DesiHub

अध्याय 6 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

पुरानी फ़ाइल

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

उस सुबह सरस्वती कॉलेज ऐसे चमक रहा था जैसे किसी की शादी हो। पुराने गलियारों में झाड़ू लगी, टूटी कुर्सियाँ छिपा दी गईं, और नोटिस बोर्ड पर एक ताज़ा काग़ज़ चिपका दिया गया।

काग़ज़ पर लिखा था, आज मेरिट ट्रस्ट के मुख्य दानदाता, श्री यशपाल नागपाल, पधार रहे हैं। और उस एक नाम ने पूरे कॉलेज की हवा बदल दी थी।

"पायल, मेरी फ़ाइल ठीक लग रही है? कियान वाली प्रगति रिपोर्ट सबसे ऊपर है न? आज सब कुछ इसी पर टिका है। जो आदमी ट्रस्ट को पैसा देता है, वही तय करता है कि मेरी स्कॉलरशिप रहे या जाए।"

उधर हॉस्टल के लड़कों के विंग में, बंटी आईने के सामने खड़ा, अपने इकलौते इस्तरी किए कुर्ते को ठीक कर रहा था, जैसे नागपाल उससे ही मिलने आ रहा हो।

"भाई, सोच! नागपाल ख़ुद आ रहा है! अरबों का आदमी! अगर उसने मुझे देख लिया, और मेरा टैलेंट पहचान लिया, तो मैं सीधा उसकी कोचिंग में, मुफ़्त! फिर तो अपना भी होर्डिंग लगेगा, छत पर।"

"बंटी, उस आदमी से दूर रहना। जितना दूर रह सके।"

"क्यों भाई? इतना बड़ा आदमी है। सब उसके पैर छूते हैं।"

"जो आदमी जितना ऊँचा हो, बंटी, उसकी परछाईं उतनी ही लंबी और ठंडी होती है। और कुछ परछाइयों में लोग खो जाते हैं। बस दूर रहना।"

बंटी ने कंधे उचकाए और मज़ाक समझ कर टाल दिया। उसे नहीं पता था कि उसका दोस्त अभी-अभी उसे एक ऐसी सच्चाई से बचा रहा था जिसे वो ख़ुद बरसों से ढो रहा था।

यशपाल नागपाल। इस शहर का सबसे बड़ा नाम। जिसकी कोचिंग हर गली में थी, जिसके होर्डिंग हर छत पर थे, और जो रैंक बेचता था, सपने बेचता था, और डर बेचता था।

और वही आदमी, इस मेरिट ट्रस्ट का सबसे बड़ा दानदाता था। उसका पैसा उन ग़रीब होनहार बच्चों को पालता था, जिन्हें वो असल में अपनी कोचिंग का ग्राहक बनाना चाहता था। दान भी उसके लिए एक धंधा था।

ठीक ग्यारह बजे, कॉलेज के गेट पर गाड़ियों का काफ़िला रुका। और उनमें से एक आदमी उतरा, धीमे, नाप-तौल कर, जैसे वक़्त भी उसके इशारे पर चलता हो।

साठ के आस-पास, बेदाग़ सफ़ेद कपड़े, सोने का चश्मा, और एक ऐसी मुस्कान जो हमेशा रहती थी, पर कभी गरम नहीं होती थी। नागपाल चला, और उसके साथ पूरा कॉलेज झुकता चला गया।

"नागपाल जी, स्वागत है। ये हमारे स्कॉलरशिप छात्र हैं। और ये हमारी टॉपर, नित्या सक्सेना। इस साल इसने मेंटरशिप का ज़िम्मा उठाया है।"

"मेंटरशिप। आह। तो ये वो प्रयोग है, जिसकी चर्चा है। एक टॉपर, और एक... कैसा कहते हैं उसे? हाँ, सबसे नाकाम छात्र। दिलचस्प जोड़ी है।"

उसने नित्या की फ़ाइल हाथ में ली, बिना जल्दबाज़ी के पन्ने पलटे, और उसकी नज़र नित्या के दस्तख़त वाली उस प्रगति रिपोर्ट पर ठहरी।

"तुमने लिखा है कि इस लड़के में गहरी क्षमता है। ठोस क्षमता। तुम्हें इतना यक़ीन कहाँ से आया, बेटा? क्या तुमने कोई सबूत देखा है? या ये सिर्फ़... उम्मीद है?"

नित्या का गला सूख गया। वो नागपाल की आँखों में देख रही थी, और उन आँखों में उसे वो चीज़ दिखी जो एक शिकारी में होती है, धैर्य।

"सर, मैंने उसे पढ़ते देखा है। मुझे यक़ीन है। हर इंसान में कुछ छिपा होता है। बस उसे देखने वाली नज़र चाहिए।"

"छिपा हुआ। वाह। तुम कवि भी हो। पर बेटा, इस दुनिया में छिपी हुई चीज़ें अक्सर इसलिए छिपी होती हैं क्योंकि उन्हें छिपा रहना चाहिए। रोशनी में आते ही, कुछ चीज़ें बहुत ख़तरनाक हो जाती हैं।"

उसे नहीं पता था कि उसने अभी उस लड़के के बारे में कितना बड़ा सच कह दिया था, जो ठीक उसी पल, उसी लॉबी में, एक खम्बे की ओट में खड़ा, उसे घूर रहा था।

नागपाल आगे बढ़ा, और तभी सभरवाल के साथ चल रहे एक प्रोफ़ेसर ने, बात-बात में, हँसते हुए इशारा किया।

"सर, और वो रहा हमारा 'सबसे नाकाम' छात्र। यही वो लड़का है जिस पर मेंटरशिप का प्रयोग हो रहा है। कियान।"

"आह, तो ये है वो पत्थर, जिसे टॉपर हीरा बनाना चाहती है। इधर आओ, लड़के। बताओ, दो और दो कितने होते हैं? देखें, तुम्हारी मेंटर की मेहनत रंग लाई या नहीं।"

पूरी लॉबी हँस पड़ी। दर्जनों नज़रें कियान पर टिक गईं, मज़ाक उड़ाने के लिए तैयार। और कियान, जो उस आदमी की गर्दन तोड़ना चाहता था, चुपचाप, सिर झुकाए खड़ा रहा।

"साहब, दो और दो... वो तो इस पर निर्भर करता है कि गिन कौन रहा है। कुछ लोग दो और दो को चार दिखाते हैं, और चुपके से पाँच जेब में रख लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए हिसाब हमेशा फ़ायदे में रहता है।"

लॉबी हँसी, ये समझ कर कि बुद्धू ने कोई बेतुकी बात कह दी। पर नागपाल की मुस्कान एक पल के लिए ठिठकी। उस बेवक़ूफ़ी भरे जवाब में कहीं एक धार थी, जो सिर्फ़ उसे चुभी।

"हम्म। बातें बनाना आता है। पर बातों से रैंक नहीं आती, लड़के। रैंक ख़रीदनी पड़ती है। और तुम्हारे जैसे लोग... ख़रीद नहीं सकते।"

कियान ने कुछ नहीं कहा। पर मन ही मन उसने सोचा, रैंक ख़रीदनी नहीं पड़ती, साहब। मैं तो रैंक बनाता हूँ, और तुम्हारे जैसे लोग उसे मेरे हाथ से ख़रीदते हैं। बस तुम्हें पता नहीं।

नागपाल आगे बढ़ गया। पर कियान वहीं खड़ा रहा। हमेशा की तरह पीछे, हमेशा की तरह अनदेखा। पर आज उसकी आँखों में नींद नहीं थी। आज उन आँखों में बारह साल का एक बवंडर था।

क्योंकि ये पहली बार था, बरसों बाद, जब कियान उस आदमी को इतने पास देख रहा था। वही आवाज़। वही मुस्कान जो कभी गरम नहीं होती। वही आदमी जिसने उसके पापा को मिट्टी में मिला दिया था।

और अचानक, कियान के सामने का गलियारा धुँधला गया। उसकी जगह एक और जगह उभर आई। एक छत। धूप में पढ़ते ग़रीब बच्चे। उसके पापा की हँसती आवाज़। और फिर... एक फ़ाइल, एक इल्ज़ाम, एक भीड़, और उसी सफ़ेद कपड़े वाले आदमी की उँगली, जो उसके पापा की तरफ़ उठी थी।

उसे याद आया, कैसे उसके पापा, जो कभी किसी के आगे नहीं झुके, उस दिन काँप रहे थे। कैसे अख़बारों में एक ईमानदार मास्टर को चोर लिखा गया। कैसे छत वाला स्कूल एक रात में उजड़ गया, और उसके पापा की मुस्कान हमेशा के लिए।

और इन सबके पीछे, हमेशा, वो एक ही चेहरा था। ये चेहरा। जो अब उससे चंद क़दम दूर, कॉलेज की चाय पी रहा था, हँस रहा था, और किसी और ग़रीब बच्चे को 'कूड़ा' बुला रहा था।

कियान की मुट्ठी अपने आप भिंच गई। नाख़ून हथेली में गड़ गए। उसका पूरा शरीर एक ही चीज़ चीख रहा था, आगे बढ़, और इस आदमी से पूछ कि उसने मेरे पापा के साथ क्या किया।

एक क़दम। उसका पैर आगे बढ़ा। मुखौटा फिसल रहा था। बुद्धू ग़ायब हो रहा था, और उसकी जगह एक बेटा, आग से भरा, सामने आ रहा था।

और तभी, किसी ने उसकी बाँह पकड़ ली।

"कियान? कियान, तुम्हें क्या हुआ? तुम्हारा चेहरा... मैंने तुम्हें ऐसे कभी नहीं देखा। तुम काँप रहे हो।"

नित्या ने उसका हाथ थामा हुआ था, और उसकी आँखों में सवाल था। उसने अभी वो देखा था जो किसी ने कभी नहीं देखा, बुद्धू के मुखौटे के नीचे का असली चेहरा। और वो चेहरा डरावना था। वो चेहरा नफ़रत से जल रहा था।

"कु... कुछ नहीं, मैडम। बस... भूख लग गई। खाली पेट में ऐसा ही होता है। कँपकँपी। हाँ। भूख।"

"भूख? कियान, तुम उस आदमी को ऐसे देख रहे थे जैसे तुम उसे... जानते हो। किसी पुराने दुश्मन की तरह।"

"मैं? उस बड़े आदमी को? मैडम, मैं तो अपना रोल नंबर नहीं जानता, उसे कहाँ से जानूँगा। बस... वो सफ़ेद कपड़े में भूत जैसा लग रहा था न, इसलिए डर गया।"

पर नित्या को अब वो झूठ पहचानने आ गया था। और ये झूठ सबसे बड़ा था। उसने उस पल को अपने भीतर सँभाल कर रख लिया, उन बाक़ी सवालों के साथ जिनका जवाब कियान कभी नहीं देता था।

उधर लॉबी के बीचों-बीच, नागपाल ने अपना गिलास उठाया, और पूरे कॉलेज को सुनाते हुए एक ऐलान किया।

"मैं बहुत ख़ुश हूँ। इसलिए मैंने एक फ़ैसला लिया है। इस साल, मैं ख़ुद, निजी तौर पर, हर स्कॉलरशिप छात्र की जाँच करूँगा। कौन इस पैसे के लायक़ है, कौन नहीं, ये मैं ख़ुद देखूँगा।"

नित्या का दिल बैठ गया। इसका मतलब था, अब उसकी स्कॉलरशिप का फ़ैसला किसी नियम से नहीं, इस एक आदमी की मर्ज़ी से होगा।

"और ये मेंटरशिप वाला मामला... ये मुझे सबसे दिलचस्प लगा। एक टॉपर और एक नाकाम लड़का। मैं इसमें ख़ास दिलचस्पी लूँगा। मैं देखना चाहता हूँ कि क्या सचमुच... कूड़े से सोना बनाया जा सकता है।"

'कूड़ा।' वही शब्द जो अमीर लोग ग़रीब लड़कों के लिए इस्तेमाल करते थे। और कियान ने वो शब्द सुना, और उसके जबड़े की हड्डी फिर सख़्त हो गई।

नागपाल मुड़ा, जाने के लिए। उसका काफ़िला हरकत में आया। और बस तभी, जाते-जाते, उसकी नज़र एक बार, बेध्यानी में, उस पीछे खड़े लड़के पर पड़ी। लास्ट बेंच वाला। जिसे कोई नहीं देखता।

और नागपाल रुक गया।

उसकी वो हमेशा वाली मुस्कान एक पल के लिए काँपी। उसकी आँखें कियान के चेहरे पर टिक गईं, और उनमें कुछ हिला, एक याद, एक परछाईं, कुछ जो बहुत गहरे दफ़्न था।

"ये चेहरा..."

कियान पत्थर बन गया। उसने नज़र नीची करने की कोशिश की, पर देर हो चुकी थी। नागपाल उसे घूर रहा था, जैसे किसी पुरानी, भूली हुई तस्वीर को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।

"तुम्हारी आँखें... ये आँखें मैंने पहले देखी हैं। बहुत साल पहले। ... देवनाथ?"

वो नाम, जो बारह साल से किसी ने ऊँची आवाज़ में नहीं लिया था। कियान के मरहूम पिता का नाम। एक ऐसा नाम, जिसे नागपाल ने अपने हाथों से मिट्टी में गाड़ा था।

कियान की साँस सीने में जम गई। एक हाँ, एक झलक, एक ग़लत हरकत, और सब ख़त्म। उसने अपने चेहरे को एक बुत बना लिया, वही ख़ाली, नींद भरी, बेवक़ूफ़ नज़र, जिसे उसने बरसों तराशा था।

"देव... क्या साहब? मेरा नाम कियान है। और मुझे कुछ याद नहीं रहता, सच्ची। कल का खाना भी याद नहीं रहता, तो नाम क्या याद रखूँ।"

नागपाल ने एक लंबा पल उसे देखा। उस बेवक़ूफ़ चेहरे और उन जानी-पहचानी आँखों के बीच झूलता रहा। और फिर, अपनी वो ठंडी मुस्कान वापस ओढ़ ली।

"हम्म। नहीं। वो आदमी तो कब का मर गया। और उसके जैसे लोगों की औलादें... वो तो और भी पहले मर जाती हैं। ख़ैर। चलता हूँ।"

वो मुड़ा और चला गया। पर उसकी उस आख़िरी नज़र ने हवा में एक ज़हर घोल दिया था। कियान की पूरी दुनिया एक पल के लिए रुक गई थी। क्योंकि अगर नागपाल ने उस चेहरे को पूरी तरह पहचान लिया, तो बारह साल का छिपा हुआ राज़, अभी, इसी लॉबी में, राख हो जाता।

"देवनाथ। उसने तुम्हें देवनाथ कहा। और तुम... तुम्हारा चेहरा उस नाम पर सफ़ेद पड़ गया, कियान। ये कौन था? तुम इस आदमी से कैसे जुड़े हो?"

कियान ने जवाब नहीं दिया। वो बस उस दरवाज़े को देखता रहा जहाँ से नागपाल गया था। और नित्या समझ गई कि आज उसने एक और परत उघाड़ी है, इस पहेली की सबसे गहरी, सबसे ख़तरनाक परत।

एक क़ातिल, एक बेटा, और एक मरे हुए आदमी का नाम, जो उन दोनों के बीच, हवा में लटका हुआ था।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

लास्ट बेंच वाला