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अध्याय 14 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

नागपाल का जाल

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

शहर के बीचोंबीच एक शीशे की मीनार खड़ी थी, नागपाल क्लासेज़, जहाँ से पूरे इलाक़े की रैंकें, फ़ीसें, और डर एक ही आदमी की मेज़ से चलते थे। उस मेज़ के पीछे, चौदहवीं मंज़िल पर, यशपाल नागपाल एक फ़ाइल पलट रहा था। मेरिट ट्रस्ट के छात्रों की फ़ाइल। और उसकी उँगली एक नाम पर रुकी। नित्या सक्सेना।

नागपाल मुस्कुराया, उस मुस्कान से जो कभी आँखों तक नहीं पहुँचती थी। क्योंकि वो जानता था, नित्या के वज़ीफ़े की डोर उसके अपने दान से बँधी थी। और उस लड़की की डोर, उस लड़के तक जाती थी जिसे वो बारह साल से ढूँढ रहा था। एक ही जाल, और उसमें दो शिकार।

तभी दरवाज़ा खुला, और अंदर आई सान्या बेदी। रनर-अप। वो लड़की जिसे नित्या की मेंटरशिप के नाकाम होते ही वो वज़ीफ़ा मिल जाता। हाथ में एक फ़ाइल, आँखों में एक बेचैन भूख।

"सर, माफ़ कीजिए बिना अपॉइंटमेंट के आने के लिए। पर मुझे लगा ये सीधे आपको बताना चाहिए। नित्या सक्सेना अपनी मेंटरशिप को बचाने के लिए झूठ बोल रही है। कियान की प्रगति के जो नंबर हैं, वो बनाए हुए हैं। मैं साबित कर सकती हूँ। और अगर ये शर्त फ़र्ज़ी है, तो वज़ीफ़ा सही हक़दार को मिलना चाहिए।"

"बैठो, बेटा। ... सान्या बेदी। दूसरा नंबर। हमेशा दूसरा। कैसा लगता है, इतने पास हो कर भी हर बार हाथ से फिसल जाना?"

"मैं यहाँ अपनी क़ाबिलियत की बेइज़्ज़ती सुनने नहीं आई, सर। मैं यहाँ इंसाफ़ माँगने आई हूँ।"

"इंसाफ़। कितना प्यारा शब्द है। ... मुझे बताओ, सान्या। तुम्हारे पिता की दुकान कैसी चल रही है? सुना है क़र्ज़ में डूबी है। और घर में तुमसे बहुत उम्मीदें हैं, है न? एक ही बेटी, जिस पर पूरा परिवार टिका है। तुम्हारा दूसरा नंबर सिर्फ़ तुम्हारा नहीं। पूरे घर का है।"

और सान्या के गले में एक गाँठ बँध गई। क्योंकि नागपाल ने वो जगह छू ली थी जो सबसे नरम थी। उसका डर। उसकी अपनी माँ, अपना घर, अपना कर्ज़। वो नित्या से इतनी अलग नहीं थी। बस उसे ये कोई नहीं बताता था।

"मेरे परिवार का ज़िक्र मत कीजिए, सर। मैं भीख नहीं माँग रही। मैं वो माँग रही हूँ जो मेरा हक़ है। नित्या को वो वज़ीफ़ा एक टूटी हुई शर्त पर मिल रहा है। मैं दूसरे नंबर पर हूँ, माना, पर मैंने आज तक अपने नंबर झूठ पर नहीं बनाए।"

"देखा? यही फ़र्क़ है तुममें और उस लड़की में। वो झूठ बोल कर बच जाती है, तुम सच बोल कर हार जाती हो। ... मैं तुम्हें एक सबक़ सिखाता हूँ, सान्या, जो कोई कोचिंग नहीं सिखाती। इस दुनिया में न सच जीतता है, न झूठ। सिर्फ़ ताक़त जीतती है। और ताक़त, फ़िलहाल, इस कमरे में सिर्फ़ मेरे पास है।"

"मैं तुम्हारी मदद करूँगा, सान्या। वो वज़ीफ़ा तुम्हारा होगा। बस तुम मेरे लिए एक छोटा सा काम करोगी। कियान और नित्या पर नज़र रखोगी। मुझे बताती रहोगी, वो क्या करते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं। बस इतना। बदले में, तुम्हारे परिवार का सारा बोझ मेरा।"

"पर... आपको उन दोनों में इतनी दिलचस्पी क्यों है, सर? ये तो बस एक कॉलेज की मेंटरशिप है।"

"तुम मेरे लिए काम कर रही हो, सान्या, या मुझसे सवाल पूछ रही हो? दूसरा नंबर बनना है, या पहला? फ़ैसला तुम्हारा।"

और सान्या ने हाँ कह दी। हार से नहीं, ज़रूरत से। उसे नहीं पता था कि उसने अभी एक कॉलेज की जंग नहीं, बारह साल पुरानी एक साज़िश में क़दम रखा था। उसने सोचा वो एक वज़ीफ़े के लिए लड़ रही है। असल में वो एक बंदूक़ बन गई थी, जिसकी नाल किसी और के हाथ में थी।

उधर कॉलेज में, उस भीगी छत की सुबह के बाद, नित्या और कियान के बीच एक नई तरह की ख़ामोशी थी। एक तरफ़ वो पल, जो लगभग एक चुंबन था। दूसरी तरफ़ वो लाइन, जो लगभग एक जंग का ऐलान थी।

"कियान, मैंने रात भर सोचा। हम नागपाल के पुराने घोटाले के सबूत ढूँढ सकते हैं। किसी न किसी के पास कुछ तो होगा, कोई पुराना काग़ज़, कोई गवाह। अगर हम..."

"बस करो, नित्या। तुम्हें लगता है मैंने बारह साल में ये नहीं सोचा? वो आदमी हवा में भी अपने निशान नहीं छोड़ता। और जिस दिन उसे भनक लगी कि तुम उसके पीछे हो, उस दिन तुम्हारी माँ की दवाई का पैसा सबसे पहले बंद होगा।"

"तो हम डर कर बैठे रहें? कियान, मैं ऐसे नहीं जी सकती, हर वक़्त सिर झुकाए, उस आदमी का एहसान ओढ़े जो तुम्हारे बाप का क़ातिल है।"

और कियान चुप हो गया। क्योंकि नित्या की हिम्मत ही उसका सबसे बड़ा डर बन गई थी। वो एक लड़की, जो झुकना नहीं जानती थी, और एक आदमी, जो झुकाना ही जानता था। और कियान बीच में खड़ा था, दोनों को बचाने की नामुमकिन कोशिश में।

"नित्या, मैं तुमसे एक ही चीज़ माँगता हूँ। कुछ दिन। सिर्फ़ कुछ दिन रुक जाओ। कुछ मत करो। मुझे पहले एक काम ख़त्म करना है। उसके बाद, मैं ख़ुद तुम्हारे साथ खड़ा हूँगा। पर अभी नहीं। अभी बहुत नाज़ुक है सब।"

"कुछ दिन। ठीक है। पर एक शर्त, कियान। इन कुछ दिनों में तुम मुझसे कुछ नहीं छिपाओगे। जो भी हो, अच्छा या बुरा, मुझे बताओगे। हम अब एक टीम हैं, तुम चाहो या न चाहो। और टॉपर और लास्ट बेंच वाले की टीम कभी नहीं हारती।"

"टॉपर और लास्ट बेंच वाला। सुनने में तो किसी बहुत बुरी फ़िल्म का नाम लगता है। पहले हफ़्ते में ही फ़्लॉप।"

और नित्या हँस दी, और एक पल के लिए, उस पूरे डर के बीच, दोनों बस दो बच्चे थे, एक छत पर, एक-दूसरे को चिढ़ाते हुए। पर वो पल छोटा था। बहुत छोटा। क्योंकि कुछ ही देर में, वो काली गाड़ी गेट पर आने वाली थी, और उस हँसी को अपने साथ ले जाने वाली थी।

उस दोपहर, कियान को रुकने का मौक़ा ही नहीं मिला। कॉलेज के दफ़्तर से एक पर्ची आई। एक काली गाड़ी गेट पर खड़ी थी। और उसमें बैठे ड्राइवर ने बस इतना कहा, नागपाल साहब ने बुलाया है। अकेले।

और आधे घंटे बाद, कियान उसी शीशे की मीनार की चौदहवीं मंज़िल पर खड़ा था, उस आदमी के सामने जिसने उसके बचपन को राख कर दिया था। बड़ी खिड़की, नीचे पूरा शहर, और मेज़ के पीछे एक मुस्कुराता हुआ क़ातिल।

"आओ, आओ। देवनाथ का बेटा। बैठो। ... कितने साल हो गए, है न? आख़िरी बार तुम इतने ही छोटे थे, अपने बाप का हाथ पकड़े। और आज देखो, कितने बड़े हो गए। इतने बड़े कि मेरे पर्चे मेरे ही नाकों के नीचे हल करने लगे।"

"आपने मुझे बुलाया क्यों है, नागपाल साहब? मुझ जैसे नाकारा से आप जैसे बादशाह को क्या काम?"

"वो बुद्धू वाला नाटक मेरे सामने मत करो, कियान। मैं वो आदमी हूँ जिसने तुम्हें ये नाटक करना सिखाया, अनजाने में। ... मुझे सब पता है। समर। अंकित तिवारी। रौनक अग्रवाल। हर फ़र्ज़ी नाम, हर पर्चा, हर लिफ़ाफ़ा। तुम्हें क्या लगा, सिकंदर किसके लिए काम करता है?"

और कियान का ख़ून जम गया। वो परछाईं, जो सिकंदर के पीछे थी, जिसे उसने फ़ोन पर महसूस किया था, वो कोई और नहीं था। हर वो राज़ जो उसने सिकंदर को दिया था, हर वो काम जो उसने किया था, सब इसी मेज़ पर पहुँचता रहा था। बारह साल से वो उसी आदमी के लिए काम कर रहा था जिससे वो नफ़रत करता था।

"सिकंदर तुम्हारा आदमी है।"

"सिकंदर मेरा हाथ है, कियान। और तुम? तुम मेरी सबसे अच्छी चाल थे, बारह साल से। एक बरबाद मास्टर का बेटा, जो मेरे लिए पर्चे हल करता है, और सोचता है वो अपने बाप का कर्ज़ चुका रहा है। ... सच तो ये है कि तुम मेरा कर्ज़ चुका रहे थे। कितना प्यारा, है न?"

कियान की मुट्ठियाँ भिंच गईं। बारह साल की मेहनत, रोशनी की फ़ीस, हर रात की जागी हुई नींद, सब एक झटके में इस आदमी की एक चाल बन गई थी। उसका पूरा वादा, उसकी पूरी क़ुर्बानी, इस आदमी के मुनाफ़े का हिस्सा थी।

"तुमने मेरे पापा को बरबाद किया, और फिर उनके बेटे को अपना नौकर बना लिया। ... तुम इंसान नहीं हो, नागपाल।"

"इंसान भावुक होते हैं, कियान। और भावुक लोग हार जाते हैं। तुम्हारे बाप की तरह। ... अब सुनो, क्योंकि मैंने तुम्हें भाषण देने नहीं बुलाया। मैंने तुम्हें एक सौदा देने बुलाया है। और तुम्हारे पास मना करने का कोई रास्ता नहीं है।"

"एक बात बताओ, नागपाल। अगर तुम्हें बारह साल से सब पता था, तो तुमने मुझे तभी ख़त्म क्यों नहीं कर दिया? इतना लंबा इंतज़ार क्यों?"

"क्योंकि मरा हुआ दुश्मन बेकार होता है, कियान। और ज़िंदा दुश्मन? ज़िंदा दुश्मन मुनाफ़ा देता है। तुमने बारह साल मेरे लिए पर्चे हल किए, मेरा साम्राज्य बड़ा किया, और सोचते रहे कि तुम अपने बाप का बदला ले रहे हो। इससे मीठा मज़ाक और क्या होगा? ... एक मरा हुआ लड़का इतना काम नहीं आता। इसलिए मैंने तुम्हें ज़िंदा रखा। अब, जब तुम्हारा इस्तेमाल ख़त्म होने को है, अब तुम्हारी बारी है।"

और नागपाल ने मेज़ पर एक और फ़ाइल खिसकाई। उस पर लिखा था, नित्या सक्सेना। स्कॉलरशिप। मेरिट ट्रस्ट। और कियान का दिल एक पल को रुक गया।

"ये लड़की। जिसके लिए तुम्हारी आँखों में वो चमक आती है जो तुम छिपा नहीं पाते। इसका पूरा भविष्य, इसकी माँ की दवाई, इसका घर, सब एक काग़ज़ पर टिका है। और वो काग़ज़ मेरी जेब में है। मैं चाहूँ तो कल सुबह इसका वज़ीफ़ा हवा हो जाए, और इसे पता भी न चले कि किसने किया।"

"उसे इसमें मत घसीटो, नागपाल। उसका इस सब से कोई लेना-देना नहीं। तुम्हारी लड़ाई मुझसे है।"

"थी। अब उससे भी है। क्योंकि प्यार, कियान, सबसे मज़बूत ज़ंजीर होता है। तुम्हारे बाप को मैंने उसकी छत से बाँधा था। तुम्हें मैं इस लड़की से बाँधूँगा। ... तुम जितना उसे बचाना चाहोगे, उतना ही मेरे इशारों पर नाचोगे।"

और फिर नागपाल उठा, खिड़की के पास गया, और नीचे फैले शहर को देखते हुए, बहुत आराम से, वो अल्टीमेटम रखा जो कियान की पूरी दुनिया की गर्दन पर था।

"सुनो ध्यान से। एक, तुम अपने फ़ाइनल जान-बूझ कर फेल करोगे। बुरी तरह। ताकि इस लड़की की मेंटरशिप ख़त्म हो, इसका वज़ीफ़ा जाए, और ये टूट कर इस शहर से चली जाए, तुमसे दूर। दो, इसके बाद तुम इस शहर से ग़ायब हो जाओगे। हमेशा के लिए। कोई कियान नहीं रहेगा।"

"और अगर मैंने मना किया?"

"तीन। इन दोनों से पहले, तुम मेरे लिए एक आख़िरी काम करोगे। सबसे बड़ा। मैं तुम्हें उसका नाम वक़्त पर बताऊँगा। ये मेरा है, सिकंदर का नहीं। और तुम इसे मना नहीं करोगे। क्योंकि अगर तुमने कोई भी शर्त तोड़ी..."

और नागपाल पलटा, और पहली बार उसकी मुस्कान ग़ायब थी। सिर्फ़ बर्फ़ थी।

"...तो मैं एक ही चाल में सब कुछ जला दूँगा। मैं दुनिया को बताऊँगा कि प्रॉक्सी रैकेट का वो चेहरा, जिसे पूरा देश ढूँढ रहा है, देवनाथ मास्टर का बेटा है। तुम्हारे बाप का नाम दोबारा घोटाले में, इस बार और गंदा। और उसी दिन, नित्या का वज़ीफ़ा भी। दो नाम, एक तारीख़, एक ही आग। तुम्हारे पास फ़ाइनल तक का वक़्त है।"

और कियान वहाँ खड़ा रह गया, उस शीशे की मीनार पर, पूरे शहर के ऊपर, और फिर भी दुनिया के सबसे तंग पिंजरे में। एक तरफ़ उसके पापा का नाम। दूसरी तरफ़ नित्या का भविष्य। और बीच में वो, दोनों हाथों से दोनों को थामे, और नागपाल के हाथ में वो कैंची जो एक झटके में दोनों डोरें काट सकती थी।

"तुम एक चीज़ भूल रहे हो, नागपाल। मेरे पापा ने मुझे झुकना नहीं, वादा निभाना सिखाया था।"

"और वादे, कियान, राख के सबसे अच्छे ईंधन होते हैं। जाओ। घड़ी चल चुकी है।"

कियान जब उस मीनार से बाहर निकला, तो शाम ढल रही थी। और गेट पर, दूर, उसे एक जानी-पहचानी परछाईं दिखी। सान्या। वो उसे देख रही थी, फ़ोन कान से लगाए, और उसकी नज़रों में कुछ था, कुछ जो पहले नहीं था। एक नई वफ़ादारी। किसी और की।

और उसी शाम, कॉलेज की छत पर, नित्या अपनी उन किताबों के बीच बैठी थी जिनमें वो नागपाल के ख़िलाफ़ लड़ाई का नक़्शा बुन रही थी। उसे नहीं पता था कि जिस आदमी को वो गिराने का सपना देख रही थी, उसने अभी-अभी उसकी अपनी ज़िंदगी को एक अल्टीमेटम की मेज़ पर रख दिया था।

दो शिकार। एक जाल। और एक घड़ी, जो अब उलटी चलनी शुरू हो चुकी थी। कियान के पास फ़ाइनल तक का वक़्त था, एक ऐसा फ़ैसला लेने के लिए जिसमें हर रास्ता किसी न किसी को राख करता था। अपने पापा का नाम, या नित्या का भविष्य। नागपाल का जाल पूरा बुना जा चुका था। अब बस डोरी खिंचने की देर थी।

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