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अध्याय 20 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

नाम की लड़ाई

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

कियान की गिरफ़्तारी की अगली सुबह, पूरा कॉलेज एक अजीब सी ख़ामोशी में डूबा था। कुछ लोग अफ़सोस में सिर हिला रहे थे, कुछ चटख़ारे ले रहे थे। पर उस पूरी भीड़ में एक लड़की थी जो रुकी नहीं। नित्या, आँखें लाल, जबड़ा कसा हुआ, बग़ल में एक मोटी फ़ाइल दबाए, कॉरिडोर में तेज़ क़दमों से चल रही थी। उसने एक फ़ैसला किया था, इतिहास दोबारा नहीं होगा। उसकी नज़र के सामने तो हरगिज़ नहीं।

और वो सबसे पहले उस एक इंसान के पास गई जो इस पूरी मशीन को रोक भी सकती थी और चला भी सकती थी। प्रोफ़ेसर सभरवाल के दफ़्तर का दरवाज़ा नित्या ने बिना दस्तक दिए खोला।

"मैडम, आप उसे एक चोर मान कर छोड़ नहीं सकतीं। ... एक गवाह की गवाही और एक धुँधली तस्वीर, इसी पर पूरा फ़ैसला हो गया? उस लड़के का पक्ष किसी ने पूछा तक नहीं। ... मैं चार महीने से उसे पढ़ा रही हूँ, मैडम। मैं जानती हूँ वो क्या है, और वो नक़लची चोर नहीं है।"

"नित्या, मैं नियमों से बँधी हूँ। ट्रस्ट ने फ़ैसला दे दिया, दस्ते ने उसे हिरासत में ले लिया। वो लड़का ख़ुद भी तो कुछ नहीं बोला, उसने अपनी चुप्पी से मान लिया। ... मैं एक प्रोफ़ेसर हूँ, बेटा, कोई जादूगर नहीं। मैं क़ानून के आगे दीवार बन कर खड़ी नहीं हो सकती।"

"आप नियम की बात कर रही हैं, मैडम। मैं इंसाफ़ की बात कर रही हूँ। ... और आप दोनों को जानती हैं, इसीलिए आपकी आँखों में भी बेचैनी है। आपने भी उस लड़के को क़रीब से देखा है। दिल पर हाथ रख कर कहिए, क्या आपको सच में लगता है कि वो अकेला अपराधी है?"

और सभरवाल एक पल को चुप हो गई। क्योंकि नित्या ने ठीक उस जगह उँगली रखी थी जहाँ सभरवाल ख़ुद भी बेचैन थी। उसने बहुत से छात्र देखे थे, बहुत से घोटाले, बहुत सी सज़ाएँ। पर इस बार कुछ सीधा नहीं बैठ रहा था। ये कहानी बहुत साफ़-सुथरी थी, जैसे किसी ने इसे पहले से लिख कर रखा हो।

"मान लो मैं सुनना चाहती हूँ। ... तुम्हारे पास सबूत क्या है, नित्या? भावना सबूत नहीं होती। अगर तुम चाहती हो कि मैं इस पूरी मशीन के ख़िलाफ़ खड़ी हो जाऊँ, तो मुझे मेरे हाथ में कुछ ठोस दो। मुझे वो दो जो मैं ट्रस्ट के सामने रख सकूँ।"

और वहीं नित्या को अपनी लड़ाई की पहली शक्ल दिखी। सभरवाल को नियम नहीं, कहानी चाहिए थी। असली कहानी। और वो कहानी एक नाम में दबी थी जिसे बारह साल पहले मिटा दिया गया था। देवनाथ मास्टर। नित्या फ़ाइल उठा कर निकल पड़ी, शहर के उस कोने की तरफ़ जहाँ ये सब शुरू हुआ था।

शहर के सबसे पुराने मोहल्ले में, एक तंग गली के ऊपर, वो छत थी। कियान के बचपन की छत। और वहाँ नित्या के साथ एक नन्हा सा रहबर था, रोशनी, जो अपने भाई की गिरफ़्तारी से डरी हुई थी, पर आज उसका हाथ थामे नित्या को कुछ दिखाने लाई थी।

"दीदी, यहीं। यहीं पापा का स्कूल था। ... न कोई फ़ीस, न कोई कुर्सी, न कोई पंखा। बस ये छत, एक ब्लैकबोर्ड, और पूरे मोहल्ले के वो बच्चे जिनके पास कोचिंग के पैसे नहीं थे। ... पापा कहते थे, जिसके पास पैसे नहीं, उसके पास भी दिमाग़ होता है, और दिमाग़ को पढ़ने का हक़ है।"

और नित्या ने देखा। दीवार पर, बारह साल की बारिशों के बाद भी, चॉक के कुछ धुँधले निशान अब तक बचे थे। कुछ आधे-अधूरे सवाल, कुछ आड़े-तिरछे अक्षर। एक ऐसे आदमी की निशानी जिसने कभी अपने लिए एक ईंट नहीं जोड़ी, पर सैकड़ों बच्चों के दिमाग़ में एक-एक दीवार खड़ी कर दी।

गली के नुक्कड़ पर चाय बेचने वाला एक अधेड़ आदमी नित्या को उस छत पर देख कर रुक गया। उसने बताया कि वो कभी इसी छत पर पढ़ा था, मुफ़्त, जब उसके बाप के पास दो वक़्त की रोटी के भी पैसे नहीं थे। आज उसका अपना बेटा इंजीनियर है। और फिर उसने भर्राई आवाज़ में कहा कि मास्टरजी को चोर कहने वाले नहीं जानते, उस एक आदमी ने इस पूरे मोहल्ले की आधी छतों पर रौशनी की थी।

"दीदी, एक बात पापा हमेशा कहते थे, भैया को भी और मुझे भी। ... वो कहते थे, नाम वो नहीं होता जो लोग तुम्हें पुकारते हैं। नाम वो होता है जो तुम चुपचाप किसी और के लिए करते हो। ... लोग भूल जाएँगे कि तुमने क्या कमाया, पर वो कभी नहीं भूलेंगे कि तुमने किसी के अँधेरे में एक दीया जलाया था।"

और उस एक वाक्य में, नित्या को पूरी कहानी का दिल मिल गया। नाम कोई रैंक नहीं था। नाम कोई घोटाला नहीं था। नाम वो था जो तुम बिना किसी को बताए, बिना किसी इनाम की उम्मीद के, किसी और के लिए करते हो। और अगर ये सच है, तो देवनाथ मास्टर इस शहर के सबसे बड़े नामों में से एक थे। बस किसी ने उसे पुकारा नहीं था।

उधर कॉलेज में, एक और मोर्चा खुल रहा था, और उसका सेनापति बंटी था। मेस के बीचोंबीच एक बेंच पर चढ़ कर, कलछी को माइक की तरह पकड़े, वो पूरे हॉस्टल को ललकार रहा था।

"सुनो सब! जो लड़का आज चोर कहलाया जा रहा है, उसने पिछले साल रमेश की फ़ीस चुपचाप भरी थी, जब रमेश के बापू का एक्सीडेंट हुआ था! ... और वो जो जूनियर था, अंकुर, जिसे दद्दू रोज़ धमकाता था? उसे किसने बचाया था? ... तुम सबको जो नाकारा दिखता था, वो असल में इस पूरे हॉस्टल को चुपचाप कंधे पर उठाए घूम रहा था!"

और एक-एक कर के, छात्र सामने आने लगे। वो लड़का जिसकी परीक्षा से एक रात पहले कियान ने चुपके से पूरा पाठ समझा दिया था। वो जिसकी मेस की उधारी कियान ने बिना बताए चुका दी थी। वो नन्हे बच्चे, उसी छत वाले मुफ़्त स्कूल के, जिन्हें कियान बारह साल से चुपचाप, अपने पापा की जगह, ख़ुद पढ़ाता आया था। नित्या को अब समझ आया, कियान सिर्फ़ कर्ज़ नहीं चुका रहा था। वो अपने पापा का पूरा स्कूल ज़िंदा रखे हुए था।

"और सुनो! जिस दिन मेरे मेस सेक्रेटरी के चुनाव में पूरे हॉल में मेरे लिए एक भी ताली नहीं बजी थी, न, उस दिन भी सिर्फ़ इसी लड़के ने खड़े हो कर ताली बजाई थी, अकेले! ... भाइयों, ऐसा दोस्त चोर नहीं होता! ऐसा दोस्त हीरा होता है, बस दुनिया ने उसे बारह साल कोयले के ढेर में रख छोड़ा था!"

और वो अकेला बंटी नहीं था। नित्या ने वो सारी कहानियाँ, वो सारे चेहरे, एक-एक कर के जोड़ने शुरू किए। हॉस्टल के लड़के, छत वाले स्कूल के बच्चे, मोहल्ले के वो बूढ़े जिन्हें देवनाथ मास्टर ने कभी पढ़ाया था। एक अकेली लड़की, बिना किसी ताक़त, बिना किसी पैसे के, धीरे-धीरे पूरे शहर की सोई हुई याद को हिला रही थी।

"देखा, मैडम? ये रहा मेरा सबूत। ... कोई काग़ज़ नहीं, कोई रसीद नहीं। ये सब चेहरे। हर एक चेहरा एक ऐसे इंसान का है जिसे उस लड़के ने चुपचाप बचाया, बिना किसी को बताए। ... आप एक ऐसे आदमी को चोर कहेंगी जिसने पूरी उम्र सिर्फ़ देना जाना?"

और सभरवाल, जो चुपचाप पीछे खड़ी सब देख रही थी, आख़िर पिघल गई। उसने बारह साल की पुरानी फ़ाइलें ख़ुद निकलवाईं, देवनाथ मास्टर वाले उस घोटाले की। और जितना उसने पढ़ा, उतना ही उसे साफ़ दिखा कि उस कहानी में कुछ गहरे तक सड़ा हुआ था।

"मैं इस लड़के के साथ खड़ी हूँ, नित्या। ... मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी नियमों को इंसाफ़ समझने की ग़लती की। तुमने मुझे फ़र्क़ दिखा दिया। ... पर एक बात याद रखना, ये लड़ाई तुम अकेली नहीं जीत सकतीं। जब तक वो लड़का ख़ुद खड़ा हो कर नहीं लड़ेगा, दुनिया की कोई गवाही उसे नहीं बचा सकती। उसे उसकी चुप्पी से निकालो।"

और वो चुप्पी, उस वक़्त, शहर के दूसरे कोने में एक ठंडी, नीली दीवारों वाली कोठरी में बैठी थी। कियान अकेला था, घुटनों पर हाथ रखे, फ़र्श को ताकते हुए। बारह साल की गुमनामी का आख़िरी पड़ाव, एक हिरासत की कोठरी। नित्या को उससे मिलने की इजाज़त बस कुछ मिनटों की मिली थी, एक लोहे की जाली के आर-पार।

"कियान, मेरी तरफ़ देखो। ... तुम्हें लगता है तुम अकेले हो? पूरा हॉस्टल तुम्हारे लिए खड़ा है। बंटी मेस पर भाषण दे रहा है। सभरवाल मैडम ने पुरानी फ़ाइलें खुलवा दी हैं। और तुम्हारे पापा के वो सारे बच्चे, वो पूरी छत वाली पाठशाला, सब तुम्हारा नाम ले रहे हैं। ... तुम गुमनाम रहना चाहते थे न? माफ़ करना, अब तुम गुमनाम नहीं हो।"

"और यही तो डर है, नित्या। ... अगर मैं खड़ा हो गया, अगर मैंने खुले आम कहा कि हाँ, मैं ही समर था, अंकित था, रौनक था, तो मैं अपने पापा का वो वादा तोड़ दूँगा। गुमनाम रहो। नाम को घोटाले से बचाओ। ... मैं अपने पापा से किया आख़िरी वादा कैसे तोड़ दूँ?"

"तुम्हारे पापा ने तुमसे नाम बचाने को कहा था, कियान। छुपने को नहीं। ... रोशनी ने मुझे तुम्हारे पापा की एक बात बताई। नाम वो नहीं जो लोग पुकारते हैं, नाम वो है जो तुम चुपचाप किसी के लिए करते हो। ... और वो नाम अभी, इसी पल, इस चुप्पी में मर रहा है, कियान। तुम्हारी ख़ामोशी उसे बचा नहीं रही, वो उसे दफ़ना रही है।"

और यहीं, उस लोहे की जाली के आर-पार, बारह साल पुराना वो वादा दो टुकड़ों में बँट गया। एक तरफ़ था वादे का अक्षर, गुमनाम रहो, छुपे रहो। और दूसरी तरफ़ थी उसकी रूह, नाम को बचाओ। और आज पहली बार कियान को साफ़ दिखा कि वो दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े थे। अक्षर बचाता, तो रूह मर जाती।

"तो मैं वादा तोड़ दूँ? ... अपने मरते पापा का आख़िरी लफ़्ज़? ... नित्या, वो लफ़्ज़ ही तो अकेली चीज़ है जो अब भी मेरे पापा की ज़िंदा है। अगर मैंने वो भी तोड़ दिया, तो मेरे पास उनका बचा क्या रहेगा?"

"उनका नाम बचेगा, कियान। साफ़, ऊँचा, सबके सामने। ... तुम्हारे पापा ने तुमसे एक शब्द माँगा था, पर उसके पीछे उनका दिल एक ही चीज़ चाहता था, कि उनका बेटा किसी दिन सिर उठा कर जी सके। छुप कर नहीं। ... क्या तुम्हें सच में लगता है कि वो चाहते कि उनका बेटा उनके नाम की तरह, एक अँधेरी कोठरी में दफ़न हो जाए?"

"रोशनी... आज स्कूल में उसे चोर की बहन कहा गया, नित्या। ... मैं बारह साल इसीलिए छुपा रहा, कि उस पर कभी ये दाग़ न आए। और मेरी उसी चुप्पी ने उसे ठीक वही दाग़ दे दिया। ... अगर मैं अब भी चुप रहा, तो वो पूरी उम्र एक चोर की बहन कहलाएगी। ... और ये, नित्या, ये मैं किसी भी क़ीमत पर होने नहीं दूँगा।"

"तो फिर उठो, कियान। रोशनी के लिए। अपने पापा के लिए। और हाँ, एक बार अपने लिए भी। ... मैं बाहर हूँ, पूरी फ़ौज के साथ खड़ी। पर उस फ़ौज को एक सेनापति चाहिए, और वो सिर्फ़ तुम हो। ... बहुत छुप लिए, कियान। अब और मत छुपो।"

और कियान की आँखों के सामने बारह साल पुरानी वो शाम घूम गई। पापा, बिस्तर पर, टूटे हुए, पर आँखों में अब भी वही नरमी। और उन्होंने वादा माँगते हुए क्या कहा था, कियान ने पहली बार पूरा सुना। उन्होंने कहा था, बेटा, अपना सिर कभी झूठ के आगे मत झुकाना। और आज, इस कोठरी में सिर झुका कर बैठे रहना, वही तो झूठ के आगे झुकना था।

"बहुत हो गया, नित्या। ... बारह साल। बारह साल मैं एक बुद्धू का मुखौटा पहने, अँधेरे में, चुपचाप छुपता रहा। और उस चुप्पी ने मुझे यहाँ, इस कोठरी तक पहुँचाया। ... मेरे पापा ने मुझसे गुमनाम रहने को कहा था ताकि नाम बचे। पर अगर नाम बचाने के लिए मुझे रौशनी में आना पड़े, तो मैं आऊँगा। ... मैं ये वादा तोड़ूँगा, ताकि उसकी रूह बचा सकूँ।"

"मतलब... कियान, तुम समझ रहे हो न कि तुम क्या कह रहे हो? ... एक बार तुम बाहर आ गए, एक बार दुनिया ने देख लिया कि तुम कौन हो, तो कोई मुखौटा नहीं बचेगा, कोई छुपने की जगह नहीं। नागपाल तुम पर पूरी ताक़त से टूट पड़ेगा।"

"पड़ने दो। ... बारह साल से मैं उसकी माँद में एक चूहे की तरह छुपा बैठा था। अब मैं उसकी माँद में शेर बन कर घुसूँगा। ... कोई और नाम नहीं, नित्या। कोई समर नहीं, कोई रौनक नहीं। इस बार मैं अपने ही नाम से लड़ूँगा। कियान। देवनाथ मास्टर का बेटा। ... और पूरा शहर देखेगा कि लास्ट बेंच वाला असल में क्या है।"

और उस ठंडी कोठरी में, लोहे की जाली के पीछे, एक लड़के ने वो फ़ैसला किया जो उसने पूरी ज़िंदगी टाला था। जिसने बारह साल ख़ुद को मिटाए रखा, उसने आख़िरकार दिखाई देने का फ़ैसला किया। पिता के वादे का अक्षर उस पल टूट गया, पर उसकी रूह, पहली बार, साँस लेने लगी। लास्ट बेंच वाला अँधेरे से निकलने वाला था, और उसके साथ, बारह साल का दबा हुआ एक नाम भी।

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