी हो न, उसका जवाब आपको भी डुबो देगा। और मैं वो नहीं होने दूँगा।"
दोपहर ढली। कॉलेज ख़ाली होने लगा। नागपाल का दौरा अब भी चल रहा था, कमरे-दर-कमरे, फ़ाइल-दर-फ़ाइल, हर स्कॉलरशिप की जाँच। और कियान, भीड़ से बचता हुआ, एक सुनसान गलियारे से गुज़र रहा था, अकेला।
गलियारे के सिरे पर धूप एक खिड़की से तिरछी आ रही थी। और उसी धूप में, जैसे किसी ने उसे वहाँ बोया हो, एक परछाईं खड़ी थी। बेदाग़ सफ़ेद। अकेली। कियान का क़दम जम गया।
"अरे, वही लड़का। लास्ट बेंच वाला। इधर आओ, डरो मत। मैं तुम्हें खाऊँगा थोड़े ही। ... वैसे, अकेले में तुम्हारा चेहरा और भी साफ़ दिखता है। भीड़ में कुछ चीज़ें छिप जाती हैं। अकेले में सब खुल जाती हैं।"
"जी... साहब। मैं तो बस रास्ता भटक गया था। क्लास ढूँढ रहा था। मुझे तो अपनी क्लास भी याद नहीं रहती, आप तो जानते ही हैं, मैं सबसे नाकाम..."
"बस। नाटक बंद करो, बेटा। मेरे सामने नहीं। ... मैं साठ साल का हूँ, और मैंने इस शहर में हज़ारों चेहरे बनते और मिटते देखे हैं। मैं किसी चेहरे को नहीं भूलता। ख़ासकर उन आँखों को, जिन्होंने कभी मुझे 'नहीं' कहा हो।"
कियान की रीढ़ में एक ठंडी लकीर दौड़ गई। मुखौटा जगह पर था, पर नागपाल उसके आर-पार देख रहा था, सीधे बारह साल पीछे।
"देवनाथ की आँखें। वही ज़िद, वही आग। बाप की आँखें बेटे में छिप नहीं सकतीं, कियान। या जो भी नाम है इस हफ़्ते तुम्हारा। तुम उस मास्टर के बेटे हो, है न? उसी छत वाले 'मसीहा' के, जिसे मैंने... चॉक की तरह मिटा दिया था।"
"आप ग़लत आदमी को पहचान रहे हैं, साहब। मेरे कोई पापा-वापा नहीं। मैं तो हॉस्टल में पला हूँ। अनाथ। आपको किसी और की याद आ रही है।"
नागपाल हँसा। धीरे। और उस हँसी में कोई गरमाहट नहीं थी। वो कियान के क़रीब आया, इतना क़रीब कि कियान को उसके इत्र की महक आई, महँगी और ठंडी।
"चलो, मान लेते हैं तुम अनाथ हो। पर सोचो, लड़के। मुझे बस एक लफ़्ज़ कहना है। कॉलेज के कान में, ट्रस्ट के कान में। कि इस स्कॉलरशिप की छाँव में एक घोटालेबाज़ मास्टर का बेटा छिपा बैठा है। बस एक लफ़्ज़।"
"और उस एक लफ़्ज़ के बाद... तुम्हारी वो होशियार मेंटर, नित्या, उसका वज़ीफ़ा जाएगा, उसकी बीमार माँ का घर जाएगा, और तुम्हारे बाप का वो 'ईमानदार' नाम, दोबारा हर अख़बार में घसीटा जाएगा। एक ही लफ़्ज़ में। ... तो अब बताओ, बेटा। मैं वो लफ़्ज़ कहूँ, या तुम चुपचाप, हमेशा की तरह, आख़िरी बेंच पर बैठे रहो?"
और कियान वहीं जम गया। धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी, पर उसके अंदर सब बर्फ़ था। क्योंकि नागपाल के हाथ में अब सिर्फ़ नित्या की स्कॉलरशिप नहीं थी। उसके हाथ में कियान के पापा का नाम था, रोशनी का भविष्य था, और वो पूरा राज़ था जिस पर बारह साल की ख़ामोशी टिकी थी। एक लफ़्ज़। और सब कुछ राख।
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