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Chapter 11 of 25 12 min read

झूठ का पहाड़

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

उस अख़बार की तस्वीर पूरे शहर की दीवारों पर चिपकी थी। चाय की दुकानों पर, बस के पीछे, टीवी की हर ब्रेकिंग न्यूज़ पर। एक धुँधला चेहरा, और नीचे मोटे अक्षरों में एक ही सवाल, ये कौन है?

और कॉलेज के पीछे, एक सुनसान कोने में, कियान उसी तस्वीर को घूर रहा था। हाथ में फ़ोन काँप रहा था। क्योंकि वो जानता था, वो धुँधला चेहरा एक दिन साफ़ हो जाएगा। और उस दिन, सब ख़त्म।

"सिकंदर भाई, मैं बाहर हूँ। आज से, अभी से। तुमने वो तस्वीर देखी? पूरा देश उसे ढूँढ रहा है, और वो तस्वीर मेरी है। पैसा आ गया, धनराज का कर्ज़ उतर गया। बात ख़त्म। अब न कोई काम, न कोई नाम। मैं मर गया तुम्हारे लिए, याद है?"

और फ़ोन के दूसरी तरफ़, सिकंदर की आवाज़ में आज वो मख़मल नहीं थी। आज सिर्फ़ लोहा था। उसने बहुत धीरे, बहुत ठंडे से कहा कि इस धंधे में आदमी तब नहीं निकलता जब वो चाहे, तब निकलता है जब काम पूरा हो। और अभी एक काम बाक़ी है।

"कौन सा काम? हमारा सौदा ख़त्म हो गया, सिकंदर भाई! तुमने वादा किया था, आख़िरी बार! ... और ये 'काम पूरा होने' का फ़ैसला तुम कब से करने लगे? तुम तो कहते थे इस धंधे में तुम्हारे ऊपर कोई नहीं। तो ये किसका काम है? किसका हुक्म है?"

एक पल के लिए फ़ोन पर ख़ामोशी छा गई। और उस ख़ामोशी में कियान ने पहली बार एक परछाईं महसूस की। सिकंदर के पीछे कोई और था। कोई बड़ा। कोई जो सिकंदर को भी चलाता था। फिर सिकंदर हँसा, और फ़ोन काट दिया।

और कियान वहीं खड़ा रह गया, फ़ोन कान से लगाए, एक कटी हुई लाइन सुनते हुए। बारह साल से वो जिस पिंजरे को अपना घर समझता आया था, आज उसे पहली बार उसकी सलाख़ें दिखीं। और वो सलाख़ें किसी और के हाथ में थीं।

और भाग भी कहाँ सकता था वो। उसने रोशनी के बारे में सोचा। अगर वो अभी सब छोड़ कर ग़ायब हो जाता, तो सिकंदर, या उसके पीछे की वो परछाईं, सबसे पहले रोशनी तक पहुँचती। एक अनाथ बच्ची, एक बरबाद नाम। नहीं। कियान भाग नहीं सकता था। उसे इसी पिंजरे में, इन्हीं सलाख़ों के बीच खड़े हो कर लड़ना था। और अकेले।


उसी शाम, छत वाली उसी तपरी पर, जहाँ कभी उन्होंने एक समोसे पर साथ हँसा था, नित्या खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी। पर आज उसके हाथ में चाय नहीं थी। आज उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।

एक टॉपर की फ़ाइल। तारीख़ों की, नंबरों की, तस्वीरों की। पिछले कुछ हफ़्तों में उसने हर टुकड़ा जोड़ा था, जैसे कोई सबसे कठिन सवाल हल करता है। और अब उसे लगता था कि उसके पास जवाब है। ग़लत जवाब, पर पूरे यक़ीन के साथ।

"मैडम? आज पढ़ाई का मूड नहीं लग रहा। और ये फ़ाइल... लगता है आज मेरी नहीं, मेरी किसी अदालत की क्लास है।"

"बैठ जाओ, कियान। आज मैं तुम्हें पढ़ाने नहीं आई। आज मैं तुम्हें बताने आई हूँ कि मैंने तुम्हें हल कर लिया है। पूरा। और मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि जवाब क्या निकला।"

और उसने फ़ाइल खोली। एक-एक करके। जैसे कोई सबूत मेज़ पर रखता है।

"पहला, तुम बुद्धू नहीं हो। तुम जान-बूझ कर फेल होते हो। तुम्हारे बयालीस नंबर बनाए हुए हैं, गढ़े हुए। दूसरा, ये 'समर' वाला काग़ज़, देश के सबसे कठिन सवाल का बेदाग़ हल, तुम्हारी छिपाई हुई लिखावट में। तीसरा, तुम उस दिन दो सौ किलोमीटर दूर एक इम्तिहानी शहर में थे, जिस दिन तुम कॉलेज से ग़ायब थे।"

"वाह मैडम। आपने तो मुझ पर पूरी थीसिस लिख दी। मैं तो सोच रहा था, इतना ध्यान तो मुझ पर मेरी माँ ने भी नहीं दिया होगा।"

"मज़ाक मत करो! ... चौथा, मैंने तुम्हें उस अँधेरी गली में देखा है, कियान। उस सोने की अँगूठियों वाले ख़तरनाक आदमी के साथ। मैंने सुना है, पर्चा, नाम, पैसा, पंद्रह लाख। और पाँचवाँ..."

उसने फ़ाइल से वो आख़िरी काग़ज़ निकाला। अख़बार की वो धुँधली तस्वीर, जिसे पूरा देश ढूँढ रहा था। और उसे कियान के चेहरे के सामने रख दिया।

"और पाँचवाँ, ये। ये तुम हो, कियान। मत कहना कि नहीं। मैं तुम्हारी चाल पहचानती हूँ, तुम्हारे कंधे, तुम्हारी झुकी हुई गर्दन। तुम एक प्रॉक्सी रैकेट का हिस्सा हो। तुम पैसे के लिए दूसरों के नाम पर इम्तिहान देते हो। तुम एक... एक धोखेबाज़ हो।"

वो शब्द, धोखेबाज़, कियान के सीने में एक कील की तरह घुसा। क्योंकि वो सच का सिर्फ़ आधा हिस्सा था, और आधा सच पूरे झूठ से भी ज़्यादा चुभता है।

"तुमने बहुत मेहनत की है, मैडम। पर तुम एक टॉपर हो न, तुम्हारी एक ख़राबी है। तुम्हें लगता है हर सवाल का एक ही जवाब होता है, और वो जवाब हमेशा किताब के पीछे छपा होता है। ज़िंदगी वैसी नहीं होती। कभी-कभी सही जवाब भी ग़लत दिखता है।"

"तो समझाओ मुझे! बताओ कि मैं ग़लत हूँ! मैं यहाँ खड़ी हूँ, कियान, हाथ में तुम्हारी बरबादी की फ़ाइल लिए, और फिर भी मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे ग़लत साबित कर दो। एक लफ़्ज़ बोलो जो मेरे इस सबूत को झूठा कर दे। बस एक।"

और यही तो कियान की सबसे बड़ी सज़ा थी। वो एक लफ़्ज़ था। सच। पर वो सच नित्या को बचाता नहीं, उसे भी इस आग में खींच लेता। अगर वो बताता कि वो एक चोर नहीं, एक बरबाद बाप का बेटा है, जो एक वादा निभा रहा है, तो नित्या भी उस राज़ की हिस्सेदार बन जाती, और नागपाल की अगली शिकार।

"मेरे पास कोई लफ़्ज़ नहीं है, नित्या।"

"क्यों नहीं है?! ... कियान, मैंने तुम्हारे लिए झूठ बोला। प्रोफ़ेसर सभरवाल के मुँह पर। मैंने अपनी साख, अपनी पूरी ईमानदारी, एक ऐसे लड़के के लिए दाँव पर लगा दी जिसे मैं जानती तक नहीं। मैंने अपनी माँ का घर उस कागज़ पर रख दिया जिस पर तुम्हारी क्षमता का दावा लिखा है। और तुम... तुम मुझे एक लफ़्ज़ के लायक़ भी नहीं समझते?"

और नित्या की आँखें भर आईं। ये सिर्फ़ ग़ुस्सा नहीं था। इसके नीचे कुछ और था, कुछ जिसे वो ख़ुद मानने को तैयार नहीं थी। और वही चीज़ इस चोट को इतना गहरा बना रही थी।

और कियान, जो उसे सब कुछ बता देना चाहता था, जो चीख कर कहना चाहता था कि नित्या, मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझ रही हो, बस उसे देखता रहा। उसके आँसू देखता रहा। और अंदर ही अंदर टूटता रहा।

"नित्या... अगर मैं तुम्हें बता दूँ, तो तुम भी नहीं बचोगी। इस सच का बोझ इतना भारी है कि जो भी इसे उठाएगा, दब जाएगा। और मैं... मैं तुम्हें उसमें नहीं..."

"तो हम दोनों मिल कर उठाएँगे उसे, कियान। मैं कमज़ोर नहीं हूँ। मैंने ज़िंदगी में हर बोझ अकेले उठाया है। तुम बस मुझे सच दे दो, बाक़ी मैं सँभाल लूँगी। एक बार, बस एक बार, मुझ पर भरोसा करके देखो।"

और एक पल के लिए, कियान का मुखौटा हिला। एक पल के लिए वो सच उसकी ज़बान की नोक तक आ गया, नित्या, मैं देवनाथ मास्टर का बेटा हूँ, और ये सब एक वादे के लिए है। पर तभी उसे नागपाल की वो लाइन याद आई, बस एक लफ़्ज़, और सब राख। और उसने वो सच वापस निगल लिया, ज़हर की तरह। क्योंकि नित्या को बचाने के लिए, उसे नित्या को खोना था।

और उसी पल, कियान ने एक फ़ैसला लिया। दुनिया का सबसे ज़ालिम फ़ैसला। क्योंकि वो जानता था, नित्या जितनी उसके पास रहेगी, उतनी ख़तरे में रहेगी। वो जाँच, वो तस्वीर, वो परछाईं, सब उसके पास आ रहे थे। और अगर वो पास रही, तो वो भी उसमें डूब जाएगी।

तो कियान ने वो किया जो उसे सबसे अच्छा आता था, पर जो उसने आज तक नित्या के साथ कभी नहीं किया था। उसने झूठ बोला। एक ऐसा झूठ, जो बचाने के लिए नहीं, चोट पहुँचाने के लिए गढ़ा गया था। ताकि वो उससे नफ़रत करे। ताकि वो दूर भागे। ताकि वो बच जाए।

"ठीक है। तुम सच सुनना चाहती हो? ये लो। हाँ, मैं वही हूँ जो तुम समझ रही हो। एक धोखेबाज़। मैं पैसे के लिए ये सब करता हूँ, और अच्छा करता हूँ। और तुम? तुम मेरी सबसे अच्छी चाल थीं, नित्या। एक टॉपर, जो मुझ पर भरोसा करती है, उससे बेहतर मुखौटा क्या होगा।"

"क्या?"

"तुम्हारे वो दस्तख़त, तुम्हारा वो झूठ सभरवाल के सामने, वो मेरी ढाल थी, नित्या। तुमने सोचा तुम मुझे बचा रही हो? तुम मेरे काम आ रही थीं। और अब जब तुम्हें सच पता चल गया, तो तुम्हारा फ़ायदा भी ख़त्म। इसलिए ये ट्यूशन, ये मेंटरशिप, ये सब आज ख़त्म। मुझे अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं।"

हर लफ़्ज़ नित्या के चेहरे पर एक थप्पड़ की तरह पड़ा। वो पीछे हटी, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो। समोसा, वो साझा हँसी, वो 'तुम बुद्धू नहीं हो' वाला पल, सब एक झटके में झूठ लगने लगा।

"वो समोसा भी एक चाल थी? वो हँसी भी? ... वाह, कियान। तुम सच में इस कॉलेज के सबसे होशियार लड़के हो। बस अफ़सोस इतना है कि तुमने अपनी सारी होशियारी लोगों का भरोसा तोड़ने में लगा दी।"

और कियान, जो हर लफ़्ज़ के साथ अंदर से मर रहा था, अपने चेहरे को पत्थर बनाए रहा। ये उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी एक्टिंग थी, और सबसे दर्दनाक। क्योंकि इस बार वो बुद्धू होने का नाटक नहीं कर रहा था। इस बार वो एक बेदर्द इंसान होने का नाटक कर रहा था। और वो नाटक उसे भीतर से चीर रहा था।

"तो ये थी असलियत। ... मैं तुम्हें इंसान समझती रही। और तुम मुझे सिर्फ़ एक मोहरा समझते रहे। ... ठीक है, कियान। बहुत अच्छे। तुमने मुझे मेरी सबसे बड़ी ग़लती दिखा दी।"

और उस पल, नित्या के अंदर भी कुछ बदल गया। आँसू सूख गए, और उनकी जगह एक ठंडी, टूटी हुई सख़्ती ने ले ली। वो एक टॉपर थी, एक जीने वाली लड़की, जिसकी अपनी माँ, अपना घर, अपना भविष्य था। और उसे बचाने का अब सिर्फ़ एक रास्ता था।

"तुमने मेंटरशिप ख़त्म कर दी। ठीक है। पर तुम भूल गए, कियान, कि इस मेंटरशिप पर मेरी स्कॉलरशिप टिकी थी। तुमने मुझे एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया, अब मैं तुम्हें अपनी ढाल बनाऊँगी। मैं कल ट्रस्ट के पास जाऊँगी। मैं उन्हें सब बताऊँगी। ये तस्वीर, ये रसीदें, सब। ताकि साबित हो जाए कि मैंने अपनी तरफ़ से कोशिश की, कि दोष तुम्हारा है, मेरा नहीं। ताकि मेरा वज़ीफ़ा बच जाए।"

और कियान का दिल रुक गया। क्योंकि नित्या को नहीं पता था कि वो ट्रस्ट किसका है। उसे नहीं पता था कि उस फ़ाइल के साथ वो सीधे नागपाल के मुँह में चल पड़ेगी। उसने कियान को दूर भगाने के लिए झूठ बोला था, और अब वही झूठ उसे उस आदमी की तरफ़ धकेल रहा था जो कियान को सबसे ज़्यादा डराता था।

"नित्या, रुको। ट्रस्ट के पास मत जाना। ये एक चीज़ मत करना। तुम नहीं जानतीं वो लोग कौन हैं, तुम..."

"अब तुम्हें मेरी फ़िक्र होने लगी? अभी तो मैं तुम्हारा मोहरा थी। तय कर लो, कियान। या तो तुम्हें मेरी परवाह है, या नहीं। और तुम्हारा जवाब मैंने अभी-अभी सुन लिया।"

और कियान के पास फिर वही एक लफ़्ज़ नहीं था। क्योंकि उसे रोकने के लिए उसे सच बताना पड़ता, और सच बताना उसे और भी गहरे इसी गड्ढे में गिरा देता। वो अपनी ही चाल में फँस गया था। अपने ही झूठ के पहाड़ के नीचे दबा हुआ।

और वहाँ, उस छत पर, जहाँ कभी दो लोग एक समोसे पर हँसे थे, अब दो लोग खड़े थे, एक-दूसरे को बचाने और तोड़ने के फ़ैसले लिए हुए। कियान ने उसे दूर भगाने का फ़ैसला किया था, ताकि वो सुरक्षित रहे। और नित्या ने उसे रिपोर्ट करने का, ताकि वो ख़ुद बच जाए। दोनों सही। दोनों ग़लत। दोनों अकेले।

"अलविदा, कियान। तुम सच में बहुत होशियार हो। तुमने सबको बेवक़ूफ़ बनाया, मुझे भी। पर एक बात याद रखना। मैं भी होशियार हूँ। और मैं अपने भविष्य को तुम्हारे झूठ के लिए नहीं जलने दूँगी।"

और वो सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ी। कियान ने उसे पुकारना चाहा, रोकना चाहा, सब बता देना चाहा। पर उसका गला घुट गया, और उसका वादा उसके पैरों में ज़ंजीर बन गया। वो बस देखता रहा, जैसे उसकी आँखों के सामने उसकी दुनिया सीढ़ियाँ उतर रही हो।

नित्या सक्सेना, हाथ में एक फ़ाइल लिए, कल सुबह ट्रस्ट के पास जाने वाली थी। उसे बचाने के लिए। और उसे नहीं पता था कि वो जिस दरवाज़े को खटखटाने जा रही थी, उसके पीछे यशपाल नागपाल बैठा था, बारह साल से उसी पल का इंतज़ार करता हुआ। झूठ का पहाड़ अब गिरने वाला था। और उसके नीचे दोनों दबे थे।

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