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अध्याय 18 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

आख़िरी परीक्षा

लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi

फ़ाइनल से पहले वाली रात। छत पर वही चाय की तपरी, वही ठंडी होती चाय, पर आज चाय किसी को याद नहीं थी। तीन सिर एक फटे हुए काग़ज़ पर झुके थे, जिस पर नित्या ने अपनी टॉपर वाली सफ़ाई से एक नक़्शा बनाया था। एक शीशे की मीनार का नक़्शा। नागपाल क्लासेज़ का मुख्यालय।

"मतलब हम सच में डाका डालने जा रहे हैं! अपुन ने सोचा था ज़िंदगी में एक बार तो कोई फ़िल्म वाला सीन आएगा! ... बोल भाई, मास्क कौन सा पहनूँगा मैं, लाल वाला या काला? रुक, अंदर सीसीटीवी तो नहीं होगा न? मेरी शक्ल आ गई तो अम्मा घर से निकाल देगी।"

"बंटी, ये डाका नहीं है। हम कुछ चुराने नहीं जा रहे। ... हम सिर्फ़ वो एक चीज़ वापस ले रहे हैं जो शुरू से कियान के पापा की थी। उनका नाम। ... नागपाल की तिजोरी में बारह साल पुरानी एक फ़ाइल बंद है, जो साबित करती है कि पेपर लीक कियान के पापा ने नहीं, ख़ुद नागपाल ने कराया था। बस वो फ़ाइल। और कुछ नहीं।"

"और वो फ़ाइल उसके अपने दफ़्तर में है, सबसे ऊँची मंज़िल पर। मैं उस इमारत को जानता हूँ, बंटी। मैंने वहाँ काम किया है। हर कैमरा कहाँ है, कौन सा गार्ड कब चाय पीने जाता है, कौन सी सीढ़ी पर कैमरा नहीं है, सब मेरे दिमाग़ में है। ... दिक़्क़त इमारत नहीं है। दिक़्क़त वक़्त है।"

और यहीं पूरी बात की जान थी। कल फ़ाइनल का पहला पर्चा था। पूरा कॉलेज इम्तिहान के कमरे में बंद होगा। और ठीक उसी दोपहर, नागपाल कॉलेज आ रहा था, ट्रस्ट के ऑडिट के लिए, नित्या की स्कॉलरशिप की समीक्षा करने। मतलब उस एक दोपहर, सिर्फ़ उस एक दोपहर, शीशे की मीनार का सबसे ऊँचा कमरा ख़ाली होगा।

"नागपाल जितनी देर कॉलेज में रहेगा, उतनी देर उसका दफ़्तर मेरा है। मुझे बस अंदर जाना है, फ़ाइल उठानी है, और निकल जाना है। पैंतालीस मिनट। इससे एक मिनट ज़्यादा, और सब ख़त्म।"

"तो हिसाब ये है। कियान मीनार में। मैं कॉलेज में, फ़ोन पर, नागपाल की हर हरकत पर नज़र रखते हुए। जिस पल वो कॉलेज से निकलने को हो, मैं कियान को इशारा कर दूँगी। ... और बंटी।"

"बोल मैडम! अपुन तैयार है! जान हाज़िर है, सिर्फ़ मास्क का रंग बता दे!"

"मास्क नहीं चाहिए, बंटी। तुम्हारा काम सबसे मुश्किल है। तुम्हें नागपाल को कॉलेज में रोके रखना है। जितनी देर तुम उसे बातों में उलझाए रखोगे, उतनी देर कियान को मिलेगी।"

"बस इतना सा? ये तो अपुन बाएँ हाथ का... रुक। नागपाल? वो शेर जैसा आदमी? उससे बातें? ... मैडम, मेरी तो उसके सामने आवाज़ ही नहीं निकलेगी! मैं उसे रोकूँगा कैसे, उसके पैर पकड़ूँगा क्या?"

"बंटी, जो लड़का मेस के चुनाव में तीन घंटे बिना रुके भाषण दे सकता है, वो एक बूढ़े आदमी को दस मिनट नहीं रोक सकता? ... उससे उसी की कोचिंग के बारे में पूछ। उसकी तारीफ़ कर। ऐसे आदमी को रोकना हो तो बस उसे उसी की महानता सुनाओ। वो घंटों नहीं हिलेगा।"

बंटी हँसा, पर हँसी के पीछे सबको पता था कि ये मज़ाक नहीं था। एक ग़लती, और कियान बारह साल की क़ैद के आख़िरी दिन पकड़ा जाता। नागपाल के हाथ में वो सबूत आ जाता जिससे वो कियान को उसके पापा की तरह ही चोर साबित कर देता। बंटी सीढ़ियाँ उतर गया, कल की तैयारी करने। और छत पर सिर्फ़ दो लोग रह गए।

"कियान... एक बात पूछूँ? सच बताओगे? ... अगर कल कुछ ग़लत हुआ, अगर वो तुम्हें अंदर पकड़ लें, तो तुम अकेले फँसोगे। मैं बाहर बैठी फ़ोन पर रहूँगी, और तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाऊँगी। ... मुझे ये मंज़ूर नहीं है।"

"नित्या, बारह साल से मैं हर काम अकेले करता आया हूँ। हर इम्तिहान, हर झूठ, हर रात। मुझे आदत है अकेले फँसने की। ... डर मुझे अपने पकड़े जाने का नहीं है। डर मुझे इस बात का है कि इस बार, पहली बार, तुम भी मेरे साथ फँसी हुई हो।"

नित्या ने कुछ नहीं कहा। बस उसके पास आ कर बैठ गई, इतने पास कि दोनों के कंधे छू रहे थे। नीचे शहर की बत्तियाँ काँप रही थीं। और ऊपर, बहुत दूर, वो शीशे की मीनार अपनी ठंडी नीली रौशनी में खड़ी थी, कल की लड़ाई का मैदान।

"बारह हफ़्ते पहले मैं तुम्हें कान पकड़ कर इसी छत पर घसीट लाई थी। पूरे कॉलेज का सबसे नाकारा लड़का। मेरी स्कॉलरशिप की सज़ा। ... और आज मैं यहाँ बैठी हूँ, और सोच रही हूँ कि तुम्हारे बिना कल का सूरज कैसे निकलेगा। ... ये कब हुआ, कियान? मुझे तो पता ही नहीं चला।"

"शायद उसी दिन, जब तुमने पूरे दस्ते के अफ़सर के सामने कहा था कि मैं रोल नंबर दो बार ग़लत लिखता हूँ। ... दुनिया में हर कोई मुझे बुद्धू समझता था और मैं ख़ुश था। पर जिस दिन तुमने मेरी आँखों में देख कर कहा कि तुम बुद्धू नहीं हो, कियान, मैं जानती हूँ, उस दिन मेरा सबसे पुराना ताला टूट गया।"

और उस छत पर, ठंडी हवा में, कियान ने अपना हाथ बढ़ाया और नित्या का हाथ थाम लिया, बहुत हौले से, जैसे कोई क़ीमती चीज़ थामता है जिसके टूटने का डर हो। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। कोई जल्दी नहीं, कोई और क़दम नहीं। बस दो माथे, एक-दूसरे से एक इंच दूर, और उस एक इंच में पूरी दुनिया की गर्माहट।

"कल जो भी हो, कियान। ... हम साथ हैं। आख़िर तक। अगर तुम फँसे, तो मैं भी फँसूँगी। अगर तुम गिरे, तो मैं तुम्हें अकेले गिरने नहीं दूँगी। ... ये मेरा वादा है। और मैं टॉपर हूँ, कियान। मैं वादे नहीं तोड़ती।"

"बारह साल से मैंने हर किसी से एक ही चीज़ छुपाई, नित्या। कि मैं कौन हूँ। ... तुम अकेली हो जिसके सामने मैं वही लड़का हूँ, जो सच में हूँ। और अब मैं वो कभी नहीं छुपाऊँगा। ... कल हम उस मीनार से एक फ़ाइल नहीं निकालेंगे। हम एक नाम वापस लाएँगे। मेरे पापा का नाम।"

अगली दोपहर। फ़ाइनल का पहला दिन। कॉलेज का बड़ा हॉल छात्रों से भरा था, पंखे घूम रहे थे, पर्चे बँट रहे थे, और हवा में वो पुराना डर तैर रहा था जो हर इम्तिहान के कमरे में होता है। और ठीक साढ़े बारह बजे, एक काली गाड़ी कॉलेज के गेट पर रुकी। यशपाल नागपाल उतरा, हीरे की कफ़लिंक, ठंडी मुस्कान, और वो चाल जो कहती थी कि ये शहर उसका है।

"नागपाल सर! नागपाल सर! एक मिनट, सर! ... मैं आपका सबसे बड़ा फ़ैन हूँ, सच्ची कसम! सर, आपकी कोचिंग के बारे में बस एक बात पूछनी थी, बहुत ज़रूरी! ... सर, आप इतने महान कैसे बने? मतलब बचपन से ही, या धीरे-धीरे? ज़रा शुरू से बताइए न, पूरा!"

नागपाल रुक गया। और जैसा कियान ने कहा था, एक घमंडी आदमी की सबसे कमज़ोर जगह उसकी अपनी तारीफ़ होती है। नागपाल के होंठों पर एक पतली मुस्कान आई, और उसने बोलना शुरू किया, अपनी महानता की कहानी, एक बूढ़े शेर की तरह जिसे अपनी ही दहाड़ से प्यार है। और बंटी सिर हिलाता रहा, वाह-वाह करता रहा, दिल ही दिल में हर पल गिनता रहा।

"और सर, ये बताइए, आप सुबह उठ कर सबसे पहले क्या सोचते हैं? ... नहीं-नहीं, रुकिए, उससे भी पहले, आपका नाश्ता क्या होता है? क्योंकि सर, इतने महान आदमी का नाश्ता भी तो महान होता होगा न! ... अरे सर, कहाँ चले, अभी तो आपकी कहानी शुरू ही हुई है! एक सेल्फ़ी, बस एक सेल्फ़ी सर, मेरी पूरी ज़िंदगी बन जाएगी!"

उसी वक़्त, शहर के दूसरे कोने में, कियान शीशे की मीनार की एक बग़ल वाली सीढ़ी से ऊपर चढ़ रहा था। स्टाफ़ की वर्दी, गले में एक पुराना पास जो उसने अपने रैकेट वाले दिनों से सँभाल रखा था, और चेहरे पर वही ख़ाली, नींद भरी बुद्धू वाली मुस्कान, ताकि कोई उसे दूसरी बार न देखे।

सातवीं मंज़िल पर, कियान का अंदाज़ा एक पल को डगमगाया। गार्ड चाय पर नहीं गया था। वो ठीक सीढ़ी के मोड़ पर खड़ा था, फ़ोन पर किसी से बतिया रहा था। कियान एक पल को जम गया। फिर उसने वही किया जो वो सबसे अच्छा करता था, एक ऊँघते, रास्ता भटके सफ़ाई कर्मचारी की तरह, गुनगुनाता हुआ, गार्ड के सामने से यूँ निकल गया कि गार्ड ने उसे दूसरी बार देखा तक नहीं। बुद्धू होने का सबसे बड़ा फ़ायदा यही था, कोई तुम्हें याद नहीं रखता।

"तीसरी मंज़िल का कैमरा बाईं तरफ़ झुका है। ... सातवीं पर गार्ड अभी चाय पर गया होगा। ... दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं। ... सबसे ऊपर। नागपाल का कमरा। बस पैंतालीस मिनट, कियान। न एक कम, न एक ज़्यादा।"

"कियान, सुन रहे हो? नागपाल अभी गेट पर ही है, बंटी ने उसे पकड़ रखा है। ... भगवान जाने वो बेचारा क्या-क्या बोल रहा है, पर नागपाल हिल नहीं रहा। तुम्हारे पास वक़्त है, जाओ। ... और कियान? ... साँस लेते रहना।"

कियान सबसे ऊपर पहुँचा। एक चौड़ा, ख़ामोश कमरा, एक तरफ़ पूरी शीशे की दीवार जिसके पार पूरा शहर बिछा हुआ था। और सामने की दीवार पर, नागपाल की एक बड़ी सी तस्वीर, जिसमें वो किसी मंत्री से हाथ मिला रहा था। और उसी तस्वीर के पीछे, कियान जानता था, तिजोरी थी।

"बारह साल से तू मेरे पापा का नाम अपने सीने से लगाए बैठा है, नागपाल। ... अपनी ही तस्वीर के पीछे। कितनी अच्छी जगह चुनी है तूने अपनी चोरी छुपाने के लिए।"

उसने तस्वीर हटाई। तिजोरी। एक नंबर वाला ताला। और यहीं कियान का असली दिमाग़ जागा। उसने सोचा, नागपाल जैसा घमंडी आदमी कौन सा नंबर रखेगा, जो उसे कभी न भूले? कोई तारीख़, जो उसके लिए सबसे बड़ी जीत की थी। और कियान के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो गई, क्योंकि उसे वो तारीख़ पता थी। वो तारीख़, जिस दिन उसके पापा को चोर ठहराया गया था।

"तूने जिस दिन मेरे पापा को गिराया, उसी दिन को तूने अपनी सबसे बड़ी जीत बना कर, अपनी तिजोरी का ताला बना लिया। ... ठीक है, नागपाल। आज वही तारीख़ तेरा ताला खोलेगी।"

और ताला खुल गया। एक हल्की सी क्लिक, जो उस ख़ामोश कमरे में किसी घंटी की तरह गूँजी। कियान ने तिजोरी खोली। अंदर काग़ज़ थे, फ़ाइलें, नक़दी की गड्डियाँ। और उन सबके नीचे, एक पुरानी, पीली फ़ाइल, जिस पर एक नाम लिखा था, वो नाम जिसे बारह साल पहले एक चोर का नाम बना दिया गया था। देवनाथ।

"मिल गई। ... पापा, मिल गई। ... बारह साल। और आज, आपका नाम मेरे हाथ में है। वो झूठ, जो आपको चोर कहता था, आज इसी हाथ से मैं उसे जला दूँगा।"

"कियान! ... कियान, सुनो! नागपाल अचानक मुड़ गया है! बंटी की बात बीच में छोड़ कर! वो गाड़ी की तरफ़ जा रहा है, बहुत तेज़! ... कियान, वो हँस रहा है! उसे किस बात पर हँसी आ रही है? निकलो वहाँ से, अभी!"

और ठीक उसी पल, कियान के हाथ फ़ाइल पर जमे ही थे कि पूरा कमरा जाग उठा। शीशे वाली पूरी दीवार अचानक एक बड़ी स्क्रीन में बदल गई। कमरे की हर बत्ती एक साथ जल उठी। और उस विशाल स्क्रीन पर एक चेहरा उभरा, ठंडा, मुस्कुराता, नागपाल का चेहरा, जो कॉलेज के गेट पर खड़ा, सीधे कैमरे में देख रहा था।

"देवनाथ का बेटा। ... आख़िरकार। ... बारह साल से मैं इस एक पल का इंतज़ार कर रहा था, बेटे। और तूने मुझे निराश नहीं किया। ठीक उसी तिजोरी तक पहुँचा, ठीक उसी फ़ाइल तक। ... तुझे क्या लगा, वो तारीख़ मैंने भूल कर ताला बनाया था? ... नहीं, बेटे। वो तारीख़ मैंने ख़ास तेरे लिए रखी थी। एक चारा। और तू, मछली की तरह, सीधे उसमें आ गया।"

"तूने मुझे यहाँ आने दिया। ... तूने ये सब जान-बूझ कर होने दिया।"

"बिलकुल। हर कैमरा चल रहा है, बेटे। हर पल रिकॉर्ड हो रहा है। एक लड़का, जिसका चेहरा पहले से नक़ल-विरोधी दस्ते की तस्वीर से मिलता है, चोरी छुपे मेरे दफ़्तर में, मेरी तिजोरी खोलते हुए। ... अब मुझे तुझे चोर साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है। ... तूने ख़ुद, अपने ही हाथों से, वो काम कर दिया।"

नीचे, सीढ़ियों पर भारी क़दमों की आवाज़ गूँजी। दरवाज़े खुले। नागपाल के आदमी, चार, पाँच, अंदर घुस आए। कियान ने फ़ाइल सीने से चिपका ली, पर एक हाथ ने उसे झटके से खींच लिया। बारह साल की जिस एक चीज़ के लिए वो यहाँ आया था, वो एक पल में उसकी मुट्ठी से फिसल गई।

"फ़ाइल भी मेरी, और अब तू भी मेरा, देवनाथ के बेटे। ... तेरे बाप को गिराने में मुझे महीनों लगे थे। तुझे गिराने में मुझे सिर्फ़ तेरा अपना लालच लगा। ... कल सुबह तक पूरा शहर जान जाएगा कि लास्ट बेंच वाला असल में एक नक़लची चोर है। बिलकुल अपने बाप की तरह।"

और स्क्रीन बुझ गई। कियान के हाथ ख़ाली थे, कलाई पर एक अजनबी की पकड़, और सीने में वो नाम, जो एक पल पहले उसके हाथ में था और अब फिर से नागपाल की तिजोरी की तरफ़ लौट रहा था। पैंतालीस मिनट की योजना, बारह साल की तैयारी, एक पल में राख। और दूर कॉलेज के गेट पर, फ़ोन कान से लगाए, नित्या ने सुना कि लाइन कट गई, और उसके हाथ से फ़ोन छूट कर गिर पड़ा।

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