अध्याय 21 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
सच का सूरज
लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi
भरी हुई जाँच सभा में, कैमरों और पूरे शहर के सामने, कियान बारह साल पुराना बुद्धू वाला मुखौटा हमेशा के लिए उतार देता है। हाँ, वो मानता है कि समर, अंकित और रौनक वही था, पर फिर पूरी कहानी उलट देता है, ये रैंक बेचने और छात्रों को ब्लैकमेल करने वाली पूरी मशीन किसने बनाई, किसकी जेब में हर रुपया गया, और सिकंदर किसका हाथ था, इसका सबूत खोल कर वो सीधे यशपाल नागपाल की तरफ़ उँगली उठा देता है। जिस-जिसने कभी लास्ट बेंच वाले का मज़ाक उड़ाया था, वो सब जान जाते हैं कि वो लड़का असल में क्या है। और फिर वो बारह साल पुराने ज़ख़्म को खोल देता है, कि इसी आदमी ने इसी तरीक़े से उसके ईमानदार पिता देवनाथ मास्टर को चोर बन
जाँच सभा का दिन। कॉलेज का सबसे बड़ा हॉल खचाखच भरा था। शिक्षा बोर्ड के अफ़सर, नक़ल-विरोधी दस्ता, प्रोफ़ेसर, छात्र, और पीछे, कैमरे। बीच में एक कुर्सी, जिस पर एक लड़के को लाया गया था, हाथ अब भी बँधे। और पूरे हॉल को एक ही उम्मीद थी, कि आज लास्ट बेंच वाला अपना गुनाह क़बूल करेगा और गिड़गिड़ाएगा।
और सबसे आगे, एक शाही कुर्सी पर, यशपाल नागपाल बैठा था, हीरे की कफ़लिंक, ठंडी मुस्कान, अपनी ताजपोशी के इंतज़ार में। उसके पास ही बैठा था सिकंदर, राज्य का गवाह, जो आज कियान के हर नाम की गवाही देने वाला था। नागपाल के लिए ये सभा एक फ़ैसला नहीं, एक जश्न था।
और हॉल के एक किनारे, नित्या और सभरवाल खड़ी थीं, दिल तेज़ी से धड़कते हुए। ये सभा सबके सामने खुली रखवाना, कैमरों को अंदर आने देना, ये सभरवाल की चाल थी, ताकि नागपाल इसे किसी बंद कमरे में दबा न सके। रोशनी को उन्होंने जान-बूझ कर घर पर सुरक्षित रखा था। आज के इस दरबार में, जीत और तबाही के बीच बस एक साँस का फ़ासला था।
दो गार्ड कियान को अंदर लाए। सबने सोचा था वो टूटा हुआ, झुका हुआ आएगा, जैसे बारह साल पहले उसके पिता आए थे। पर वो सीधा चला, सिर उठाए, और अपनी कुर्सी पर यूँ बैठा जैसे कोई मुजरिम नहीं, बल्कि कोई इम्तिहान देने वाला बैठता है। और शायद यही सबसे पहला इशारा था, कि आज का पर्चा वो नहीं था जिसकी किसी ने तैयारी की थी।
बोर्ड के मुख्य अफ़सर ने अपना चश्मा ठीक किया और कियान की तरफ़ देखा। उन्होंने सीधा सवाल किया, क्या तुम वही हो जिसने अलग-अलग फ़र्ज़ी नामों से, समर, अंकित तिवारी, रौनक अग्रवाल, देश की सबसे कठिन परीक्षाएँ हल कीं? हॉल में सुई गिरने जैसी ख़ामोशी छा गई।
"जी। ... मैं ही था। ... वो सारे नाम मेरे थे। हर एक पर्चा मैंने हल किया। ... बारह साल से पूरा कॉलेज मुझे बुद्धू समझता रहा, और मैं ख़ुश था कि वो ग़लत समझ रहे हैं।"
और पूरा हॉल एक झटके से हिल गया। क्योंकि जो आवाज़ अभी बोली थी, वो उस ऊँघते, हकलाते बुद्धू की आवाज़ नहीं थी जिसे सब जानते थे। ये आवाज़ साफ़ थी, ठंडी थी, सधी हुई थी। रीढ़ सीधी थी, नज़र किसी से नहीं झुक रही थी। ये कोई और लड़का था, जो हमेशा उसी चेहरे के पीछे छुपा बैठा था।
"पर माफ़ कीजिए, सर, आप ग़लत सवाल पूछ रहे हैं। ... सवाल ये नहीं है कि पर्चे किसने हल किए। वो तो आसान हिस्सा है, वो मैंने किया। ... असली सवाल ये है कि ये पूरा धंधा किसने बनाया। किसने एक भूखे लड़के को ढूँढ कर, उसकी ग़रीबी को हथियार बना कर, बारह साल तक इस्तेमाल किया। और हर परीक्षा के हर रुपये किसकी तिजोरी में गए।"
और हॉल की ज़मीन जैसे एक तरफ़ झुक गई। अफ़सर की उँगलियाँ रुक गईं। ये वो कहानी नहीं थी जिसकी उम्मीद किसी ने की थी। कोई मुजरिम अपनी सज़ा से नहीं बच रहा था, कोई शिकारी अपना जाल खोल रहा था। हॉल में एक धीमी फुसफुसाहट दौड़ गई, फिर थम गई।
"सर, ये लड़का बात घुमा रहा है। ... एक पकड़ा हुआ नक़लची अपना जुर्म छुपाने के लिए बड़े लोगों पर कीचड़ उछालेगा, इसमें नई बात क्या है? ... मैं इस शहर को तीस साल से पढ़ा रहा हूँ। मेरी कोचिंग ने हज़ारों बच्चों को अफ़सर बनाया। और आप एक चोर की बात पर मुझ पर शक करेंगे?"
"बड़े लोग बहुत आसानी से कीचड़ का इल्ज़ाम लगा देते हैं, नागपाल साहब। ... पर कीचड़ में सबूत नहीं होते। और मेरे हाथ में कीचड़ नहीं, काग़ज़ हैं। ... आप तीस साल से इस शहर को पढ़ा रहे हैं, ये सच है। पर आपने उसे पढ़ाया कम, ख़रीदा ज़्यादा है। और आज मैं आपकी हर ख़रीद का हिसाब खोलने आया हूँ।"
"मेरे पास सबूत है। ... बारह साल। हर बार जब मैं आपकी मशीन के अंदर गया, मैं वहाँ से एक काग़ज़ उठा लाया। रसीदें, फ़र्ज़ी एडमिट कार्ड के रिकॉर्ड, रैंक की क़ीमत की लिस्ट, वो खाते जहाँ हर छात्र से वसूली गई रक़म आपके ही नाम पर चढ़ी। ... मैं आपकी माँद में बैठ कर, आपके ही ख़िलाफ़ बम बनाता रहा।"
और कियान ने एक-एक कर के काग़ज़ बोर्ड के सामने रखने शुरू किए। रैंक की क़ीमतें। ब्लैकमेल किए गए छात्रों के नाम, जिन्हें नागपाल ने पहले पास कराया और फिर उसी राज़ से उम्र भर के लिए बाँध लिया। एक पूरी मशीन, जो रैंक बेचती थी और डर ख़रीदती थी। और हर परत के आख़िर में एक ही नाम था।
"एक मिसाल दूँ, सर? ... पिछले साल एक लड़के को नागपाल की कोचिंग ने रैंक दिलाई, पैसे ले कर। और फिर जब उस लड़के ने सच बोलने की कोशिश की, तो उसी रैंक की धमकी दे कर उसे चुप करा दिया। वो लड़का आज भी डर के मारे बोलता नहीं। ... ये पढ़ाना नहीं है, सर। ये ज़िंदगियाँ गिरवी रखना है।"
"ये... ये सब झूठे काग़ज़ हैं! कोई भी बना सकता है! ... सर, आप एक तीस साल पुराने संस्थान की इज़्ज़त को एक पकड़े हुए मुजरिम के काग़ज़ों पर तौलेंगे? ये मेरे ख़िलाफ़ एक सोची-समझी साज़िश है, और कुछ नहीं!"
पर उसकी आवाज़ में अब वो पुरानी बर्फ़ नहीं थी। वो थोड़ी ऊँची थी, थोड़ी तेज़, और भरे हॉल ने वो बारीक फ़र्क़ पकड़ लिया। जब सच सामने आता है, तो सबसे पहले झूठ की आवाज़ काँपती है। और नागपाल की आवाज़, तीस साल में पहली बार, काँप रही थी।
"इस पूरे तंत्र का मालिक एक ही आदमी है। जो रैंक बेचता है, जो बच्चों के भविष्य से जुआ खेलता है, जो सिकंदर जैसे हाथों से अपना ज़हर पूरे शहर में बाँटता है। ... वो मैं नहीं हूँ, सर। वो इसी हॉल में बैठा है, सबसे आगे, सबसे ऊँची कुर्सी पर। यशपाल नागपाल।"
और फिर कियान ने वो चाल चली जिसकी नागपाल ने कल्पना भी नहीं की थी। उसने कहा कि नागपाल के अपने गवाह से पूछ लीजिए, सिकंदर से। पूछिए कि उसे काम कौन देता था, पैसा कहाँ से आता था, हुक्म किसका चलता था। और सिकंदर, जो कियान को दफ़नाने आया था, जैसे-जैसे सच बोलता गया, उसका हर लफ़्ज़ नागपाल की तरफ़ ही चढ़ता गया।
और पहली बार, नागपाल की वो ठंडी मुस्कान थरथरा गई। उसने सिकंदर की तरफ़ एक तीखी नज़र फेंकी, चुप रहने का हुक्म देती हुई। पर सिकंदर, जो ता-उम्र सिर्फ़ एक मोहरा रहा था, आज पहली बार किसी की कठपुतली नहीं था। शायद आख़िरी पल में उसे भी अपनी बिकी हुई ज़मीर का कोई छोटा सा टुकड़ा याद आ गया था। उसने सच बोलना बंद नहीं किया। जो गवाही कियान का फंदा थी, वो नागपाल के गले का फंदा बन गई।
और उस पूरे हॉल में एक अजीब सी लहर दौड़ गई। वो लड़के जो कभी उस पर हँसते थे, जो उसकी नक़ल उतारते थे, जो उसे कक्षा का सबसे बड़ा मज़ाक समझते थे, आज दंग रह गए। वो सीनियर जो जूनियरों को दबाता था, वो सब आज सिर झुकाए बैठे थे, किसी की आँख कियान से नहीं मिल रही थी। जिस लास्ट बेंच को वो सबसे बेकार जगह समझते थे, वहीं, बारह साल से, उस कमरे का सबसे तेज़ दिमाग़ चुपचाप बैठा था।
"सर, बतौर विभागाध्यक्ष, मैं ये कहना चाहती हूँ। ... मैंने इस लड़के के काग़ज़ ख़ुद जाँचे हैं, और पुराने रिकॉर्ड भी। जो ये कह रहा है, वो सिर्फ़ आरोप नहीं है, हर लफ़्ज़ के साथ एक दस्तावेज़ है। ... मैं तीस साल से पढ़ा रही हूँ, और आज मुझे शर्म भी है और गर्व भी। शर्म कि हमने इसे नाकारा समझा। गर्व कि ये हमारा छात्र है।"
पर कियान अभी रुका नहीं था। क्योंकि रैकेट तो बस आधी कहानी थी। असली कर्ज़, असली ज़ख़्म, बारह साल और पीछे था। उसने बोर्ड की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ पहली बार काँपी, ग़ुस्से से नहीं, याद से।
"और ये पहली बार नहीं है कि इस आदमी ने एक बेगुनाह को चोर बनाया है। ... बारह साल पहले, इसी शहर में, एक ग़रीब मास्टर था। जो एक छत पर, बिना एक पैसा लिए, उन बच्चों को पढ़ाता था जिनके पास कोचिंग के पैसे नहीं थे। नागपाल की दुकान के लिए वो मुफ़्त स्कूल एक ख़तरा था। ... तो नागपाल ने उस पर एक झूठा पेपर लीक का घोटाला मढ़ दिया। उसे चोर बना दिया। और वो ईमानदार आदमी उसी दाग़ के साथ मर गया।"
और कियान ने वो नाम लिया, जो बारह साल से एक पीतल की पट्टी की तरह घिस कर मिटा दिया गया था। देवनाथ मास्टर। उसका अपना पिता। और वो नाम, पहली बार, भरे हॉल में, कैमरों के सामने, एक चोर का नहीं, एक शहीद का नाम बन कर गूँजा।
"वो मास्टर मेरे पिता थे, सर। ... मैं बारह साल इसीलिए छुपा रहा, इसीलिए बुद्धू बना रहा, ताकि इस आदमी को ये पता न चले कि देवनाथ का बेटा ज़िंदा है और गिनती कर रहा है। ... आज मैं छुपना छोड़ रहा हूँ। मैं कियान हूँ। देवनाथ मास्टर का बेटा। और मैं अपने पिता का नाम वापस माँगने आया हूँ।"
"सर, और ये सिर्फ़ इस लड़के के शब्द नहीं हैं। ... मेरे पास वो लोग हैं जो उस छत पर मुफ़्त पढ़े। वो बच्चे जिन्हें देवनाथ मास्टर ने बनाया। पूरा मोहल्ला गवाही देने को तैयार है कि वो आदमी चोर नहीं, इस शहर का सबसे ईमानदार इंसान था। ... बारह साल पहले उसका पक्ष किसी ने नहीं सुना। आज सुन लीजिए।"
और बोर्ड हिल गया। इतने सबूत, इतनी गवाहियाँ, इतने चेहरे, इन सबको एक झटके में झुठलाया नहीं जा सकता था। मुख्य अफ़सर ने धीरे से, पर साफ़ आवाज़ में ऐलान किया, कि देवनाथ मास्टर का बारह साल पुराना मामला दोबारा खोला जाएगा। और उस एक वाक्य के साथ, बारह साल पुरानी एक दफ़न लड़ाई, ज़िंदा हो कर उठ खड़ी हुई।
हॉल में एक धीमी सी हलचल दौड़ गई। कुछ बूढ़े, जो देवनाथ मास्टर को जानते थे, चुपचाप अपनी आँखें पोंछने लगे। बारह साल जिस नाम को एक फुसफुसाहट में लेने से भी लोग डरते थे, आज एक सरकारी अफ़सर की ज़बान पर, पूरी इज़्ज़त के साथ खड़ा था। छत वाली उस मुफ़्त पाठशाला का मास्टर, बरसों बाद, फिर से एक मास्टर था।
एक पल को ऐसा लगा जैसे बारह साल का अँधेरा टूट गया हो। कियान की बँधी कलाइयाँ अब भी बँधी थीं, पर उसका सिर, पहली बार, ऊँचा था। नित्या की आँखों में आँसू थे। पूरा हॉल एक ऐसे लड़के को देख रहा था जिसने अकेले, बिना किसी ताक़त के, एक बादशाह को उसके ही दरबार में नंगा कर दिया था।
पर घिरा हुआ शेर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है। और नागपाल जानता था कि सबूतों की लड़ाई वो हार चुका है। तो उसने वो हथियार उठाया जो उसके पास हमेशा रहता था, जब तर्क ख़त्म हो जाते थे। डर। वो अपनी कुर्सी से उठा, बहुत धीरे, और उसकी वो ठंडी मुस्कान वापस लौट आई।
"वाह, देवनाथ के बेटे। ... तूने आज बहुत अच्छा तमाशा किया। ताली बजनी चाहिए। ... पर एक बात भूल गया। काग़ज़ और गवाही से केस खुलते हैं, बेटे। पर ख़त्म वो तब होते हैं, जब गवाह डर जाते हैं। ... और मैं जानता हूँ कि तुझे डराया नहीं जा सकता। तेरे जैसे लोग अपने लिए नहीं डरते। ... तू दूसरों के लिए डरता है।"
"तू किस बारे में बात कर रहा है, नागपाल।"
"एक नन्ही सी लड़की है, रोशनी। ... जिसका अकेला सरपरस्त अब एक हिरासत में बंद मुजरिम है। ऐसे बच्चे को क़ानून यतीमख़ाने भेज देता है, और मेरी एक फ़ोन कॉल से वो कहीं भी, किसी के भी पास जा सकती है। ... और वो टॉपर लड़की, नित्या। उसकी विधवा माँ, उस छोटे से शहर में, अकेली। ... तेरे पास सबूत हैं, कियान। पर मेरे पास दो लड़कियाँ हैं जिन्हें तू बचा नहीं सकता।"
"तुम... तुम एक दस साल की बच्ची को धमका रहे हो? ... भरी सभा में, कैमरों के सामने? ... तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम कितना नीचे गिर चुके हो, नागपाल? एक आदमी जो एक बच्ची से डर कर उसे हथियार बनाए, वो बादशाह नहीं होता। वो कायर होता है।"
"तू मुझे गिरा नहीं पाया, नागपाल। तो अब तू उन्हें गिराएगा जो मुझे प्यारे हैं। ... पर सुन ले। तूने आज मेरे सामने वो लकीर पार कर ली, जिसके बाद मैं रुकूँगा नहीं। तूने मेरी बहन का नाम लिया। ... अब ये लड़ाई सबूतों की नहीं रही। अब ये आख़िरी है।"
और उस भरे हॉल में, जीत के ठीक बीचोंबीच, कियान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने बारह साल एक बादशाह को गिराने में लगाए थे, और आज उसे गिरा भी दिया था। पर उस गिरते हुए बादशाह ने, अपने आख़िरी पल में, अपना सबसे ज़हरीला तीर सबूतों पर नहीं, बल्कि उन दो लड़कियों पर तान दिया था, जो कियान की पूरी दुनिया थीं। सूरज निकल तो आया था। पर उसकी पहली ही किरण के साथ, एक नया, और गहरा साया भी उठ खड़ा हुआ।
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