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Chapter 10 of 25 12 min read

पकड़ा गया?

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

परीक्षा वाली सुबह हवा में एक अजीब सी ख़ामोशी थी। शहर के बाहर, एक ऊँची दीवारों वाली इमारत, जिसके गेट पर धातु का दरवाज़ा, कैमरे, और वर्दीधारी गार्ड। देश की सबसे बड़ी परीक्षा का किला।

और उस भीड़ में, एक लड़का, महँगी घड़ी, इस्तरी की हुई कमीज़, और एक नाम जो उसका नहीं था। रौनक अग्रवाल। असल में, कियान।

कॉलेज में कियान भगवान था। वहाँ हर चाल उसकी थी, हर मुखौटा उसका। पर यहाँ, इस किले में, वो एक मोहरा था, सिकंदर की बिछाई गोटियों पर टिका हुआ। और मोहरे कभी नहीं जानते कि उन्हें कौन चला रहा है।

"बस तीन घंटे, कियान। अंदर जा, पर्चा हल कर, और निकल जा। तू रौनक है। तेरी कोई कहानी नहीं, कोई पापा नहीं, कोई राज़ नहीं। बस एक रोल नंबर। साँस ले। और चल।"

गेट पर पहली जाँच। एक गार्ड ने रौनक का एडमिट कार्ड देखा, फिर चेहरा, फिर कार्ड। कियान की पीठ पर पसीने की एक ठंडी लकीर उतरी। पर वो मुस्कुराया, बेफ़िक्र, अमीर बाप के बिगड़े बेटे की तरह।

"भाईसाहब, जल्दी करिए न। पापा की गाड़ी बाहर खड़ी है, ड्राइवर को नो-पार्किंग में परेशानी होगी। और मुझे टॉप रैंक लानी है, समझे? देर मत करवाइए।"

गार्ड ने आँखें घुमाईं और उसे अंदर जाने दिया। पहली परत पार। कियान का दिल एक धड़कन के लिए हल्का हुआ। पर असली दीवार अभी बाक़ी थी। बायोमेट्रिक।

अंदर, एक मेज़ पर एक मशीन रखी थी। हर छात्र को उस पर अंगूठा रखना था, और आँख भी स्कैन करानी थी। मशीन मिलाती थी कि जो अंदर बैठ रहा है, वही है जिसने फ़ॉर्म भरा। और कियान रौनक नहीं था।

सिकंदर ने कहा था, अंदर हमारा आदमी है, मशीन में तेरा निशान पहले से डाल दिया जाएगा। पर वादे और मशीनें, दोनों धोखा देती हैं। कियान की बारी आई। उसने अंगूठा शीशे पर रखा।

मशीन ने एक पल सोचा। एक सेकंड। दो। और फिर एक लाल बत्ती जली, और एक तीखी आवाज़, बीप। मैच नहीं हुआ।

पूरी दुनिया रुक गई। कियान का ख़ून जम गया। पास खड़ा निगरान चौंका। लाल बत्ती का मतलब था, गड़बड़। और गड़बड़ का मतलब था, पकड़ा जाना, और उसके साथ, बारह साल का राज़, उसके पापा का नाम, सब ख़त्म।

निगरान, एक अधेड़, तेज़ आँखों वाला आदमी, आगे बढ़ा। उसकी नज़र मशीन से उठ कर कियान के चेहरे पर टिक गई।

"अरे यार, ये मशीन भी न। कल कोचिंग में भी यही किया था इसने। मेरा अंगूठा थोड़ा कट गया है न, क्रिकेट खेलते हुए, इसलिए। दुबारा लगाऊँ? आप लोग इतनी पुरानी मशीनें रखते ही क्यों हो।"

निगरान कुछ कहता, इससे पहले कियान ने फिर अंगूठा रखा। और इस बार, अंदर बैठे सिकंदर के आदमी ने, जो उसी मशीन के तार सँभाले बैठा था, चुपके से सही निशान चला दिया। मशीन ने फिर सोचा। एक सेकंड। और फिर, हरी बत्ती।

निगरान की भवें अब भी तनी थीं। हरी बत्ती के बावजूद, उसकी आँखों में शक बैठ गया था। उसने कुछ नहीं कहा, पर कियान को अंदर जाते हुए देखता रहा, और अपनी जेब से एक छोटा सा नोटपैड निकाल कर उस पर सीट नंबर लिख लिया। रौनक अग्रवाल। सीट बयालीस।

परीक्षा हॉल में, कियान अपनी सीट पर बैठा। सामने पर्चा आया। और जैसे ही उसकी नज़र सवालों पर पड़ी, एक अजीब बात हुई। सारा डर एक तरफ़ हट गया।

क्योंकि यही एक जगह थी जहाँ कियान झूठ नहीं बोलता था। जहाँ वो बुद्धू नहीं बनता था। जहाँ उसका असली रूप, वो तेज़, ठंडा, चमकता दिमाग़, खुल कर साँस लेता था। सवाल कठिन थे, देश के सबसे कठिन। और कियान उनके बीच ऐसे चल रहा था जैसे कोई अपने घर के अँधेरे कमरे में, बिना ठोकर खाए।

एक-एक कर के सवाल गिरते गए। जो सवाल औरों को घंटों रुलाते, कियान उन्हें मिनटों में चीर देता। तीन घंटे का पर्चा उसने दो में ख़त्म कर दिया, और बाक़ी वक़्त, जान-बूझ कर, धीरे-धीरे जवाब उतारता रहा, ताकि बहुत तेज़ न लगे।

पर वो निगरान। वो बार-बार सीट बयालीस के पास से गुज़रता। रुकता। देखता। कियान की पीठ पर उसकी नज़र किसी सुई की तरह चुभती थी। कियान जानता था, ये आदमी उसे भूलेगा नहीं।

घंटी बजी। पर्चा जमा हुआ। कियान उठा, और भीड़ के साथ बाहर की तरफ़ बढ़ा, सिर झुकाए, चेहरा छिपाए, हर कैमरे से बचते हुए। दरवाज़े पर वही निगरान खड़ा था।

"थैंक यू सर। पर्चा अच्छा गया। पापा को बता दूँगा कि आपकी मशीन ने मुझे तंग किया। ... मज़ाक कर रहा हूँ। चलता हूँ।"

और वो निकल गया। गेट के बाहर, गली के मोड़ पर, कियान एक दीवार से टिक गया, और पहली बार, तीन घंटे में, ठीक से साँस ली। पसीने में भीगा, काँपता हुआ। वो बच गया था। बाल-बाल।

पर उस दीवार से टिके हुए, कियान को एक ठंडी सच्चाई महसूस हुई। कॉलेज में वो सुरक्षित था, क्योंकि वहाँ का खेल उसका था। पर यहाँ, इस खुली दुनिया में, वो एक दूसरे की मशीन, एक दूसरे के आदमी, एक दूसरे के रहम पर था। यहाँ वो मालिक नहीं, बेपर्दा और अकेला था। और ये एहसास किसी भी परीक्षा से ज़्यादा डरावना था।

"पर हो गया, पापा। ये आख़िरी था। पंद्रह लाख। धनराज का पूरा कर्ज़, ख़त्म। बारह साल का बोझ, आज उतर गया। ... अब बस काग़ज़ में हिसाब सिफ़र होने की देर है, और मैं आज़ाद। तुम्हारा वादा पूरा। फिर न कोई समर, न रौनक। सिर्फ़ तुम्हारा बेटा।"

उसने आँखें बंद कीं, और एक पल के लिए ख़ुद को उस आज़ाद ज़िंदगी में देखा, जहाँ कोई मुखौटा नहीं था। उसे नहीं पता था कि वो आज़ादी नहीं, एक फंदा था, और उसका फीता किसी और के हाथ में था।


उसी वक़्त, दो सौ किलोमीटर दूर, सरस्वती कॉलेज में, कियान की एक ख़ाली कुर्सी एक तूफ़ान खड़ा कर रही थी।

प्रोफ़ेसर सभरवाल, विभाग की मुखिया, अपनी मेज़ पर हाज़िरी रजिस्टर खोले बैठी थीं। और उनकी उँगली एक ख़ाली ख़ाने पर रुकी थी। कियान। ग़ैरहाज़िर।

"नित्या। तुम्हारा वो होनहार छात्र आज फिर ग़ायब है। जिस दिन इसकी मेंटरशिप रिपोर्ट पर नागपाल जी की नज़र है, उसी दिन ये ग़ायब। मुझे बताओ, ये लड़का कहाँ है? और सच बताना, क्योंकि झूठ मुझसे छिपता नहीं।"

और नित्या वहीं जम गई। क्योंकि उसे सच पता था, या कम से कम उसे लगता था कि पता है। कल उसने कियान को उस अँधेरी गली में, उस ख़तरनाक आदमी के साथ देखा था। उसके दिमाग़ में अब भी वही शब्द गूँज रहे थे, पर्चा, नाम, पैसा। जुर्म।

और अब उसके सामने दो रास्ते थे। एक, सच बोल दे, कि कियान कहीं गड़बड़ में है, और अपने आप को उस ठग से अलग कर ले। पर उस सच के साथ एक क़ीमत जुड़ी थी। अगर कियान की ग़ैरहाज़िरी दर्ज हुई, मेंटरशिप नाकाम मानी गई, तो नित्या की स्कॉलरशिप, उसी पल, ख़त्म।

और उस एक पल में, नित्या को अपनी माँ का चेहरा दिखा। वो फ़ोन, जिस पर माँ पूछती थी, बेटा, वज़ीफ़ा आया? वो छोटा सा घर, जो इसी पैसे पर टिका था। और नित्या ने, अपने ही उसूलों को एक तरफ़ रखते हुए, वो किया जो उसने कभी नहीं किया था। उसने झूठ बोला।

"मैम, कियान बीमार है। तेज़ बुख़ार। मैंने ही उसे आराम करने को कहा। असल में, मैंने उसे कुछ ख़ास सवाल दिए हैं हल करने को, घर पर, अकेले में। वो उसी पर काम कर रहा है। मेंटरशिप का हिस्सा है ये। मेरी निगरानी में।"

सभरवाल ने अपनी ऐनक के ऊपर से नित्या को देखा। एक लंबा, तीखा पल। सभरवाल झूठ पहचानती थीं, और उन्हें शक हुआ। पर नित्या की आँखों में एक ज़िद थी, और सभरवाल के दिल में इस लड़की के लिए एक नरम कोना।

"ठीक है। मैं आज के लिए इसे तुम्हारी निगरानी में मान लेती हूँ। पर नित्या, याद रखो, तुमने अपना नाम इस लड़के के साथ बाँध दिया है। ये डूबा, तो तुम भी डूबोगी। मैं उम्मीद करती हूँ तुम्हें अंदाज़ा है कि तुम किसके लिए अपनी साख दाँव पर लगा रही हो।"

नित्या कमरे से बाहर निकली, और दीवार से टिक गई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने अभी-अभी उस लड़के के लिए झूठ बोला था जिसे वो एक ठग समझती थी। उसने ख़ुद को उसके जुर्म में शरीक कर लिया था। और सबसे बुरी बात, उसे नहीं पता था कि उसने ये अपनी स्कॉलरशिप के लिए किया, या... किसी और वजह से।


और उधर हॉस्टल में, कियान का 'आधिकारिक बीमार होना' एक और मुसीबत खड़ी कर रहा था, जिसका नाम था बंटी।

"कियान बीमार है?! किसने कहा?! अरे वो तो कल रात बिल्कुल ठीक था, मेरे साथ चार समोसे खाए थे उसने! मैं अभी जाकर सबको बताता हूँ कि मेरा दोस्त बिल्कुल स्वस्थ है, कोई अफ़वाह न फैले!"

अगर बंटी ये 'सच' सबको बता देता, तो नित्या का झूठ उसी पल फट जाता। शुक्र था कि नित्या ने उसे बीच रास्ते पकड़ लिया।

"बंटी! रुको! हाँ, कियान बीमार है। बहुत बीमार। और अगर किसी ने पूछा, तो तुम कहोगे कि हाँ, वो कल रात से ही बीमार था, तुमने उसे काँपते देखा। समझे? अगर तुमने कुछ और कहा, तो तुम्हारा दोस्त बड़ी मुसीबत में पड़ जाएगा। बहुत बड़ी।"

"पर मैडम, वो तो ठीक... अच्छा। ठीक है। कियान बीमार था। बहुत बीमार। काँप रहा था। ... वैसे मैडम, आप मेरे दोस्त के लिए झूठ बोलने को कह रही हैं, इसका मतलब आप उसे... अरे, वो अलग बात है, मैं चुप रहूँगा। बंटी अपने यार के लिए जान दे देगा, झूठ तो छोटी चीज़ है।"

और नित्या को, अपने डर के बीच, एक पल के लिए हँसी आ गई। बंटी को ये तक नहीं पता था कि वो किस झूठ का हिस्सा बन रहा है, पर वो बिना सोचे अपने दोस्त के लिए खड़ा हो गया। इस पूरी उलझन में, ये एक चीज़ साफ़ थी, कि कियान के आस-पास लोग उसके लिए झूठ बोलने को तैयार रहते थे। और शायद, इसकी कोई वजह थी।


रात होते-होते, कियान लौटा। थका हुआ, ख़ाली, और अंदर से टूटा हुआ। हॉस्टल के गेट पर, अँधेरे में, एक परछाईं उसका इंतज़ार कर रही थी। नित्या।

"बीमारी कैसी है, कियान? बुख़ार उतरा? ... मैंने आज तुम्हारे लिए झूठ बोला। प्रोफ़ेसर सभरवाल के मुँह पर। पहली बार अपनी ज़िंदगी में। और मुझे नहीं पता क्यों, क्योंकि मुझे लगता है तुम एक झूठे हो, कियान। बहुत बड़े झूठे।"

"तो बोला क्यों? अगर मैं झूठा हूँ, तो सच बता देतीं। तुम्हारी स्कॉलरशिप तो बच जाती।"

"पता नहीं। शायद इसलिए कि जब भी मैं तुम्हें ठग समझने की कोशिश करती हूँ, कोई एक चीज़ बीच में आ जाती है। तुम्हारी बहन को फ़ोन पर पढ़ाना। एक जूनियर को बचाना। ... मेरे लिए बचाया हुआ एक समोसा। ठग ऐसा नहीं करते, कियान। तो तुम कौन हो? मुझे बताओ। एक बार, सच।"

और कियान चुप रहा। क्योंकि सच बताना उसे बचा नहीं सकता था, सिर्फ़ उसे भी डुबो सकता था। और आज, दो सौ किलोमीटर की उस बेपर्दा दुनिया से लौट कर, वो नहीं चाहता था कि नित्या भी उस दुनिया में खिंच आए।

"मैं कोई नहीं हूँ, नित्या। बस एक लास्ट बेंच वाला। जितना कम मुझे जानोगी, उतनी सुरक्षित रहोगी। आज तुमने मेरे लिए झूठ बोला। उसके लिए शुक्रिया। पर अगली बार मत बोलना। मैं इस लायक़ नहीं।"

और वो अंदर चला गया। पर उन दोनों के बीच जो हुआ, वो एक धागा और कस गया। नित्या अब सिर्फ़ उसकी मेंटर नहीं थी। वो उसके झूठ की हिस्सेदार थी। और वो चाहे या न चाहे, अब उन दोनों की क़िस्मत एक ही डोर से बँधी थी।


पर उस रात, जब कियान थकान में सो रहा था, यह सोच कर कि सबसे बड़ा ख़तरा टल गया, दूर, नागपाल की शीशे की मीनार में, एक और चाल चली जा रही थी।

क्योंकि सिकंदर का वो आदमी, जिसने मशीन में कियान का निशान चलाया था, वो नागपाल का आदमी था। और उसने कियान को बचाया नहीं था, उसने एक निशान छोड़ा था। एक फ़्लैग हुआ बायोमेट्रिक। एक धुँधली सीसीटीवी तस्वीर। एक सुराग़, जान-बूझ कर छोड़ा गया।

और अगली सुबह, टीवी पर, अख़बारों में, कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर, एक ख़बर आग की तरह फैल गई। नक़ल-विरोधी दस्ते ने एक बड़े प्रॉक्सी-परीक्षा रैकेट की जाँच का ऐलान कर दिया था। कोई है, जो किसी और के नाम पर, देश के सबसे बड़े इम्तिहान पास करता है।

और उस ख़बर के साथ, एक तस्वीर। धुँधली, दानेदार, सीसीटीवी से ली हुई। एक लड़के की, परीक्षा हॉल से निकलते हुए, सिर झुकाए। चेहरा साफ़ नहीं था। पर आँखें, चाल, कद... वो हूबहू किसी और जैसा दिखता था।

कॉलेज की छत पर, चाय की तपरी पर, नित्या उस अख़बार को हाथ में लिए जम गई। उसके बग़ल में खड़े बंटी ने वही तस्वीर देखी, और हँस कर कहा, 'अरे, ये तो बिल्कुल अपने कियान जैसा दिखता है!' नित्या का हाथ काँपा। क्योंकि वो हँस नहीं पा रही थी। क्योंकि उसे पता था। वो कियान जैसा नहीं दिखता था। वो कियान था। और अब पूरा देश उस चेहरे को ढूँढ रहा था।

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