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Chapter 15 of 25 12 min read

सान्या का पत्ता

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

उसी शहर के एक तंग मोहल्ले में, एक छोटे से कमरे में, सान्या बेदी फ़ोन कान से लगाए दीवार की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी। दूसरी तरफ़ उसके पिता की थकी हुई आवाज़ थी। दुकान का किराया, बिजली का बिल, छोटे भाई की फ़ीस, और एक ही उम्मीद, जो हर बार दूसरे नंबर पर आ कर रुक जाती थी।

"हाँ पापा, इस बार पक्का। मैं वादा करती हूँ। ये वज़ीफ़ा मेरा होगा, और फिर आपको दुकान के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। बस थोड़े दिन और। ... नहीं पापा, आप रोइए मत। मैं हूँ न।"

और फ़ोन रखते ही सान्या की आँखें भर आईं। क्योंकि जो लड़की पूरे कॉलेज को सख़्त और ठंडी लगती थी, वो दरअसल वही बोझ उठा रही थी जो नित्या उठाती थी। एक घर। एक उम्मीद। एक डर। बस उसका दूसरा नंबर था, और दूसरे नंबर वाले को कोई हमदर्दी नहीं देता।

उसकी मेज़ पर एक फ़ाइल पड़ी थी। कियान के प्रगति टेस्ट के काग़ज़, नंबरों का हिसाब, और एक सबूत, कि वो बयालीस नंबर बनाए हुए थे, गढ़े हुए। ये उसका पत्ता था। इसे कॉलेज के सामने रख देती, तो नित्या की मेंटरशिप झूठी साबित होती, शर्त टूटती, और वज़ीफ़ा उसका।

एक पल को उसका हाथ रुका। नित्या ने उसका कभी बुरा नहीं किया था। पर फिर उसे अपने पिता की आवाज़ याद आई, और उसने वो फ़ाइल उठा ली। भूख हमदर्दी से बड़ी होती है। और सान्या भूखी थी, नंबरों की, इज़्ज़त की, बचने की।

अगली सुबह, सान्या वो फ़ाइल प्रोफ़ेसर सभरवाल की मेज़ पर रख आई। और दोपहर तक, पूरे कॉलेज में एक ही ख़बर थी। कियान की प्रगति फ़र्ज़ी थी, और मेंटरशिप की औपचारिक समीक्षा बैठ रही थी। एक वाइवा। एक ज़बानी इम्तिहान, जो तय करता कि ये पूरी शर्त सच थी या धोखा।

नित्या को जब पता चला, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। क्योंकि इस एक वाइवा पर सब कुछ टिका था। अगर पैनल को यक़ीन हो गया कि कियान अनपढ़ है, नाक़ाबिल है, तो शर्त उसी पल टूट जाती, और उसका वज़ीफ़ा सान्या के हाथ में।

"कियान, सुनो। कल वाइवा है। पैनल के सामने। तुम्हें बस इतना दिखाना है कि तुम सीख रहे हो, कि मेंटरशिप काम कर रही है। एक भी सही जवाब, कियान, बस एक। ताकि साबित हो कि तुम नाक़ाबिल नहीं हो।"

"और अगर मैं सही जवाब दूँ, नित्या? तो पूरा कमरा देखेगा कि लास्ट बेंच वाला बुद्धू अचानक होशियार कैसे हो गया। तुम्हें अंदाज़ा है वहाँ कौन बैठा होगा? नागपाल। उसकी आँखों के सामने चमकना, ख़ुद अपनी क़ब्र खोदना है।"

और यही वो पुराना पिंजरा था, जो अब और तंग हो गया था। नित्या को बचाने के लिए कियान को चमकना था। और चमकते ही नागपाल का अल्टीमेटम पूरा हो जाता, वो दिख जाता, पकड़ा जाता। उसकी हिफ़ाज़त उसकी गुमनामी में थी। और नित्या की हिफ़ाज़त उसकी चमक में। एक ही पल, दो उलटी ज़रूरतें।

अगले दिन, समीक्षा कक्ष। एक लंबी मेज़। एक तरफ़ प्रोफ़ेसर सभरवाल, बीच में। उनके साथ पैनल। और एक कुर्सी पर, मेहमान की तरह, पर राजा की तरह बैठा, यशपाल नागपाल। ट्रस्ट का दानदाता, जो हर वज़ीफ़े की जाँच का हक़ रखता था। कोने में नित्या, और दरवाज़े के पास सान्या।

"कियान, ये कोई सज़ा नहीं है। ये एक जाँच है। एक शिकायत आई है कि तुम्हारी प्रगति असली नहीं, बनाई हुई है। इस पैनल को बस ये देखना है कि तुम्हारी मेंटर ने तुम्हें कुछ सिखाया या नहीं। तो आराम से। हम पूछेंगे, तुम जवाब दोगे।"

और कियान ने वही किया जो वो बारह साल से करता आया था। उसने अपने कंधे झुकाए, आँखें आधी बंद कीं, और एक बेवक़ूफ़ी भरी मुस्कान ओढ़ ली। पहला सवाल आया, आसान सा। कियान ने खोपड़ी खुजाई।

"सर, ये तो... रुकिए... मुझे याद आ रहा है... ये वो वाला है न, जिसमें एक्स होता है? या वाई? दोनों में से एक तो पक्का होता है, सर।"

कमरे में एक दबी हुई हँसी दौड़ गई। सान्या के होंठों पर एक हल्की मुस्कान आई, उसका पत्ता चल रहा था। नागपाल आराम से पीछे टिका, संतुष्ट। और नित्या की मुट्ठियाँ मेज़ के नीचे कस गईं। कियान डूब रहा था, और उसे लग रहा था वो जान-बूझ कर डूब रहा है।

"कियान, ये आठवीं कक्षा का सवाल था। ... प्रोफ़ेसर, अगला सवाल पूछिए। थोड़ा कठिन। देखते हैं इस मेंटरशिप ने कुछ पढ़ाया भी है, या सिर्फ़ काग़ज़ों पर नंबर लिखे हैं।"

"सर, एक हिंट दे दीजिए न? हमारे यहाँ तो मैडम भी हिंट देती हैं। ... अच्छा, वाई है? नहीं? फिर एक्स? ... सर, आप ही बता दीजिए, मैं मान लूँगा। आपकी बात तो पक्की सही होगी। आप इतने बड़े प्रोफ़ेसर जो हैं।"

पूरा कमरा हँस पड़ा। सान्या ने राहत की एक साँस ली, उसका पत्ता ठीक चल रहा था। नागपाल आराम से पीछे टिका, आँखों में एक ठंडी चमक, अपना शिकार जाल में उतरता देखते हुए। और नित्या को लगा जैसे उसकी अपनी साँस किसी ने मुट्ठी में भींच ली हो।

और नित्या समझ गई कि हो क्या रहा है। कियान अपनी जान की हिफ़ाज़त कर रहा था, अपनी गुमनामी बचा रहा था, नागपाल के सामने न चमक कर। पर उसी के साथ, वो उसका वज़ीफ़ा भी डुबो रहा था। हर ग़लत जवाब के साथ, उसकी माँ की दवाई, उसका घर, थोड़ा और दूर जा रहा था।

"कियान... एक बार। सिर्फ़ एक बार। मेरे लिए।"

और तभी, नागपाल ने आगे झुक कर, बहुत मीठी आवाज़ में, प्रोफ़ेसर से कहा कि क्यों न वो ख़ुद एक सवाल पूछें। एक असली सवाल। और उसने जो सवाल रखा, वो कोई कॉलेज का सवाल नहीं था। वो देश की सबसे कठिन परीक्षा का एक सवाल था। एक ऐसा सवाल जिसे हल करना तो दूर, समझना भी टॉपरों को पसीना ला देता।

"बस यूँ ही, कियान। मज़े के लिए। अगर तुम्हारी मेंटर इतनी क़ाबिल है, तो शायद उसने तुम्हें कुछ ऊँचा भी सिखाया हो। ये हल करो। और अगर न कर पाओ, तो कोई बात नहीं। हम सब समझ जाएँगे कि ये मेंटरशिप बस एक... मज़ाक थी।"

और नित्या का दिल बैठ गया। क्योंकि ये सवाल एक जाल था। अगर कियान इसे हल न करे, तो शर्त टूटे, वज़ीफ़ा जाए। और अगर हल कर दे, तो नागपाल को वो सबूत मिल जाए जो वो बारह साल से ढूँढ रहा था, कि ये लड़का साधारण नहीं है।

कियान ने वो सवाल देखा। और उसकी आँखों में, एक पल के लिए, वो बुद्धूपन ग़ायब हो गया। उसने सवाल पढ़ा, और उसका दिमाग़ अपने आप उसे हल करने लगा, जैसे साँस लेना। जवाब उसके सामने था, साफ़, आसान, चमकता हुआ। बस उसे बोलना था। और बोलते ही, सब कुछ बदल जाता।

उसने नित्या की तरफ़ देखा। कोने में बैठी, साँस रोके, आँखों में एक पूरी दुनिया लिए। उसकी माँ, उसका घर, उसका भविष्य, सब उस एक जवाब पर टिका था। और कियान ने बारह साल में पहली बार वो फ़ैसला लिया जो उसने कभी नहीं लिया था। किसी और के लिए, अपने आप को ख़तरे में डालने का।

उसने सोचा, अगर वो चुप रहा, तो नित्या टूट जाएगी। उसकी माँ, उसकी दवाई, उसका घर, सब बिखर जाएगा। और अगर वो बोला, तो वो ख़ुद टूट जाएगा, उसका मुखौटा, उसका वादा, उसकी गुमनामी। और पहली बार, तराज़ू का पलड़ा अपनी तरफ़ नहीं झुका। वो नित्या की तरफ़ झुक गया। कियान ने एक गहरी साँस ली।

"सर... ये सवाल जितना डरावना दिखता है, उतना है नहीं। ... देखिए, अगर आप इसे सीधे हल करने बैठें, तो ये आपको घंटों घुमाएगा। पर नित्या मैडम ने मुझे एक बात सिखाई थी। कि हर मुश्किल सवाल के अंदर एक आसान सवाल छिपा होता है। बस उसे ढूँढना पड़ता है।"

कमरे की हँसी अचानक थम गई। कियान की आवाज़ बदल गई थी। वो झिझक ग़ायब थी, वो बुद्धूपन ग़ायब था। एक नई आवाज़ थी, साफ़, शांत, और बहुत तेज़। सभरवाल ने अपनी क़लम नीचे रखी। सान्या की मुस्कान जम गई।

"इस पूरे सवाल में एक ही चीज़ मायने रखती है, ये आख़िरी शर्त। बाक़ी सब सिर्फ़ आपको भटकाने के लिए है, शोर। जैसे ही आप इस शर्त को यहाँ रखते हैं, पूरा सवाल दो लाइन में सिमट जाता है। और जवाब है, यही। ... मैंने ये अपने दम पर नहीं सोचा, सर। मैंने बस वो देखा जो मैडम ने मुझे देखना सिखाया।"

एक पल के लिए कमरे में कोई साँस भी नहीं ले रहा था। जवाब बिलकुल सही था। इतना सही, इतना साफ़, कि पैनल के सबसे सीनियर प्रोफ़ेसर को भी उसे समझने में एक मिनट लगा। और वो लड़का, जो दो मिनट पहले एक्स और वाई में उलझा था, उसने वो हल कर दिया था जो देश के टॉपर नहीं कर पाते।

और कियान ने बहुत होशियारी से एक काम किया था। उसने हर सही जवाब का सेहरा नित्या के सिर बाँध दिया था। 'मैडम ने सिखाया', 'मैडम ने दिखाया'। ताकि ये चमक उसकी न लगे, मेंटरशिप की लगे। ताकि नित्या की शर्त बच जाए। उसने अपने आप को खोलने के बदले उसे बचाया था।

"कियान... ये जवाब... ये मैंने आज तक किसी छात्र से नहीं सुना। ... प्रोफ़ेसरों, मुझे लगता है इस समीक्षा का नतीजा साफ़ है। ये मेंटरशिप न सिर्फ़ असली है, ये असाधारण है। शिकायत ख़ारिज। नित्या सक्सेना की शर्त बरक़रार रहेगी।"

और नित्या ने एक लंबी, काँपती साँस छोड़ी, जिसे वो न जाने कब से रोके हुए थी। उसका वज़ीफ़ा बच गया था। पर उसका दिल इसलिए नहीं धड़क रहा था। वो इसलिए धड़क रहा था क्योंकि उसने अभी-अभी देखा था कि कियान ने अपनी सबसे बड़ी हिफ़ाज़त, अपनी गुमनामी, उसके एक वज़ीफ़े के लिए दाँव पर लगा दी थी।

"तुमने ये क्यों किया, कियान? तुमने ख़ुद को दिखा दिया, सबके सामने। नागपाल के सामने। तुम्हें अंदाज़ा है तुमने अभी क्या किया?"

"पता है, मैडम। पूरा पता है। ... पर तुम्हारी माँ की दवाई एक जवाब से ज़्यादा ज़रूरी थी। इस बार हिसाब मैंने नहीं लगाया। इस बार दिल ने लगाया। और दिल, पता है न, सबसे कच्चा हिसाब लगाता है।"

और नित्या के पास कहने को कुछ नहीं बचा। क्योंकि उस लड़के ने अभी-अभी उसके एक वज़ीफ़े के बदले अपनी बारह साल की गुमनामी बेच दी थी, बिना एक पल हिचके। और उसे इसका ज़रा भी अफ़सोस नहीं था। और यही बात नित्या को अंदर तक हिला गई।

"पर... सर, ये नामुमकिन है। ये लड़का पूरे साल फेल होता आया है, और अचानक ये? ये कोई मेंटरशिप नहीं है, सर, ये कुछ और है, ये..."

और सान्या की आवाज़ बीच में ही रुक गई। क्योंकि पहली बार, उसे भी वही शक हुआ जो कभी नित्या को हुआ था। कि इस बुद्धू के नीचे कुछ और है। कुछ बहुत बड़ा। पर उसका पत्ता हार चुका था, और कोई उसकी सुनने को तैयार नहीं था।

और उसी पल, मेज़ के दूसरे छोर पर, एक और इंसान वही देख रहा था जो सान्या ने देखा था। पर उसके चेहरे पर शक नहीं था। उसके चेहरे पर एक धीमी, ठंडी मुस्कान थी। यशपाल नागपाल आगे झुका, और उस लड़के को यूँ देखा जैसे कोई शिकारी बरसों बाद अपने शिकार को खुले में खड़ा देखता है।

क्योंकि बारह साल में पहली बार, उसने अपनी आँखों से वो देख लिया था जिसका उसे सिर्फ़ शक था। कि लास्ट बेंच वाला बुद्धू, देवनाथ का बेटा, दरअसल एक असाधारण, ख़तरनाक दिमाग़ था। और अब जब पूरे कमरे ने उसकी चमक देख ली थी, तो नागपाल के पास वो हथियार था जिसका उसे इंतज़ार था।

"तो ये है असली कियान। शाबाश, बेटा। ... तुमने अभी-अभी मेरा सबसे मुश्किल काम आसान कर दिया।"

क्योंकि एक बुद्धू को प्रॉक्सी रैकेट के उस धुँधले चेहरे से जोड़ना नामुमकिन था। कोई यक़ीन न करता कि एक नाकारा लड़का देश के सबसे कठिन पर्चे हल कर रहा है। पर एक ऐसा लड़का, जिसकी असाधारण चमक अभी-अभी एक पूरे पैनल ने देखी थी? उसे उस धुँधली तस्वीर से जोड़ना, अब बहुत आसान था।

और कियान ने, जब उठ कर जाने लगा, तो नागपाल की उस मुस्कान को देखा। और उसका ख़ून जम गया। क्योंकि उसे उसी पल एहसास हुआ कि उसने नित्या को बचाने के चक्कर में क्या किया था। उसने अपने आप को दिखा दिया था। और नागपाल ने वो देख लिया था।

नित्या का वज़ीफ़ा बच गया था। पर कियान का मुखौटा, जो बारह साल से सलामत था, आज उसने ख़ुद अपने हाथों से चीर दिया था। और उस कमरे में बैठे एक आदमी ने वो सब देख लिया था। सान्या का पत्ता हार गया था। पर उसका पत्ता चलते-चलते, उसने अनजाने में नागपाल के हाथ में वो एक कार्ड थमा दिया था, जिसका इंतज़ार वो बारह साल से कर रहा था। और अब वो कार्ड चलने वाला था।

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