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Chapter 4 of 25 11 min read

फ़र्ज़ी नाम

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

शहर के एक बंद गोदाम में, एक अकेले बल्ब की रोशनी में, एक मेज़ पर तीन चीज़ें रखी थीं। एक एडमिट कार्ड, एक पतली प्लास्टिक की परत, और एक मोटा लिफ़ाफ़ा।

"देख, कलाकार। ये है अंकित तिवारी का एडमिट कार्ड। तस्वीर तेरी, नाम उसका। सेंटर पर कोई सवाल नहीं करेगा। सब सेट है।"

"बायोमेट्रिक? आजकल तीन जगह अँगूठा लगता है। एक भी मैच न हुआ, तो पूरा खेल ख़त्म।"

"उसका इंतज़ाम है। ये पारदर्शी परत, इस पर अंकित का निशान छपा है। अँगूठे पर चिपका लेना। मशीन को धोखा दे देगी। और अंदर का ऑपरेटर अपना है। वो आँख बंद कर लेगा, जब तक तू सही रक़म वाला बंदा है।"

कियान ने वो परत उठाई, उसे रोशनी में देखा, और उसकी बारीकियाँ परखीं, जैसे कोई सर्जन औज़ार परखता है। उसे डर नहीं था। डर वालों की उँगलियाँ काँपती हैं। उसकी उँगलियाँ पत्थर थीं।

"सेंटर पर सीसीटीवी कहाँ-कहाँ हैं? और अंकित तिवारी की उम्र इस कार्ड पर उन्नीस लिखी है। मेरा चेहरा उन्नीस का नहीं लगता। ऑपरेटर को इशारा कर देना, ज़्यादा देर मेरा चेहरा स्क्रीन पर न रखे।"

"देखा, यही बात है तुझमें। बाक़ी लड़के पर्चे से डरते हैं, तू कैमरे गिनता है। तूने ये सब कहाँ से सीखा, कलाकार?"

"जहाँ से इंसान सब कुछ सीखता है, भाई। मजबूरी से।"

"पैसा कब?"

"आधा अभी, आधा पर्चे के बाद। और सुन, ये सबसे बड़ा है। इसके बाद तेरा सेठ धनराज वाला कर्ज़ ख़त्म। तू आज़ाद। सोच, कैसा लगेगा जब पहली बार तेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीं होगा।"

कियान ने कुछ नहीं कहा। पर उस एक पल में उसने वो सपना देखा जो वो ख़ुद को देखने नहीं देता था, एक सुबह, जब वो सिर्फ़ कियान होगा, किसी 'समर', किसी 'अंकित' का बोझ उठाए बिना।

"भाई, एक बात साफ़ कर दूँ। ये आख़िरी है। इसके बाद न कोई एडमिट कार्ड, न कोई फ़र्ज़ी नाम। कर्ज़ ख़त्म, तो कियान भी इस दुनिया से ख़त्म।"

"हाँ, हाँ, आख़िरी। तुम कलाकार लोग हर बार यही कहते हो। पर देख, दरवाज़ा खुलना आसान है, कलाकार। बंद करना मुश्किल। ख़ैर, वो बाद की बात है। अभी तो बस अंगूठा, कार्ड, और पैसा।"

कियान ने उस मुस्कान को नोट किया, पर कुछ नहीं कहा। उसे नहीं पता था कि सिकंदर के पीछे एक और आदमी था, जिसके लिए कियान का ये राज़ सोने से ज़्यादा क़ीमती था। अभी नहीं। अभी उसे बस रोशनी का स्कूल महफ़ूज़ रखना था।

पर वो सुबह अभी दूर थी। क्योंकि अगली सुबह, कियान को एक और इम्तिहान देना था। कहीं ज़्यादा मुश्किल। नित्या का प्रगति टेस्ट।

और यहीं पर उसकी पूरी ज़िंदगी का सबसे अजीब गणित शुरू होता था।

"ठीक है, कियान। ये तुम्हारा पहला असली टेस्ट है। बीस सवाल। तुम्हें कम से कम इतने सही करने हैं कि ट्रस्ट को लगे तुम सुधर रहे हो। समझे? कोशिश करो।"

"बीस सवाल? मैडम, मुझे तो दो से आगे गिनती में पसीना आ जाता है।"

अब हक़ीक़त ये थी कि कियान इन बीस सवालों को दो मिनट में हल कर सकता था। पर उसकी असली समस्या उलटी थी। उसे ठीक इतने सही करने थे कि नित्या की शर्त बची रहे, पर एक भी ज़्यादा नहीं, वरना बुद्धू का मुखौटा उतर जाता।

तो कियान ने पेन उठाया, और दुनिया की सबसे अजीब मेहनत शुरू की, ठीक-ठीक औसत बनने की मेहनत।

"पास लाइन पैंतीस है। ट्रस्ट को खुश करने के लिए चालीस चाहिए। पर पचास से ऊपर गया तो शक होगा। तो... बयालीस। हाँ, बयालीस परफ़ेक्ट है। बयालीस पर कोई सवाल नहीं पूछता।"

उसने जानबूझ कर तीन आसान सवाल ग़लत किए, ताकि औसत लगे। एक कठिन सवाल आधा सही किया, ताकि लगे कि 'कोशिश' कर रहा है। और एक जगह, आदत से, सही जवाब लिख कर काट दिया, और उसकी जगह ग़लत लिखा।

"भाई, ये क्या कर रहा है? सही जवाब काट कर ग़लत लिख रहा है? उलटा चोर! बाक़ी लोग ग़लत काट कर सही लिखते हैं, ये सही काट कर ग़लत लिखता है!"

"बंटी, ये कला है। हर कोई नहीं समझ सकता। तू बस देख और सीख।"

बंटी ने सिर पकड़ लिया। उसे लगा उसका दोस्त पागल है। उसे नहीं पता था कि वो दुनिया का इकलौता ऐसा छात्र देख रहा है जो फेल होने के लिए पसीना बहा रहा था।

"कियान, ये आख़िरी सवाल तो बहुत आसान है। बस इतना बताओ, अगर एक ट्रेन साठ की रफ़्तार से चले, तो दो घंटे में कितना जाएगी?"

"मैडम, ये तो ट्रेन पर निर्भर करता है। अगर बीच में चाय के लिए रुकी, तो कम। और अगर लेट है, जो कि हमेशा होती है, तो कहीं नहीं पहुँचेगी।"

नित्या ने माथा पकड़ लिया। जवाब बेतुका था। पर उसमें एक बात थी, वो पूरी तरह ग़लत नहीं था, बस ऐसा मोड़ दिया गया था कि सही न लगे। जैसे कोई जानबूझ कर पटरी से उतरा हो।

"एक सौ बीस, कियान। जवाब एक सौ बीस है। पर तुमने वो नहीं लिखा, तुमने चाय लिख दी।"

"देखा मैडम, मुझे चाय के अलावा सचमुच कुछ नहीं आता। मैंने पहले ही कहा था।"

टेस्ट ख़त्म हुआ। कियान ने कॉपी बड़ी विनम्रता से नित्या को थमाई, ठीक बयालीस नंबर की मेहनत के साथ।

उस शाम, नित्या अपने कमरे में उस कॉपी को जाँच रही थी। और जैसे-जैसे वो जाँचती गई, उसके माथे पर एक बल पड़ता गया।

"ये अजीब है। बहुत अजीब।"

क्योंकि टॉपर एक चीज़ जानते हैं, ग़लतियों का भी एक पैटर्न होता है। एक सचमुच का कमज़ोर छात्र बुनियादी चीज़ों में ग़लती करता है, और कठिन में। पर कियान की कॉपी उलटी थी।

"इसने सबसे कठिन सवाल का पहला आधा हिस्सा बिलकुल सही किया, और फिर आसान वाला ग़लत? ये तो ऐसा है जैसे किसी ने नाप कर, तौल कर, ठीक इतने नंबर बनाए हों कि पास हो जाए, पर होशियार न लगे।"

उसने वो कॉपी नीचे रखी और खिड़की से बाहर देखा। एक सवाल उसके मन में कील की तरह गड़ गया था। कोई इंसान जानबूझ कर औसत क्यों बनना चाहेगा? और उससे भी बड़ा सवाल, कोई ऐसा क्यों कर सकता है, जब तक कि वो सचमुच होशियार न हो?

उसने वो टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट वाली कॉपी उठाई, और उसके बग़ल में वो 'समर' वाला मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ रखा, जिसकी लिखावट तीखी और बेदाग़ थी। दो काग़ज़, एक ही बैग से निकले, दो बिलकुल अलग हाथों के।

"या तो ये दो अलग लोग हैं... या फिर एक ही इंसान, जो एक हाथ से बुद्धू लिखता है और दूसरे से जीनियस। और अगर ये सच है, कियान, तो तुम मेरी ज़िंदगी के सबसे बड़े झूठ हो।"

"तुम पास होना नहीं चाहते, कियान। तुम पास होना छिपाना चाहते हो। पर क्यों?"

"अरे टॉपर मैडम! रात के ग्यारह बजे किसकी कॉपी में डूबी हो? कहीं वो लास्ट बेंच वाले की तो नहीं? पूरा हॉस्टल कह रहा है तुम उस पर बहुत मेहनत कर रही हो।"

"पायल, ये मज़ाक नहीं है। ये लड़का... इसमें कुछ गड़बड़ है। इसकी ग़लतियाँ भी बहुत होशियार हैं। मुझे लगता है ये बुद्धू है ही नहीं।"

"हे भगवान। तुम पहली इंसान हो जो किसी लड़के के फेल होने पर उस पर शक कर रही है। बाक़ी लड़कियाँ पास वालों पर मरती हैं, तुम फेल वाले की जासूसी कर रही हो।"

"जासूसी नहीं, पायल। मेरी स्कॉलरशिप उस लड़के पर टिकी है। और अगर वो जानबूझ कर फेल हो रहा है, तो इसका मतलब वो मुझे भी डुबो रहा है। मुझे पता लगाना है, वो ऐसा क्यों कर रहा है।"

और जबकि नित्या यहाँ, अपने कमरे में, इस पहेली से जूझ रही थी, कियान शहर के दूसरे कोने में, एक ऐसी जगह चला गया था जहाँ उसे कभी नहीं होना चाहिए था।

नागपाल क्लासेज़। शहर की सबसे बड़ी कोचिंग। शीशे की एक ऊँची इमारत, जिसके हर होर्डिंग पर मुस्कुराते टॉपर, और हर टॉपर के नीचे एक क़ीमत। यहीं सिकंदर का आदमी अंकित तिवारी के कार्ड का आख़िरी सत्यापन करने वाला था।

कियान हुड में चेहरा छिपाए, तेज़ क़दमों से लॉबी पार कर रहा था। बस दो मिनट। कार्ड लेना था, और निकल जाना था। किसी को उसका यहाँ होना नहीं दिखना चाहिए था।

और तभी, बिलकुल सामने, कोचिंग के दरवाज़े से एक लड़की निकली, हाथ में किताबें, कंधे पर बैग। सान्या बेदी। अपनी अलग कोचिंग के लिए, यहीं, इसी इमारत में।

दोनों की नज़रें एक पल के लिए मिलीं। कियान ने तुरंत सिर झुकाया, पर देर हो चुकी थी। सान्या की आँखें फैल गईं।

"कियान? तुम? यहाँ, नागपाल क्लासेज़ में?"

कियान रुका। उसका दिमाग़, जो सेकंड में गणित के सबसे कठिन सवाल हल करता था, अब एक ही सवाल पर अटक गया, बचने का बहाना क्या हो।

"अरे, सान्या। हाँ, बस... यहाँ के वाशरूम अच्छे हैं न। मैं बस वाशरूम..."

"वाशरूम? पूरे शहर की सबसे महँगी कोचिंग में, तुम, लास्ट बेंच वाला कियान, वाशरूम के लिए आए हो? जो कॉलेज की क्लास में नहीं जागता, वो यहाँ तक चल कर आया?"

"क्या करूँ, सान्या। रास्ते से गुज़र रहा था, ज़ोर की लग आई। महँगी जगह के वाशरूम में भी वही होता है जो सस्ती जगह में। बराबरी का मामला है।"

"मज़ाक बंद करो। तुम बंटी के साथ हॉस्टल में रहते हो, शहर के इस कोने में तुम्हारा कोई काम नहीं। और तुमने पिछले हफ़्ते दो दिन कॉलेज छोड़ा था। मैंने हाज़िरी रजिस्टर देखा है, कियान। मैं हर चीज़ देखती हूँ।"

और फिर सान्या ने वो देखा जो एक तेज़ नज़र देख लेती है। कियान की जेब से झाँकता एक काग़ज़ का कोना। एक एडमिट कार्ड जैसा। उसकी आँखें उस पर टिक गईं।

"ये तुम्हारी जेब में क्या है? ये एडमिट कार्ड है? किस परीक्षा का? और उस पर ये नाम..."

कियान की साँस रुक गई। एक इंच और, और सान्या उस नाम को पढ़ लेती, अंकित तिवारी, एक मरे हुए लड़के का नाम, एक बुद्धू की जेब में। उसका दिमाग़ बिजली की तरह चला।

"अरे ये? ये तो बंटी का लॉटरी टिकट है। वो कहता है इस बार लाख का इनाम निकलेगा। मैं तो कहता हूँ पैसे बरबाद, पर वो मानता नहीं। इसीलिए यहाँ आया था, एक दुकान का पता पूछने।"

उसने काग़ज़ को जेब में और गहरा धकेला, एक बेढंगी, बुद्धू वाली हरकत से, जिससे सान्या की नज़र एक पल को नाम से हट गई। पर सिर्फ़ एक पल को।

"लॉटरी टिकट पर तस्वीर नहीं होती, कियान। और मैंने साफ़ देखा, उस पर तुम्हारी तस्वीर थी, पर नाम कोई और था।"

कमरे की हवा भारी हो गई। सान्या अब खेल नहीं रही थी। वो एक क़दम और पास आई, आवाज़ धीमी, पर धार तेज़।

"कियान, सच बताओ। तुम असल में हो कौन? क्योंकि जो लड़का मुझे यहाँ दिख रहा है, फ़र्ज़ी नाम वाले कार्ड के साथ, वो कॉलेज वाला बुद्धू बिलकुल नहीं है। और अगर मैं ये बात प्रोफ़ेसर सभरवाल को बता दूँ, तो सोचो क्या होगा।"

लॉबी की चमकती रोशनी में, नागपाल की उस इमारत में जहाँ हर सच बिकता था, कियान का सबसे बड़ा सच एक कोने से झाँक रहा था। सामने खड़ी थी वो लड़की जिसे नित्या की स्कॉलरशिप चाहिए थी, और जिसके हाथ में अभी-अभी वो हथियार आया था जिसकी उसे तलाश थी।

एक फ़र्ज़ी नाम। एक तेज़ नज़र। और एक ऐसा सवाल, जिसका सच कियान की पूरी दुनिया, और नित्या की भी, राख कर सकता था।

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