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अध्याय 5 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

चाय और शक

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

नागपाल क्लासेज़ की चमकती लॉबी में, सान्या की उँगली अब भी कियान की जेब की तरफ़ थी, और उसकी नज़र में जीत की चमक। एक सेकंड और, और सब कुछ खुल जाता।

पर कियान के पास एक हथियार था जो सान्या के पास नहीं था। वो पूरी दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाने का सालों का अभ्यास। और जब सच नहीं बचा सकता, तब बेवक़ूफ़ी बचाती है।

"अरे सान्या! तुझे पता है ये कार्ड क्या है? ये है 'फ़्री लस्सी' का कूपन! नागपाल वाले नए बच्चों को बाँट रहे हैं। मुफ़्त की लस्सी! मैं तो इसीलिए लाइन में लग गया था। बंटी ने कहा था, कियान, कहीं भी मुफ़्त का मिले, छोड़ना मत।"

"लस्सी का कूपन? पर उस पर तस्वीर..."

"हाँ न! तस्वीर वाला कूपन! ताकि एक बंदा दो बार लस्सी न ले जाए। कितना बढ़िया सिस्टम है। मैंने तो सोचा तू भी लस्सी के लिए आई है। चल, दो-दो पीते हैं, मुफ़्त की है।"

और उसने वो कार्ड इतनी लापरवाही से जेब में ठूँसा, इतने भोलेपन से लस्सी-लस्सी की रट लगाई, कि सान्या का पूरा शक एक पल के लिए डगमगा गया।

"तुम सच में दुनिया के सबसे अजीब इंसान हो, कियान। मुफ़्त की लस्सी के लिए शहर के दूसरे कोने में आ गए।"

"यही तो मेरी ख़ासियत है। अच्छा, मैं चलता हूँ, बस छूट जाएगी। और सुन, किसी को लस्सी वाली बात मत बताना, वरना भीड़ लग जाएगी।"

कियान तेज़ी से निकल गया, दिल अब भी धड़क रहा था। और सान्या वहीं खड़ी रही, हँसती हुई, पर उसकी आँखों के पीछे कुछ ठंडा हो गया था।

"लस्सी। हाँ। पर तस्वीर वाले कूपन नहीं होते, कियान। तुम कुछ छिपा रहे हो। और मैं इस लस्सी वाली कहानी को कभी नहीं भूलूँगी।"

वो कहानी इतनी बेवक़ूफ़ थी कि उसने बचा लिया, पर इतनी बेवक़ूफ़ थी कि उसे भुलाया भी नहीं जा सकता था। सान्या ने उस पल को अपने दिमाग़ के एक कोने में रख दिया, आने वाले दिनों के लिए।

उधर उसी शाम, कॉलेज की छत पर, बेमौसम बारिश के बाद की एक साफ़, धुली हुई शाम थी। रामू चाचा की केतली से भाप उठ रही थी, और नीचे शहर की बत्तियाँ एक-एक कर जल रही थीं।

"लो, चाय। आज पढ़ाई नहीं। मैं थक गई हूँ तुम्हारे बहानों से लड़ते-लड़ते। आज बस... बैठते हैं।"

"बिना पढ़ाई के? मैडम, तबीयत तो ठीक है? कहीं आप बीमार तो नहीं?"

"चलिए, ये अच्छा है। बिना किताब वाली शाम। मैडम, आपको पता है, आप हँसती अच्छी हैं। पर हँसती कभी नहीं। हमेशा घड़ी देखती हैं, जैसे वक़्त आपसे कुछ छीनने वाला हो।"

"क्योंकि वक़्त सचमुच छीनता है, कियान। जब घर में हर महीने का हिसाब जोड़ना पड़े, तो घड़ी देखना आदत बन जाती है।"

"और मैं आपकी घड़ी की सबसे बड़ी अड़चन हूँ।"

"तुम्हें पढ़ाना ही एक बीमारी है, कियान। ख़ैर। मुझे एक बात बताओ, सच में। तुम इतने बुरे छात्र हो, तो कॉलेज में हो ही क्यों? तुम्हें तो पढ़ाई पसंद नहीं। फिर ये सब क्यों?"

कियान ने चाय का गिलास दोनों हाथों में लिया, उसकी गरमाहट महसूस की, और पहली बार उसकी आवाज़ में मज़ाक की परत पतली थी।

"क्योंकि मेरे पापा चाहते थे कि उनका बेटा कॉलेज जाए। वो ख़ुद एक मास्टर थे। कहते थे, बेटा, डिग्री हो न हो, कॉलेज की हवा में कुछ होता है। इंसान को इंसान बनाती है।"

"थे? मतलब..."

"कुछ साल पहले गुज़र गए। ख़ैर। तो मैं कॉलेज आता हूँ, हवा खाता हूँ, और सो जाता हूँ। पापा की एक इच्छा तो पूरी हो रही है, आधी सही।"

नित्या चुप हो गई। उसने वो हल्कापन देखा जिससे कियान अपने सबसे भारी दर्द को ढँकता था, और पहली बार उसे उस लड़के पर ग़ुस्सा नहीं, कुछ और आया।

"अरे, मूड ख़राब मत करो, मैडम। मैं भी तो सुनूँ, टॉपर बनने में क्या मिलता है? मुझे तो लगता है दिन-रात किताबें, कोई मज़ा नहीं। मैं तो कहता हूँ, थोड़ा फेल भी हो जाया करो, ज़िंदगी हल्की रहती है।"

"टॉपर बनने में क्या मिलता है? डर मिलता है, कियान। कि अगर एक बार फिसल गई, तो सब ख़त्म। तुम्हें फेल होने की आज़ादी है। मुझे टॉप करने की सज़ा।"

"वाह। ये तो मैंने ऐसे कभी सोचा नहीं। हम दोनों एक ही जेल में हैं, मैडम। बस मेरी सलाख़ों पर 'फेल' लिखा है, और आपकी पर 'फर्स्ट'।"

और उस एक पल में, चाय की भाप के बीच, दो अजनबी थोड़े कम अजनबी हुए। दोनों को लगा जैसे किसी ने पहली बार उनकी असली भाषा समझी हो।

"मेरे पापा भी नहीं हैं। जब मैं छोटी थी। तब से अम्मा ने अकेले पाला। इसीलिए ये स्कॉलरशिप... ये सिर्फ़ पैसा नहीं है मेरे लिए। ये अम्मा का चैन है।"

"और अगर मैं फेल हो गया, तो वो चैन छिन जाएगा।"

"हाँ।"

एक पल के लिए, कियान के चेहरे पर एक ऐसा भाव आया जो नित्या ने पहले नहीं देखा था, अपराधबोध। क्योंकि वो जानता था कि उसका फेल होना उसकी अपनी ज़रूरत थी, और वही ज़रूरत इस लड़की का चैन छीन रही थी।

तभी कियान का फ़ोन बजा। स्क्रीन पर एक तस्वीर, रोशनी, दाँत निपोरे, स्कूल की वर्दी में। कियान का पूरा चेहरा एक पल में बदल गया, नरम, चौड़ा।

"हाँ, बता। खाना खाया? ... होमवर्क? ... अच्छा, वो सवाल फिर से अटक गया? रुक, ऐसे कर। पहले छोटी संख्या को नीचे लिख..."

और यहीं, बात करते-करते, कियान भूल गया कि वो कौन बना बैठा है। उसने फ़ोन पर, चंद सेकंड में, एक ऐसा गणित का सवाल समझाया, इतनी सफ़ाई से, इतने सही तरीक़े से, कि नित्या का हाथ चाय के गिलास पर जम गया।

"...अब देख, दोनों को जोड़ेगी तो सत्रह आएगा, पर सवाल गुणा का है, तो जवाब बासठ होगा। हाँ! शाबाश। देखा, कितना आसान था।"

नित्या ने साँस रोक कर सुना। ये वो लड़का नहीं था जो 'दो और दो पाँच' कहता था। ये कोई और था। तेज़, साफ़, धैर्यवान, एक अच्छा शिक्षक। उसके अपने पापा जैसा।

फ़ोन कटा। और जब कियान ने पलट कर नित्या को देखा, तो उसे एहसास हुआ कि उसने अभी क्या कर दिया। उसकी आँखों में एक पल के लिए डर कौंधा।

"तुमने अभी वो सवाल... रोशनी को समझाया। बासठ। सही जवाब। बिना सोचे। जिस लड़के को ट्रेन की स्पीड नहीं पता, उसने अभी गुणा का सवाल फ़ोन पर हल कर दिया।"

"अरे नहीं, वो तो रोशनी ने पहले ही कर रखा था। मैं बस हाँ-हाँ कर रहा था। बच्चों को हौसला देना पड़ता है न। बासठ, तिरसठ, क्या फ़र्क पड़ता है।"

"तिरसठ नहीं, बासठ। और तुम्हें पता था। कियान, तुम अपनी बहन को छिप कर पढ़ाते हो, और मेरे सामने बुद्धू बनते हो। क्यों?"

दोनों की नज़रें मिलीं। छत पर हवा रुक गई। ये वो पल था जब कियान का पूरा राज़ एक धागे से लटक रहा था, और वो धागा नित्या की आँखों में था।

"मैडम, कुछ लोग रोशनी के लिए होते हैं, कुछ अँधेरे के लिए। मैं अँधेरे वाला हूँ। मुझ पर इतनी रोशनी मत डालो। मैं झुलस जाता हूँ।"

और उस एक लाइन में इतनी सच्चाई थी कि नित्या ने और नहीं पूछा। पर उसने ठान लिया। वो इस लड़के का राज़ जान कर रहेगी। चाहे कुछ भी हो।

पर जबकि छत पर एक दीवार पिघल रही थी, नीचे, कॉलेज के दफ़्तर में, एक और दीवार खड़ी की जा रही थी।

सान्या बेदी, सबसे मीठी मुस्कान के साथ, ट्रस्ट के एक अधिकारी के सामने बैठी थी, और अपनी चाल चल रही थी।

"सर, मैं बस चिंता में हूँ। नित्या मेरी दोस्त है। पर वो कियान जैसे डूबे हुए मामले पर अपनी पूरी मेहनत लगा रही है। और आप जानते हैं, कियान कभी नहीं सुधरेगा। पूरा कॉलेज जानता है। ट्रस्ट का पैसा यूँ बरबाद होते देखना... दुख होता है।"

अधिकारी ने सिर हिलाया। सान्या ने ज़हर को शहद में लपेट कर परोसा था, और वो असर कर रहा था।

"मैं बस कहना चाहती हूँ, सर, कि ट्रस्ट को एक साफ़ प्रगति रिपोर्ट माँगनी चाहिए। ठोस सबूत। अगर कियान सचमुच सुधर रहा है, तो नित्या इसे लिख कर दे। और अगर नहीं, तो शायद ये स्कॉलरशिप किसी ऐसे के पास जानी चाहिए जो इसे बरबाद न करे।"

सान्या को पता था कि वो क्या कर रही है। वो नित्या को एक कोने में धकेल रही थी। या तो वो कियान की झूठी तरक़्क़ी लिख कर दे और पकड़ी जाए, या सच लिखे कि कोई तरक़्क़ी नहीं, और स्कॉलरशिप खो दे।

और दफ़्तर से निकलते हुए, एक पल के लिए, सान्या की चाल धीमी हुई। उसने अपने फ़ोन में एक मैसेज देखा, घर से, पिताजी का, दुकान के किराए का।

"मुझे भी वो पैसा चाहिए, नित्या। तुम्हारी अम्मा है, तो मेरे भी घर वाले हैं। इसमें सिर्फ़ तुम मासूम नहीं हो। हम दोनों डूब रहे हैं। बस बचने की जगह एक है।"

वो कोई कार्टून जैसी खलनायक नहीं थी। वो बस एक और डरी हुई लड़की थी, जो उसी तख़्ते के लिए लड़ रही थी जिस पर नित्या खड़ी थी। और यही बात इसे और भी ख़तरनाक बनाती थी।

अगली सुबह, प्रोफ़ेसर सभरवाल ने नित्या को बुलाया। उनके चेहरे पर वो सख़्ती थी जिसके नीचे चिंता छिपी थी।

"नित्या, ट्रस्ट एक लिखित प्रगति रिपोर्ट माँग रहा है। तुम्हें दावा करना होगा कि कियान में कितना सुधार हुआ है, और उस पर दस्तख़त करने होंगे। ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। ये तुम्हारी साख है। अगर तुमने बढ़ा-चढ़ा कर लिखा और वो फ़ाइनल में फेल हुआ, तो डूबेगी तुम भी।"

नित्या के सामने अब वही जाल था जो सान्या ने बुना था। एक तरफ़ सच, कि कियान अभी भी 'दो और दो पाँच' कहता है। दूसरी तरफ़, वो पल जो उसने छत पर देखा था, बासठ, बिना सोचे।

और उसी पल, नित्या ने एक फ़ैसला लिया। एक जोखिम भरा, बेतुका, दिल से लिया गया फ़ैसला, जो एक टॉपर को कभी नहीं लेना चाहिए था।

"मैम, मैं लिखूँगी कि कियान में असल क्षमता है। ठोस, गहरी क्षमता। और मैं इस पर अपने दस्तख़त करूँगी। मैं अपनी साख कियान पर लगाती हूँ।"

"नित्या, सोच लो। तुमने अभी कहा था कि वो जागता तक नहीं। तुम अपना पूरा भविष्य एक ऐसे लड़के पर दाँव लगा रही हो जो..."

"जो दुनिया को कुछ और दिखाता है, मैम। पर मैंने उसका असली रूप देखा है। बस एक झलक। और वो झलक काफ़ी है। मैं ग़लत नहीं हूँ।"

"ठीक है, नित्या। पर याद रखना, जो दस्तख़त तुम कर रही हो, वो सिर्फ़ स्याही नहीं है। ये एक वादा है, कॉलेज से, ट्रस्ट से, और ख़ुद से। अगर ये टूटा, तो सिर्फ़ स्कॉलरशिप नहीं जाएगी। तुम्हारा नाम जाएगा। और नाम, एक बार गिर जाए, तो दोबारा खड़ा नहीं होता।"

नित्या को नहीं पता था कि 'गिरा हुआ नाम' इस पूरी कहानी का सबसे गहरा घाव था, और वो घाव उसी लड़के के सीने में दफ़्न था जिस पर वो अभी अपना नाम लिख रही थी।

और यहीं, इस एक फ़ैसले में, नित्या ने अनजाने में अपनी पूरी ज़िंदगी उस लड़के से बाँध ली, जो पूरी तरह झूठ से बना था।

उसने अपनी साख उस लड़के की क्षमता पर दाँव लगाई थी, ये जाने बिना कि वो क्षमता असली थी, पर वो क्षमता ही उसका सबसे बड़ा राज़ थी, और उस राज़ का खुलना, नित्या को भी उसी आग में जला देता।

नित्या ने कलम उठाई, और उस काग़ज़ पर दस्तख़त कर दिए। एक टॉपर ने अपना भविष्य एक बुद्धू पर लिख दिया। और उसे नहीं पता था कि वो बुद्धू, ठीक उसी वक़्त, एक मरे हुए लड़के के नाम पर अपनी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक पर्चा देने की तैयारी कर रहा था।

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