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Chapter 25 of 25 12 min read

लास्ट बेंच वाला

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

कुछ महीने बाद। एक और नतीजों की सुबह। पर इस बार, इस शहर की हवा में डर नहीं था। नागपाल की चमकती मीनार पर अब ताला था, उसकी कोचिंग के बोर्ड उतर चुके थे, और वो ख़ुद अपने मुक़दमे का इंतज़ार कर रहा था। जिस शहर ने बरसों रैंक ख़रीदी और बेची थी, वो पहली बार साफ़ हवा में साँस ले रहा था।

नागपाल, जो कभी इस शहर का बादशाह था, अब एक अस्पताल और एक अदालत के बीच झूल रहा था, उसके ख़रीदे हुए गवाह एक-एक कर मुकर चुके थे। और सिकंदर, जो हमेशा किसी और के हाथ का मोहरा रहा, आख़िरकार अपने हिस्से के गुनाहों का हिसाब भर रहा था। जिस डर पर वो पूरी सल्तनत खड़ी थी, वो डर अब नहीं था। और डर के जाते ही, ये शहर अचानक हर उस बच्चे के लिए बहुत बड़ा लगने लगा था, जिसके पास कभी कोचिंग के पैसे नहीं थे।

और पुराने मोहल्ले की उसी छत पर, जहाँ कभी एक मास्टर चुपके से पढ़ाता था, और जहाँ नागपाल ने ताला जड़ दिया था, अब एक स्कूल था। खुला, रोशन, बच्चों की आवाज़ों से भरा। तिरपाल की जगह अब एक पक्की छत थी, और दीवार पर एक नई पीतल की पट्टी।

उस पीतल की पट्टी पर वही नाम खुदा था, जिसे बारह साल पहले, ठीक एक पीतल की पट्टी से ही, घिस कर मिटा दिया गया था। देवनाथ मास्टर मुफ़्त पाठशाला। पर इस बार वो नाम मिटाया नहीं जा सकता था। क्योंकि अब वो सिर्फ़ पीतल में नहीं, इस पूरे मोहल्ले की याद में खुदा था।

"कियान! कियान! ... आ गया! नतीजा आ गया! ... तेरा नाम, तेरा असली नाम, पूरे देश में सबसे ऊपर! नंबर एक! ... कियान, देवनाथ मास्टर का बेटा, पूरी लिस्ट में सबसे पहला!"

और उस सुबह, शहर के हर अख़बार में, हर टीवी पर, एक ही नाम था। कियान। देवनाथ मास्टर का बेटा। वही नाम, जिसे बारह साल पहले घिस कर मिटाया गया था, आज पूरे देश की सूची में सबसे ऊपर खुदा था। कुछ बूढ़े, जो मास्टरजी को जानते थे, अख़बार को सीने से लगा कर रो पड़े।

और उस पल, देश का नंबर एक कहाँ था? किसी मंच पर नहीं, किसी कैमरे के सामने नहीं। वो उसी छत पर, ज़मीन पर बैठा, एक नौ साल के बच्चे को तीन का पहाड़ा समझा रहा था। उसने बंटी की तरफ़ देखा, हल्के से मुस्कुराया, और वापस उस बच्चे की कॉपी की तरफ़ झुक गया।

"अच्छी बात है, बंटी। ... पर अभी ज़रा रुक। ये बच्चा तीन का पहाड़ा भूल रहा है, और अभी, इस वक़्त, वो नंबर एक इस पहाड़े से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। ... रैंक कल भी रहेगी। ये सवाल अभी हल होना है।"

और वहीं, उस एक पल में, पूरी बारह साल की कहानी सिमट आई। जिस लड़के ने बारह साल दूसरों के नाम पर रैंकें बटोरी थीं, आज अपने ही नाम की सबसे बड़ी रैंक उसके लिए एक बच्चे के पहाड़े से बड़ी नहीं थी।

और वो अकेला नहीं था जो आज ऊपर उठा था। पिछले बरसों में, अपनी उस चुराई हुई कमाई से, कियान ने चुपके से इस मोहल्ले के कई बच्चों की फ़ीस भरी थी, किताबें ख़रीदी थीं, किसी गुमनाम भेजने वाले के नाम पर। आज उनमें से कुछ बच्चे ख़ुद अफ़सर बन चुके थे, कुछ पढ़ा रहे थे।

वो सब आज उसी छत पर लौट आए थे, ये जानने के बाद कि वो गुमनाम हाथ किसका था। जिस लड़के को कॉलेज सबसे बड़ा बुद्धू कहता था, उसने चुपचाप एक पूरे मोहल्ले को खड़ा कर दिया था, और किसी को कानोंकान ख़बर तक नहीं होने दी थी।

उनमें एक नौजवान अफ़सर भी था, जो कभी उसी छत पर नंगे पैर बैठ कर पढ़ा था, और जिसकी परीक्षा की फ़ीस किसी 'गुमनाम' ने भरी थी। उसने कियान का हाथ थामा, कुछ कहना चाहा, पर बोल नहीं पाया। कुछ शुक्रिया लफ़्ज़ों में नहीं आते। कियान ने बस उसके कंधे पर हाथ रखा, और मुस्कुरा दिया, ठीक वैसे जैसे कभी उसके अपने पिता मुस्कुराते थे।

"सुनो सब! ... हमारे स्कूल के मास्टर, हमारे अपने कियान भैया, पूरे देश में नंबर एक! ... और मैं, बंटी, उनका पहला असिस्टेंट! ... हाज़िरी मैं लगाता हूँ, अनुशासन मैं देखता हूँ। बस पढ़ाना वो देखते हैं, क्योंकि वो, हे हे, थोड़े ज़्यादा तेज़ हैं।"

"भैया! भैया, देख, मैंने पूरा पाठ याद कर लिया! ... और मैं तेरे जैसे आख़िरी बेंच पर नहीं बैठूँगी, समझा? मैं सबसे आगे बैठूँगी! ... क्योंकि पापा कहते थे, जो सबसे आगे बैठता है, वो सबसे पहले सवाल पूछता है।"

"नहीं, रोशनी। ... तू जहाँ चाहे बैठ। आगे, पीछे, कहीं भी। ... क्योंकि अब तुझे छुपना नहीं है। ... तेरा भाई बारह साल आख़िरी बेंच पर इसलिए बैठा, ताकि तू किसी भी बेंच पर, बिना डर के, खुल कर बैठ सके।"

"बंटी भैया! आपने फिर मेरा नाम हाज़िरी में ग़लत लिख दिया! ... और आप ख़ुद तो तीन का पहाड़ा नहीं जानते, और मुझे अनुशासन सिखा रहे हैं?"

"ऐ! ... मैं असिस्टेंट हूँ, मुझे पहाड़े जानने की ज़रूरत नहीं। मेरा काम है रौब जमाना! ... और तू चुपचाप बैठ, वरना तेरे भैया से शिकायत कर दूँगा।"

"मेरे भैया देश में नंबर एक हैं। ... वो आपकी नहीं, मेरी सुनेंगे।"

और उसी शाम, जब बच्चे घर चले गए, रोशनी ने वही पुरानी टेप निकाली, पापा की आवाज़ वाली, जो बरसों से उनके तंग कमरे का सबसे क़ीमती ख़ज़ाना थी। उसने उसे उस नई छत पर, उसी नई पीतल की पट्टी के नीचे बजाया। और बारह साल पुरानी एक आवाज़, उस शाम की हवा में तैर गई।

"बेटा... एक बात हमेशा याद रखना। ... नाम वो नहीं होता जो लोग तुम्हें पुकारते हैं। नाम वो होता है जो तुम चुपचाप, बिना किसी को बताए, किसी और के लिए करते हो। ... दुनिया रैंक गिनती है, कियान। पर ऊपरवाला वो अच्छाई गिनता है जो तुमने अँधेरे में की हो, बिना किसी तालियों के।"

और कियान की आँखें भर आईं। बारह साल पहले जो वादा एक बोझ की तरह उसके नन्हे कंधों पर रखा गया था, आज वो एक स्कूल की शक्ल में, एक हँसते हुए मोहल्ले की शक्ल में, उसके सामने खड़ा था। पिता ने कहा था, नाम बचाना। और बेटे ने नाम बचा कर, उसे इस पूरे शहर को बाँट दिया था।

उस रात, स्कूल की बत्तियाँ बुझाने से पहले, कियान उसी नई पीतल की पट्टी के पास रुका। उसने अपनी उँगली उस खुदे हुए नाम पर फेरी, बहुत धीरे, जैसे कोई किसी हरे ज़ख़्म को नहीं, किसी भरे हुए ज़ख़्म को छू रहा हो।

"देख लिया, पापा? ... आपका नाम अब किसी पीतल की पट्टी पर नहीं टिका। ये अब उन बच्चों में लिखा है, जो कल इस छत से निकल कर पूरे शहर को रोशन करेंगे। ... आपने कहा था, गुमनाम रहना। मैं रहा, पूरे बारह साल। ... पर अब गुमनाम रहने की बारी आपके नाम की नहीं है, पापा। अब वो बारी मेरी हर उस नेकी की है, जो मैं आगे, चुपचाप, किसी और के लिए करूँगा।"

और एक दोपहर, सान्या भी उस छत पर आई, बच्चों के लिए कुछ किताबें ले कर। वो लड़की जो कभी नित्या को गिराने आई थी, अब उसी के साथ, उसी छत पर, दूसरों को उठा रही थी। नागपाल की मशीन ने जिन दो लड़कियों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया था, वो अब, आख़िरकार, एक ही तरफ़ थीं।

और नित्या? नित्या ने उस साल अपना वज़ीफ़ा पूरे कॉलेज में सबसे ऊँचे नंबरों से बचाया, अपनी मेहनत से, किसी शर्त से नहीं। उसकी माँ, उस छोटे शहर में, बरसों बाद पहली बार बिना क़र्ज़ और बिना डर के सोई। और सान्या, कभी उसकी सबसे बड़ी दुश्मन, अब उसके ठीक बग़ल वाली रैंक पर थी, एक दोस्त की तरह, एक होड़ की तरह नहीं।

"तो, मास्टर कियान। ... देश का नंबर एक, और ज़मीन पर बैठ कर बच्चों को तीन का पहाड़ा पढ़ा रहा है। ... पता है, बारह हफ़्ते पहले मुझे तुझे किसी तरह पास कराना था, वरना मेरा वज़ीफ़ा चला जाता।"

"और आज? आज मैं पास भी हो गया, तेरा वज़ीफ़ा भी बच गया, और ऊपर से तेरे हिस्से में एक मास्टर भी आ गया, जो मुफ़्त में पढ़ाता है।"

"दुनिया का सबसे महँगा, मुफ़्त वाला मास्टर।"

"तो अब आगे क्या, मास्टरजी? दो साल इन बच्चों को पढ़ाएगा, फिर?"

"फिर उसी संस्थान जाऊँगा, नित्या। पर इस बार वो मुझे मेरी शर्तों पर बुला रहे हैं, क्योंकि इस बार मैंने रैंक बख़्शवाई नहीं, अपने नाम से कमाई है। ... दो साल ये छत, फिर वो बड़ी दुनिया। और दोनों जगह, बिना किसी नक़ाब के, अपने ही नाम से।"

"और मैं?"

"और तू मेरे साथ। हर बेंच पर, हर छत पर, हर शहर में। ... अब तो तू मुझे हल कर चुकी है, नित्या। अपने सबसे मुश्किल सवाल से पीछा छुड़ाना अब तेरे लिए मुश्किल है।"

और वहीं, उस छत पर खड़े-खड़े, नित्या ने पहली बार पूरी कहानी को एक ही नज़र में देखा। जिसे पूरा कॉलेज कमरे का सबसे बड़ा बुद्धू समझता था, वो असल में उस कमरे का सबसे तेज़, और सबसे नेक, दिमाग़ था। आख़िरी बेंच कोई नाकामी की जगह नहीं थी। वो बस वो जगह थी, जहाँ कमरे का सबसे होशियार लड़का, जान-बूझ कर, चुपचाप बैठ गया था।

और कॉलेज में भी, उसी छत की चाय वाली तपरी पर, जहाँ कभी एक टॉपर एक ऊँघते बुद्धू को घसीट कर ट्यूशन के लिए लाई थी, अब हर शाम एक छोटी सी क्लास लगने लगी थी। कियान और नित्या, दोनों मिल कर, उन बच्चों को मुफ़्त पढ़ाते जो पीछे छूट जाते थे। जिस छत पर कभी उनकी जंग शुरू हुई थी, वो अब पढ़ाने की, और थोड़ी सी मोहब्बत की, जगह बन गई थी।

"सोच, कियान। ... इसी तपरी पर मैंने तुझे नियम गिनाए थे, पहला नियम, वक़्त पर आना। ... और तू पहले ही दिन कॉमिक पर लार टपकाते हुए सो गया था। ... आज इसी तपरी पर, तू इन बच्चों को वक़्त की क़ीमत पढ़ा रहा है। ... ज़िंदगी भी क्या-क्या घुमा देती है।"

और तभी, उस स्कूल के दरवाज़े से, बच्चों का एक नया झुंड अंदर आया। शोर मचाते, धक्का-मुक्की करते, कुछ डरे हुए, कुछ आधे-अधूरे। और उन सबमें सबसे पीछे, एक दुबला सा लड़का, नज़र झुकाए, चुपचाप सबसे आख़िरी बेंच की तरफ़ बढ़ गया।

"देख, नित्या। ... वो पीछे वाला।"

"आख़िरी बेंच वाला।"

"हर कमरे में एक होता है। ... और अक्सर वही होता है जिस पर किसी की नज़र नहीं जाती, और जो सबसे ज़्यादा देखे जाने के लायक़ होता है। ... चल, उसे बुला। क्या पता, वो भी किसी दिन, इस कमरे का सबसे तेज़ दिमाग़ निकले।"

और बंटी, बिना बुलाए, पहले ही उस दुबले लड़के के पास पहुँच चुका था, अपनी वही पुरानी टूटी-फूटी अकड़ के साथ।

"ऐ, पीछे क्यों बैठा है, डर मत। ... इस स्कूल में सबसे पहले एक बात सीख ले। ... यहाँ का सबसे बड़ा मास्टर, देश का नंबर एक, वो भी कभी इसी आख़िरी बेंच पर बैठता था। ... तो बैठ, आराम से। हो सकता है, तेरी क़िस्मत की बेंच भी यही हो।"

और दो मेंटर, जो कभी एक बुद्धू और एक टॉपर थे, एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिए। क्योंकि अब वो एक राज़ जानते थे, जो बाक़ी दुनिया नहीं जानती। कि आख़िरी बेंच कोई पिछली क़तार नहीं होती। वो बस एक अगली क़तार होती है, जिसे अभी किसी ने पहचाना नहीं। और उस दुबले लड़के की झुकी हुई नज़र में, दोनों को एक जाना-पहचाना सा कुछ दिखा, वही चुपचाप जलती हुई चिंगारी, जिसे कभी किसी ने आख़िरी बेंच पर देखा नहीं था।

वो लड़का कभी सिर्फ़ आख़िरी बेंच वाला नहीं था। ... वो हमेशा से वो था, जिसे हराना सबसे मुश्किल था। ... और उस छत पर, अपने पिता के नाम के नीचे, अपने लोगों के बीच, अपने प्यार के साथ खड़ा, कियान आख़िरकार वही था, जो वो हमेशा से था। बिना नक़ाब। बिना डर। बस, कियान।

कहानी यहाँ ख़त्म होती है। पर उस छत पर, हर सुबह, एक नई क्लास शुरू होती है। और हर क्लास में, सबसे पीछे, कोई न कोई नया लास्ट बेंच वाला बैठा होता है, नज़र झुकाए, ख़ामोश, इस इंतज़ार में कि कोई उसे देखे। ... बस किसी एक इंसान के, उसे ठीक से देख लेने भर की, देर होती है। ... और अगर आप ग़ौर से देखें, तो शायद वो सबसे पीछे बैठा लड़का, असल में, वो हो, जिसे हराना सबसे मुश्किल है।

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