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Chapter 13 of 25 12 min read

छत के नीचे

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

उस रात शहर पर पहली बरसात टूटी। छत वाली तपरी की टीन पर बूँदें ढोल की तरह बज रही थीं, और उस टीन के नीचे, अकेली, भीगी, नित्या सक्सेना खड़ी थी। पर आज उसके हाथ में न किताबें थीं, न फ़ाइल। आज उसके हाथ में सिर्फ़ एक फ़ोन था, और उसकी स्क्रीन पर सालों पुरानी एक ख़बर।

रात भर वो जागी थी। पर आज पर्चे के लिए नहीं। उसने पुराने अख़बारों के पीले पन्ने खंगाले थे, एक-एक करके, जैसे कोई सबसे मुश्किल सबूत हल करता है। रोशनी का दिया हुआ एक टुकड़ा, छत वाला मुफ़्त स्कूल, और उसने उस टुकड़े से पूरी तस्वीर बुन ली थी।

एक मास्टर, देवनाथ। एक छत, जहाँ वो शहर के सबसे ग़रीब बच्चों को मुफ़्त पढ़ाता था। एक पेपर लीक का घोटाला, जो उस पर मढ़ा गया। एक बरबादी, एक मौत, और पीछे छूटा कर्ज़ का पहाड़। और सबसे ऊपर, एक नाम, जिसने ये सारा जाल बुना था। एक कोचिंग का बादशाह।

और जब उसने वो नाम पढ़ा, तो नित्या के हाथ काँप गए। यशपाल नागपाल। वही आदमी जो कुछ हफ़्ते पहले कॉलेज आया था, उसकी अपनी स्कॉलरशिप जाँचने। वही आदमी जिसका पैसा उसकी माँ की दवाई ख़रीदता था। जिस दानदाता के आगे वो सिर झुकाती थी, वही उस लड़के के बाप का क़ातिल था जिसे वो बचाने निकली थी।

सीढ़ियों पर क़दमों की आहट हुई। कियान भीगता हुआ ऊपर आया, बाल चिपके, कमीज़ पानी से भारी। उसने वादे के मुताबिक़ चार बजे आने की जगह देर कर दी थी, और अब रात हो चली थी।

"मैडम, इस बारिश में? आपने कहा था चार बजे। मैं आया तो आप नहीं थीं। अब रात के इस पहर में छत पर खड़ी हो, भीगती हुई। ... ट्यूशन इतना ज़रूरी था? या आज मुझे निमोनिया करा के ही मानोगी?"

नित्या ने जवाब नहीं दिया। उसने बस फ़ोन उसकी तरफ़ कर दिया, स्क्रीन पर वो पीली ख़बर, वो पुरानी तस्वीर, एक छत, एक मास्टर, कुछ बच्चे। और कियान की हँसी उसके चेहरे पर ही जम गई।

"ये... ये तुम्हें कहाँ से मिला?"

"रोशनी ने बताया था, कियान। मास्टरजी। छत वाला मुफ़्त स्कूल। सबसे अच्छे वाले मास्टर। मैंने बाक़ी ख़ुद जोड़ लिया। रात भर लगी। ... देवनाथ। तुम्हारे पापा। ये तुम्हारी कहानी है, है न?"

और वो हुआ जो कियान ने बारह साल से नहीं होने दिया था। किसी ने उसका असली नाम, उसके बाप का नाम, ज़ोर से बोल दिया था। खुले आसमान के नीचे। उसकी टाँगें एक पल को काँपीं। वो पास पड़े स्टूल पर बैठ गया, जैसे कोई पुराना घाव अचानक फिर से खुल गया हो।

"तुम्हें ये सब जानने की क्या ज़रूरत थी, नित्या? मैंने तुम्हें आधा सच दिया था। आधा। क्योंकि आधा ही तुम्हारे लिए सुरक्षित था। और तुमने रात भर लगा कर बाक़ी आधा भी खोद निकाला? ये तुम्हारी वो टॉपर वाली बीमारी है, हर चीज़ का जवाब चाहिए।"

"हाँ, चाहिए। क्योंकि जिस लड़के के लिए मैंने अपनी माँ का घर दाँव पर लगाया, मैं कम से कम इतना तो जानूँ कि वो कौन है। ... और अब जो मैं जानती हूँ, कियान, उससे मैं भाग नहीं सकती। तुम्हारे पापा चोर नहीं थे। उन्हें चोर बनाया गया।"

बारिश तेज़ हो गई। हवा का एक झोंका पानी की झड़ी तपरी के नीचे तक ले आया, और दोनों बेसाख़्ता एक तरफ़ सरके, उसी पुराने नीले तिरपाल के नीचे, जिसके तले कभी महीनों पहले एक बारिश में उनकी जंग पहली बार एक डिग्री नरम पड़ी थी। पर आज तिरपाल छोटा था, और दोनों पास।

"वही तिरपाल। याद है? उस दिन तुम मुझे धोखेबाज़ समझ कर लड़ रही थीं। आज तुम मेरे मरे हुए बाप की वकालत कर रही हो। ... तुम्हारा मन बदलने की रफ़्तार से तो मौसम भी शरमा जाए, मैडम।"

"मज़ाक मत करो, कियान। आज नहीं। ... मुझे बताओ। उनके बारे में। असली वाला, वो जो अख़बार में नहीं छपा। कैसे थे वो?"

और कियान चुप हो गया। बारिश की आवाज़ में, उस छोटे से तिरपाल के नीचे, बारह साल का बाँधा हुआ बाँध एक दरार से टूटने लगा। उसने बहुत धीरे बोलना शुरू किया, जैसे हर लफ़्ज़ किसी तहख़ाने से निकाल रहा हो।

"वो दुनिया के सबसे ग़रीब आदमी थे, नित्या। और सबसे अमीर भी। उनके पास कुछ नहीं था, बस एक छत और एक ब्लैकबोर्ड। और वो उस छत पर उन बच्चों को पढ़ाते थे जिन्हें कोई कोचिंग अपने गेट के अंदर नहीं घुसने देती थी। मुफ़्त। पूरी रात। बदले में कोई एक अमरूद रख जाता, कोई थैंक यू भी नहीं।"

"वो कहते थे, कियान, नाम रैंक से नहीं बनता। नाम इससे बनता है कि तुमने चुपचाप किसके लिए क्या किया। ... और फिर एक आदमी को ये छत खटकने लगी। क्योंकि जो बच्चे उसकी लाखों की फ़ीस नहीं भर सकते थे, वो मेरे पापा की छत पर उसके अमीर बच्चों से आगे निकल रहे थे।"

"एक बार एक बच्चा फ़ीस की जगह अपनी बकरी बाँध कर ले आया। बोला, मास्टरजी, पैसे नहीं हैं, ये रख लो। पापा ने बकरी रख ली, दो दिन उसका दूध पिया, और तीसरे दिन लौटा दी, ये कह कर कि बेटा, तेरी बकरी ने भी अब गणित सीख लिया है, अब तेरी बारी। ... पूरी छत हँसी थी उस दिन। मैं भी।"

और बरसों बाद, उस भीगी छत पर, कियान के होंठों पर वो हँसी लौट आई। आधी हँसी, आधे आँसू। नित्या भी मुस्कुरा दी, बेसाख़्ता। और उस एक पल में, उस मरे हुए मास्टर की छत उन दोनों के बीच फिर से ज़िंदा हो गई, बच्चों से भरी, हँसी से भरी, एक बकरी से भरी।

"नागपाल।"

और वो नाम दोनों के बीच गिरा, बारिश से भी भारी। कियान ने उसकी तरफ़ देखा, चौंका हुआ, कि नित्या यहाँ तक पहुँच गई थी। और नित्या ने सिर हिलाया, धीरे से, हाँ, मैं जानती हूँ।

"उसने एक पर्चा लीक कराया, और मेरे पापा के नाम कर दिया। एक ईमानदार मास्टर, एक रात में, चोर। स्कूल की छत छिन गई, नाम मिट गया, और लोग जो कल तक पैर छूते थे, थूकने लगे। पापा ये सह नहीं पाए। दो साल में चले गए। पीछे छोड़ गए कर्ज़, रोशनी, और एक वादा।"

"कैसा वादा?"

"कि मैं हमारे नाम को दोबारा कभी किसी घोटाले से न छूने दूँ। और गुमनाम रहूँ, बिलकुल अनदेखा, जब तक ये कर्ज़ पूरा न उतर जाए। इसलिए, नित्या। इसलिए मैं लास्ट बेंच वाला बुद्धू हूँ। इसलिए मैं फ़र्ज़ी नामों के पीछे छिपता हूँ। मैं भाग नहीं रहा। मैं एक मरे हुए आदमी का वादा निभा रहा हूँ।"

और उस पल, उस भीगी छत पर, नित्या ने पहली बार कियान को पूरा देखा। मुखौटा नहीं, चाल नहीं, बुद्धू नहीं। एक लड़का, जो सात साल की उम्र से एक बोझ ढो रहा था जो उसका था ही नहीं। जो हँसता इसलिए था ताकि कोई उसकी आँखों में न झाँके। और उसका दिल किसी अनजानी चीज़ से भर आया।

"तुमने ये सब अकेले उठाया? सात साल की उम्र से? ... और पूरा कॉलेज तुम्हें नाकारा कहता है। तुम पर हँसता है। और तुम हँसने देते हो। कियान, तुम इस कमरे के सबसे बुद्धू नहीं हो। तुम सबसे बहादुर हो।"

बारिश की एक बूँद उसके बालों से फिसल कर उसके गाल पर आई, और कियान ने बेसाख़्ता हाथ उठाया, उसे पोंछने के लिए। और रुक गया, उसके चेहरे से एक इंच पहले। दोनों की साँसें थम गईं। टीन पर बारिश बजती रही। और उस छोटे से तिरपाल के नीचे, दुनिया सिकुड़ कर बस उतनी रह गई, जितनी उन दोनों के बीच थी।

कियान की उँगलियाँ उसके गाल के इतने पास थीं कि गरमी छू रही थी। नित्या हिली नहीं। उसकी आँखें उठीं, कियान की आँखों से मिलीं, और उनमें वो सवाल था जिसका जवाब पूरा साल दोनों टालते आए थे। बारिश, तिरपाल, दो चेहरे, एक इंच। बस एक इंच।

"कियान... एक बार, बस एक बार, कोई चाल मत सोचो। कोई हिसाब मत लगाओ। कोई मुखौटा नहीं। बस... यहीं रुके रहो।"

और उस एक फुसफुसाहट में पूरा साल था। हर वो झगड़ा जो असल में कुछ और था, हर वो चाय जो बहाना थी, हर वो पल जब दोनों ने जान-बूझ कर नज़रें चुराई थीं। टीन पर बारिश और तेज़ हुई, जैसे आसमान भी साँस रोके देख रहा हो कि आगे क्या होता है।

"नित्या..."

और ठीक उसी पल, जब वो एक इंच मिट सकता था, कियान पीछे हट गया। उसका हाथ नीचे गिरा। उसने अपनी नज़र फेर ली, तिरपाल पर टपकती बारिश की तरफ़, जैसे वहाँ कोई जवाब लिखा हो।

"क्यों? ... तुम पीछे क्यों हट गए, कियान? मैं तुम्हारी आँखों में सब पढ़ सकती हूँ। तो फिर?"

"इसीलिए, नित्या। क्योंकि मैं तुम्हारी आँखों में भी सब पढ़ सकता हूँ। और यही सबसे ख़तरनाक चीज़ है। ... मेरे पास जो भी है, जिसे मैं छूता हूँ, वो जल जाता है। मेरे पापा, रोशनी का बचपन, मेरा नाम। मैं तुम्हें उस आग में नहीं खींच सकता। तुम्हारी अपनी माँ है, अपना घर, अपनी रोशनी। मुझसे दूर रहना ही तुम्हारी हिफ़ाज़त है।"

और यही कियान की सबसे बड़ी सज़ा थी। पूरे साल में पहली बार उसे किसी चीज़ की सच में चाह थी, और वही एक चीज़ थी जिसे पाने का उसे हक़ नहीं था। क्योंकि नागपाल की परछाईं अब भी उन दोनों के ऊपर मँडरा रही थी। और प्यार, उसके लिए, सबसे बड़ी कमज़ोरी थी।

"तुम्हें पता है उसने मुझसे क्या कहा था? यहीं, इसी कॉलेज के एक ख़ाली गलियारे में? कि उसे पता है मैं देवनाथ का बेटा हूँ। और कि बस एक लफ़्ज़, और सब राख। मेरा नाम, तुम्हारा वज़ीफ़ा, रोशनी, सब। एक लफ़्ज़, नित्या। वो आदमी धमकी नहीं देता। वो सिर्फ़ बताता है कि आगे क्या होने वाला है।"

और अब नित्या समझी कि कियान किस चीज़ से डरता था। ये कायरता नहीं थी। ये एक ऐसे दुश्मन का डर था जो पूरे शहर की तक़दीर अपनी जेब में रखता था। जो रैंक बेचता था, भविष्य ख़रीदता था, और नामों को एक फ़ोन कॉल में राख कर देता था। और वही आदमी, नित्या के अपने वज़ीफ़े का मालिक था।

"तो ये तय है? तुम बस पीछे हटते रहोगे, अकेले जलते रहोगे, और मुझे 'हिफ़ाज़त' के नाम पर दूर धकेलते रहोगे? ... कियान, मैं कोई कमज़ोर लड़की नहीं हूँ जिसे बचाना है। मैं वो हूँ जो तुम्हारा सबसे बड़ा राज़ रात भर में खोद लेती है। सोचो, तुम्हारी दुश्मन बन कर मैं कितनी ख़तरनाक थी। दोस्त बन कर कितनी होऊँगी।"

और यहीं, इस भीगी छत पर, नित्या के अंदर वो चीज़ ठोस हो गई जो कियान को सबसे ज़्यादा डराती थी। वो एक टॉपर थी। वो हार से नहीं, अनसुलझे सवालों से डरती थी। और नागपाल अब उसके सामने एक सवाल था। एक ग़लत जवाब, जिसे सही करना था।

"सुनो, कियान। मैं तुम्हें एक बात कहने आई थी, और मैं वो कह के जाऊँगी। ये छिपना, ये भागना, ये गुमनाम रहना, बहुत हो गया। तुम्हारे पापा को एक आदमी ने चोर बनाया। और वो आदमी आज भी राजा बना बैठा है, हमारे सिर पर।"

"नित्या, रुको। तुम्हें नहीं पता तुम क्या कहने जा रही हो।"

"मुझे पता है। मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ। छिप कर नहीं, खुले आम। मैं नागपाल को गिराना चाहती हूँ, और तुम्हारे पापा का नाम सबके सामने, इसी शहर के सामने, साफ़ करना चाहती हूँ। जैसे उन्होंने बच्चों को दिन के उजाले में पढ़ाया था, वैसे ही उनका इंसाफ़ भी उजाले में होगा। हम मिल कर उसे ख़त्म करेंगे, कियान।"

और कियान का ख़ून जम गया। क्योंकि नित्या ने अभी-अभी, बिना जाने, वो एक रास्ता बोल दिया था जो उसके पूरे वादे के ठीक ख़िलाफ़ था। नाम को उजाले में लाना। घोटाले को फिर से छेड़ना। गुमनामी तोड़ना। वो हर चीज़ जिससे बचने के लिए उसके पापा ने उससे क़सम ली थी।

"नहीं। नित्या, ये एक चीज़ हम कभी नहीं करेंगे। समझी? कभी नहीं। जिस पल हम खुले में आए, जिस पल नागपाल का नाम लिया, उसी पल वो सब कुछ जला देगा। तुम्हारी स्कॉलरशिप, रोशनी, मेरा वादा, सब कुछ। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि तुमने अभी क्या कहा।"

"मुझे अंदाज़ा है। मैंने ये सोच कर कहा है, कियान, डर कर नहीं। तुमने बारह साल एक मरे हुए आदमी के डर में गुज़ार दिए। ... मैं जीने वालों के लिए लड़ती हूँ। और अब मैं तुम्हारे लिए लड़ूँगी, तुम चाहो या न चाहो।"

और वहाँ, एक ही तिरपाल के नीचे, एक ही बारिश में भीगते, दो लोग खड़े थे, एक-दूसरे के इतने क़रीब कि दिल की धड़कन सुनाई दे, और फिर भी दो अलग आसमानों के नीचे। एक, जो नाम को उजाले में लाना चाहता था। दूसरा, जो उसी उजाले से मौत की तरह डरता था।

कियान उसे देखता रहा, उस लड़की को जिसने अभी-अभी उसे प्यार के सबसे क़रीब भी पहुँचाया था, और सबसे बड़े ख़तरे के भी। उसका दिल कह रहा था, हाँ। उसका वादा चीख रहा था, नहीं। और उन दोनों के बीच, बारिश की बूँदें टीन पर गिरती रहीं, एक-एक करके, जैसे कोई घड़ी उलटी चल रही हो।

नित्या सक्सेना ने अपनी लड़ाई चुन ली थी। उजाले वाली लड़ाई। और उसे नहीं पता था कि उसने जो रास्ता चुना था, वही एक रास्ता कियान का पूरा वादा तोड़ता था। छत के नीचे दो दिल एक हुए थे। और उसी छत के नीचे, एक जंग खुल गई थी, जिसका ऐलान ख़ुद प्यार ने किया था।

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