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अध्याय 23 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

इंसाफ़ की घंटी

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

आग का अलार्म पूरी मीनार में चीख़ रहा था। सबसे ऊँची मंज़िल पर घना अँधेरा था, और उस अँधेरे में तीन मोबाइल की रोशनियाँ एक साथ जागीं, काँपती हुई, एक-दूसरे को टटोलती हुई।

पहली रोशनी नित्या के हाथ में थी। उसने रोशनी को अपने सीने से चिपका रखा था, दोनों सही-सलामत, मेज़ के पीछे दुबकी हुई। दूसरी रोशनी सान्या के पास थी, जो घुटनों के बल बैठी थी, वो अधजली फ़ाइल अपने दुपट्टे में कस कर लिपटी हुई। और जब तीसरी रोशनी फ़र्श पर पड़ी, तो वहाँ, गिरे हुए धातु के टोकरे के पास, एक ढेर सा पड़ा था। ... नागपाल।

"रोशनी मेरे पास है... साँस ले, बच्ची, तू महफ़ूज़ है। ... सान्या? ... सान्या, बोल, तू ठीक है? वो चीख किसकी थी?"

"मैं ठीक हूँ... हाथ थोड़ा जला है, पर फ़ाइल बच गई, नित्या। ... आधी राख हो गई, फिर भी मेरे पास है। ... और वो चीख... वो नागपाल था। अँधेरे में फ़ाइल छीनने झपटा, और गिर पड़ा।"

अँधेरे में, फ़ाइल की तरफ़ अंधाधुंध लपकते हुए, नागपाल का पैर उसी गिरे हुए भारी टोकरे में उलझ गया था। उसका सिर मेज़ के कोने से टकराया, और वो चीख जो अँधेरे में उठी थी, उसी झटके में कट गई। तीस साल का बादशाह, अपनी ही मीनार के फ़र्श पर पड़ा था।

वो साँस ले रहा था। कनपटी पर एक चोट, एक टाँग बेढंगी मुड़ी हुई, पर ज़िंदा। अलार्म की आवाज़ पर नीचे से दौड़े आए गार्डों ने उन्हें इसी हाल में पाया, तीन लड़कियाँ, एक बच्ची, एक जली हुई फ़ाइल, और फ़र्श पर पड़ा एक टूटा हुआ आदमी।

जिन दो आदमियों ने रोशनी को उठाया था, वो अफ़रा-तफ़री में निकल भागने की कोशिश करते रहे, पर अलार्म ने पूरी मीनार सील कर दी थी। गार्डों ने उन्हें सीढ़ियों में ही धर दबोचा। और रोशनी, अपनी नित्या दीदी की बाँहों में, आख़िरकार महफ़ूज़ थी।

"वो फ़ाइल... मुझे दो... वो मेरी है... तुम सब... तुम सब बरबाद हो जाओगे..."

"अब कुछ भी तुम्हारा नहीं रहा, नागपाल। ... न ये फ़ाइल, न ये शहर, न मैं। ... जिस लड़की को तुमने सबसे कमज़ोर, सबसे बिकाऊ मोहरा समझा था, तुम्हारी पूरी सल्तनत आज उसी के जले हुए दुपट्टे में लिपटी पड़ी है।"

और जब तक सुबह की पहली रोशनी उस मीनार के शीशों पर पड़ी, नागपाल का गिरना किसी अँधेरे कमरे का राज़ नहीं रह गया था। सान्या की भेजी नक़लें एक शाम पहले ही शिक्षा बोर्ड और तीन अख़बारों तक पहुँच चुकी थीं। सच अब उस कमरे से बहुत बाहर निकल चुका था।

सुबह के अख़बार में, बारह साल से दबा हुआ एक नाम, पहले पन्ने पर छपा था। देवनाथ मास्टर। एक चोर के तौर पर नहीं। बल्कि उस आदमी के तौर पर, जिसे कोचिंग के बादशाह ने अपने धंधे को बचाने के लिए झूठा फँसाया था।

और उसी सुबह, हिरासत की उस ठंडी कोठरी का दरवाज़ा खुला। केस दोबारा खुल चुका था, सबूत सबके सामने था, असली गुनहगार बेनक़ाब हो चुका था। अब देवनाथ के बेटे को रोकने की कोई ज़मीन बाक़ी नहीं थी। कियान रोशनी में निकला, इस बार अपने ही चेहरे के साथ।

"कियान... ये देख। ... आधी जली है, पर जो लाइन चाहिए थी, वो साफ़ बची है। तेरे पापा के दस्तख़त के नीचे, नागपाल का अपना असली हुक्म, अपनी ही स्याही में। ... बारह साल बाद, ये अधजला काग़ज़ आख़िरकार सच बोलेगा।"

"बारह साल, नित्या। ... मैं इस एक काग़ज़ के लिए बुद्धू बना रहा। क्लास में सोता रहा, ग़लत जवाब देता रहा, थप्पड़ खाता रहा। ... और आज वो मेरी हथेली पर है। आधा जला हुआ। ठीक मेरे पापा की तरह, आधा टूटा, पर मिटा नहीं।"

और बारह साल में पहली बार, कियान ने अपना चेहरा नहीं छुपाया। उसने नित्या को अपने आँसू देखने दिए। जो लड़का आख़िरी बेंच पर, थप्पड़ खा कर भी, कभी नहीं रोया था, वो आज अपने पिता का नाम हाथ में लिए रो पड़ा।

इंसाफ़ की घंटी अब तेज़ी से बजी। दोपहर होते-होते शिक्षा बोर्ड ने नागपाल की सारी कोचिंग की मान्यता रद्द कर दी। पुलिस ने दो मामले खोले, रैंक बेचने का रैकेट, और बारह साल पुराना दोबारा खुला फंदा। जिस सल्तनत ने इस शहर का डर ख़रीद रखा था, वो ईंट-ईंट कर के गिरने लगी।

अस्पताल के बिस्तर से नागपाल ने अपने वकीलों को बुलाना चाहा, अपने ख़रीदे हुए आदमियों को। पर जो लोग कल तक उससे थरथराते थे, आज उसका फ़ोन तक नहीं उठा रहे थे। और वो छात्र, जिन्हें उसने बरसों रैंक की धमकी से चुप करा रखा था, एक-एक कर के आगे आने लगे। सिकंदर भी अपने हिस्से के जुर्म का सामना करने क़ानून के सामने खड़ा था। बादशाह अब भी था, पर उसका दरबार उठ चुका था।

"मैं तीस साल में पहली बार ये कह रही हूँ। ... आज इस कॉलेज ने एक छात्र को नहीं, एक सच्चाई को पास किया है। ... देवनाथ मास्टर का नाम, आज से, इस शहर के रिकॉर्ड में एक बेगुनाह का नाम है। और उनका बेटा, इसी हॉल में, बराबरी के एक इंसान की तरह खड़ा है, किसी नौकर या मुजरिम की तरह नहीं।"

और उस शाम, पुराने मोहल्ले की उसी छत पर, जहाँ कभी एक ग़रीब मास्टर बिना एक पैसा लिए शहर के सबसे ग़रीब बच्चों को पढ़ाता था, लोग जमा हुए। वो बड़े हो चुके आदमी, जो कभी उसी छत पर नंगे पैर बैठ कर पढ़े थे। उन्होंने वहाँ एक दीया जलाया। नागपाल ने जिस मुफ़्त पाठशाला को दफ़ना दिया था, वो एक शाम के लिए, फिर से रोशनी से भर उठी।

पर इंसाफ़ की घंटी एक तरफ़ नहीं बजती। कियान ने अपने पिता का नाम तो साफ़ कर दिया था। पर अब उसे अपना हिसाब भी देना था। क्योंकि समर, अंकित, रौनक, वो असली जुर्म थे, वजह चाहे जो भी रही हो। नाम साफ़ करने वाला अपना दामन ख़ुद मैला नहीं रख सकता था।

"मैं यहाँ माफ़ी माँगने नहीं, हिसाब देने आया हूँ। ... मैंने फ़र्ज़ी नामों से देश की परीक्षाएँ हल कीं। ये ग़लत था, चाहे मेरी मजबूरी कोई भी रही हो। ... मैं भागूँगा नहीं, न छुपूँगा। जो सज़ा बनती है, मैं लूँगा। और उस मशीन से मैंने जो पैसा कमाया, उसका एक-एक रुपया लौटाऊँगा।"

और फिर उसने वो किया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। बारह साल का जमा किया हुआ पैसा, वो पूरा ज़ख़ीरा जो उसने उसी रैकेट के अंदर बैठ कर बनाया था, उसमें से उसने अपने लिए एक पाई भी नहीं रखी। उसने वो सब बोर्ड के सामने रख दिया, उन छात्रों को लौटाने के लिए जिन्हें इस मशीन ने ठगा था।

"बोर्ड ने फ़ैसला किया है। ... तुमने जुर्म किया, ये सच है। पर तुम्हें बचपन में इसी मशीन ने शिकार बनाया, ये भी उतना ही सच है। और उसी मशीन को गिराने वाला भी तुम्हीं हो। ... तुम जेल नहीं जाओगे, कियान। पर अगले दो साल, तुम इस शहर के उन बच्चों को मुफ़्त पढ़ाओगे, जिनसे इस तंत्र ने उनका हक़ छीना। ... इसे सज़ा मत समझना। इसे कर्ज़ उतारना समझना।"

और वो हॉल, जो बारह साल पहले एक मास्टर पर हँसा था, और बारह हफ़्ते पहले एक बुद्धू पर, आज ख़ामोश था। डर की ख़ामोशी नहीं। इज़्ज़त की ख़ामोशी। आख़िरी बेंच वाले लड़के ने वो इज़्ज़त सबसे मुश्किल तरीक़े से कमाई थी, खुले में, अपने ही नाम से।

उसी सुबह नित्या ने उस छोटे से शहर में अपनी माँ को फ़ोन किया। हफ़्तों बाद पहली बार, उस अकेली औरत की आवाज़ में डर नहीं था। जिस हाथ ने कल तक उस घर तक धमकी पहुँचाई थी, वो हाथ अब ख़ुद एक अस्पताल के बिस्तर पर बेबस पड़ा था। नित्या की पूरी दुनिया, आख़िरकार, महफ़ूज़ थी।

और बाहर, सान्या सबसे अलग खड़ी थी, ये तय नहीं कर पा रही कि वो इस जीत में शामिल होने के क़ाबिल है भी या नहीं। नित्या उसके पास गई।

"सान्या। ... कल रात तूने वो फ़ाइल अपने ही दुपट्टे में बुझाई, अपने हाथ जला कर। ... तू कभी मेरी दुश्मन नहीं थी। तू बस मेरे जैसी एक डरी हुई लड़की थी, जिसने आख़िरी वक़्त पर सही चुना। ... शुक्रिया।"

"मैंने बरसों ग़लत चुना, नित्या। ... एक रात सही चुनने से वो सब नहीं मिट जाता। ... पर शायद इंसाफ़ यहीं से शुरू होता है। किसी एक के, आख़िरकार, सही चुनने से।"

"पता है नित्या, बारह साल बाद पहली बार, मुझे किसी इम्तिहान में जान-बूझ कर फेल नहीं होना। ... और सच कहूँ? बुद्धू बनना सबसे मुश्किल इम्तिहान था। रोज़ पास होना पड़ता था, कि कोई पकड़ न ले कि मैं दरअसल फेल हो ही नहीं रहा।"

"तो अब बता, कियान। अब तू असल में है क्या? कॉलेज का सबसे बड़ा बुद्धू, या देश का सबसे तेज़ दिमाग़?"

"अभी तो बस... आज़ाद, नित्या। ... बारह साल में पहली बार, मैं जो हूँ, वही हूँ। न समर, न अंकित, न रौनक। सिर्फ़ कियान।"

उस शाम, कियान रोशनी का नन्हा हाथ थामे उसी छत पर चढ़ा, जहाँ उसके पिता कभी शहर के ग़रीब बच्चों को पढ़ाते थे। नीचे कहीं दीया अब भी टिमटिमा रहा था, और ऊपर हवा में एक पुरानी, जानी-पहचानी ख़ामोशी थी।

"आपने कहा था, पापा, नाम को कभी घोटाले से मत छूने देना, और कर्ज़ चुकने तक गुमनाम रहना। ... बारह साल मैं इसीलिए छुपा। ... पर अब समझ आया, नाम को अँधेरे में छुपा कर नहीं बचाया जाता। आज पूरे शहर ने आपका नाम इज़्ज़त से लिया। ... और मुझे माफ़ कर दीजिए, कि इसे बचाने के लिए आख़िर मुझे रोशनी में आना पड़ा।"

और उस छत की हवा में, बारह साल देर से, कियान को ऐसा लगा जैसे एक थकी, नरम आवाज़ ने जवाब दिया हो, कि अँधेरे में रखा नाम बचता नहीं, बस दफ़न होता है। कर्ज़ तो बरसों पहले उतर चुका था। और आज, नाम भी साफ़ हो गया था। पिता के दोनों वादे, आख़िरकार, पूरे हुए।

और एक पल को ऐसा लगा जैसे बारह साल की ये कहानी आख़िरकार एक लंबी साँस ले सकती है। बादशाह गिर चुका था। नाम साफ़ हो चुका था। छत पर दीया जल चुका था। और आख़िरी बेंच वाला लड़का, पहली बार, बिना किसी मुखौटे के धूप में खड़ा था।

पर ठीक उसी पल, कॉलेज के गेट पर एक गाड़ी आ कर रुकी, जिस पर एक सरकारी नंबर प्लेट थी। उसमें से एक आदमी उतरा, सलीक़ेदार सूट, हाथ में एक मुहरबंद लिफ़ाफ़ा। उसने गार्ड से किसी का नाम पूछा। कियान का। उसका असली नाम।

और बारह साल में पहली बार, अपना नाम किसी अजनबी की ज़बान पर सुनना कोई ख़तरा नहीं था। कियान आगे बढ़ा। फिर भी उसके अंदर वो पुराना डर, आदत की तरह, एक पल को जाग गया, कि जब भी कोई अजनबी उसका नाम जानता है, कुछ न कुछ छिन जाता है।

पर वो आदमी कोई समन ले कर नहीं आया था। वो एक पेशकश ले कर आया था। देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था ने एक ऐसे लड़के को देखा था, जिसने अकेले, बिना किसी मदद के, तीन अलग नामों से, देश के सबसे मुश्किल पर्चे हल किए थे। और अब वो उस दिमाग़ को चाहते थे, खुले में, उसके अपने नाम के साथ।

एक सीधा दाख़िला, देश के सबसे बड़े संस्थान में। एक टॉप रैंक, हाथ में रखी हुई। एक भविष्य, रोशनी में, अपने नाम के साथ। वो सब कुछ, जो एक छुपे हुए लड़के का हक़ था, और जिसे उसने ख़ुद से बरसों दूर रखा था।

"पर इसमें एक शर्त लिखी है, नित्या। ... वो मुझे ये सब यूँ ही नहीं दे रहे।"

"कैसी शर्त, कियान?"

"कि मैं आज ही ये शहर छोड़ दूँ। और उनके नक़ल-विरोधी अभियान का चेहरा बन जाऊँ। ... मेरा नाम, मेरी कहानी, मेरी शक्ल, उनके पोस्टरों पर, उनके मंचों पर। ... वो मुझे रैंक नहीं दे रहे, नित्या। वो मुझे एक बार फिर ख़रीद रहे हैं। बस इस बार, सबसे तेज़ रोशनी में।"

और वहीं, अपनी सबसे बड़ी जीत के ठीक बीचोंबीच, कियान एक लिफ़ाफ़ा थामे खड़ा रह गया। एक पेशकश जो एक छुपे हुए लड़के को वो सब दे सकती थी, जिसका वो हक़दार था। या उसे एक बार फिर, किसी और के हाथ की मोहरा बना सकती थी। बस इस बार, सबसे तेज़ उजाले में।

जिस लड़के ने पूरी ज़िंदगी नज़रों से छुपने में गुज़ारी थी, वो आज एक ऐसी चिट्ठी हाथ में लिए खड़ा था, जो उसे सबसे तेज़ उजाले में खींच रही थी। और उसे नहीं पता था, कि वो चिट्ठी एक खुला दरवाज़ा है, या एक नया, ज़्यादा नरम पिंजरा।

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