अध्याय 12 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
आधी सच्चाई
लास्ट बेंच वाला द्वारा Avni Oberoi
नित्या सारे सबूतों की फ़ाइल लिए सभरवाल के दरवाज़े पर कियान को बरबाद करने को तैयार खड़ी होती है, पर बोल नहीं पाती, क्योंकि उसके गिरने से वो ख़ुद भी गिरेगी और क्योंकि उसे परवाह होने लगी है। कियान आधा सच देता है, कर्ज़ और नन्ही बहन रोशनी, पर नागपाल और रैकेट की पूरी गहराई नहीं, और नित्या तय करती है कि वो उसे ईमानदारी से पास कराएगी और राज़ रखेगी। पर गेट पर भाई का इंतज़ार करती रोशनी की एक मासूम बात से खुल जाता है कि कियान किसका बेटा है, उसी मास्टरजी देवनाथ का, वही नाम जिसे नागपाल ने दफ़ना दिया था।
सुबह के आठ बजे थे, और नित्या सक्सेना सारी रात जागी थी। कॉलेज के उस पुराने गलियारे में, जहाँ दीवारों पर पुराने टॉपरों की तस्वीरें टँगी थीं, वो प्रोफ़ेसर सभरवाल के दफ़्तर के बंद दरवाज़े के सामने खड़ी थी। हाथ में वही फ़ाइल। कियान की बरबादी, और अपनी बचत, एक ही काग़ज़ों में बँधी हुई।
रात भर उसने वो फ़ाइल दस बार खोली और बंद की थी। धुँधली तस्वीर, रसीदें, बयालीस नंबर का हिसाब, समर वाला काग़ज़। हर सबूत मज़बूत था। हर सबूत उसकी स्कॉलरशिप बचा सकता था। बस एक दरवाज़ा खटखटाना था, और सच बोल देना था। इतना ही तो था।
पर उसकी उँगलियाँ लकड़ी पर उठतीं, और रुक जातीं। क्योंकि उसे पता था, इस फ़ाइल में सिर्फ़ कियान का जुर्म नहीं था। इसमें उसका अपना झूठ भी था। वो झूठ जो उसने सभरवाल के मुँह पर बोला था, कियान को बचाने के लिए।
उसने आँखें बंद कीं, एक लंबी साँस ली, और दरवाज़ा खटखटा दिया।
"अंदर आओ। ... नित्या सक्सेना। सुबह के आठ बजे, और आँखों के नीचे रात भर की स्याही। ये किसी प्रगति रिपोर्ट का चेहरा नहीं है। ये किसी फ़ैसले का चेहरा है। बैठो।"
सभरवाल का दफ़्तर हमेशा की तरह क़रीने से लगा था। किताबें, एक ठंडी चाय, और वो नज़र जो पर्चे की तरह इंसान को भी पढ़ लेती थी। नित्या कुर्सी पर बैठी, फ़ाइल गोद में, जैसे कोई बम गोद में रखे हो।
"सर, मैं... मेंटरशिप के बारे में बात करने आई हूँ। कियान के बारे में। मुझे आपको कुछ बताना है, जो शायद पूरी शर्त बदल दे।"
"तो बताओ। मैं तीस साल से इसी कुर्सी पर बैठा हूँ, नित्या। मैंने हर तरह के 'कुछ बताना है' सुने हैं। एक और सही।"
और नित्या ने मुँह खोला। रात भर की रटी हुई लाइनें उसकी ज़बान की नोक तक आ गईं। कियान बुद्धू नहीं है। कियान जान-बूझ कर फेल होता है। कियान एक रैकेट में है। सब कुछ, एक साँस में कह देना था।
पर जैसे ही उसने पहला लफ़्ज़ सोचा, उसे दो चेहरे दिखे। एक, उसकी माँ का, जिसकी पूरी दुनिया इस स्कॉलरशिप पर टिकी थी। और दूसरा... कियान का। वो झुके कंधे, वो थकी हुई आँखें, वो लड़का जो हर मज़ाक के पीछे कुछ छिपा रहा था। और उसके गले में लफ़्ज़ अटक गए।
"नित्या? काग़ज़ तुम्हारे हाथ में हैं, पर ज़बान चुप है। जो भी उस फ़ाइल में है, वो तुम्हें उतना ही डरा रहा है जितना वो जिसके बारे में है।"
और उस पल नित्या ने वो किया जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। एक टॉपर, जिसके पास सारे जवाब थे, ने जवाब देने से इनकार कर दिया। उसने फ़ाइल गोद में और कस कर पकड़ ली।
"कुछ नहीं, सर। ... मैं बस ये पूछने आई थी कि फ़ाइनल तक कितने हफ़्ते बचे हैं। और क्या मुझे थोड़ा और वक़्त मिल सकता है। कियान... कियान अभी भी कोशिश कर रहा है। हम दोनों कर रहे हैं।"
"सात हफ़्ते। और वक़्त तुम्हें उतना ही मिलेगा जितना नियम देते हैं, न एक दिन ज़्यादा। ... जानती हो, नित्या, तुम्हारी एक ही ख़राबी है। सबसे अच्छे बच्चे सबसे बुरे झूठे होते हैं। जाओ, अपनी कोशिश करो।"
और नित्या दफ़्तर से बाहर निकल आई, फ़ाइल बंद, सच अनकहा। उसने कियान को बचा लिया था, बिना ये फ़ैसला किए कि वो उसे बचाना चाहती है। और वो अब भी नहीं जानती थी कि क्यों।
उसे इसका जवाब चाहिए था। और नित्या सक्सेना जब कोई सवाल हल नहीं होता, तो उसे छोड़ती नहीं। उसने कियान को कॉलेज की उसी पिछली सीढ़ी पर ढूँढ लिया, जहाँ वो हमेशा दुनिया से छिपता था।
"मैं अभी-अभी सभरवाल के दरवाज़े से लौटी हूँ, कियान। हाथ में तुम्हारी पूरी बरबादी। एक लफ़्ज़ बोलती, और तुम्हारा सब कुछ ख़त्म। मेरी स्कॉलरशिप बच जाती। ... और मैं बोल नहीं पाई।"
"तो अब क्या, मैडम? मुझ पर एहसान चढ़ा रही हैं? मैंने तो कल ही कह दिया था, मुझे आपकी ज़रूरत नहीं। बुद्धू पर इतनी मेहनत क्यों?"
"वो बुद्धू वाला नाटक बंद करो। मेरे सामने नहीं चलेगा, अब नहीं। कल छत पर तुमने जो कहा, वो तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झूठ था। और मैं जानती हूँ क्यों।"
"सच था वो। तुम मेरी चाल थीं, नित्या। एक अच्छी ढाल। इतना सीधा तो है।"
"अच्छा? तो एक बात समझाओ। अगर मैं सिर्फ़ तुम्हारी चाल थी, एक मोहरा, तो जब मैं सीढ़ियाँ उतर रही थी, तुमने मुझे ट्रस्ट के पास जाने से रोकने की कोशिश क्यों की? 'नित्या रुको', 'वहाँ मत जाना' ... मोहरे की परवाह कौन करता है, कियान?"
और यही एक टॉपर का हुनर था। उसने कियान की अपनी ही चाल, उसका अपना ही एक लफ़्ज़, उठा कर उसके सामने रख दिया था। एक ऐसा सबूत जो उसके अपने झूठ को झूठा साबित करता था। कियान चुप हो गया।
"वो... वो सिर्फ़..."
"तुम हार नहीं मानतीं, है न? टॉपर लोग ऐसे ही होते हैं। एक सवाल छूट जाए, तो पूरी रात नींद नहीं आती। एक सवाल छोड़ भी नहीं सकतीं।"
"नहीं आती। और तुम, कियान, मेरा सबसे मुश्किल सवाल हो। पूरे साल का। मैंने हर फ़ॉर्मूला आज़मा लिया, हर तरीक़ा, हर चाल। एक ही बचा है अब। सच। तो बोलो। इस बार गोल मत करो।"
"अब झूठ नहीं, कियान। असली वाला सच। वो नहीं जो चोट पहुँचाए। वो जो सच में सच हो। मैंने तुम्हारे लिए झूठ बोला है। मुझे कम से कम ये तो हक़ है कि मैं जानूँ, मैंने किसके लिए बोला।"
और कियान के अंदर कुछ गिरा। पूरी दीवार नहीं, बस एक ईंट। पर एक ईंट भी हट जाए, तो रोशनी अंदर आ ही जाती है। उसने सीढ़ी पर बैठते हुए एक लंबी, थकी हुई साँस छोड़ी।
"तुम्हें सच चाहिए? ठीक है। पर पूरा नहीं मिलेगा, नित्या। जितना मैं दे सकता हूँ, उतना लो। और उतने से भी तुम पर बोझ चढ़ जाएगा।"
"मेरे पापा गुज़र गए, बहुत साल पहले। और पीछे छोड़ गए कर्ज़ का एक पहाड़। धनराज जैसे सेठ, जिनका ब्याज साँस लेता है और बढ़ता है। बारह साल से मैं वही पहाड़ काट रहा हूँ। एक-एक रुपया।"
"और तुम्हारी माँ?"
"कोई नहीं है, नित्या। सिर्फ़ मैं हूँ। और एक और। रोशनी। मेरी बहन। दस साल की। उसकी फ़ीस, उसकी किताबें, उसका खाना, उसका छोटा सा कमरा, सब मेरे ज़िम्मे है। मेरे सिवा उसका इस दुनिया में कोई नहीं।"
और नित्या, जो ख़ुद हर महीने अपनी विधवा माँ को पैसे भेजती थी, जो ख़ुद एक पूरे घर का बोझ अपने कंधों पर लिए फिरती थी, उस बोझ को पहचान गई। पल भर में। जैसे कोई अपनी ही भाषा दूर से सुन ले।
"मेरी माँ भी अकेली हैं, कियान। पापा नहीं हैं, बहुत साल से। ये स्कॉलरशिप सिर्फ़ मेरी फ़ीस नहीं है। ये उनकी दवाई है, उनका किराया है, उनकी हर रात की नींद है। इसलिए जब मैं कहती हूँ कि मैं तुम्हारा बोझ समझती हूँ, तो मैं तरस नहीं खा रही। मैं सच कह रही हूँ।"
और दो लोग, जो पूरे साल एक-दूसरे को दुश्मन समझते आए थे, उस पिछली सीढ़ी पर बैठे एक ही बोझ की दो शक्लें पहचान रहे थे। एक के कंधे पर एक माँ, दूसरे के कंधे पर एक बहन। और अचानक वो पूरी जंग, वो नंबरों और मुखौटों की लड़ाई, बहुत छोटी लगने लगी।
"मेरे पास एक ही चीज़ है, नित्या। दिमाग़। और दिमाग़ बिकता है, अच्छे दाम पर। मैंने उसे बेचा। लालच के लिए नहीं, रोशनी की फ़ीस के लिए, धनराज के ब्याज के लिए। बस इतना। इससे आगे मत पूछना। इससे आगे जो है, वो मेरा नहीं, तुम्हारा भी दुश्मन बन जाएगा।"
और यहीं कियान रुक गया। उसने नागपाल का नाम नहीं लिया। उसने उस परछाईं का नाम नहीं लिया जो सिकंदर के पीछे थी। उसने उस आग का नाम नहीं लिया जिसमें उसके पापा का नाम जला था। उसने बस आधा सच दिया, और आधा अपने सीने में दफ़न रखा, नित्या को बचाने के लिए।
"और कल? वो 'तुम मेरी सबसे अच्छी चाल थीं'? वो समोसा भी एक चाल था?"
"वो सबसे बड़ा झूठ था जो मैंने आज तक किसी से बोला। और सबसे मुश्किल भी। मैंने वो इसलिए बोला ताकि तुम मुझसे नफ़रत करो, दूर भागो, और इस गंदगी से बच जाओ। ... समोसा चाल नहीं था, नित्या। समोसा सच था। शायद पिछले बारह साल का सबसे सच्चा पल।"
और वो लफ़्ज़ नित्या के सीने में उतर गए। कल जो झूठ थप्पड़ की तरह पड़ा था, आज उसका सच मरहम की तरह उतरा। उसकी आँखों की सख़्ती पिघली, और उसकी जगह कुछ और आया। कुछ गरम। कुछ जिसे वो अभी नाम नहीं देना चाहती थी।
"ठीक है। तो अब हम ये करेंगे। सुनो ध्यान से, क्योंकि मैं दो बार नहीं कहूँगी। तुम पास होगे, कियान। सच में। अपनी मेहनत से नहीं, अपने असली दिमाग़ से। इतना पास कि मेरी स्कॉलरशिप बच जाए, और तुम्हें कभी अपना दिमाग़ किसी सिकंदर को बेचना न पड़े।"
"तुम... कल तुम मुझे रिपोर्ट करने वाली थीं। आज तुम मेरा राज़ रखने की बात कर रही हो?"
"थी। पर मैं टॉपर हूँ, कियान। मैं अपना मन बदलती नहीं। मैं उसे अपग्रेड करती हूँ। ... तुम्हारा राज़, तुम्हारा राज़ रहेगा। मेरे पास वैसे भी अपने बहुत हैं। एक और सही।"
और वहाँ, उस पिछली सीढ़ी पर, दो लोग बैठे थे जो कल एक-दूसरे को तोड़ रहे थे, और आज एक-दूसरे को थाम रहे थे। हवा में कुछ बदल गया था। वो गर्माहट, जिसे न कियान नाम देना चाहता था, न नित्या। दोनों जानते थे वो वहाँ है। दोनों उसे अनदेखा करने का नाटक कर रहे थे।
"ठीक है, मैडम। पर एक दिक़्क़त है। अगर मैं सच में पास हो गया, तो पूरे कॉलेज में अफ़वाह उड़ेगी कि लास्ट बेंच वाला बुद्धू अचानक होशियार कैसे हो गया। लोग शक करेंगे। तुम्हारी मेहनत पर मेडल मिलेगा, मेरी अक़्ल पर सवाल।"
"तो थोड़ा बुद्धू बने रहना, बीच-बीच में। एक-दो जगह जान-बूझ कर गिर जाना, पर फ़ेल होने से एक इंच ऊपर। ये तो तुम्हें आता ही है, कियान। इसमें तो शायद तुम पूरे देश के टॉपर हो।"
और कियान हँस पड़ा। एक सच्ची हँसी, बहुत दिनों बाद। क्योंकि नित्या ने बिना जाने वो मज़ाक कर दिया था जो सचमुच सच था। बुद्धू बने रहना वाक़ई उसका सबसे बड़ा हुनर था। बस वो नहीं जानती थी कि वो हुनर कितना बड़ा था, और उसकी क़ीमत कितनी भारी।
"तो अब तुम मेरी ट्यूटर भी हो, और मेरे राज़ की चौकीदार भी? एक स्कॉलरशिप के लिए बहुत सारी नौकरियाँ कर रही हो, मैडम।"
"और तुम एक बुद्धू के लिए बहुत सारे राज़ रखते हो, कियान। अब चलो, देर हो रही है। और हाँ, कल छत पर, ठीक चार बजे। इस बार सही जवाब देना। मुझे पता चल जाएगा अगर तुमने जान-बूझ कर ग़लत किया।"
और पहली बार, वो मुखौटा और वो असली लड़का, दोनों एक ही जगह खड़े थे। और नित्या ने दोनों को देखा था, और भागी नहीं थी। रुकी थी। कियान के लिए ये बात बारह साल में पहली बार हुई थी। किसी ने उसका आधा सच देखा था, और फिर भी पास रुका था।
वो दोनों बातें करते हुए कॉलेज के गेट तक आए। और वहाँ, चाय वाली उसी तपरी के पास, एक नन्ही सी परछाईं खड़ी थी। स्कूल की वर्दी, दो चोटियाँ, और सब्र से भरी एक छोटी सी नाराज़गी।
"भैया! तुमने कहा था जल्दी आओगे! मैं कब से खड़ी हूँ! ... और ये कौन है? इतनी सुंदर? भैया, ये तुम्हारी क्या लगती है?"
"रोशनी! ये... ये मैडम है। नित्या मैडम। मुझे पढ़ाती है।"
"तुम्हें कोई पढ़ाता है?! पर भैया, तुम तो सबको पढ़ाते हो! तुम तो सबसे होशियार..."
"रोशनी। बस। बहुत बोलती है ये। चल, घर।"
"रुको, कियान। ... हैलो, रोशनी। तुम बहुत प्यारी हो। तुम्हारा स्कूल कैसा है? पढ़ाई अच्छी चल रही है?"
"बहुत अच्छी! मैं क्लास में फ़र्स्ट आती हूँ! भैया कहते हैं मुझे पापा जैसा मास्टर बनना है। मेरे पापा भी मास्टर थे न, सबसे अच्छे वाले! वो छत पर सबको मुफ़्त पढ़ाते थे, ग़रीब बच्चों को। सब उन्हें मास्टरजी कहते थे। पूरा शहर! ... पर फिर एक बुरे आदमी ने..."
"रोशनी! ... बस। चल अब। सच में देर हो रही है।"
पर देर हो चुकी थी। दूसरी तरह की देर। क्योंकि नित्या के दिमाग़ में, उस टॉपर के दिमाग़ में जो कभी कोई टुकड़ा नहीं भूलता, एक पुरानी, धुँधली ख़बर जाग उठी। सालों पुरानी। एक छत वाला मुफ़्त स्कूल। एक ईमानदार मास्टर। एक पेपर लीक का घोटाला। एक बरबाद नाम।
और उस मास्टर का नाम, जो बरसों से किसी अख़बार के पीले पन्ने में दबा था, अचानक नित्या के सामने आ खड़ा हुआ। देवनाथ। मास्टरजी देवनाथ। और उनका बेटा, वो लड़का जिसे वो अभी-अभी बचाने का फ़ैसला कर के आई थी, उसके सामने खड़ा था। कियान। देवनाथ का बेटा।
नित्या के हाथ ठंडे हो गए। उसने कियान की तरफ़ देखा, फिर रोशनी की तरफ़, फिर उस मिटाए हुए नाम की तरफ़ जो अब उसके अपने हाथों में साँस ले रहा था। वो सिर्फ़ एक बुद्धू का राज़ नहीं थामे बैठी थी। वो एक ऐसा नाम थामे बैठी थी जिसे किसी बहुत बड़े आदमी ने बहुत मेहनत से दफ़नाया था। और वो नाम, अब, ज़िंदा था।
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