Chapter 9 of 25 12 min read
दो नामों वाला लड़का
लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi
अपने नामुमकिन छात्र को हल न कर पाकर नित्या वही करती है जो एक टॉपर किसी उलझे सवाल के साथ करता है, वो कियान की खोज-बीन शुरू कर देती है, और एक बेढंगी जासूसी में पीछा करते-करते पुराने शहर के एक ऐसे कोने में जा पहुँचती है जहाँ नाकाम बुद्धू एक शातिर, ख़तरनाक आदमी सिकंदर से मिल रहा है। कर्ज़ की घड़ी कसती है, और सिकंदर सबसे बड़ा काम रखता है, देश की सबसे मशहूर परीक्षा में एक टॉप-रैंक उम्मीदवार का रूप धरना, आज़ादी का टिकट और कियान की अब तक की सबसे ख़तरनाक चाल। पर सिकंदर की शर्तों में एक छिपा काँटा है, और सुनने वाले को पता चलता है कि ये फ़िक्सर बरसों से कियान का हर राज़ उसी एक आदमी तक पहुँचाता आया है जिस
नित्या सक्सेना अपनी ज़िंदगी में कभी कोई सवाल अधूरा नहीं छोड़ती थी। किताब का सवाल हो, या इंसान का। और इन दिनों उसके सिर पर एक ही सवाल सवार था, जिसका नाम था कियान।
उस रात हॉस्टल के कमरे में, नित्या ने अपनी दीवार पर एक चार्ट बना रखा था। तारीख़ें, नंबर, वो 'समर' वाला पुराना काग़ज़, और बीच में एक बड़ा सा सवालिया निशान।
"हे भगवान। नित्या। ये क्या है? तूने अपनी पूरी दीवार एक लड़के की तस्वीरों और तारीख़ों से भर दी है। लोग इसे प्यार कहते हैं, टॉपर। और तू इसे 'केस स्टडी' बोल रही है।"
"पायल, ये प्यार-व्यार नहीं है। ये एक अनसुलझा सवाल है। और मुझसे अनसुलझे सवाल हज़म नहीं होते। ये लड़का जान-बूझ कर फेल होता है, इसके पास ऐसी रसीदें हैं जो होनी नहीं चाहिए, ये किसी और की लिखावट में सवाल हल करता है। कुछ तो है।"
"हाँ हाँ, कुछ तो है। तेरे दिल में। सुन, बाक़ी टॉपर लड़कों के नोट्स चुराते हैं, और तू एक लड़के का पूरा राज़ चुराने की प्लानिंग कर रही है। कमाल है। और वैसे, इस 'सवाल' की आँखें अच्छी हैं, मैंने नोट किया है।"
"पायल! ... देख, कल वो कॉलेज से जल्दी निकल जाता है, हर मंगलवार। कहाँ जाता है? कोई नाकाम लड़का इतना पाबंद कैसे हो सकता है? कल मैं पता लगाऊँगी। बस देखूँगी, दूर से। एक टॉपर की तरह, सबूत के साथ।"
"जासूसी करने जा रही है टॉपर। भगवान उस लड़के को बचाए। और तुझे भी। क्योंकि जिस दिन तुझे इससे प्यार हुआ न, तू सबसे पहले उसी को सबूत के साथ साबित करेगी।"
"पायल, हँसी छोड़ अब। तुझे पता है मेरी माँ ने इस वज़ीफ़े के लिए क्या-क्या बेचा है। हर महीने वो फ़ोन पर पूछती है, बेटा, स्कॉलरशिप आई? और मैं झूठ बोलती हूँ कि सब ठीक है। अगर ये लड़का पास नहीं हुआ, तो वज़ीफ़ा सान्या का, और मेरी माँ का घर... इसलिए मैं ये सवाल नहीं छोड़ सकती। मुझे इसे हल करना ही है।"
"अच्छा, सॉरी। ... देख, मैं जानती हूँ तेरे लिए ये कितना बड़ा है। बस इतना कह रही हूँ, नित्या, इंसान किताब का सवाल नहीं होता। किताब का जवाब पीछे छपा होता है, इंसान का दिल में छिपा। कहीं ऐसा न हो कि तू जवाब ढूँढते-ढूँढते, ख़ुद सवाल में उलझ जाए।"
"मैं उलझी नहीं हूँ। ... शायद। बस, जब वो हँसता है न, पायल, तो एक पल के लिए वो बुद्धू नहीं लगता। कोई और लगता है। और मुझे उसी 'किसी और' को पकड़ना है। बस एक बार, आमने-सामने।"
नित्या ने एक तकिया पायल की तरफ़ उछाला। पर सच ये था कि पायल की बात कहीं न कहीं चुभ गई थी। नित्या ख़ुद नहीं जानती थी कि वो कियान का सच जानना चाहती है, या बस... कियान को जानना चाहती है।
अगली शाम। और नित्या सक्सेना, जो ज़िंदगी में कभी लेट नहीं हुई थी, अब एक जासूस बनने की कोशिश कर रही थी। जिसके लिए, ईमानदारी से कहें तो, वो बिल्कुल नहीं बनी थी।
उसने एक बड़ा सा दुपट्टा सिर पर लपेटा, धूप का चश्मा लगाया, और एक अख़बार उठा लिया, जिसे वो उल्टा पकड़े हुए थी। इस भेस में वो जासूस कम, और नाटक कंपनी की भूली-भटकी कलाकार ज़्यादा लग रही थी।
कियान कॉलेज के गेट से निकला, हमेशा की तरह हाथ जेब में, चाल ढीली, बेफ़िक्र। पर नित्या ने ग़ौर किया, आज उसकी चाल में वो ढीलापन दिखावा था। वो तेज़ चल रहा था। और वो सीधे कॉलेज वाली सड़क छोड़ कर, पुराने शहर की तंग गलियों में मुड़ गया।
गलियाँ पतली होती गईं। रोशनी कम होती गई। ये शहर का वो हिस्सा था जहाँ टॉपर नहीं आते। जहाँ दीवारों पर काई थी, और हवा में तंबाकू और पुराने लोहे की गंध। नित्या का दिल तेज़ धड़कने लगा। पर वो रुकी नहीं।
एक बार कियान अचानक रुका। नित्या हड़बड़ा कर एक गन्ने के रस वाले ठेले के पीछे दुबक गई, और सीधे रस की बाल्टी में कोहनी दे बैठी। पर कियान ने पीछे नहीं देखा। वो बस एक पल रुका था, जैसे कोई अपने पीछे की हवा सूँघ रहा हो, और फिर एक बंद दुकान की तरफ़ मुड़ गया।
नित्या ने अपनी कोहनी से टपकता गन्ने का रस पोंछा, दुपट्टा ठीक किया, और उस बूढ़े ठेले वाले को दो रुपए थमाए, जो उसे ऐसे घूर रहा था जैसे उसने रस नहीं, कोई राज़ चुराया हो। फिर वो दबे पाँव आगे बढ़ी, दिल में एक ही दुआ, कि कियान पीछे न मुड़े, और उसका ये बेढंगा भेस किसी को पहचान न पाए।
और वहाँ, एक पुराने बिलियर्ड्स पार्लर के धुँधले शीशे के पीछे, नित्या ने वो देखा जिसने उसके सारे हिसाब उलट दिए। कियान, कॉलेज का सबसे कंगाल, सबसे नाकाम लड़का, एक बेहद महँगे, इस्तरी किए सूट वाले आदमी के सामने बैठा था। जैसे कोई पुराना जान-पहचान का हो।
नित्या एक टूटी खिड़की की ओट में जम गई। वो आदमी कौन था? उसकी उँगलियों में सोने की अँगूठियाँ थीं, आवाज़ में मख़मल, और आँखों में वो ठंडक जो सिर्फ़ ख़तरनाक लोगों में होती है। और कियान... कियान उसके सामने बुद्धू नहीं लग रहा था। वो सतर्क लग रहा था। बराबरी में।
"तो, मेरे शहज़ादे। कैसा चल रहा है कॉलेज का नाटक? अभी भी आख़िरी बेंच पर सोते हो? ... मुझे तुम पर तरस आता है, कियान। इतना बड़ा दिमाग़, और इस्तेमाल एक क्लास में सोने के लिए। ये तो वैसा हुआ जैसे कोई तलवार से प्याज़ काटे।"
"मुझे तरस नहीं, हिसाब चाहिए, सिकंदर भाई। सीधे मतलब पर आओ। तुमने आज बुलाया, कोई ख़ास बात होगी। और तुम्हारी हर 'ख़ास बात' मुझे किसी नए ख़तरे में डालती है।"
"ख़तरा? नहीं, नहीं। इस बार मैं तुम्हारे लिए ख़तरा नहीं, आज़ादी लाया हूँ। ... बताओ, धनराज सेठ का कितना कर्ज़ बचा है? सच बताना।"
"आठ लाख। ब्याज मिला कर शायद और ज़्यादा। दो-तीन छोटे काम और करूँ, तो साल भर में उतर जाएगा।"
"साल भर। और मैं कहूँ कि एक ही काम में, एक ही दिन में, वो पूरा कर्ज़ उतर जाए? आठ लाख नहीं, पंद्रह लाख। एक झटके में। धनराज ख़त्म, और ऊपर से तुम्हारी बहन के स्कूल के लिए भी बच जाए। सोचो, कियान। एक दिन। और तुम आज़ाद।"
खिड़की के पीछे, नित्या की साँस रुक गई। कर्ज़। धनराज। पंद्रह लाख। ये शब्द उस दुनिया के नहीं थे जिस दुनिया की वो थी। ये लड़का किसी बहुत गहरे, बहुत काले पानी में डूबा हुआ था। और उसे लगा कि वो कियान को समझने आई थी, पर वो तो एक अजनबी को देख रही थी।
"पंद्रह लाख एक काम में। ... सिकंदर भाई, इतना पैसा कोई ऐसे ही नहीं देता। इतने में तो लोग ख़ून कर देते हैं। ये कौन सा काम है?"
"सबसे बड़ा। सबसे ऊँचा। ... देश की सबसे बड़ी परीक्षा, कियान। वो जिसकी टॉप रैंक टीवी पर आती है, अख़बार के पहले पन्ने पर छपती है। एक बड़े आदमी का बेटा है, रौनक अग्रवाल, बाप बिल्डर है, बेटे को गारंटीड टॉप रैंक चाहिए, दिखावे के लिए। और वो रैंक... तुम बन कर लाओगे।"
"नहीं। सिकंदर भाई, पागल हो? वो परीक्षा राष्ट्रीय है। सबसे कड़ी सुरक्षा, बायोमेट्रिक, कैमरे, कई परतें। और अगर मैंने टॉप रैंक बना दी, तो कैमरे मेरे पीछे भागेंगे। मेरा चेहरा हर जगह होगा। ये गुमनाम रहने का उलटा है। ये तो ख़ुद को रोशनी में खड़ा करना है।"
"रौनक की तस्वीर छपेगी, कियान। तुम्हारी नहीं। तुम बस अंदर जाओगे, रौनक का चेहरा, रौनक का नाम, रौनक की उँगलियों के निशान का जुगाड़, सब मेरे ज़िम्मे। तुम सिर्फ़ पर्चा हल करोगे। और तीन घंटे बाद, हमेशा के लिए ग़ायब। रौनक हीरो बन जाएगा, और तुम... तुम आज़ाद हो जाओगे।"
"और बायोमेट्रिक? आजकल हर बड़े सेंटर पर उँगलियों के निशान लिए जाते हैं, आँख की पुतली तक स्कैन होती है। अगर मेरा निशान रौनक के नाम से मैच नहीं हुआ, तो मैं वहीं, उसी कमरे में, बीच परीक्षा पकड़ा जाऊँगा। और फिर सिर्फ़ मैं नहीं डूबूँगा, सिकंदर भाई। मेरे साथ मेरे पापा का नाम डूबेगा। वो नाम, जिसे बचाने के लिए मैं ये सब कर रहा हूँ।"
"उसका इंतज़ाम हो चुका है, शहज़ादे। सेंटर के अंदर हमारा एक आदमी है। मशीन में रौनक का नहीं, तुम्हारा निशान पहले से डाल दिया जाएगा। तुम्हें बस सही वक़्त पर, सही सीट पर बैठना है। बाक़ी सब गोटियाँ पहले से बिछी हैं। तुम्हें सिर्फ़ चाल चलनी है। ... मैंने तुम्हें आज तक कभी गिरने दिया है क्या?"
और कियान चुप हो गया। क्योंकि सिकंदर ने वो एक शब्द कह दिया था जिसके आगे कियान की सारी अक्ल हार जाती थी। आज़ाद। कर्ज़ ख़त्म। धनराज ख़त्म। रोशनी का भविष्य पक्का। और फिर, ये मुखौटा हमेशा के लिए उतार देना। पापा से किया वादा पूरा।
"रोशनी अगले साल बड़े स्कूल में जाएगी। उसे पंखों वाली क्लास मिलेगी, वो जो पापा हमें नहीं दे पाए। और छत वाला स्कूल... शायद मैं उसे फिर खोल सकूँ, पापा के नाम पर, चुपके से। ये पंद्रह लाख सिर्फ़ कर्ज़ नहीं उतारेंगे, सिकंदर भाई। ये मेरे पापा का अधूरा सपना ज़िंदा कर देंगे।"
"देखा? तुम ख़ुद समझ गए। यही तो मैं कह रहा हूँ। एक दिन का जोखिम, और तुम्हारे बाप का सपना साँस लेने लगेगा। मना करना बेवक़ूफ़ी होगी। और तुम बेवक़ूफ़ नहीं हो, कियान। कम से कम असल में तो नहीं।"
"अगर एक बार में सब ख़त्म हो जाए... तो मैं फिर कभी किसी और के नाम पर पर्चा नहीं छूऊँगा। कभी नहीं। ये आख़िरी होगा।"
"बिल्कुल आख़िरी। ये मेरा वादा है। एक आख़िरी बार, और तुम अपने पापा के उस वादे से भी आज़ाद, और मेरे इस धंधे से भी। ... तो हाँ है, शहज़ादे?"
एक लंबी ख़ामोशी। पंखा घूमता रहा। बिलियर्ड्स की गेंदें दूर कहीं टकराईं। और फिर कियान ने, बहुत धीरे, अपने पापा से मिली उस पूरी थकान के साथ, सिर हिलाया।
"हाँ। एक आख़िरी बार। पर इसके बाद, सिकंदर भाई, मैं मर जाऊँगा तुम्हारे लिए। समझे? रौनक अग्रवाल पास होगा, और कियान ग़ायब। हमेशा के लिए।"
और खिड़की के पीछे, नित्या ने वहाँ से हटने में ही भलाई समझी। उसका दिल हथौड़े की तरह बज रहा था। उसने सब तो नहीं सुना था, पर जो सुना था, वो काफ़ी था। पर्चा। नाम। पैसा। किसी और का चेहरा। उसके दिमाग़ में एक ही शब्द गूँज रहा था, और वो शब्द था, नक़ल। धोखा। जुर्म।
उसे नहीं पता था कि वो आधा सच देख रही थी। उसे ये नहीं दिखा था कि ये लड़का किसी लालच में नहीं, एक मरते बाप के वादे में फँसा है। उसे बस इतना दिखा कि जिस लड़के के लिए उसने अपनी साख के दस्तख़त किए थे, वो एक ठग है। और उस सोच ने उसके अंदर कुछ तोड़ दिया।
गली से बाहर निकलते हुए, उसकी आँखें भर आईं, और उसे अपने ही आँसुओं पर ग़ुस्सा आया। 'तू रो क्यों रही है,' उसने ख़ुद को डाँटा। 'वो एक अजनबी है। एक झूठा। तूने उस पर भरोसा किया, ये तेरी ग़लती थी।' पर दिल का हिसाब दिमाग़ के हिसाब से नहीं मिलता।
उधर अंदर, कियान उठा। उसने सिकंदर से हाथ मिलाया, वो हाथ जो हमेशा गरम रहता था पर भरोसे के लायक़ कभी नहीं। और वो उस धुँधले पार्लर से बाहर निकल गया, ये सोचते हुए कि उसने अभी अपनी आज़ादी का सौदा किया है।
पर वो नहीं जानता था कि जैसे ही दरवाज़ा उसके पीछे बंद हुआ, सिकंदर की मख़मली मुस्कान ग़ायब हो गई। उसने जेब से एक फ़ोन निकाला, वो फ़ोन नहीं जो वो कियान के सामने रखता था, एक दूसरा फ़ोन। और उसने एक ही नंबर मिलाया, जो उसकी लिस्ट में बिना नाम के सेव था।
"जी, सर। नमस्ते। ... हाँ, हो गया। लड़का मान गया। रौनक अग्रवाल वाला काम। राष्ट्रीय परीक्षा। जैसा आपने कहा था, बिल्कुल वैसा। मैंने उसे 'आज़ादी' का लालच दिया, और वो फँस गया। पंद्रह लाख का चारा, और मछली ख़ुद काँटे पर आ गई।"
और फ़ोन के दूसरी तरफ़, अपनी शीशे की मीनार में बैठे उस आदमी ने, बिना जल्दबाज़ी के, बस इतना कहा, 'शाबाश।' वही आवाज़, वही ठंडक। और सिकंदर, जो कियान का 'भाई' बनता था, उसके सामने झुक गया, जैसे कोई कुत्ता अपने मालिक के सामने झुकता है।
"जी सर, नागपाल सर। मैं बरसों से इसकी हर हरकत आपको बताता आया हूँ, और आगे भी बताता रहूँगा। ये लड़का सोचता है मैं इसका दोस्त हूँ। इसे क्या पता कि इसका हर राज़, इसका हर क़दम, आपकी मेज़ पर पहुँचता है। ... जैसा आप कहेंगे, परीक्षा वाले दिन, वैसा ही होगा।"
और वहीं, उस धुँधले पार्लर में, बारह साल का सबसे बड़ा धोखा अपना असली चेहरा दिखा गया। जिस सिकंदर पर कियान अपनी जान से ज़्यादा भरोसा करता था, वो शुरू से ही नागपाल का आदमी था। हर पर्चा, हर फ़र्ज़ी नाम, हर काम, नागपाल की मेज़ तक पहुँचता था। और अब वो सबसे बड़ा काम, जिसे कियान अपनी आज़ादी समझ रहा था, दरअसल वो जाल था जो नागपाल ने अपने हाथों से बुना था। कियान आज़ादी की तरफ़ नहीं, फंदे की तरफ़ चल पड़ा था।
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