अध्याय 19 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
टूटी हुई कसम
लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi
अगली सुबह नागपाल अपना पलटवार खोल देता है, कियान का नाम नक़लची रैकेट के हल करने वाले के रूप में कॉलेज और अफ़सरों के सामने उजागर, नित्या की स्कॉलरशिप जाँच में रुकी, और बारह साल पुराना घोटाला फिर से देवनाथ मास्टर के नाम से चिपका दिया गया, ठीक वही बदनामी जिससे बचने के लिए पिता ने वादा लिया था। नित्या और रोशनी को बचाने के लिए कियान अकेले फँदे में सिर देने की सोचता है, और मरते पिता का वादा, गुमनाम रहो, नाम बचाओ, इस सच से टकरा जाता है कि अब सिर्फ़ रौशनी में आ कर ही जीता जा सकता है। और आख़िर में सबसे क़रीबी दग़ा दे जाता है, सिकंदर नागपाल से सौदा कर के कियान के ख़िलाफ़ गवाही देने को राज़ी हो जाता है, औ
अगली सुबह कियान कॉलेज के गेट में घुसा, और हवा बदली हुई थी। नज़रें उठतीं और तुरंत झुक जातीं। फुसफुसाहटें उसके पीछे-पीछे चलतीं। और उन फुसफुसाहटों में एक शब्द बार-बार लौट रहा था, वही शब्द जो नागपाल ने रात को वादा किया था। चोर। नक़लची। रातों-रात, पूरा शहर जान चुका था।
नोटिस बोर्ड पर एक काग़ज़ चिपका था, ट्रस्ट की मुहर के साथ। नक़ल-विरोधी दस्ते ने एक प्रॉक्सी रैकेट की जाँच में इस कॉलेज के एक छात्र का नाम लिया था। और उसी काग़ज़ के नीचे एक दूसरी लाइन थी, जो नित्या का दिल चीर गई। मेरिट स्कॉलरशिप, जाँच पूरी होने तक, तत्काल प्रभाव से रोकी जाती है।
"कियान, इधर आओ, जल्दी। ... रात भर में सब कुछ बाहर आ गया है। तुम्हारा नाम, रैकेट, सब। और उन्होंने मेरी स्कॉलरशिप रोक दी है, जाँच होने तक। ... पर वो सिर्फ़ इतने पर नहीं रुके, कियान। वो तुम्हारे पापा का नाम भी घसीट रहे हैं। पुराना घोटाला फिर से खोल दिया है।"
"बिलकुल वैसे ही जैसे बारह साल पहले। ... वही शब्द। चोर। वही अख़बार। वही उँगलियाँ जो एक ईमानदार आदमी की तरफ़ उठी थीं। ... फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है, नित्या, कि उस बार वो मेरे पापा थे। इस बार मैं हूँ। नागपाल ने बारह साल बाद वही तस्वीर दोबारा बना दी।"
और यही नागपाल का असली ज़हर था। उसने सिर्फ़ कियान को नहीं फँसाया था। उसने इतिहास को दोहरा दिया था। एक पिता जो चोर कहलाया, और एक बेटा जो अब उसी नाम के साथ, उसी शहर में, उसी झूठ का बोझ ढो रहा था। जैसे बारह साल कुछ बदला ही न हो।
"ऐ! जो भी ये बकवास फैला रहा है, ज़रा सामने आए! ... मेरा भाई चोर? वही लड़का जो मेरी आधी परीक्षा की चिंता में रात भर मेरे साथ जागता था, और फिर ख़ुद फेल हो जाता था? ... अरे इसने आज तक मेस से एक फ़ालतू रोटी नहीं चुराई, ये पूरे रैकेट का दिमाग़ होगा? ... तुम सब पागल हो, पूरे के पूरे!"
और पूरे हॉस्टल में, उस एक आवाज़ ने एक पल को फुसफुसाहटों को चुप करा दिया। बंटी को कुछ नहीं पता था, न रैकेट का, न नागपाल का, न किसी राज़ का। पर उसे एक बात पक्की पता थी, कि उसका दोस्त अच्छा आदमी है। और कभी-कभी, गहरे अँधेरे में, बस इतना सा अटूट यक़ीन ही सबसे बड़ी रौशनी होता है।
"नहीं। ... मैं इतिहास को दोबारा नहीं होने दूँगी, कियान। ये झूठ है, और हम इसे साबित करेंगे। तुम्हारे पास सबूत है, नागपाल के ख़िलाफ़ पूरी फ़ाइल। हम लड़ेंगे। हम सच सबके सामने रखेंगे।"
"किस सच के साथ, नित्या? ... मेरी फ़ाइल अभी अधूरी है, पापा को बेगुनाह साबित करने वाला सबूत कल नागपाल की तिजोरी में वापस चला गया। और अगर मैं खुले आम खड़े हो कर लड़ूँ, तो मैं वो वादा तोड़ दूँगा जो मैंने अपने मरते पापा से किया था। गुमनाम रहो। नाम को घोटाले से बचाओ।"
और यहीं पूरी कहानी का सबसे ज़ालिम मोड़ छुपा था। जो वादा कियान ने अपने पापा का नाम बचाने के लिए किया था, वही वादा अब उस नाम को डुबो रहा था। छुपे रहो, तो सब कुछ बरबाद। सामने आओ, तो वादा टूटा। दोनों रास्ते एक ही खाई पर जा कर ख़त्म होते थे।
"एक ही रास्ता बचता है, नित्या। ... अगर मैं ख़ुद को दे दूँ। सिर्फ़ मैं। अकेला। ... अगर मैं दस्ते के पास जा कर कह दूँ कि हाँ, सारा गुनाह मेरा है, अकेले मेरा, तो शायद वो तुम्हें छोड़ दें। तुम्हारी स्कॉलरशिप बच जाए। रोशनी सुरक्षित रहे। मैं सह लूँगा। मुझे आदत है।"
"नहीं। ... कियान, ये पागलपन है। तुम अपने आप को क़ुर्बान करने की बात कर रहे हो, जैसे वो कोई हल हो। वो हल नहीं है, वो हार है।"
"तुम समझ नहीं रही। अगर मैं लड़ा, अगर मैंने आवाज़ उठाई, तो नागपाल तुम्हें और रोशनी को भी इसमें खींच लेगा। और तुम दोनों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। ... मेरे पापा भी यही चाहते थे, कि उनका बोझ किसी और पर न पड़े। मैं भी बस वही कर रहा हूँ।"
"तुम्हारे पापा ने भी यही सोचा था, कियान! अकेले सह लूँगा, किसी को नहीं बताऊँगा, चुपचाप सब झेल जाऊँगा! ... और उसका नतीजा क्या हुआ? वो अकेले, चुप, बेगुनाह मर गए, और उनका नाम आज भी एक चोर का नाम है! ... वो चुप्पी तुम्हारे पापा को नहीं बचा पाई। तुम्हें कैसे बचाएगी?"
और वो लाइन कियान के सीने में उतर गई। क्योंकि वो सच था, इतना नंगा सच कि उससे नज़र मिलाना मुश्किल था। जिस चुप्पी को कियान अपने पापा की आख़िरी निशानी समझ कर सीने से लगाए बैठा था, वही चुप्पी उसके पापा का क़ातिल थी। और अब वो उसी क़ातिल को अपनी विरासत समझ रहा था।
"तो मैं करूँ क्या, नित्या? ... अगर चुप रहना पापा को नहीं बचा पाया, और खुल कर लड़ना मेरा वादा तोड़ता है, तो मेरे पास बचा क्या है? ... मेरे हाथ में सिर्फ़ दो रास्ते हैं। और दोनों के आख़िर में मेरे पापा का नाम और तुम्हारा भविष्य, दोनों एक साथ जलते हैं। ... कोई तो बता दे, इस पहेली का सही जवाब क्या है।"
उस शाम, तंग किराए के कमरे में, एक और चोट कियान का इंतज़ार कर रही थी, इस बार सबसे छोटी और सबसे गहरी। रोशनी दरवाज़े पर बैठी थी, घुटनों में सिर दिए, और उसकी आँखें लाल थीं। स्कूल में किसी ने कुछ कहा था।
"भैया... आज स्कूल में सब बच्चे कह रहे थे कि मेरा भाई चोर है। ... और एक लड़की बोली कि हमारे पूरे ख़ानदान में चोरी का ख़ून है, पापा भी चोर थे। ... भैया, सच बताओ। ... क्या हम सच में चोर हैं?"
"रोशनी... इधर देख मेरी तरफ़। ... इस दुनिया में बहुत से लोग बहुत सी बातें कहेंगे। पर उन बातों से सच नहीं बदलता। ... हमारे पापा ज़िंदगी में एक पैसे की चोरी नहीं की। उन्होंने पूरी उम्र दूसरों के बच्चों को मुफ़्त पढ़ाया। और तेरा भाई... तेरा भाई चाहे जो भी हो, चोर नहीं है।"
और कियान का दिल टूट गया, क्योंकि जो शब्द बारह साल पहले उसके बचपन को जला गया था, वही शब्द अब उसकी नन्ही बहन के बचपन तक पहुँच गया था। नागपाल का ज़हर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक रिस रहा था, और कियान की चुप्पी उसे रोक नहीं पा रही थी।
"मुझे उन बच्चों की परवाह नहीं है, भैया। ... मुझे पता है मेरे पापा अच्छे थे, क्योंकि तुमने बताया था। और मुझे पता है तुम अच्छे हो, क्योंकि तुम रोज़ आधी रोटी मुझे देते हो और कहते हो कि तुम्हारा पेट भरा है। ... झूठे कहीं के। तुम चोर नहीं, तुम दुनिया के सबसे बड़े झूठे हो, बस।"
और उस नन्ही सी लड़की की उस अटूट यक़ीन से, कियान के अंदर कुछ हिला। पर अभी वो पूरी तरह टूटा नहीं था, अभी एक और वार बाक़ी था। और वो वार वहाँ से आने वाला था, जहाँ से कियान ने कभी उम्मीद नहीं की थी।
उसी रात, कियान एक आख़िरी उम्मीद ले कर सिकंदर के पास पहुँचा। वही सिकंदर, जिसने बारह साल पहले उसे इस अँधेरी दुनिया में खींचा था। कियान को लगा कि शायद सिकंदर के पास कोई रास्ता हो, कोई जुगाड़, कोई मोहलत।
"सिकंदर, नागपाल ने सब कुछ बाहर निकाल दिया। मेरा नाम, रैकेट, सब। मुझे एक रास्ता चाहिए। ... तुमने मुझे इस धंधे में डाला था। बारह साल पहले, एक भूखे लड़के को। अब तुम मुझे निकालो।"
"रास्ता... हाँ, रास्ता। ... देख कियान, इस दुनिया में हर किसी के लिए एक रास्ता होता है। पर हर रास्ता सबको एक ही जगह नहीं ले जाता। ... बैठ, चाय पी। और मेरी एक बात ध्यान से सुन।"
और तभी कियान ने वो देखा जो सिकंदर की मीठी आवाज़ छुपा रही थी। उसकी नज़र। वो कियान की आँखों से नहीं मिल रही थी। बारह साल में पहली बार, वो शातिर, बेख़ौफ़ आदमी किसी से नज़र चुरा रहा था। और कियान के पेट में एक ठंडी गाँठ बँध गई।
"तुमने... तुमने सौदा कर लिया। ... है न? नागपाल के साथ। ... इसीलिए तुम्हारी आँखें मुझसे नहीं मिल रहीं, सिकंदर। बोलो। मेरे मुँह पर बोलो।"
"नागपाल को एक गवाह चाहिए था, कियान। कोई जो अदालत में खड़े हो कर कहे कि हाँ, ये लड़का ही समर था, अंकित तिवारी था, रौनक अग्रवाल था। और उस गवाह के बदले, वो आदमी छूट जाता। ... मैंने वो सौदा कर लिया। मैं तेरे ख़िलाफ़ गवाही दूँगा।"
"बारह साल। ... बारह साल मैंने तुझ पर भरोसा किया, सिकंदर। तुझे अपने हर नाम का पता था। तू अकेला आदमी था जो जानता था कि लास्ट बेंच वाला असल में कौन है। और आज तू उसी को बेच रहा है।"
"भरोसा? ... कियान, इस धंधे में भरोसा सबसे महँगी चीज़ है, और मैं बहुत ग़रीब आदमी हूँ। ... तू सोचता है तू अकेला मोहरा था? मैं भी नागपाल का मोहरा हूँ, तेरी ही तरह। फ़र्क़ बस इतना है कि जब बाज़ी पलटी, तो मुझे एक चाल मिली, और तुझे नहीं। ... माफ़ कर दे, या मत कर। दोनों की क़ीमत एक ही है। कुछ नहीं।"
और यही सबसे गहरा घाव था। वो आदमी, जिसने कियान को उसकी पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा जाना था, अब राज्य का गवाह बन कर उसके ख़िलाफ़ खड़ा था। नागपाल को कियान को गिराने के लिए किसी अजनबी की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसने कियान के सबसे क़रीबी हाथ को ही ख़रीद लिया।
"एक आख़िरी बात, मुफ़्त में। ... दस्ते वाले आज रात तुझे ढूँढ रहे हैं। तस्वीर साफ़ हो गई है, कियान। ... भागना है तो अभी भाग। पर मैं तुझे जानता हूँ। तू भागेगा नहीं। तू अपने बाप की तरह है, और तेरे बाप जैसे लोग हमेशा वहीं खड़े रह जाते हैं जहाँ उन्हें भागना चाहिए था।"
और सिकंदर सही था। कियान भागा नहीं। वो सीधा कॉलेज लौटा, नित्या के पास, अपना फ़ैसला सुनाने। पर उसके पहुँचने से पहले ही, गेट पर वो इंतज़ार कर रहे थे। नक़ल-विरोधी दस्ते की गाड़ी। और वही अफ़सर, हाथ में अब एक साफ़ तस्वीर लिए।
"कियान! ... रुको, अफ़सर साहब, रुकिए! आपके पास सिर्फ़ एक गवाह की बात है, एक अधूरी तस्वीर! ये लड़का बेगुनाह है, मैं साबित कर सकती हूँ, मुझे बस थोड़ा वक़्त दीजिए!"
अफ़सर ने बहुत ठंडे स्वर में कहा कि अब बात शक की नहीं रही, मैडम। एक गवाह है, एक साफ़ तस्वीर है, और बायोमेट्रिक का मिलान है। उसने कहा कि इस लड़के पर प्रॉक्सी परीक्षा रैकेट में शामिल होने का इल्ज़ाम है, और उसे हिरासत में लिया जा रहा है। और फिर उसने कियान की कलाई की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"नित्या, रुक जाओ। ... मत लड़ो। अभी नहीं, ऐसे नहीं। ... रोशनी का ध्यान रखना। और अपनी स्कॉलरशिप का। बस इतना ही मेरे लिए काफ़ी है। ... मैंने तुमसे कहा था न, मुझे अकेले फँसने की आदत है।"
"नहीं, कियान, ये आदत नहीं है, ये तुम्हारे पापा वाली वही ग़लती है! तुम फिर वही कर रहे हो, चुपचाप सिर झुका कर! ... देखो मेरी तरफ़! तुमने मुझसे वादा किया था, आख़िर तक साथ! ये साथ नहीं है, कियान, ये फिर से अकेले डूबना है!"
पर कियान ने सिर झुका लिया, ठीक वैसे जैसे बारह साल पहले एक और आदमी ने इसी शहर में झुकाया था। हथकड़ी की ठंडी धातु उसकी कलाई पर बँधी। और पूरे कॉलेज के सामने, हर उस चेहरे के सामने जो कभी उस पर हँसा था, लास्ट बेंच वाला लड़का एक चोर की तरह गाड़ी की तरफ़ ले जाया गया।
वही गेट। वही भीड़। वही फुसफुसाती नज़रें। और बीच में एक झुका हुआ सिर, बँधे हुए हाथ, और एक नाम जो दूसरी बार, एक ही ख़ानदान में, चोर का नाम बना दिया गया। बारह साल में नागपाल ने कुछ नहीं बदला था। उसने बस वही तस्वीर, वही फ़्रेम, एक नए चेहरे के साथ दोबारा टाँग दी थी।
"तुम सिर झुका सकते हो, कियान। पर मैं नहीं झुकूँगी। ... तुम्हारे पापा के लिए कोई खड़ा नहीं हुआ था। पर तुम्हारे लिए मैं खड़ी हूँ। ... ये कहानी वैसे ख़त्म नहीं होगी जैसे नागपाल चाहता है। मेरा वादा है।"
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ। कियान का चेहरा शीशे के पीछे ओझल हो गया। बारह साल की सारी चुप्पी, सारी क़ुर्बानी, सारा गुमनाम रहना, आज एक हथकड़ी में सिमट गया था। पिता से किया वादा टूटा नहीं था, पर उसी वादे ने बेटे को ठीक उसी खाई में पहुँचा दिया था, जिससे बचाने के लिए वो वादा लिया गया था। और अँधेरी गाड़ी, अपने साथ, लास्ट बेंच वाले को ले कर, रात में घुल गई।
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