Chapter 24 of 25 12 min read
बिना नक़ाब
लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi
जंग जीत ली गई है और दोनों के बीच का हर झूठ मिट चुका है, तो अब वो प्यार, जिसे चौबीस कड़ियों से रोका जा रहा था, पहली बार खुले में, अपने आप, चुन लिया जाता है, कोमल, साफ़ और सच्चा। हॉस्टल में बंटी इस बात पर मचल उठता है कि उसका बग़ल वाला बेंच वाला दोस्त बारह साल तक देश का सबसे तेज़ दिमाग़ छुपाए बैठा रहा, छत की चाय पर पायल नित्या को छेड़ती है, और सुधरा हुआ मेरिट ट्रस्ट, नागपाल के ज़हरीले पैसे और उसकी ज़ालिम शर्त से आज़ाद हो कर, नित्या का वज़ीफ़ा उसकी मेहनत पर बहाल कर देता है और सान्या को भी एक ईमानदार सहारा देता है, यानी अब दोनों को ऊपर उठने की जगह मिल जाती है। उसी शाम, उसी पुरानी तिरपाल के नीचे, कि
मीनार वाली रात के अगले दिन, पूरे कॉलेज में एक ही कहानी थी। आख़िरी बेंच वाला बुद्धू, असल में देश का सबसे तेज़ दिमाग़ था। और इस भूचाल का केंद्र कहीं था, तो वो था लड़कों का हॉस्टल विंग, जहाँ बंटी सुबह से एक ही बात पर फट पड़ने को तैयार था।
"बारह साल! बारह साल से मैं तेरे बग़ल वाले बेंच पर बैठा हूँ, कियान! ... मैंने तुझे अपनी गणित की कॉपी दिखाई, अपने चिप्स बाँटे, अपने राज़ बताए! ... और तू पूरे देश का सबसे तेज़ दिमाग़ निकला, और मुझे, अपने सबसे अच्छे दोस्त को, नहीं बताया?!"
"बंटी, अगर मैं तुझे बता देता, तो तू पूरे हॉस्टल को बता देता।"
"बिलकुल बता देता! ढोल बजा कर बताता, मेस में अनाउंस करवाता! ... अच्छा एक बात बता। वो पिछले साल, तूने मेरा फ़िज़िक्स का पेपर देख कर कहा था, यार मुझे तो कुछ नहीं आता। ... वो झूठ था?"
"बंटी, उस पेपर में तूने न्यूटन का नाम 'न्यूटन सिंह' लिखा था। ... मैं सच में सोच रहा था कि इसे बचाऊँ कैसे। वो झूठ नहीं था, वो बेबसी थी।"
और पूरा विंग हँस पड़ा, और सबसे ज़ोर से बंटी हँसा। क्योंकि उस चोट खाए हुए ग़ुस्से के नीचे एक और बड़ी चीज़ थी। जिस लड़के का हॉस्टल बरसों मज़ाक उड़ाता रहा था, वो उन्हीं का था। और वो सब, बेहिसाब, उस पर फ़ख़्र कर रहे थे।
और अगले ही घंटे, आधे हॉस्टल ने दावा करना शुरू कर दिया कि उन्हें तो पहले से पता था। जो लड़के कल तक उसकी नक़ल उतारते थे, आज कह रहे थे कि उन्हें हमेशा से 'कुछ अजीब' लगता था इस लड़के में। और बंटी, जो सच में उसका सबसे पुराना दोस्त था, इस बेईमानी पर सबसे ज़्यादा जल रहा था।
"ऐ! कोई नहीं जानता था! सिर्फ़ मैं इसका सबसे अच्छा दोस्त हूँ! ... तुम सब बारह साल इसे 'लास्ट बेंच वाला बुद्धू' कहते रहे, और अब हीरो बनते हो? ... कियान, इनको बता, कि इसके चिप्स सिर्फ़ मैंने बाँटे थे, इन घड़ियालों ने नहीं!"
"और सुन। अब से तू जो भी करेगा, मैं तेरा पहला असिस्टेंट रहूँगा। ... देश का सबसे तेज़ दिमाग़, और उसका सबसे वफ़ादार बंटी। ... सोच ज़रा, कितना बड़ा नाम होगा अपना।"
पर उस हँसी के नीचे, कियान की जेब में वो मुहरबंद लिफ़ाफ़ा अब भी पड़ा था, किसी पत्थर की तरह भारी। देश के सबसे बड़े संस्थान की पेशकश। और उसके साथ बँधी वो शर्त, जो उसे रात भर सोने नहीं दे रही थी।
"तूने अभी तक जवाब नहीं दिया, कियान। ... देश का सबसे बड़ा संस्थान तुझे सीधे टॉप रैंक दे रहा है, बिना परीक्षा। ... जो तूने बरसों दूसरों के नाम पर चुरा-चुरा कर हासिल किया, वो आज कोई तुझे प्लेट में रख कर दे रहा है, तेरे अपने नाम के साथ। तू सोच भी क्यों रहा है?"
"इसीलिए सोच रहा हूँ, नित्या। ... क्योंकि जो चीज़ प्लेट में रख कर मिलती है, उसकी क़ीमत बाद में वसूली जाती है। ... वो मुझे रैंक नहीं दे रहे, वो मुझे ख़रीद रहे हैं। कल उनके हर पोस्टर पर मेरा चेहरा होगा, हर भाषण में मेरी कहानी। ... मैं बारह साल सिकंदर के हाथ की मोहरा रहा। मैं एक और मालिक के हाथ की मोहरा नहीं बनना चाहता, चाहे वो रोशनी में ही क्यों न हो।"
और नित्या समझ गई। ये वही ज़ख़्म था जिससे उसके पिता मरे थे, एक अच्छा आदमी, जिसे एक बड़ी मशीन ने इस्तेमाल किया और फेंक दिया। कियान अब अँधेरे से नहीं डरता था। वो रोशनी में ख़रीदे जाने से डरता था।
"तो तू ना कह देगा? ... कियान, ऐसा मौक़ा ज़िंदगी में एक बार आता है। जो तेरे पापा चाहते थे, कि उनके बेटे का नाम इज़्ज़त से लिया जाए, वो आज तेरे हाथ में है। ... इसे यूँ फेंक मत देना, ठीक से सोच।"
"मैं यही तो सोच रहा हूँ, नित्या, रात भर से। ... एक तरफ़ वो सब है जो मेरे पापा चाहते थे। और दूसरी तरफ़ एक डर, कि इज़्ज़त भी अपने आप में एक क़ैद बन सकती है। ... सच कहूँ? पहली बार, मेरे पास सही जवाब नहीं है। बारह साल हर सवाल का जवाब मुझे पता था। और आज, अपनी ही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सवाल, अनसुलझा है।"
उधर छत की चाय वाली तपरी पर, दुनिया आख़िरकार फिर से मामूली और ख़ूबसूरत थी। पायल ने दो कटिंग चाय रखीं और पूरी कहानी माँग ली, एक-एक बात, बिना कुछ छोड़े।
"तो सीधी बात बता, नित्या। ... जिस लड़के को तू 'मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सिरदर्द' कहती थी, वो असल में देश का सबसे बड़ा दिमाग़ है, हीरो है, और तेरे लिए हिरासत तक चला गया। ... और तू अब भी 'हम बस दोस्त हैं' वाला नाटक करेगी? मैं तेरी रूममेट हूँ, नित्या। तेरा तकिया मुझे सब बता देता है।"
"पायल, चुप कर! ... बात ट्यूशन की थी, वज़ीफ़े की थी। ... और मेरे तकिये को नौकरी से निकाल रही हूँ मैं।"
"अच्छा वज़ीफ़ा! हाँ वो बता। सुना है ट्रस्ट पूरा बदल गया?"
और यही वो एक चीज़ थी जो इस तूफ़ान ने धो कर साफ़ कर दी थी। नागपाल के जाते ही, उसका ज़हरीला पैसा और उसकी वो ज़ालिम शर्त भी उसके साथ चली गई थी। मेरिट ट्रस्ट अब नए, ईमानदार हाथों में था, और उसकी समिति में अब प्रोफ़ेसर सभरवाल भी बैठती थीं।
"क्लॉज़ ख़त्म, पायल। ... अब मेरी स्कॉलरशिप किसी लड़के को पास कराने पर नहीं टिकी। वो मेरी अपनी मेहनत पर टिकी है, जैसी शुरू से होनी चाहिए थी। ... कल माँ को बताया। वो फ़ोन पर देर तक रोती रही, पर इस बार डर से नहीं।"
और नए ट्रस्ट ने एक काम और किया। जिस लड़की की घर की मजबूरी ने उसे कभी नागपाल का हथियार बनाया था, उसी सान्या को अब उसका अपना, ईमानदार वज़ीफ़ा मिल गया। रनर-अप को अब टॉपर को गिरा कर अपना घर बचाना ज़रूरी नहीं रहा। पहली बार, दोनों के ऊपर उठने के लिए काफ़ी जगह थी।
"मैं... मैं बस शुक्रिया कहने आई थी। ... सभरवाल मैडम ने बताया कि ट्रस्ट में मेरे लिए तूने कहा था, नित्या। ... जिस लड़की ने तुझे गिराने की हर कोशिश की, तूने उसी के लिए हाथ बढ़ाया। ... मुझे आज तक समझ नहीं आया, तू ऐसी क्यों है।"
"क्योंकि तू और मैं कभी दुश्मन थीं ही नहीं, सान्या। ... हमें एक ही आदमी ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया था। अब वो आदमी गिर चुका है। ... अब हम बराबरी में लड़ेंगे, दुश्मनों की तरह नहीं, दो टॉपरों की तरह।"
"हे भगवान, ये कॉलेज है या कोई फ़िल्म। ... दुश्मन दोस्त बन रही हैं, बुद्धू टॉपर निकल रहे हैं। ... अगली बार किसी का कोई राज़ हो तो पहले मुझे बता देना, भाई। मेरा दिल कमज़ोर है, इतने ट्विस्ट नहीं झेल पाता।"
और उसी शाम, जब तपरी ख़ाली हो गई और आसमान नारंगी हो चला, कियान ने नित्या को उसी छत पर पाया, उसी तिरपाल के नीचे, जहाँ महीनों पहले एक अचानक हुई बारिश ने एक जंग को एक डिग्री नरम किया था।
"याद है, नित्या? इसी तिरपाल के नीचे। ... उस दिन मैं तुझसे बस एक इंच दूर आ कर पीछे हट गया था। ... क्योंकि उस दिन, तुझसे प्यार करना ही वो एक चीज़ थी जो तुझे ख़तरे में डाल सकती थी।"
"और आज?"
"आज कोई राज़ नहीं बचा, नित्या। न कोई फ़र्ज़ी नाम, न कोई छुपा हुआ कर्ज़, न कोई नागपाल। ... आज पहली बार, मेरे पास तुझसे कहने को कोई झूठ नहीं है। ... बस एक सच है। कि बारह साल मैंने ख़ुद को हर किसी से छुपाया, पर तुझसे छुपते-छुपते, मैं तुझी में कहीं मिल गया।"
"पता है, हमारी पहली मुलाक़ात में तू कॉमिक पर लार टपकाते हुए सो रहा था। ... मैंने सोचा था, ये है वो लड़का, जिसके लिए मैं अपनी पूरी मेहनत बरबाद करने वाली हूँ। ... और आज लगता है, शायद तू ही वो सबसे अच्छी चीज़ थी जो उस बेवक़ूफ़ क्लॉज़ ने मुझे दी।"
"तो मान लिया आख़िरकार, कि मैं तेरी सबसे अच्छी चाल था?"
"नहीं, कियान। तू मेरी सबसे अच्छी चाल नहीं था। ... तू मेरा सबसे मुश्किल सवाल था। ... और मैंने तुझे हल करने में पूरा एक साल लगा दिया।"
और इस बार न कोई बारिश बीच में आई, न किसी राज़ ने उसे पीछे खींचा, न किसी वादे ने रोका। इस बार, जो लड़का सारी ज़िंदगी एक क़दम पीछे हटता रहा था, एक क़दम आगे बढ़ा।
"तो अब पीछे मत हटना, कियान। ... बारह हफ़्ते मैंने एक बुद्धू को पढ़ाया, और असल में सीखा मैंने। ... कि दुनिया का सबसे तेज़ दिमाग़ भी, कभी-कभी, सबसे सीधी बात समझने में सबसे ज़्यादा वक़्त लगाता है।"
और वहाँ, एक नारंगी आसमान और एक पुरानी तिरपाल के नीचे, चौबीस कड़ियों का रोका हुआ प्यार आख़िरकार बह निकला। ये कोई चुराया हुआ पल नहीं था, न कोई राज़। ये दो लोग थे, खुले में, एक-दूसरे को चुनते हुए, अब कुछ भी छुपाने को बाक़ी न रखते हुए। जंग जीत ली गई थी। और आज, आख़िरकार, ये भी।
और जब वो पल गुज़रा, तो किसी ने शर्म से नज़र नहीं चुराई। नीचे तपरी वाला चचा चाय चढ़ा रहा था, दूर हॉस्टल में कोई पुराना गाना बज रहा था, और ऊपर उस छत पर, दो टॉपर, जो कभी एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे, चुपचाप एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे। बिना किसी क्लॉज़ के, बिना किसी शर्त के, पहली बार सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से।
कुछ देर बाद, नित्या का हाथ अपने हाथ में लिए, कियान ने वो लिफ़ाफ़ा एक बार फिर निकाला। और नित्या ने उसके चेहरे पर कुछ ठहरता देखा, वही शांति जो उसने कभी बुद्धू के मुखौटे के नीचे देखी थी, पर अब वो ठंडी नहीं थी। अब वो साफ़ थी।
"तूने फ़ैसला कर लिया, है ना?"
"हाँ। ... मैं उनकी पेशकश नहीं लूँगा, नित्या। ... न उनका दिया हुआ रैंक, न उनके पोस्टर का चेहरा। और ये शहर छोड़ कर भी नहीं जाऊँगा।"
"पर कियान, ये तो तेरा हक़ है। तूने ये कमाया है।"
"इसीलिए तो, नित्या। ... जो मेरा हक़ है, वो मैं किसी के रहम पर नहीं लूँगा। ... मैं वो परीक्षा दूँगा, पर खुले में, अपने ही नाम से। समर या रौनक बन कर नहीं, कियान बन कर। कोई मुझे रैंक बख़्शे नहीं, मैं उसे सबके सामने कमाऊँगा। ... और उससे पहले, दो साल, मैं इन बच्चों को पढ़ाऊँगा, इसी शहर में, अपने पापा की उसी छत पर।"
"और रोशनी?"
"रोशनी अब बस एक बच्ची रहेगी, नित्या। ... न किसी सूदखोर का डर, न किसी राज़ का बोझ। ... वो उसी छत पर बड़ी होगी, जहाँ पापा पढ़ाते थे। पर इस बार एक राज़ की तरह नहीं, एक छात्रा की तरह। खुले में, धूप में। ... जो बचपन मुझसे छिन गया था, वो मैं उसे लौटाऊँगा।"
और वहीं, आख़िरकार, कियान को अपने पिता का वादा टूटा हुआ नहीं, समझा हुआ महसूस हुआ। मास्टरजी ने कहा था, नाम वो नहीं जो लोग तुम्हें पुकारते हैं, नाम वो है जो तुम चुपचाप किसी और के लिए करते हो। कियान रोशनी में दिखने के लिए नहीं आ रहा था। वो रोशनी में कुछ बनाने आ रहा था, खुले में, जिसे कोई मशीन कभी ख़रीद न सके।
"बारह हफ़्ते पहले मुझसे कहा गया था, इस लड़के को किसी तरह पास करा दो। ... और आज ये लड़का पूरे शहर को पास करा रहा है। ... मैं तुझे पढ़ाने आई थी, कियान। और तूने मुझे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक़ पढ़ा दिया, कि सबसे तेज़ दिमाग़ वो नहीं जो सबसे ऊँचा उठे, वो है जो नीचे झुक कर किसी और को उठाए।"
"रुक रुक रुक! छत वाला स्कूल? पढ़ाना? ... मैंने कहा था न, मैं तेरा पहला असिस्टेंट! ... मैं बच्चों को हाज़िरी लगाना सिखाऊँगा, अनुशासन, और... और गणित तू पढ़ा देना। ... भाई, अपना तो नाम बन गया समझ। मास्टर कियान और असिस्टेंट बंटी!"
जिस लड़के ने पूरी ज़िंदगी नज़रों से छुपने में गुज़ारी थी, उसने आख़िरकार अपना रास्ता चुन लिया। न वो अँधेरा जिसमें वो बरसों छुपा रहा, न वो चौंधियाती रोशनी जो उसे बेच रही थी। अपनी अपनी रोशनी। अपनी शर्तों पर। किसी और की नहीं।
कियान ने एक पेन उठाया। और उस संस्थान की उस भव्य पेशकश के नीचे, उसने अपना जवाब लिखा, बस एक लाइन। एक ऐसी लाइन, जो आने वाले नतीजों के दिन, सब कुछ तय कर देगी, कि आख़िरी बेंच वाला लड़का, अपने ही नाम से, इस बार कहाँ खड़ा होता है।
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