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Chapter 2 of 25 11 min read

छत पे ट्यूशन

लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi

अगली सुबह ठीक सात बजे, हॉस्टल के लड़कों के विंग के बाहर, नित्या सक्सेना एक फ़ाइल छाती से लगाए, घड़ी देखती खड़ी थी।

और कियान... कियान अभी तक सो रहा था।

"कियान! नीचे आओ! सात बज गए हैं! मैंने कहा था सुबह पढ़ेंगे!"

खिड़की खुली। एक झबरे बालों वाला, गोल-मटोल लड़का बाहर झाँका, बंटी। कियान का रूममेट, और पूरे हॉस्टल का सबसे ऊँची आवाज़ वाला जीव।

"अरे मैडम! ये तो सूरज उगने से पहले उठ गईं! भाई सो रहा है। कल रात 'पढ़ाई' में देर हो गई थी उसकी।"

"कियान और पढ़ाई? एक ही वाक्य में? तुम मज़ाक कर रहे हो।"

"मज़ाक तो पूरी ज़िंदगी है, मैडम। रुकिए, मैं उठाता हूँ उसे। पर एक शर्त, बाद में चाय आपकी तरफ़ से।"

दस मिनट बाद कियान नीचे आया, आँखें आधी बंद, बाल आसमान की तरफ़ खड़े, और मुँह में ब्रश।

"मैडम, इंसान सुबह-सुबह इतना पढ़ेगा तो शाम को क्या करेगा? कुछ तो बचा कर रखो।"

"ठीक है, सुनो। नियम नंबर एक, टाइम पर आना। नियम नंबर दो, सोना मना है। नियम नंबर तीन, हर सवाल का जवाब देना है, चाहे ग़लत हो।"

"ग़लत जवाब चलेगा? फिर तो मैं टॉपर हूँ इस मामले में। ग़लत जवाबों में मेरा कोई मुक़ाबला नहीं।"

नित्या ने आँखें मूँदीं, गिनती की, एक... दो... तीन, और फिर उसे कॉलेज की छत की तरफ़ खींच ले गई।

कॉलेज की छत। पुराने कॉलेज की वो जगह जहाँ किताबें कम, दिल ज़्यादा खुलते थे। एक कोने में रामू चाचा की चाय की तपरी, केतली में उबलती अदरक वाली चाय, और नीचे फैला पूरा इम्तिहानी शहर, कोचिंग के होर्डिंग, हॉस्टल की छतें, रैंक बेचने वाले सपने।

"यहीं पढ़ेंगे। रोज़। सुबह और शाम। चलो, पहला सवाल। ये त्रिकोणमिति का सवाल हल करो।"

उसने एक सवाल आगे बढ़ाया। एक साधारण सा सवाल, जो कियान के लिए साँस लेने जितना आसान था। और यहीं से तमाशा शुरू हुआ।

"ये जो साइन थीटा है... ये कौन है? इसके घर वाले कहाँ रहते हैं?"

"साइन थीटा किसी का नाम नहीं है, कियान।"

"नहीं है? तो किताब वाले इसे 'थीटा' क्यों बुलाते हैं? नाम है तो घर भी होगा।"

सीढ़ियों पर बैठा बंटी, समोसा खाते हुए, ज़ोर से हँसा और ताली बजाई, जैसे कोई क्रिकेट मैच देख रहा हो।

"और भाई ने पहली ही गेंद पर छक्का मारा! साइन थीटा का घर पूछ लिया! मैडम की गेंदबाज़ी फेल!"

"बंटी! तुम यहाँ कमेंट्री करने आए हो या नाश्ता करने?"

"दोनों, मैडम। मुफ़्त का मनोरंजन और गरम समोसा, इससे बढ़िया सुबह क्या होगी।"

अगले एक घंटे में कियान ने वो सब किया जो एक जीनियस को छिपाने के लिए करना पड़ता है। उसने सूरज को पश्चिम में उगाया, दो और दो को छह किया, और भारत की राजधानी 'चाय' बताई।

"राजधानी दिल्ली नहीं होती, मैडम। दिल्ली तो बस मशहूर है। असली राजधानी वहाँ होती है जहाँ सबसे अच्छी चाय मिले। इसलिए, ये छत।"

"ये... ये तुमने अभी-अभी बनाया?"

"जी नहीं, ये मेरा गहरा दर्शन है। बरसों की मेहनत है इसमें।"

पर नित्या टॉपर थी। और टॉपर एक चीज़ पहचानते हैं, गड़बड़ी। और यहाँ गड़बड़ी बहुत थी, बस उलटी तरफ़ की।

उसने एक कठिन सवाल रखा, जानबूझ कर, ये देखने कि कियान कहाँ तक गिर सकता है। और कियान जम्हाई लेते-लेते, आधी नींद में, बुदबुदाया।

"तीसरी लाइन में साइन प्लस होगा, माइनस नहीं। वरना पूरा हल ग़लत..."

नित्या का पेन रुक गया। उसने अपनी कॉपी देखी। उसने ख़ुद तीसरी लाइन में माइनस लगाया था। और वो सचमुच ग़लत था।

"तुमने... तुमने अभी क्या कहा?"

"मैंने? कुछ नहीं। मैं तो सपने में गाना गा रहा था। साइन प्लस... वो एक गाना है। नया वाला।"

नित्या ने उसे घूरा। कुछ ठीक नहीं था। एक लड़का जो साइन थीटा का घर पूछता है, वो नींद में एक जटिल सवाल की तीसरी लाइन कैसे सुधार सकता है?

"अच्छा, तो तुम्हें कुछ नहीं आता?"

"बिलकुल कुछ नहीं, मैडम। ये मेरी सबसे बड़ी क़ाबिलियत है। मैं इसमें एक्सपर्ट हूँ।"

नित्या ने एक और तरीक़ा आज़माया। उसने अपनी सबसे साफ़, सबसे सधी हुई कॉपी उसके सामने रखी, जिस पर उसके अपने बनाए हुए नोट्स थे, जिन्हें पूरा कॉलेज पूजता था।

"चलो, ऐसे करते हैं। मैं करती हूँ, तुम बस देखो। पहले सवाल को समझो, फिर सूत्र लगाओ। देखो, ये स्टेप।"

कियान ने कॉपी को इतने ध्यान से देखा जितना किसी ने कभी नित्या के नोट्स को नहीं देखा था। पर उस ध्यान में पढ़ाई नहीं थी। कुछ और था।

"मैडम, ये सूत्र आपने चौथे स्टेप में उलटा लगा दिया। ऊपर जो है वो नीचे जाना चाहिए। ... मेरा मतलब, ऐसा मुझे लगता है। मुझे तो कुछ आता नहीं।"

नित्या ने चौथा स्टेप देखा। एक पल रुकी। फिर हिसाब दोहराया। कियान सही था। उसने सचमुच सूत्र उलटा लगाया था, एक ऐसी ग़लती जो पूरे कॉलेज में शायद पाँच लोग पकड़ पाते।

"ये... ये तुमने कैसे पकड़ा? अभी तो तुमने कहा था तुम्हें सूत्र का नाम भी नहीं पता।"

"तुक्का, मैडम। मुझे ग़लत चीज़ें अच्छी लगती हैं न, तो नज़र भी उन्हीं पर जाती है। आपकी कॉपी में इकलौती ग़लत चीज़ यही थी। बाक़ी सब बहुत सही था, इसलिए बोरिंग।"

नित्या चुप हो गई। ये जवाब इतना चालाक था कि बुद्धू का नहीं हो सकता था, और इतना बचकाना कि जीनियस का नहीं लगता था। ठीक बीच में, जहाँ सच छिपता है।

"मैडम, एक राज़ की बात? मैं भाई के साथ दो साल से रह रहा हूँ। इसने आज तक एक किताब नहीं खोली, पर हर टीचर की हर ग़लती पकड़ लेता है। भूत है ये, पढ़ाकू भूत।"

"बंटी, चुप कर। मेरी बदनामी मत कर। लोग सोचेंगे मैं होशियार हूँ। मेरी पूरी मेहनत ख़राब हो जाएगी।"

बंटी ने ठहाका लगाया, पर नित्या नहीं हँसी। उसने वो शब्द पकड़ लिया था। 'मेरी पूरी मेहनत।' बुद्धू बनने में मेहनत क्यों लगती है?

तभी छत पर एक और छाया पड़ी। कड़क क़दम, तनी हुई कमर। प्रोफ़ेसर सभरवाल, चाय के बहाने, पर असल में नित्या का 'प्रयोग' देखने आई थीं।

"तो? कैसा चल रहा है मेंटरशिप का महान प्रयोग, नित्या?"

"बढ़िया, मैम। हम... बुनियाद पर काम कर रहे हैं। बहुत मज़बूत बुनियाद।"

ठीक उसी पल कियान ने ज़ोर से एक जम्हाई ली और चाय के गिलास को उलटा पकड़ लिया, जिससे चाय उसकी अपनी क़मीज़ पर गिर गई।

"बहुत मज़बूत बुनियाद। दिख रहा है।"

फिर सभरवाल की आवाज़ थोड़ी नरम, थोड़ी गंभीर हुई। उन्होंने नित्या को एक तरफ़ ले जा कर धीरे से कहा।

"नित्या, एक बात सुन लो। ट्रस्ट सिर्फ़ फ़ाइनल का इंतज़ार नहीं करेगा। बीच सत्र में एक प्रगति रिपोर्ट देनी होगी। एक छोटा टेस्ट। अगर उसमें भी कियान ने कुछ नहीं दिखाया, तो शर्त वहीं, बीच में ही टूट सकती है।"

"बीच में? मैम, अभी तो शुरुआत है। मुझे और वक़्त..."

"वक़्त कम है, बेटा। और नज़र रखने वाले बहुत। ख़ास कर सान्या।"

और जैसे नाम लेने भर से बुलाया गया हो, छत के दूसरे कोने में सान्या बेदी खड़ी थी। हाथ में किताब, चेहरे पर सधी हुई मुस्कान, और आँखों में हिसाब।

"अरे नित्या! तुम सचमुच कियान को पढ़ा रही हो? कितनी हिम्मत है तुममें। मैं तो कहती हूँ, कुछ लोग बदलने के लिए बने ही नहीं होते।"

"हर कोई बदल सकता है, सान्या। बस सही तरीक़े की ज़रूरत होती है।"

"बिलकुल। पर अगर तरीक़ा काम न आए, तो कोई और तैयार बैठा है, है न? वैसे, तुम्हारी अम्मा की तबीयत कैसी है? सुना था दवाइयाँ महँगी हैं आजकल।"

नित्या की मुट्ठी भिंच गई। सान्या को पता था कि उसका कमज़ोर बिंदु कहाँ है। और सान्या को ये भी पता था कि वो कमज़ोर बिंदु अभी छत पर बैठा, चाय गिरा रहा था।

"ऑल द बेस्ट, नित्या। तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी।"

सान्या चली गई। सभरवाल चली गईं। और नित्या वहीं खड़ी रह गई, उस लड़के को देखती हुई जो उसकी पूरी दुनिया की चाबी था, और जो उस चाबी को हर पल कुएँ में फेंकने पर तुला था।

"कियान, तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है ये मेरे लिए क्या है, है न? ये सिर्फ़ मेरा टेस्ट नहीं है। किसी और की भी उम्मीद है इसमें।"

और पहली बार, कियान की जम्हाई थमी। उसने नित्या को देखा, उसकी आँखों में वो थकान देखी जो हँसी के पीछे छिपी थी, और एक पल के लिए, बहुत हल्के से, उसका मज़ाक थम गया।

"किसकी उम्मीद?"

"मेरी अम्मा की। ... छोड़ो। तुम नहीं समझोगे।"

"शायद समझता हूँ, मैडम। उम्मीदों का बोझ मुझे भी थोड़ा-थोड़ा पता है।"

नित्या ने चौंक कर उसे देखा। पर तब तक बुद्धू का मुखौटा वापस अपनी जगह आ चुका था।

"ख़ैर! अब चाय ठंडी हो रही है और दर्शन गरम। मुझे लगता है आज की पढ़ाई सफल रही। मैंने तीन नए ग़लत जवाब सीखे।"

शाम ढल रही थी। छत ख़ाली हो रही थी। बंटी कब का समोसों की तीसरी प्लेट निपटा कर जा चुका था।

"चलिए मैडम, आज के लिए इतनी बुद्धि काफ़ी है। ज़्यादा दिमाग़ लगाना सेहत के लिए हानिकारक है।"

कियान अपना बैग उठा कर चला गया। नित्या वहीं रुकी, अपनी किताबें समेटती हुई, थकी हुई, हारी हुई सी।

और तभी, चाय की तपरी के पास, ज़मीन पर, हवा से लुढ़कता एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ उसके पैर से आ टकराया।

"ये किसका है? कियान का बैग तो यहीं खुला था।"

उसने काग़ज़ उठाया, बस फेंकने के लिए। फिर उसकी नज़र उस पर पड़ी। और उसका हाथ हवा में ही रुक गया।

उस काग़ज़ पर एक सवाल हल था। पर कोई मामूली सवाल नहीं। ये उस स्तर का सवाल था जो देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में आता है, वो सवाल जिसे नित्या ख़ुद कई घंटे लगा कर भी शायद न कर पाती।

और वो हल... बेदाग़ था। साफ़, सधा हुआ, हर लाइन नाप-तौल की। जैसे किसी ने साँस लेते हुए लिखा हो। एक ऐसे दिमाग़ का काम, जो नित्या ने अपनी पूरी ज़िंदगी में सिर्फ़ किताबों में देखा था।

"ये... ये कौन कर सकता है? इस शहर में तो कोई नहीं..."

और लिखावट, वो लिखावट नित्या ने पहले कभी नहीं देखी थी। तीखी, तेज़, बेख़ौफ़। कियान की घसीट, आलसी, आधी-अधूरी लिखावट से बिलकुल अलग।

और नीचे, कोने में, एक छोटा सा दस्तख़त था। एक नाम। नित्या ने उसे पढ़ा, और उसकी रीढ़ में एक सर्द लहर दौड़ गई।

"समर...?"

ये नाम कियान का नहीं था। ये उस बैग में था जो कियान का था। इस लिखावट में हल हुआ था वो सवाल जिसे कियान 'साइन थीटा का घर' पूछ कर टाल देता था।

नित्या ने काग़ज़ को पलटा। पीछे कुछ नहीं था, बस एक तारीख़ और एक अजीब सा कोड, जैसे कोई रसीद हो। और एक जगह, कलम के दबाव से काग़ज़ लगभग फट गया था, वहाँ लिखा था, 'बड़ा वाला, अगले हफ़्ते।'

"बड़ा वाला अगले हफ़्ते... कोड... दस्तख़त... ये किसी पढ़ाई की चीज़ नहीं लगती। ये किसी सौदे की चीज़ लगती है।"

टॉपर का दिमाग़ पैटर्न पकड़ता है, और यहाँ पैटर्न डरावना था। एक बुद्धू के बैग में देश के सबसे कठिन सवाल का बेदाग़ हल, एक फ़र्ज़ी नाम, और अगले हफ़्ते के किसी 'बड़े' काम का इशारा।

"अगर ये कियान का नहीं है... तो ये उसके बैग में क्या कर रहा है? और अगर ये कियान का है... तो 'समर' कौन है?"

नित्या ने उस काग़ज़ को ऐसे थामा जैसे वो कोई सुलगता हुआ अंगारा हो। एक टॉपर के दिमाग़ में, पहली बार, एक ऐसा सवाल जागा था जिसका जवाब किसी किताब में नहीं था।

दुनिया के लिए कियान एक बुद्धू था। पर इस काग़ज़ पर, किसी 'समर' के नाम से, कोई एक बहुत ख़तरनाक सच लिखा था। और वो सच अब नित्या के हाथ में था।

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