अध्याय 8 / 25 पढ़ने में 13 मिनट
हॉस्टल की सियासत
लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi
हॉस्टल की मेस में बग़ावत छिड़ जाती है और बंटी मेस सेक्रेटरी का चुनाव लड़ने का ऐलान कर देता है, जिसका प्रचार कियान के ज़िम्मे आता है। जब पुराना सेक्रेटरी दद्दू एक डरे जूनियर को दबाता है, तो कियान बुद्धू बन कर, उँगलियों पर उलटा हिसाब लगा कर, उसकी चोरी का पूरा गणित सबके सामने खोल देता है, और नित्या मुखौटे के नीचे छिपे दिमाग़ की झलक पा जाती है। साझा हंगामे में दोनों पहली बार सच में साथ हँसते हैं। उधर सान्या के हाथ एक रसीद और तस्वीर लगती है जो कियान को उस दिन एक दूर के इम्तिहानी शहर में दिखाती है जिस दिन उसने कॉलेज गोल किया था, और वो उसे कॉलेज नहीं, सीधे नागपाल के पास ले जाती है।
सरस्वती कॉलेज के लड़कों के हॉस्टल में उस शाम क्रांति हो रही थी। और हर क्रांति की तरह, ये भी खाने की थाली से शुरू हुई।
"भाइयो! इसे देखो! ये दाल है? ये दाल है?! इसमें दाल ढूँढने के लिए मुझे गोताख़ोर बुलाना पड़ेगा! और ये रोटी, अरे इस रोटी से मैं कल गेट का ताला तोड़ूँ तो चाबी की ज़रूरत ही न पड़े!"
पूरी मेस में थालियाँ बज उठीं। सौ लड़के, सौ भूखे पेट, और एक बंटी, जो हमेशा हंगामे की सबसे आगे वाली कुर्सी पर होता था।
"बंटी, दाल पतली है तो पी ले न, चाय समझ कर। कम से कम गरम तो है। इस मौसम में गरम दाल-चाय, वाह। तेरी क़िस्मत अच्छी है।"
"कियान! तू मेरा दोस्त है या मेस का प्रवक्ता? मेरे साथ खड़ा हो! आज या तो इंसाफ़ मिलेगा, या... या मैं दूसरी थाली लूँगा। दोनों में से एक ज़रूर होगा।"
और तभी वॉर्डन का नोटिस बोर्ड पर एक काग़ज़ चिपका, जिसने इस भूख की क्रांति को सीधे सियासत में बदल दिया। मेस सेक्रेटरी के चुनाव। इसी हफ़्ते। जो जीतेगा, वही तय करेगा कि मेस में क्या पकेगा और पैसा कहाँ जाएगा।
"चुनाव। ... चुनाव! कियान, ये रहा मौक़ा! मैं लड़ूँगा। बंटी, मेस सेक्रेटरी। मेरे राज में हर इतवार चिकन, हर बुधवार खीर, और दाल इतनी गाढ़ी कि चम्मच खड़ा रहे!"
"बंटी, तू पिछले सेमेस्टर में यूनिट टेस्ट में तेरह नंबर लाया था। तेरह। और तू पूरे हॉस्टल का बजट सँभालेगा?"
"नंबरों का दिल से क्या लेना-देना, भाई? नेता बनने के लिए दिमाग़ नहीं, दिल चाहिए। और आवाज़। दोनों मेरे पास हैं। बस एक चीज़ की कमी है, एक होशियार मैनेजर। ... और वो तू है।"
"मैं? बंटी, मैं इस कॉलेज का सबसे नाकाम लड़का हूँ। मुझसे तो अपना रोल नंबर नहीं सँभलता, तेरा चुनाव क्या सँभालूँगा।"
"बिल्कुल सही! नाकाम मैनेजर, नाकाम उम्मीदवार, परफ़ेक्ट जोड़ी! जनता को अपने जैसा नेता पसंद आता है, कियान। और इस हॉस्टल में तेरे और मेरे जैसे नाकाम बहुमत में हैं!"
कियान ने माथा पकड़ लिया। पर बंटी की आँखों में वो चमक थी जिसके आगे कियान कभी नहीं टिक पाता था। और वैसे भी, अगले कुछ दिन बुद्धू बने रहने का इससे अच्छा बहाना और क्या होता, कि तुम एक हारने वाले चुनाव का प्रचार कर रहे हो।
अगली दोपहर, छत वाली तपरी पर, नित्या अपनी किताबों के पहाड़ के पीछे बैठी थी, जब उसके कानों में एक अजीब नारा पड़ा।
"एक ही नाम, एक ही जान, बंटी लाएगा मुर्ग़े की शान! वोट दो, वोट दो, दाल को मोटा होने दो!"
"कियान? ये क्या हो रहा है? तुम्हारा दोस्त हाथ में एक कढ़ाई और एक झंडा लेकर छत पर क्यों नाच रहा है?"
"मैडम, धीरे बोलिए। आप एक ऐतिहासिक पल देख रही हैं। ये हॉस्टल का गाँधी है। कढ़ाई इसका चरखा है, और मुर्ग़ा इसका सत्याग्रह। मैं इसका... क्या कहते हैं... प्रचार मंत्री हूँ।"
"प्रचार मंत्री। तुम? जो पर्चे पर अपना नाम भी सही से नहीं लिखते, तुम प्रचार सँभाल रहे हो?"
"जी। और देखिए, मेरी रणनीति काम कर रही है। मैंने बंटी से कहा है, कुछ मत करना, बस नाचते रहना। जनता को नाच पसंद है, वादे नहीं। वादे तो सब तोड़ते हैं, नाच कोई नहीं भूलता।"
और नित्या हँस पड़ी। सच में। कल की वो ठंडी दीवार, वो 'बस इतना रिश्ता है हमारा' वाली चोट, एक पल के लिए पिघल गई। क्योंकि जब कियान मज़ाक करता था, तो उसके चेहरे से वो थका हुआ मुखौटा उतर जाता था, और नीचे कोई और दिखता था। कोई ज़्यादा असली।
"तुम्हें पता है, कियान, जब तुम पढ़ाई से भागने की स्कीम बनाते हो न, तब तुम्हारा दिमाग़ सबसे तेज़ चलता है। काश ये तेज़ी किताब में भी लगा दो, तो मेरी स्कॉलरशिप बच जाए।"
"किताब में मज़ा नहीं है न, मैडम। किताब के जवाब पहले से लिखे होते हैं। ज़िंदगी में जवाब ख़ुद बनाने पड़ते हैं। ... वैसे, आपके लिए एक समोसा बचा कर रखा है। प्रचार वाला। खाइए, वोट डालना ज़रूरी नहीं।"
और उस एक समोसे के साथ, उन दोनों के बीच की जंग एक और डिग्री नरम हो गई। पर हँसी के इस पर्दे के पीछे, हॉस्टल की सियासत अपना असली, कड़वा रंग दिखाने वाली थी।
क्योंकि मेस का पुराना सेक्रेटरी था दद्दू। तीसरे साल का एक हट्टा-कट्टा सीनियर, जिसकी गर्दन मोटी थी और नीयत उससे भी मोटी। पिछले दो साल से मेस का सारा पैसा उसी के हाथ से गुज़रता था, और इसीलिए दाल में दाल कम, और दद्दू की जेब में माल ज़्यादा था।
उस शाम, मेस के पीछे वाले अँधेरे कोने में, दद्दू ने पहले साल के एक दुबले-पतले जूनियर को दीवार से लगा रखा था। लड़का काँप रहा था, हाथ में उसकी महीने भर की मेस-फ़ीस के पैसे थे।
दद्दू घुड़का, कि इस बार 'सुरक्षा शुल्क' दुगना है, और अगर किसी को बताया तो अगले पूरे महीने उसकी थाली में सिर्फ़ अचार और पानी मिलेगा। जूनियर की आँखें भर आईं। किसी में हिम्मत नहीं थी कि दद्दू के सामने बोले।
कियान वहीं से गुज़र रहा था, हाथ में बंटी के प्रचार वाले पर्चे। उसने वो डरा हुआ चेहरा देखा। और उसे अपनी बहन रोशनी याद आई, और वो लड़की जिसने उसे कहा था कि तेरे पापा चोर थे। कमज़ोर को दबाना, ये कियान को दुनिया में सबसे ज़्यादा जलाता था।
पर कियान चीख नहीं सकता था, लड़ नहीं सकता था। लड़ता तो नज़र में आता। तो उसने वही किया जो वो सबसे अच्छा करता था। उसने बुद्धू बनने का फ़ैसला किया।
"दद्दू भाई! यहाँ हो! अच्छा हुआ मिल गए! भाई, मेरा दिमाग़ थोड़ा कमज़ोर है, ज़रा हिसाब समझा दो। सब कह रहे हैं मेस का पैसा पूरा नहीं पड़ता। मुझे तो गणित आता नहीं, पर मैं ज़ोर-ज़ोर से गिनता हूँ, तो शायद तुम पकड़ लो कहाँ ग़लती है।"
दद्दू ने जूनियर को छोड़ा और मुड़ा, चिढ़ कर। भीड़ जमा होने लगी। कियान ने उँगलियों पर गिनना शुरू किया, ज़ोर-ज़ोर से, जैसे कोई बच्चा गिनता हो, आँखें भोली, ज़बान लड़खड़ाती।
"तो... हर लड़के से बारह सौ रुपए, और हॉस्टल में तीन सौ लड़के। बारह सौ गुना तीन सौ... उई माँ, ये तो बड़ा नंबर हो गया। छत्तीस लाख? नहीं नहीं, मुझसे ग़लती हुई होगी। इतना पैसा तो बहुत होता है न, दद्दू भाई? इतने में तो रोज़ चिकन आना चाहिए। पर आता तो अचार है। तो बाक़ी पैसा... कहाँ जाता है?"
भीड़ में एक ख़ामोशी दौड़ी। हर लड़के के दिमाग़ में अचानक वही 'बेवक़ूफ़' सवाल गूँजने लगा। छत्तीस लाख आता है, अचार खिलाया जाता है, और बाक़ी पैसा कहाँ जाता है? कियान ने जान-बूझ कर एक गिनती ग़लत की थी, और उसी ग़लत गिनती ने सबको सही जगह पहुँचा दिया।
"अरे, और दद्दू भाई, ये जो तुमने नई बाइक ली है न, कितने की है? दो लाख? पर तुम्हारे पापा तो कहते हैं कि वो तुम्हें ख़र्ची भी नहीं भेजते, ताकि तुम मेहनत सीखो। तो बाइक... मेस के अचार से आई क्या? ग़लत बोल रहा हूँ तो सुधार दो, मैं तो बुद्धू हूँ।"
दद्दू का चेहरा पहले लाल हुआ, फिर सफ़ेद। उसका मुँह खुला, पर कोई सफ़ाई नहीं निकली। क्योंकि हर 'बेवक़ूफ़' सवाल एक सच्चाई की चाबी थी, और अब तीन सौ लड़के उसे घूर रहे थे। भूखे, और अब जागे हुए।
बंटी, जो अभी-अभी अपनी कढ़ाई लेकर पहुँचा था, ने मौक़ा पकड़ा और कढ़ाई हवा में उठा दी।
"सुना सबने?! दद्दू ने हमारा चिकन बाइक बना लिया! बंटी को वोट दो, अचार को इतिहास बनाओ! एक ही नाम, एक ही जान!"
और उस अँधेरे कोने में हुई एक छोटी सी बग़ावत, पूरे हॉस्टल की जीत बन गई। जूनियर के पैसे वापस मिले, दद्दू का राज उसी शाम ख़त्म हुआ, और किसी को समझ नहीं आया कि ये सब उस बुद्धू लड़के की एक 'ग़लत' गिनती से कैसे हो गया।
किसी को नहीं। सिवाय एक के।
"तुमने वो जान-बूझ कर किया। तुमने गिनती ग़लत नहीं की, कियान। तुमने उसे ऐसे उलझाया कि सच अपने आप बाहर आ जाए। एक बुद्धू ऐसा नहीं कर सकता। ऐसा तो सिर्फ़ वो कर सकता है जिसे हिसाब सबसे ज़्यादा आता हो।"
"मैडम, आप हर चीज़ में मास्टरमाइंड ढूँढ लेती हैं। मैं तो बस ज़ोर से गिन रहा था। तुक्का लग गया। भगवान बुद्धुओं का ख़ास ख़याल रखता है, आपने सुना नहीं?"
"तुक्का। ... कियान, तुम्हारे तुक्के हमेशा निशाने पर लगते हैं। और मुझे अब यक़ीन हो चला है कि तुम बुद्धू नहीं हो। तुम बस दुनिया को बुद्धू समझते हो, या... दुनिया से कुछ छिपाते हो।"
कियान की मुस्कान एक पल को काँपी। नित्या हर दिन एक क़दम और पास आ रही थी। और वो जानता था कि इस पहेली की तह में जो है, वो उसे बचा नहीं पाएगा, डुबो देगा। पर आज, बस आज के लिए, उसने उस डर को एक तरफ़ रखा, और मुस्कुरा दिया।
"आप बहुत ख़तरनाक हैं, नित्या मैडम। दुनिया में सबसे ख़तरनाक इंसान वो होता है जो सच में देखता है। ... पर आज का दिन अच्छा था। एक जूनियर बच गया, दद्दू का राज गया, और आप हँसीं। इतना काफ़ी है। बाक़ी सवाल कल के लिए रख दीजिए।"
और उस शाम, दो लोग एक साथ, सच में, दिल से हँसे। पहली बार। हॉस्टल की सियासत ने अनजाने में उन्हें एक धागे से बाँध दिया था। पर उसी वक़्त, कॉलेज के दूसरे कोने में, एक और धागा बुना जा रहा था, एक फंदा।
लाइब्रेरी के पीछे वाले कमरे में, सान्या बेदी बैठी थी। उसके सामने मेज़ पर कई काग़ज़ बिखरे थे, तस्वीरें, रसीदें, तारीख़ें। पिछले कुछ हफ़्तों से वो चुपचाप एक ही काम कर रही थी, कियान के इर्द-गिर्द हर उस चीज़ को इकट्ठा करना जिससे बदबू आती हो।
सान्या बुरी नहीं थी। बस डरी हुई थी। उसके भी घर में एक बूढ़ा बाप था, एक बीमार माँ, और एक ही उम्मीद, ये स्कॉलरशिप, जो नित्या के पास थी। अगर नित्या की मेंटरशिप नाकाम होती, तो वज़ीफ़ा सान्या का। और उसे यक़ीन था कि कियान एक फ़रेब है। बस उसे सबूत चाहिए था।
"मुफ़्त लस्सी के कूपन। ... कोई इतनी बेवक़ूफ़ी भरी कहानी तभी बनाता है जब असली कहानी बहुत ख़तरनाक हो। तुम उस दिन उस एग्ज़ाम सेंटर में क्या कर रहे थे, कियान? एक नाकाम लड़का, देश के सबसे मुश्किल इम्तिहान के सेंटर पर। ये मेल नहीं खाता।"
और तभी, काग़ज़ों के उस ढेर में, सान्या की उँगली एक चीज़ पर रुकी। एक तस्वीर, जो उसने एक जान-पहचान के कोचिंग वाले से जुगाड़ की थी। धुँधली, पर साफ़ काफ़ी। एक दूर के इम्तिहानी शहर की, एक सेंटर के गेट की। और गेट के बाहर, भीड़ में, एक जाना-पहचाना चेहरा।
"ये... ये तो कियान है। दूसरे शहर में। इसी तारीख़ को। ... और इसी तारीख़ को ये कॉलेज से ग़ायब था। हाज़िरी रजिस्टर में इसका नाम कटा है। ये यहाँ नहीं था। ये वहाँ था। एक इम्तिहान के सेंटर पर, दो सौ किलोमीटर दूर।"
और उसके नीचे दबी थी एक रसीद। नागपाल क्लासेज़ के एक फ़्रैंचाइज़ी सेंटर की, उसी शहर की, उसी तारीख़ की। कोई फ़ीस, कोई एंट्री, कुछ ऐसा जो एक नाकाम, कंगाल लड़के के पास होने का कोई मतलब नहीं बनता था। दो टुकड़े। और सान्या ने उन्हें आपस में जोड़ दिया।
"तुम कोई फ़रेब हो, कियान। मुझे नहीं पता क्या, पर कुछ बहुत बड़ा। और अब मेरे हाथ में सबूत है।"
अब सान्या के पास दो रास्ते थे। एक, ये सब लेकर सीधे कॉलेज जाए, प्रोफ़ेसर सभरवाल के पास, और मेंटरशिप को रुकवा दे। पर सान्या ने एक पल सोचा, और दूसरा रास्ता चुना। एक ऐसा रास्ता जिसका अंजाम वो सोच भी नहीं सकती थी।
क्योंकि उसे याद था कि नागपाल जी ने ख़ुद ऐलान किया था कि वो हर स्कॉलरशिप छात्र की, और इस मेंटरशिप की, निजी जाँच करेंगे। और सान्या ने सोचा, अगर सबूत सीधे सबसे ऊँचे आदमी के हाथ में दे दूँ, तो फ़ैसला और तेज़, और पक्का होगा।
उसे नहीं पता था कि वो एक भूखे शेर के मुँह में मांस रख रही थी। उसे नहीं पता था कि जिस कियान का राज़ वो नागपाल को सौंपने जा रही थी, वही राज़ नागपाल बारह साल से ढूँढ रहा था।
अगली सुबह। शहर के बीचोंबीच, नागपाल क्लासेज़ की शीशे की मीनार के सबसे ऊपरी दफ़्तर में, यशपाल नागपाल अपनी कुर्सी पर बैठा था, जब उसे बताया गया कि एक कॉलेज की लड़की, सान्या बेदी, कुछ ज़रूरी दिखाना चाहती है।
"नमस्ते, सर। मैं जानती हूँ आप बहुत व्यस्त हैं। पर मुझे लगा ये आपको देखना चाहिए। इस लड़के के बारे में। जिस पर वो मेंटरशिप वाला प्रयोग हो रहा है। कियान। मुझे लगता है ये जो दिखता है, वो है नहीं।"
नागपाल ने बिना जल्दबाज़ी के वो तस्वीर और रसीद हाथ में ली। उसने तस्वीर को देखा। उस धुँधले चेहरे को, उस दूर के इम्तिहानी शहर को, उस तारीख़ को। और धीरे-धीरे, उसके चेहरे पर वो मुस्कान फैली जो कभी गरम नहीं होती।
क्योंकि नागपाल के दिमाग़ में अब तीन टुकड़े एक साथ जुड़ रहे थे। गलियारे वाला वो लड़का, देवनाथ की आँखें। एक नाकाम छात्र जो पैसे बिना दूर के इम्तिहान सेंटरों पर घूमता है। और उसके अपने कान में बरसों से पड़ती एक अफ़वाह, कि कोई है जो किसी और के नाम पर इम्तिहान पास करता है।
"तो लास्ट बेंच वाला बुद्धू, दूर के इम्तिहानी शहरों की सैर करता है। किसी और के नाम पर। ... बेटी, तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि तुम मेरे लिए कितना बड़ा तोहफ़ा लाई हो।"
"सर, मैं बस चाहती थी कि जाँच सही से हो, ताकि... ताकि वज़ीफ़ा सही हाथ में जाए। मैं इसे बदनाम नहीं करना चाहती, बस सच सामने..."
"बिल्कुल, बेटी। सच सामने आना चाहिए। तुमने बहुत अच्छा किया। तुम जाओ। बाक़ी अब मैं देख लूँगा। ... ये लड़का, और इसका सच, अब मेरा मसला है।"
सान्या दफ़्तर से बाहर निकली, ये सोचते हुए कि उसने अपने वज़ीफ़े के लिए एक चाल चली है। उसे नहीं पता था कि उसने कोई चाल नहीं चली, एक बंदूक़ में गोली भरी थी, और उसे उस आदमी के हाथ में थमा दिया था जो बारह साल से एक बच्चे को ढूँढ रहा था। नागपाल ने वो तस्वीर मेज़ पर रखी, उस पर उँगली रखी, और बहुत धीरे कहा, 'मिल गए, देवनाथ के बेटे। अब खेल शुरू होता है।'
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