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Chapter 17 of 25 12 min read

पिता का कर्ज़

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

कियान के क़दम गेट से दस क़दम पहले जम गए। बंटी की बात अब भी हवा में तैर रही थी, गेट पर वो कौन खड़ा है, तुझे पूछ रहा था। और कियान की जेब में वो पर्ची थी, आज दोपहर, पापा के घर के काग़ज़। बारह साल की लड़ाई का आख़िरी दिन। और ठीक उसी सुबह, ठीक उसी गेट पर, नक़ल-विरोधी दस्ते का अफ़सर उसका असली नाम ले कर खड़ा था।

"कियान, भागना मत। ... सुन रहे हो? भागोगे तो वही होगा जो वो चाहता है। बेगुनाह भागता नहीं। मुजरिम भागता है। ... और आज तुम अकेले नहीं हो। मेरी तरफ़ देखो, मेरी आँखों में। साँस लो। हम गेट के अंदर जाएँगे, साथ, आराम से।"

"उसके पास मेरा असली नाम है, नित्या। दुनिया में सिर्फ़ एक ही आदमी उसे मेरा नाम दे सकता था। ... सिकंदर। मतलब नागपाल। ... मतलब ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। ये चाल है। मुझे बारह साल की क़ैद के आख़िरी दिन पकड़वाया जा रहा है।"

और उसी पल कियान ने एक फ़ैसला किया। जो हथियार उसने बारह साल पहले उठाया था, वही आज आख़िरी बार उठाना था। उसके कंधे ढीले हो गए, आँखों में वो जानी-पहचानी नींद उतर आई, चेहरे पर वो भोली, ख़ाली मुस्कान जो पूरा कॉलेज पहचानता था। लास्ट बेंच वाला बुद्धू। और वही बुद्धू सीधे उस अफ़सर की तरफ़ चल पड़ा, हाथ हिलाते हुए।

"सर! आप मुझे ढूँढ रहे थे? ... सच में? वाह! मुझे तो आज तक कोई ढूँढता ही नहीं, सर! ... बताइए न, क्या हुआ? कोई इनाम-वनाम है क्या? सबसे कम हाज़िरी का? क्योंकि वो तो पक्का मेरा ही होगा!"

अफ़सर की आँखें तंग हुईं। उसने जेब से वही धुँधली सीसीटीवी तस्वीर निकाली और कियान के चेहरे से मिलाने लगा। उसने पूछा कि पिछले महीने की बारह तारीख़ को तुम कहाँ थे, और एक दूर के इम्तिहानी शहर का नाम लिया। फिर उसने एक फ़र्ज़ी नाम लिया, बहुत धीरे, कियान की आँखों में झाँकते हुए। रौनक अग्रवाल।

"रौनक अग्रवाल? ... सर, ये तो बड़ा अमीर आदमी वाला नाम लग रहा है! मैं रौनक अग्रवाल होता तो यहाँ आपके सामने फटी चप्पल में खड़ा होता क्या? ... और बारह तारीख़? सर, मुझे तो कल क्या खाया था वो याद नहीं रहता। मैडम से पूछ लीजिए। ये मेरी टीचर हैं। पूरे कॉलेज में मुझसे बड़ा नाकारा कोई नहीं।"

"सर, मैं इस कॉलेज की मेरिट स्कॉलर हूँ, और पिछले चार महीने से इसे पढ़ा रही हूँ। यक़ीन मानिए, ये लड़का अगर एक सवाल सीधा हल कर ले, तो मैं पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँट दूँ। ... आप इसे किसी परीक्षा का टॉपर समझ रहे हैं? सर, ये आदमी अपने ही इम्तिहान में रोल नंबर ग़लत लिख आता है। दो बार।"

और वो सच था। हर लफ़्ज़ सच था, और फिर भी सबसे बड़ा झूठ था। अफ़सर की नज़र दोनों पर टिकी रही, एक लम्बे, भारी पल। तस्वीर धुँधली थी। नाम पक्का नहीं था। उसके पास शक था, पर सबूत नहीं। और शक से हथकड़ी नहीं लगती। उसने धीरे से तस्वीर वापस जेब में रखी।

पर जाते-जाते उसने एक लाइन छोड़ी, जो कियान की रीढ़ में बर्फ़ की तरह उतर गई। तस्वीर साफ़ हो रही है, उसने कहा, लैब में। धीरे-धीरे। जिस दिन वो साफ़ हुई, मैं वापस आऊँगा। और उस दिन कोई मैडम, कोई मिठाई, तुझे नहीं बचाएगी, लड़के। और वो चला गया। कियान की भोली मुस्कान चेहरे पर तब तक चिपकी रही, जब तक अफ़सर की पीठ ओझल नहीं हो गई।

"नित्या, तुम समझ रही हो क्या हुआ? ... मेरी पूरी चाल यही थी। कर्ज़ चुकाओ, चुपचाप ग़ायब हो जाओ, कोई कभी न जाने कि लास्ट बेंच वाला असल में कौन था। ... पर नागपाल ने वो दरवाज़ा बंद कर दिया। उसने मेरा नाम दस्ते के हाथ में रख दिया। अब मैं चुपचाप ग़ायब नहीं हो सकता। अब या तो मैं पकड़ा जाऊँगा... या मुझे लड़ना पड़ेगा।"

"तो लड़ेंगे। ... पर एक वक़्त में एक पहाड़, कियान। अभी, आज दोपहर, तुम अपने पापा के घर के काग़ज़ छुड़ाओगे। बारह साल का एक हिसाब आज पूरा होगा, अफ़सर हो या न हो, नागपाल हो या न हो। पहले वो। बाक़ी जंग शाम को।"

दोपहर। शहर के सबसे पुराने हिस्से में, एक सीलन भरी गली के ऊपर, सेठ धनराज का दफ़्तर था। वही धनराज, जिसकी सूद की डोर बारह साल से देवनाथ मास्टर के परिवार के गले में बँधी थी। कियान तंग सीढ़ियाँ चढ़ा, हाथ में नक़दी की वही थैली, जो कल इतनी मुश्किल से बची थी। और उसके साथ, हर सीढ़ी पर, नित्या थी।

धनराज ने नोट गिने, एक-एक कर के, उँगली पर थूक लगा कर, जैसे बारह साल से गिनता आया था। फिर उसने एक पुरानी, पीली फ़ाइल निकाली, उस पर जमी धूल फूँक कर उड़ाई, और एक काग़ज़ मेज़ पर सरका दिया। घर के काग़ज़। देवनाथ मास्टर का घर। कियान के बचपन की वो छत, जहाँ पूरे मोहल्ले के बच्चे मुफ़्त पढ़ने आते थे।

"बस? ... इतना ही? बारह साल... और आज बस ये एक काग़ज़, और सब ख़त्म? ... मुझे लगा था इस पल में आसमान से कुछ गिरेगा, बाजे बजेंगे। पर बस एक धूल भरा काग़ज़ है, और एक ख़ामोश कमरा।"

धनराज ने कंधे उचकाए और कहा कि हिसाब हिसाब होता है, बेटा, अब तेरे बाप का नाम मेरी बही में नहीं है। फिर उसने एक ठंडी बात जोड़ी, जो किसी थप्पड़ से ज़्यादा लगी। तेरे बाप ने कभी एक दिन देर नहीं की, जब तक जिया। सबसे ईमानदार आदमी था जो मेरी बही में कभी आया। और ईमानदारी में ही मरा।

और कियान ने वो काग़ज़ उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे। एक काग़ज़, जिसका वज़न बारह साल था। उसने उसे यूँ थामा जैसे कोई बरसों बाद अपने बाप का हाथ थामता है। और नित्या ने देखा कि उस लड़के की आँखें, जो पूरे कॉलेज के सामने कभी नहीं झुकीं, कभी गीली नहीं हुईं, आज चुपचाप भर आई थीं।

"कियान... ये हो गया। सच में हो गया। कर्ज़ ख़त्म। ... तुम्हारे पापा का घर, वो छत, वो पाठशाला, सब वापस तुम्हारा। किसी और के नाम पर नहीं, कियान के नाम पर। तुमने कर दिखाया।"

"पता है नित्या, इसी छत पर मेरे पापा पूरे मोहल्ले के बच्चों को मुफ़्त पढ़ाते थे। और मैं उसी छत को छुड़ाने के लिए बारह साल दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धू बना रहा। ... वो ऊपर से देख रहे होंगे और सोच रहे होंगे, ये लड़का पढ़ने में तो पूरा निकम्मा निकला, पर छत बचा ले गया।"

और वो हँसा, पर हँसी बीच में ही टूट गई, जैसे कोई पुल आधे में दरक जाए। क्योंकि जिस बाप के लिए ये सब किया, वो ये काग़ज़ देखने के लिए नहीं था। नित्या ने कुछ नहीं कहा। बस बढ़ कर उसका हाथ थाम लिया। और इस बार, पहली बार, कियान ने अपना हाथ छुड़ाया नहीं।

उस शाम, वो दोनों उसी छत पर थे, उसी चाय वाली तपरी के पास, जहाँ बारह हफ़्ते पहले एक टॉपर एक बुद्धू को कान पकड़ कर घसीट लाई थी। पर आज हवा बदली हुई थी। कियान ने चाय का गिलास नीचे रखा, नित्या की तरफ़ देखा, और पहली बार, उसकी आँखों में कोई मुखौटा नहीं था। सिर्फ़ एक थका हुआ, सच्चा लड़का।

"नित्या। उस दिन मैंने तुम्हें आधा सच बताया था। कर्ज़, धनराज, रोशनी। और आधा छुपा लिया था। ... आज कर्ज़ ख़त्म हो गया है। और मैं नहीं चाहता कि अब हमारे बीच भी कोई कर्ज़ बचे। कोई झूठ। ... तुम पूरा सच सुनोगी? जितना डरावना है उतना पूरा?"

नित्या ने बस सिर हिलाया। हवा एक पल को रुक सी गई। दूर, शहर की बत्तियाँ एक-एक कर के जल रही थीं, जैसे कोई आसमान में हिसाब लगा रहा हो।

"मैं जानबूझकर फेल होता हूँ, नित्या। हर बार। हर पर्चे में। क्योंकि जिस दिन कोई सच में देख लेगा कि मैं होशियार हूँ, उसी दिन मेरा राज़ खुल जाएगा। ... मैं किसी और के नाम पर, पैसे ले कर, देश के सबसे मुश्किल इम्तिहान पास करता हूँ। समर। अंकित तिवारी। रौनक अग्रवाल। वो सब चेहरे मेरे हैं। लास्ट बेंच वाला बुद्धू, असल में उन सबका दिमाग़ है।"

और नित्या को इस पर झटका नहीं लगा, क्योंकि ये आधा वो पहले ही जोड़ चुकी थी। पर असली झटका उस अगली बात से लगा, जो कियान ने और भी धीरे कही, जैसे उसे कहते हुए भी डर लग रहा हो।

"और जिस आदमी के लिए मैं ये सब करता था, जो सिकंदर के ज़रिए मुझे काम भेजता था, वो कोई अजनबी नहीं था, नित्या। ... वो नागपाल था। बारह साल से। जिस आदमी से मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा नफ़रत करता हूँ, मैं अनजाने में उसी के लिए पर्चे हल करता रहा। अपने ही दुश्मन के हाथ का मोहरा बन कर।"

"नागपाल? ... सिकंदर के पीछे शुरू से नागपाल था? ... कियान, इसका मतलब जिसने तुम्हारे पापा को बरबाद किया, तुमने बारह साल उसी को और अमीर बनाया। उसने तुम्हारे बाप को मार कर, तुम्हारे ही दिमाग़ को अपनी जेब में डाल लिया। ये तो... ये तो बहुत ज़ालिम है।"

"और मैं फिर भी नहीं छोड़ सकता था। क्योंकि मेरे पापा ने मरते वक़्त मुझसे दो वादे लिए थे। एक, हमारे नाम को दोबारा कभी किसी घोटाले से मत छूने देना। और दो, जब तक कर्ज़ न चुके, गुमनाम रहना। ... आज मैंने कर्ज़ चुका दिया, नित्या। दूसरा वादा पूरा हुआ। बारह साल बाद।"

और यहीं, इसी पल, पूरी कहानी मुड़ गई। क्योंकि नित्या ने वो एक सवाल पूछा जो सब कुछ बदलने वाला था।

"दूसरा वादा? ... कियान, कर्ज़ तो ख़त्म हो गया। तुम आज़ाद हो। अब तुम गुमनामी छोड़ सकते हो, दुनिया के सामने आ सकते हो। फिर तुम्हारी आँखों में अब भी वो बोझ क्यों है? ... कौन सा वादा अब भी बाक़ी है?"

"क्योंकि कर्ज़ सिर्फ़ पैसा नहीं था, नित्या। ... जिस पेपर लीक के घोटाले का इल्ज़ाम मेरे पापा पर लगा, वो झूठा था। नागपाल का गढ़ा हुआ। और वो झूठा सबूत, वो नक़ली फ़ाइल जिसने एक ईमानदार मास्टर को चोर बना दिया, वो आज भी कहीं मौजूद है। ... मेरे पापा का पैसा वाला कर्ज़ चुक गया। पर मेरे पापा का नाम, वो आज भी एक चोर का नाम है। और वही असली, आख़िरी कर्ज़ है।"

और नित्या को पहली बार पूरी तस्वीर दिखी। ये लड़का सिर्फ़ पैसा नहीं चुका रहा था। ये बारह साल से एक जंग की तैयारी कर रहा था, अकेले, अंधेरे में, बिना किसी को बताए। उसने बहुत धीरे पूछा कि फिर आगे क्या, कियान। इस असली कर्ज़ का हिसाब कैसे चुकेगा।

"तुम्हें लगता है मैं वो सारा पैसा बस धनराज को देता रहा? ... नहीं, नित्या। हर काम का एक हिस्सा मैंने अलग रखा। बारह साल से। एक-एक रुपया जोड़ा, एक जंग के लिए। ... और सिर्फ़ पैसा नहीं। हर बार जब मैं नागपाल की मशीन के अंदर गया, मैंने वहाँ से सबूत उठाए। नाम, रसीदें, रैंक बेचने का पूरा हिसाब। मैंने चुपके से, उसी की मशीन के अंदर बैठ कर, नागपाल के ख़िलाफ़ एक पूरी फ़ाइल बना ली है।"

नित्या के हाथ से मानो चाय का गिलास फिसलते-फिसलते बचा। बुद्धू लास्ट बेंच वाला, जो क्लास में सोता था, जो हर जवाब गोल कर देता था, जिसे पूरा कॉलेज नाकारा कहता था, वो बारह साल से देश के सबसे ताक़तवर कोचिंग बादशाह के ख़िलाफ़, उसी की माँद में बैठ कर, ख़ामोशी से एक बम बना रहा था।

"तुमने... तुमने नागपाल के ख़िलाफ़ सबूत जमा किए हैं? उसी के लिए काम करते हुए, उसी की नाक के नीचे? ... कियान, ये तो उसे गिरा सकता है। पूरी तरह। ये सिर्फ़ बचने की बात नहीं रही। ये तो जीतने की बात है। तुम्हारे पापा का नाम साफ़ हो सकता है।"

"लगभग। ... मेरी फ़ाइल में रैकेट का सब कुछ है। रैंक की ख़रीद-फ़रोख़्त, सिकंदर, पैसा, सब। पर एक चीज़ नहीं है। वो एक चीज़ जो मेरे पापा को बेगुनाह साबित करेगी। ... वो असली, नक़ली फ़ाइल। बारह साल पुराना वो गढ़ा हुआ पेपर लीक का सबूत। जब तक वो सामने नहीं आता, दुनिया मानती रहेगी कि चोर मेरे पापा थे, नागपाल नहीं।"

"तो वो फ़ाइल है कहाँ, कियान? वो नक़ली सबूत, वो एक चीज़ जो सब बदल देगी, बारह साल की सारी लड़ाई जिस पर टिकी है... वो आख़िर है कहाँ?"

और कियान ने छत से, शहर के उस पार देखा, जहाँ आसमान में एक शीशे की मीनार खड़ी थी। नागपाल क्लासेज़ का मुख्यालय। अपनी हर मंज़िल से ठंडी नीली रौशनी बिखेरती हुई। ऊँची, बेदाग़, नामुमकिन। कियान ने बहुत धीरे, उस मीनार की तरफ़ उँगली उठाई।

"वहाँ। ... नागपाल के अपने दफ़्तर में। सबसे ऊँची मंज़िल पर, उसकी अपनी तिजोरी में। जिस आदमी ने मेरे पापा को चोर बनाया, उसका सबूत उसी के महल में, उसी के सीने के सबसे क़रीब बंद है। ... अपने पापा का नाम साफ़ करने के लिए, नित्या, मुझे उसी शेर की माँद में घुसना होगा।"

और उस शीशे की मीनार की ठंडी रौशनी में, बारह साल पुराना बुद्धू का मुखौटा, आख़िरकार, उतरने को तैयार था। कर्ज़ चुक चुका था। पर पिता का असली कर्ज़, नाम का कर्ज़, अभी बाक़ी था। और उसे चुकाने की सबसे ख़तरनाक लड़ाई, अभी, इसी पल, शुरू हुई थी।

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