Chapter 1 of 25 11 min read
आख़िरी बेंच
लास्ट बेंच वाला by Avni Oberoi
देश की सबसे कड़ी एंट्रेंस के किलेनुमा सेंटर में एक शांत लड़का पूरा पर्चा चीर कर रख देता है, बाहर निकल कर किसी और के नाम वाला एडमिट कार्ड फाड़ता है, और सिकंदर से मोटा लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लेता है। वही लड़का कॉलेज का मशहूर 'लास्ट बेंच वाला' कियान है। उसी दिन टॉपर नित्या को उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका मिलता है, और जैसे ही वो ठान कर निकलती है, कियान के फ़ोन पर सिकंदर का पैग़ाम आता है।
कुछ कमरे लोगों को अंदर लाने के लिए नहीं बनते। कुछ कमरे लोगों को बाहर रखने के लिए बनते हैं।
शहर के किनारे, काँटेदार तारों से घिरा वो सेंटर एक किले जैसा था। लोहे के दो गेट, बायोमेट्रिक मशीनें, हर कोने पर कैमरा, और छाती पर बंदूक टाँगे गार्ड। अंदर, तीन सौ छात्र देश की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षा के आगे झुके बैठे थे। पसीना, काँपती उँगलियाँ, और वो पर्चा, जिसके एक रैंक पर पूरी ज़िंदगी टिकी होती है।
और उन तीन सौ के बीच, आख़िरी कतार में, एक लड़का कुर्सी पर पीठ टिकाए, पेन घुमाता, ऐसे बैठा था जैसे किसी चाय की दुकान पर बैठा हो। घड़ी में अभी दो घंटे बाक़ी थे। उसका पर्चा कब का पूरा हो चुका था।
"सवाल सत्ताईस में छपाई की ग़लती है। जवाब फिर भी वही रहेगा।"
उसने ये किसी से नहीं कहा। बस हवा से कहा। पर आगे बैठे एक घबराए हुए लड़के के कान खड़े हो गए। इनविजिलेटर पास आया, उसकी शीट पर एक सरसरी नज़र डाली, और आगे बढ़ गया। उसे लगा लड़के ने बस दो-चार सवाल किए हैं और बाक़ी छोड़ दिया है, जैसे हर कमज़ोर छात्र करता है।
उस शीट पर हर जवाब सही था। हर एक।
लड़के ने आख़िरी आधे घंटे में एक भी सवाल नहीं देखा। उसने बस अपनी घड़ी देखी, फिर छत देखी, और मन ही मन गिनती की, कि इस पर्चे के पैसे में रोशनी की स्कूल फ़ीस के कितने महीने निकल आएँगे। चार महीने। उसने हिसाब लगाया। और पहली बार, उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई।
घंटी बजी। उसने सबसे पहले शीट जमा की। बाहर निकलते हुए बायोमेट्रिक मशीन ने उसके अंगूठे को पढ़ा, और स्क्रीन पर एक नाम चमका। नाम था, समीर जोशी। ये उसका नाम नहीं था।
गेट के बाहर, धूप में, एक चमकती काली गाड़ी खड़ी थी। उसके बोनट से टिका, धूप का चश्मा लगाए, पान चबाता एक आदमी मुस्कुरा रहा था। सिकंदर भाई।
"आ गया मेरा शेर! बोल, कैसा रहा पर्चा? रुला दिया न बाक़ी बच्चों को?"
"पर्चा आसान था, भाई। सवाल सत्ताईस ग़लत छपा था। बाक़ी में कोई दम नहीं।"
"सुनो इसको! देश के लाखों बच्चे इस पर्चे के नाम से बिस्तर गीला कर देते हैं, और ये कहता है कोई दम नहीं।"
लड़के ने जेब से एक एडमिट कार्ड निकाला। उस पर तस्वीर उसकी थी, नाम समीर जोशी का। उसने उसे दोनों हाथों से आराम से फाड़ा, एक बार, दो बार, चार टुकड़े, और हवा में उड़ा दिया।
"अरे! इतनी मेहनत से बनवाया था वो कार्ड। सत्तर हज़ार का सेटिंग था उसमें।"
"जो नाम मेरा नहीं, उसे जेब में नहीं रखता, भाई। काम ख़त्म, नाम ख़त्म।"
सिकंदर ने एक पल उसे देखा, फिर शर्ट की जेब से एक मोटा लिफ़ाफ़ा निकाला और उसके हाथ में रख दिया।
"पूरा, गिन ले। और एक बात, तेरे जैसा दिमाग़ मैंने आज तक नहीं देखा। तू चाहे तो अपने नाम से बैठ, टॉप कर, अख़बार में छप। ये चोरी-छिपे क्यों?"
"क्योंकि मेरे नाम की क़ीमत अख़बार में छपने से कहीं ज़्यादा है, भाई। और वो नाम बिकाऊ नहीं है।"
सिकंदर हँसा, पर उसकी आँखें नहीं हँसीं। उसने लड़के की पीठ थपथपाई।
"ठीक है, कलाकार। पर एक बड़ा काम आ रहा है। साल का सबसे बड़ा। उसके लिए तैयार रहना। मना करने का सोचना भी मत।"
लड़के ने लिफ़ाफ़ा जेब में डाला, बस को हाथ दिया, और भीड़ में गुम हो गया। न किसी को उसका नाम पता था, न ये कि अभी-अभी देश का सबसे तेज़ दिमाग़ इस बस स्टॉप से गुज़रा है।
अब उसी लड़के को याद रखिए। क्योंकि तीन घंटे बाद, शहर के दूसरे कोने में, सरस्वती कॉलेज की एक क्लास में, यही लड़का पूरे कॉलेज का सबसे नाकारा, सबसे नाकाम, सबसे मशहूर बुद्धू था। लास्ट बेंच वाला कियान। जो क्लास में सोता है, जवाब गोल कर देता है, और हर इम्तिहान में सबसे नीचे आता है।
पर उस दोपहर, कॉलेज के दूसरे सिरे पर, एक और कहानी अपने सबसे बुरे मोड़ पर खड़ी थी।
नित्या सक्सेना। इस साल की टॉपर। वो लड़की जिसकी नोटबुक इतनी साफ़ थी कि जूनियर उसकी फ़ोटो खींच कर पढ़ते थे। मेरिट स्कॉलरशिप उसकी थी, और वो स्कॉलरशिप उसकी पूरी दुनिया थी।
डिपार्टमेंट हेड प्रोफ़ेसर सभरवाल के दफ़्तर में, नित्या एक काग़ज़ हाथ में लिए खड़ी थी, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।
"मैम, ये... ये मज़ाक है क्या? स्कॉलरशिप रिन्यू करने की शर्त ये है? मैं टॉपर हूँ। मेरे नंबर देखिए।"
"नंबर मैंने देखे हैं, नित्या। इसीलिए तुम्हें चुना गया है। ट्रस्ट का नया नियम है। हर स्कॉलरशिप वाले को एक मेंटरशिप निभानी होगी। और तुम्हें जो छात्र सौंपा गया है, वो साल का सबसे कमज़ोर छात्र है।"
"कौन सा छात्र?"
"कियान। सेकंड ईयर। तुमने नाम तो सुना ही होगा।"
पूरे कॉलेज ने कियान का नाम सुना था, जैसे कोई किसी क़ुदरती आफ़त का नाम सुनता है। नित्या की आँखें फैल गईं।
"लास्ट बेंच वाला कियान? मैम, वो लड़का जागता नहीं है, पास कैसे करूँगी? उसे तो अपना रोल नंबर याद नहीं रहता।"
"शर्त साफ़ है। साल के आख़िर तक, फ़ाइनल में, कियान को पास लाइन के ऊपर लाना है। अगर वो पास हुआ, तुम्हारी स्कॉलरशिप बनी रहेगी।"
"और अगर नहीं हुआ?"
"तो स्कॉलरशिप रनर-अप को चली जाएगी। सान्या बेदी को।"
कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रह गई। नित्या को अपने कानों में अपने ही दिल की धड़कन सुनाई देने लगी।
"मैं जानती हूँ ये मुश्किल है। पर ये फ़ैसला ट्रस्ट का है, मेरा नहीं। और ट्रस्ट का पैसा जिसका है, नियम भी उसी के हैं।"
"जी, मैम।"
नित्या दफ़्तर से बाहर निकली, और सीधी दीवार से टिक कर खड़ी हो गई। हाथ काँप रहे थे। उसने काग़ज़ को इतनी ज़ोर से पकड़ा हुआ था कि उँगलियों के निशान पड़ गए थे। फिर उसने वो किया जो वो हर मुश्किल में करती थी। उसने फ़ोन निकाला और घर का नंबर मिलाया।
"हैलो? नित्या बेटा? इस वक़्त फ़ोन? सब ठीक तो है? तेरी आवाज़ भारी क्यों है?"
"कुछ नहीं, अम्मा। बस थकान है। आप बताओ, दवाई ले ली? डॉक्टर ने जो शुगर वाली गोली लिखी थी, वो लाई कि नहीं?"
"ले लूँगी, बेटा। अभी महीने का ख़र्चा थोड़ा ऊपर-नीचे है। अगली स्कॉलरशिप आ जाए, तो ले आऊँगी।"
और उसी एक लाइन में नित्या को वो सब कुछ मिल गया जिसका उसे डर था। स्कॉलरशिप सिर्फ़ उसकी फ़ीस नहीं थी। वो अम्मा की दवाई थी। वो घर का किराया था। वो हर महीने की साँस थी।
"अम्मा, आप दवाई कल ही लाना। पैसे की चिंता मत करो। स्कॉलरशिप... स्कॉलरशिप पक्की है। मैं टॉपर हूँ न? आपकी बेटी कभी पीछे रही है?"
"नहीं रे। मेरी बेटी सूरज है। तेरे पापा होते तो कितना ख़ुश होते।"
फ़ोन कटा। नित्या ने आँखें बंद कीं, एक लंबी साँस ली, और जब आँखें खोलीं, तो उनमें डर की जगह लोहा था।
"ठीक है, कियान। तू सो, तू गोल कर, तू जो चाहे कर। पर इस साल तुझे पास होना पड़ेगा। मेरी अम्मा की दवाई तेरे इम्तिहान पर टिकी है।"
अब उसे बस एक काम करना था। अपने नए 'शागिर्द' से मिलना। और वो पहली मुलाक़ात, इतिहास में सबसे बुरी पहली मुलाक़ातों में से एक थी।
दोपहर की सुनसान क्लास। सेकंड ईयर का कमरा। और सबसे पीछे, आख़िरी बेंच पर, एक कॉमिक्स की किताब चेहरे पर रखे, मुँह से लार टपकाता, ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे लेता, कियान सो रहा था।
"ये... ये सो रहा है? दोपहर के तीन बजे? क्लास के बीचों-बीच?"
नित्या ने पास जा कर हलके से मेज़ ठकठकाई। कोई हरकत नहीं। उसने थोड़ा ज़ोर से खाँसा। खर्राटा और गहरा हो गया।
"कियान! उठो!"
कियान हड़बड़ा कर उठा, कॉमिक्स ज़मीन पर गिरी, और उसने आधी नींद में इधर-उधर देखा, जैसे उसे समझ ही न आ रहा हो कि वो किस सदी में है।
"हाँ जी? पर्चा ख़त्म? इतनी जल्दी? मैंने तो अभी नाम ही लिखा था।"
"कोई पर्चा नहीं है। मैं नित्या हूँ। नित्या सक्सेना। और अब से, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगी।"
"पढ़ाओगी? मुझे? किसने बोला? मैंने तो शिकायत नहीं की किसी से।"
"कॉलेज ने बोला। तुम्हें पास होना है, इस साल, फ़ाइनल में। और मुझे तुम्हें पास कराना है।"
कियान ने एक लंबी जम्हाई ली, कुर्सी पर आराम से पीठ टिकाई, और उसे ऐसे देखा जैसे उसे कोई मज़ेदार सी बात बता दी गई हो।
"मैडम, एक राज़ की बात बताऊँ? मुझे पास होना पसंद नहीं। पास होते ही उम्मीदें शुरू हो जाती हैं। और उम्मीदें... बहुत भारी होती हैं।"
"तुम्हें फेल होना पसंद है?"
"पसंद-वसंद कुछ नहीं। बस आदत है। और आदत तो टॉपर लोगों की भी नहीं छूटती, है न?"
नित्या ने बैग से एक मोटी सी किताब निकाली और मेज़ पर पटकी। धमाके की आवाज़ पूरी क्लास में गूँजी।
"चलो। पहला सवाल। दो और दो कितने होते हैं? बेसिक से शुरू करते हैं।"
अब ये सवाल एक ऐसे लड़के से पूछा गया था जो अभी तीन घंटे पहले देश का सबसे कठिन गणित का पर्चा दो घंटे पहले ख़त्म कर आया था।
"दो... और दो... रुकिए... ये तो कठिन है, मैडम। पाँच?"
"पाँच?! दो और दो पाँच होते हैं?!"
"अच्छा, चार? देखिए, मैं आस-पास तो हूँ। ये भी तो एक बात है।"
और एक पल के लिए, जब नित्या ने ग़ुस्से में सिर घुमाया, कियान की नज़र किताब के उस पन्ने पर पड़ी जो उसने खोला था, और उसकी उँगली अपने आप एक ग़लत छपे समीकरण पर ठहर गई। उसने कुछ नहीं कहा। बस उँगली हटा ली। पर वो एक पल था, जिसमें बुद्धू का मुखौटा एक मिलीमीटर सरका था। नित्या ने नहीं देखा। किसी ने नहीं देखा।
"तुम्हें अंदाज़ा भी है कि मेरे लिए ये कितना ज़रूरी है? मेरी पूरी ज़िंदगी इस पर टिकी है, और तुम मज़ाक कर रहे हो!"
"ज़िंदगी इतनी सस्ती चीज़ों पर नहीं टिकनी चाहिए, मैडम। जैसे मेरे नंबरों पर।"
नित्या रुकी। उस एक लाइन में कुछ था, कुछ जो एक बुद्धू के मुँह से नहीं निकलना चाहिए था। पर उसने उसे थकान समझ कर छोड़ दिया।
"ठीक है। तुम आज जीत गए। पर सुन लो, कियान। मैं हार मानने वालों में से नहीं हूँ।"
उसने किताब उठाई, बैग कंधे पर डाला, और दरवाज़े पर पहुँच कर मुड़ी। उसकी आवाज़ अब मज़ाक में नहीं थी। उसमें एक क़सम थी।
"तुम चाहे जितना सो लो, जितना बहाने बना लो। मैं तुम्हें पास कराऊँगी, कियान। कुछ भी हो जाए। मैं तुम्हारी हर हरकत पर नज़र रखूँगी, हर पर्चे में, हर दिन। तुम मुझसे बच नहीं सकते।"
और ये कहते हुए वो निकल गई। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसने अभी-अभी क्या कह दिया है।
क्योंकि इस पूरी दुनिया में कियान की एक ही चीज़ को ख़तरा था। नज़र। किसी की गहरी, तेज़, हार न मानने वाली नज़र।
"हर हरकत पर नज़र... वाह। ये तो नई मुसीबत है।"
कियान अकेला रह गया। उसने कॉमिक्स उठाई, पर पढ़ी नहीं। तभी उसकी जेब में फ़ोन काँपा। स्क्रीन पर सिकंदर का नाम चमका। उसने मैसेज खोला। और पहली बार उस पूरे दिन में, उस बेफ़िक्र लड़के के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो गई।
"बड़ा काम पक्का हो गया। साल का सबसे बड़ा पर्चा। एडमिट कार्ड बन रहा है। नाम, अंकित तिवारी। लड़का पिछले साल गुज़र गया, रिकॉर्ड में अब भी ज़िंदा है। परफ़ेक्ट। पैसा दुगना। मना मत करना।"
एक मरे हुए लड़के के नाम पर। साल का सबसे बड़ा पर्चा। और कियान जानता था कि इस बार दाँव उसकी ज़िंदगी का था।
उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ दूर, धूप में, नित्या तेज़ क़दमों से जाती दिख रही थी। वो लड़की जिसने अभी-अभी क़सम खाई थी कि वो उसकी हर हरकत पर नज़र रखेगी।
दुनिया में एक ही चीज़ कियान को पकड़ सकती थी। और क़ुदरत ने वो एक चीज़ अभी-अभी उसकी ट्यूशन टीचर बना कर उसकी बेंच पर बिठा दी थी।
"नज़र रखेगी... मुझ पर।"
बाहर, नित्या को अपनी अम्मा की दवाई बचानी थी, और उसका एक ही रास्ता था, कियान को पास कराना। अंदर, कियान को अपनी जान बचानी थी, और उसका एक ही रास्ता था, कभी पास न होना।
दो लोग। दो ज़िंदगियाँ। और एक ही सच, जो अगर खुल गया, तो दोनों बरबाद। खेल शुरू हो चुका था। और इसमें जीतने का मतलब था, हार जाना।
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