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अध्याय 16 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

गुमनाम रैंक

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

सुबह की ख़बर ने कियान की रीढ़ में एक ठंडी लकीर खींच दी। टीवी पर नक़ल-विरोधी दस्ते का अफ़सर बोल रहा था, और उसके पीछे स्क्रीन पर तीन धुँधली तस्वीरें थीं। तीन अलग-अलग शहर, तीन अलग-अलग नाम, तीन अलग-अलग रैंक। पर अफ़सर कह रहा था कि ये सब एक ही हाथ का काम है।

समर। अंकित तिवारी। रौनक अग्रवाल। तीन गुमनाम रैंक, जिन्हें दस्ता अब एक ही हल करने वाले तक जोड़ रहा था। एक पैटर्न। और पैटर्न, कियान जानता था, धुएँ की तरह होता है। जब दिखने लगे, तो आग पास ही होती है।

"बस। अब और नहीं। जाल बंद होने से पहले मुझे निकलना है, नित्या। हमेशा के लिए। एक आख़िरी हिसाब बाक़ी है, और आज मैं उसे चुका दूँगा। आज कर्ज़ का पहाड़ ख़त्म। और उसके बाद, कोई समर नहीं, कोई रौनक नहीं। सिर्फ़ कियान।"

"आख़िरी हिसाब? कितना? और कहाँ से आएगा? कियान, अगर तुमने अभी एक और पर्चा दिया, तो वो तुम्हें उसी वक़्त पकड़ लेंगे। दस्ता हर सेंटर पर तुम्हारी तस्वीर लिए बैठा है।"

"नया पर्चा नहीं, नित्या। पुराना पैसा। मेरे एक आख़िरी काम का हिसाब, जो अभी तक मेरे हाथ नहीं आया। बड़ी रक़म। उतनी, जिससे मेरे पापा के गिरवी पड़े घर के काग़ज़ छूट जाएँ। वो आख़िरी चीज़ जो नागपाल ने हमसे छीनी थी। बस वो पैसा उठाना है, और कर्ज़ ख़त्म।"

और नित्या समझ गई कि ये कितना बड़ा था। सिर्फ़ पैसा नहीं। वो घर, वो छत, वो आख़िरी निशानी जो देवनाथ मास्टर की बची थी। बारह साल की पूरी लड़ाई का आख़िरी क़दम। और वो एक ही क़दम सबसे ख़तरनाक था, क्योंकि अब पूरा दस्ता उसकी हर परछाईं सूँघ रहा था।

"तो अकेले नहीं करोगे। अब से हम एक टीम हैं, याद है? तुम्हारे पास दिमाग़ है जो पर्चे हल करता है। मेरे पास दिमाग़ है जो सवाल हल करता है। इस बार सवाल ये है, तुम्हें उस पैसे तक बिना पकड़े कैसे पहुँचाया जाए। और वो सवाल मैं हल करूँगी।"

और अगले घंटे में, नित्या ने वो किया जो एक टॉपर सबसे अच्छा करता है। उसने पूरी चाल को एक पर्चे की तरह हल किया। कहाँ पैसा है, कौन उस पर नज़र रखे है, कब भीड़ सबसे ज़्यादा होगी, कौन सा रास्ता कैमरों से बचा है। कियान बस देखता रहा, दंग, कि उसकी दुनिया की सबसे मुश्किल चाल कोई और, उससे भी तेज़, बुन रहा था।

"सुनो। पैसा उस दुकान के पीछे है। भीड़ शाम को छह बजे सबसे ज़्यादा होगी। सामने का रास्ता कैमरे में है, पीछे वाला नहीं। तुम्हारे पास अंदर से बाहर तक नब्बे सेकंड होंगे, एक भी ज़्यादा नहीं। और मैं फ़ोन पर तुम्हारी आँख बनूँगी। तुम बस वही करोगे जो मैं कहूँगी। बिना सवाल।"

"जी, मैडम। ... पता है, ये पहली बार है जब कोई मुझे बता रहा है कि पर्चा कैसे हल करना है, और मैं मना नहीं कर रहा। शायद मुझे ये अच्छा लग रहा है। ख़तरनाक बात है।"

और नित्या मुस्कुरा दी। बारह साल से कियान हर चाल अकेले चलता आया था, हर राज़ अकेले ढोता आया था। और आज पहली बार, उसने किसी और के हाथ में अपनी डोर दे दी थी। और सबसे अजीब बात ये थी कि उसे डर नहीं लग रहा था। हल्का लग रहा था। जैसे कोई बोझ बाँटने से आधा हो जाता है।

"तुम्हें पता है, नित्या, तुम अगर ग़लत रास्ते पर होतीं, तो देश की सबसे ख़तरनाक अपराधी होतीं। ये चाल... मैंने बारह साल में इतनी सफ़ाई से कभी नहीं सोचा।"

"तारीफ़ बाद में, कियान। अभी एक दिक़्क़त है। इस पूरी चाल में हमें एक तीसरे इंसान की ज़रूरत है। कोई जो सामने खड़ा हो, ध्यान भटकाए, भीड़ बनाए। कोई जो शक के दायरे में न आए। कोई जो... थोड़ा बेवक़ूफ़ लगे।"

और दोनों की नज़रें मिलीं, और दोनों के दिमाग़ में एक ही चेहरा आया। एक बड़ा दिल, एक ऊँची आवाज़, और एक ऐसी मासूमियत जो किसी भी योजना को हँसी में बदल सकती थी। बंटी।

और आधे घंटे बाद, हॉस्टल के कमरे में, बंटी अपने बिस्तर पर लेटा एक चिप्स का पैकेट खा रहा था, जब कियान और नित्या अंदर आए, चेहरे पर वो गंभीरता लिए जो बंटी को हमेशा डरा देती थी।

"अरे! टॉपर मैडम हमारे कमरे में? कियान, तूने आख़िरकार पढ़ाई शुरू कर दी? ... रुक, रुक, ये गंभीर चेहरे क्यों बना रखे हैं? किसी की शादी तय हो गई क्या? मेरी तो नहीं?"

"बंटी, यार, एक छोटा सा काम है। नित्या के एक रिश्तेदार का पुराना सामान एक जगह से उठाना है। बड़ी भीड़ वाली जगह है। तुझे बस वहाँ खड़े हो कर थोड़ा शोर मचाना है, ताकि हम आराम से काम कर लें। बदले में, आज की बिरयानी मेरी तरफ़ से।"

"बिरयानी?! बस इतनी सी बात? भाई, शोर मचाना तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है! मुझे बचपन से शाबाशी इसी बात पर मिली है कि मैं बेवजह सबसे ज़्यादा बोलता हूँ। ... चलो, कहाँ चलना है? मैं तैयार हूँ। पर पहले बिरयानी की बुकिंग पक्की।"

"बंटी, सिर्फ़ शोर। बस इतना। कोई फ़ालतू हीरोगिरी नहीं, किसी को फ़ोन नहीं, कोई भाषण नहीं। ठीक है? सीधा-सादा शोर।"

"मैडम, आप मुझे जानती नहीं। मैं ख़ुद संयम का दूसरा नाम हूँ। ... वैसे भाषण वाला आइडिया बुरा नहीं है। रख लेता हूँ, बैकअप के लिए। ज़रूरत पड़ी तो मंच तैयार है।"

और नित्या ने कियान की तरफ़ एक ऐसी नज़र से देखा जो कह रही थी, हम अपनी पूरी चाल इस आदमी पर टिका रहे हैं? और कियान ने बस कंधे उचका दिए। बंटी नाक़ाबिल ज़रूर था, पर वफ़ादार सौ फ़ीसदी। और आज उन्हें नाप-तौल नहीं, वफ़ादारी चाहिए थी।

और कियान ने एक हल्की सी हँसी हँस दी, पर उसके अंदर एक चुभन थी। बंटी, जो उसका सबसे सच्चा दोस्त था, आज भी बिना जाने उसका सबसे बड़ा मोहरा बन रहा था। पर आज एक फ़र्क़ था। आज कियान अकेला नहीं था। आज उसके साथ नित्या थी। और शायद ये आख़िरी झूठ था।

शाम को, शहर के एक पुराने, भीड़ भरे बाज़ार में, एक तंग गली के आख़िर में वो जगह थी। एक पुरानी दुकान, जिसके पीछे कियान के आख़िरी काम का हिसाब, नक़दी की एक थैली, रखी थी। और गली के मुँह पर, एक बाइक पर बैठा एक आदमी, जो बहुत ग़ौर से हर आने-जाने वाले को देख रहा था।

"कियान, रुको। गली के मुँह पर एक आदमी है, काली बाइक। वो कोई ग्राहक नहीं है, वो पहरा है। तुम सीधे नहीं जा सकते। ... बंटी को अभी भेजती हूँ। जैसे ही वो शोर शुरू करे, तुम पीछे वाले रास्ते से अंदर।"

और फिर बंटी ने वो किया जिसमें वो सच में माहिर था। वो सीधे उस काली बाइक वाले के पास गया, और पूरे बाज़ार को सुनाई देने वाली आवाज़ में चिल्लाया।

"अरे भाई साहब! आप यहाँ?! पहचाना नहीं? अरे मैं, शर्मा जी का बेटा! पिछले साल आपकी बुआ की शादी में हम साथ नाचे थे! ... क्या मतलब आपकी कोई बुआ नहीं? भाई साहब, बुआ तो सबकी होती है! एक फ़ोटो हो जाए? भीड़, इधर आओ, फ़ोटो!"

और पल भर में, बंटी के इर्द-गिर्द एक भीड़ जमा हो गई, कुछ हँसते हुए, कुछ हैरान, और वो काली बाइक वाला उस हुल्लड़ में ऐसा फँसा कि उसे गली के पीछे का रास्ता दिखा ही नहीं। कियान परछाईं की तरह अंदर सरका, थैली उठाई, और निकल आया। सफ़ाई से। तेज़ी से।

पर तभी, गड़बड़ हो गई। बंटी के शोर से एक असली सिपाही, जो बाज़ार में गश्त पर था, उस तरफ़ मुड़ा। और उसकी नज़र सीधे कियान की उस थैली पर पड़ी, जो जल्दबाज़ी में आधी खुली रह गई थी। नक़दी की एक झलक। और सिपाही की भौंहें तन गईं।

"कियान, सिपाही! दाईं तरफ़! थैली छिपाओ, और भागो मत, भागोगे तो पकड़े जाओगे। ... रुको। बंटी, अपनी वाली एक्टिंग, अभी!"

और नित्या ने वो सोचा जो सिर्फ़ एक टॉपर सोच सकता था, दबाव में, एक सेकंड में। उसने बंटी को इशारा किया, और बंटी, बिना पूरी बात समझे, कियान के पास दौड़ा और उसके गले लग गया, ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए।

"भाई! मिल गए तुम! पूरे बाज़ार में ढूँढ रहा था! माँ ने कहा था बैंक से पैसे ले कर सीधे घर आना, और तू यहाँ! चल घर चल, वरना माँ हम दोनों को कूटेगी! ... सिपाही जी, आप भी देखिए, ये मेरा भाई है, कितना लापरवाह है, इतने पैसे ले कर घूम रहा है!"

और सिपाही, जो एक चोर ढूँढ रहा था, उसके सामने दो झगड़ते हुए भाई थे, एक रोता हुआ, एक शर्मिंदा, और बैंक से निकाले पैसे। उसने सिर हिलाया, एक हल्की डाँट दी कि पैसे सँभाल कर रखो, और आगे बढ़ गया। और कियान की साँस, जो कब से अटकी थी, धीरे से लौटी।

गली के बाहर, एक कोने में, तीनों रुके। बंटी हाँफ रहा था, अब भी नहीं समझ पाया कि हुआ क्या। कियान के हाथ में थैली थी, और उसकी आँखों में एक ऐसी चीज़ जो नित्या ने पहले कभी नहीं देखी थी। राहत। असली, गहरी राहत।

"मैंने... मैंने ठीक किया न? पता नहीं क्यों किया, पर ज़बरदस्त किया! ... अब बिरयानी? भाई, इतनी एक्टिंग के बाद तो डबल बिरयानी बनती है। और रायता भी।"

"डबल बिरयानी पक्की, बंटी। और रायता भी। तूने आज जो किया न, वो तुझे कभी पता नहीं चलेगा कितना बड़ा था। जा, तू आगे चल, हम आते हैं।"

और जब बंटी बिरयानी के सपने देखता हुआ आगे बढ़ गया, तो कियान और नित्या वहीं रुके। कियान ने थैली को यूँ देखा जैसे कोई बारह साल की क़ैद के आख़िरी ताले को देखता है। बहुत धीरे, उसने कहा।

"बस, नित्या। ये आख़िरी था। कल सुबह मैं ये पैसा दे कर पापा के घर के काग़ज़ छुड़ा लूँगा। और उसके बाद... कर्ज़ ख़त्म। बारह साल बाद, ख़त्म। मैं आज़ाद हो जाऊँगा। पहली बार।"

और उसकी आवाज़ काँप गई। क्योंकि आज़ादी का ये पल जितना मीठा था, उतना ही ख़ाली। जिस बाप के लिए वो लड़ा, वो देखने के लिए नहीं था। जो बचपन उसने बेचा, वो लौटने वाला नहीं था। पर कर्ज़, वो पहाड़, आख़िरकार, ढहने वाला था।

"तुम्हारे पापा को अगर आज पता चलता, कियान, तो वो तुम पर कितना गर्व करते। तुमने उनका वादा निभा दिया। हर एक लफ़्ज़। ... और अब जब कर्ज़ ख़त्म हो जाएगा, तो शायद तुम्हें छिपने की भी ज़रूरत नहीं रहेगी।"

"शायद। ... शायद फिर हम वो लड़ाई भी लड़ सकें, जो तुमने छत पर कही थी। खुले में। उजाले में। जब कर्ज़ की ज़ंजीर नहीं रहेगी, तो शायद मैं भी वो लड़का बन सकूँ जो झुकता नहीं। तुम्हारे जैसा।"

और उस पल, उस गली के कोने में, दोनों के बीच कुछ और गहरा हो गया। छत पर वो लगभग-चुंबन एक एहसास था। पर आज, एक साथ एक जंग जीत कर, कंधे से कंधा मिला कर, वो एहसास एक भरोसे में बदल गया था। और भरोसा, प्यार से भी मज़बूत होता है।

अगली सुबह, हल्की, उम्मीद भरी। कियान और नित्या कॉलेज के गेट की तरफ़ बढ़ रहे थे, और कियान की जेब में वो पर्ची थी जिस पर लिखा था, आज दोपहर, पापा के घर के काग़ज़। बारह साल की लड़ाई का आख़िरी दिन। और पहली बार, कियान के क़दमों में एक हल्कापन था।

"अरे रुको! भाई, कल की बिरयानी का हिसाब बाक़ी है! और आज मेरा मन डबल का है, वादा वादा होता है! ... वैसे, कियान, गेट पर वो कौन खड़ा है? तुझे पूछ रहा था। कोई वर्दी वाला अफ़सर टाइप।"

और कियान के क़दम रुक गए। उसकी वो हल्की, उम्मीद भरी सुबह, एक पल में जम गई। उसने धीरे से नज़र उठाई, गेट की तरफ़।

वहाँ, कॉलेज के गेट पर, एक आदमी खड़ा था। साधारण कपड़े, पर वो नज़र जो हर चेहरे को छानती है। नक़ल-विरोधी दस्ते का वही अफ़सर, जिसकी तस्वीरें कल टीवी पर थीं। और वो किसी वर्दी वाले से पूछ रहा था, एक नाम ले कर। कोई फ़र्ज़ी नाम नहीं। समर नहीं, रौनक नहीं।

"कियान... वो... वो तुम्हारा असली नाम ले रहा है।"

और कियान का ख़ून जम गया। क्योंकि उसका असली नाम, उसकी असली पहचान, दस्ते के पास सिर्फ़ एक ही सूरत में पहुँच सकती थी। किसी ने बताया था। किसी ने, जो उसे जानता था, उसे पकड़वा दिया था। और कियान जानता था, वो कौन था। सिकंदर। और सिकंदर के पीछे, नागपाल।

बारह साल की क़ैद का आख़िरी ताला, कियान की जेब में एक पर्ची पर, बस चंद घंटों की दूरी पर था। कर्ज़ ख़त्म होने ही वाला था। आज़ादी हाथ में ही थी। और ठीक उसी सुबह, ठीक उसी गेट पर, दस्ता उसका असली नाम ले कर खड़ा था। किसी ने उसे बेच दिया था। और जाल, जो बारह साल से बुना जा रहा था, अब उसके गले तक कस गया था।

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