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Chapter 1 of 30

वसीयत की रात

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

कुछ महल बाहर से जितने चमकते हैं, अंदर से उतने ही खोखले होते हैं।

मुंबई। कोलाबा। समंदर की छाती पर खड़ा राठौर ग्रैंड होटल। पाँच सितारा, सौ साल पुराना, और आज रात रोशनी में नहाया हुआ।

बाहर मूसलाधार बारिश थी, और अंदर एक चमचमाती दावत। ऐसी दावत, जहाँ एक मेहमान की शेरवानी की क़ीमत में किसी नौकर का पूरा साल कट जाए।

और उस पूरे तूफ़ान को, उस पूरी दावत को अकेले सँभाल रही थी एक लड़की। बैंक्वेट फ़्लोर की सबसे तेज़ वेट्रेस। ... नाम, अद्विका।

रात के नौ बजे थे। मंच पर राठौर फ़ाउंडेशन के चैरिटी गाला का बड़ा एलान होने वाला था। तभी टेबल नंबर चार पर एक नया जूनियर लड़का, काँपते हाथों से, शैम्पेन के गिलासों का पूरा टॉवर गिराने ही वाला था।

बिजली की तरह अद्विका वहाँ पहुँची, और चलते-चलते, बिना रुके, उसका डगमगाता टॉवर सँभाल लिया।

"साँस ले। ... ट्रे नीचे से पकड़, ऊपर से नहीं। ... देख, गिरा नहीं ना?"

लड़के की जान में जान आई। अद्विका ने उसके कान में फुसफुसाया,

"पहली रात है ना? ... आराम से। यहाँ गिलास टूटने पर तनख़्वाह कटती है, सर नहीं कटता। ... मैं हूँ।"

लड़के ने डरी हुई हँसी हँसी, और अद्विका आगे बढ़ गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

यही अद्विका थी। जिस फ़र्श पर सब हुक्म चलाते थे, उसी फ़र्श को वो अपने कंधों पर उठाए फिरती थी। स्टाफ़ के लिए सारी नरमी, और अपने लिए सिर्फ़ काम।

उसकी जेब में फ़ोन काँपा। स्क्रीन पर एक नाम चमका। सोनू। उसका छोटा भाई। बीमार, हॉस्टल में, और कल जिसकी फ़ीस की आख़िरी तारीख़ थी।

अद्विका ने फ़ोन को एक पल देखा, फिर वापस जेब में डाल लिया। ड्यूटी के बीच फ़ोन उठाया, तो नौकरी गई। और ये नौकरी उसकी पूरी दुनिया थी।

चलते-चलते उसका हाथ अनजाने में अपने गले पर गया, उस पुराने लॉकेट पर, जो माँ की आख़िरी निशानी थी। जब भी डर लगता, वो उसे छू लेती। जैसे कोई अपना पास हो।

तभी लॉबी में एक सन्नाटा सा दौड़ा। हर स्टाफ़ की रीढ़ अपने आप सीधी हो गई। ... क्योंकि वो आ गया था।

रेयांश सिंघानिया। कार्यवाहक सीईओ। इकतीस साल का, और इस पूरे साम्राज्य का इकलौता मालिक। ... कम से कम, दुनिया यही समझती थी।

काली शेरवानी, चेहरे पर कोई भाव नहीं, और आँखों में वो थकान जिसे वो अपने रुतबे के नीचे छिपाए रखता था। वो मुस्कुराता नहीं था। वो हुक्म देता था।

आज की पूरी दावत सिर्फ़ एक आदमी के लिए सजी थी। मल्होत्रा साहब। शहर के सबसे बड़े दानी, जिनकी एक दस्तख़त राठौर ग्रैंड को इस तिमाही डूबने से बचा सकती थी।

"आज कोई ग़लती नहीं। एक भी नहीं। ... मल्होत्रा साहब का गिलास कभी ख़ाली न दिखे। और स्टाफ़ का कोई चेहरा उन्हें याद तक न रहे।"

उसने मैनेजर की तरफ़ देखा तक नहीं, बस चलते हुए कहा,

"इस होटल में नौकर दीवारों की तरह होते हैं। दिखने चाहिए, महसूस नहीं होने चाहिए। ... समझे?"

स्टाफ़ का कोई चेहरा याद न रहे। ... रेयांश सिंघानिया को क्या पता था कि आज रात एक चेहरा उसे उम्र भर याद रहने वाला था।

मंच के पास, रेयांश मल्होत्रा साहब को होटल का सौ साल पुराना इतिहास सुना रहा था। तभी एक वेटर ने अद्विका को इशारा किया, शैम्पेन की ट्रे ले कर वहाँ पहुँचाओ।

अद्विका ट्रे थामे भीड़ के बीच से बढ़ी। सब ठीक था। कदम नाप कर, ट्रे बिल्कुल सीधी। ... तभी, भीड़ में से एक हाथ आया।

किसी की कोहनी, जो इत्तिफ़ाक़न नहीं लगी। एक धक्का, ठीक नाप कर, ठीक उस पल। अद्विका ने उस चेहरे को नहीं देखा। ... पर उस धक्के में इरादा था।

ट्रे डगमगाई। एक गिलास फिसला। और लाल वाइन की एक लकीर, सीधे मल्होत्रा साहब की बेदाग़ सफ़ेद बंडी पर जा गिरी।

पूरी लॉबी एक पल को थम गई। संगीत, हँसी, गिलासों की खनक, सब जैसे साँस रोक कर रुक गए।

मल्होत्रा साहब पीछे हटे, चेहरा ग़ुस्से से तमतमा गया। "ये क्या बदतमीज़ी है!" उनकी गरज पूरे हॉल में गूँजी।

रेयांश की जबान पर बर्फ़ आ गई। उसने पलट कर मल्होत्रा साहब की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ रेशम की तरह नरम हो गई।

"माफ़ी, मल्होत्रा साहब। ... ये राठौर ग्रैंड में नहीं होता। ... एक पल दीजिए।"

और फिर वो अद्विका की तरफ़ मुड़ा। आवाज़ अब भी धीमी थी, पर उसमें अब रेशम नहीं, लोहा था।

"नाम?"

"अद्विका, सर। ... सर, ये मेरी ग़लती नहीं थी, मुझे किसी ने..."

"मैंने सफ़ाई नहीं माँगी। नाम पूछा।"

उसने उसकी बात बीच में काट दी। उसे सच से कोई मतलब नहीं था। उसे सिर्फ़ मल्होत्रा साहब का वो चेहरा दिखता था, जो ये पूरा तमाशा देख रहा था।

"इस होटल की सौ साल की इज़्ज़त, और तुमसे एक ट्रे नहीं सँभली। ... भरी महफ़िल में, मेरे सबसे ख़ास मेहमान पर।"

"सर, मुझे भीड़ में किसी ने धक्का दिया। मैंने वो गिलास जान-बूझकर नहीं गिराया। ... मैं झूठ नहीं बोल रही।"

अद्विका ने सिर झुकाया नहीं। उसने रेयांश की आँखों में सीधे देखा। और एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, रेयांश रुक गया।

कोई नौकर उसकी आँखों में इस तरह नहीं देखता था। न डर, न आँसू, न गिड़गिड़ाहट। ... कुछ था उस नज़र में जो उसे अंदर तक बेचैन कर गया।

पर उसने उस बेचैनी को झटक दिया। बड़े लोग नौकरों की आँखों में नहीं देखते। उसने देखना बंद कर दिया।

"मुझे तुम्हारी सफ़ाई नहीं चाहिए, अद्विका। मुझे बस तुम्हारा जाना चाहिए।"

और फिर उसने वो कहा, जो अद्विका के कानों में बरसों गूँजने वाला था।

"तुम्हारे जैसे लोग सामान होते हो। जगह पर पड़े हो तो ठीक, वरना... पैरों की धूल। ... आज तुम अपनी जगह से हिल गईं।"

पैरों की धूल। ... शब्द हॉल की उस चमकती हवा में गिरे, और हर मेहमान ने सुना।

"बिल्ला उतारो।"

बिल्ला उतारो। दो शब्द। एक मैनेजर आगे बढ़ा और अद्विका की वर्दी से उसका नेम-बिल्ला खींच लिया।

अद्विका, स्टाफ़। पीतल की वो छोटी सी पट्टी, जिसे वो रोज़ सुबह चमका कर लगाती थी। अब वो एक मैनेजर की मुट्ठी में थी।

रेयांश ने रूमाल से मल्होत्रा साहब की आस्तीन का इशारा किया, माफ़ी में सिर झुकाया, और मुड़ते हुए बस इतना कहा,

"निकालो इसे। इसी वक़्त। ... और कल से इसकी शक्ल इस होटल में न दिखे।"

दो गार्ड आए। अद्विका ने कोई विरोध नहीं किया। उसने सिर्फ़ एक बार, आख़िरी बार, उस पूरी लॉबी को देखा। उन झूमरों को, उस संगमरमर को, जिसे उसने अपने ही हाथों से चमकाया था।

और फिर उसे उस बड़े दरवाज़े से बाहर, सीधे मूसलाधार बारिश में धकेल दिया गया। पीछे दरवाज़ा बंद हुआ, और अंदर संगीत फिर बजने लगा। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

बारिश में भीगती अद्विका फुटपाथ पर खड़ी रह गई। हाथ में एक थैला, जिसमें उसकी गीली वर्दी थी, और वो टूटा हुआ नेम-बिल्ला।

उसे अपनी बेइज़्ज़ती का उतना दुख नहीं था। ... बेइज़्ज़ती तो जैसे उसकी क़िस्मत की आदत थी।

दुख इस बात का था कि कल सोनू की फ़ीस कहाँ से आएगी। दुख इस बात का था कि जिस माँ ने मर कर भी उसे ईमानदार रहना सिखाया, आज सबके सामने उसे कचरा, पैरों की धूल कह दिया गया।

पर सबसे गहरा दुख वो था, जो वो किसी को बता भी नहीं सकती थी। ... अद्विका देशमुख की कोई दुनिया नहीं थी। न माँ रही, न बाप का पता, न कोई ख़ानदान।

वो एक ऐसे परिवार की अनाथ थी, जिसे वो जानती तक नहीं थी। ज़िंदगी भर, हर दरवाज़े पर, वो बस एक ही चीज़ रही थी। ... कोई नहीं। किसी की कुछ नहीं।

तुम्हारे जैसे लोग पैरों की धूल होते हो। ... उसने आँखें बंद कीं। शायद रेयांश सही था। शायद वो सचमुच किसी की कुछ नहीं थी।

उसने गले से वो लॉकेट निकाला। बारिश की बूँदें उस पर फिसल रही थीं। उसने उसे खोला, अंदर एक धुँधली सी तस्वीर थी, एक ऐसे चेहरे की, जिसे वो कभी मिली ही नहीं थी।

"तुम कौन थे? ... और मुझे यूँ अकेला छोड़ कर कहाँ चले गए?"

लॉकेट ख़ामोश रहा। जैसे हमेशा रहता था।

जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। वो बस-स्टॉप की एक टूटी बेंच पर बैठ गई, और बारिश को अपने ऊपर बरसने दिया। ... और तभी, उस बारिश के शोर में, एक आवाज़ आई।

"अद्विका... देशमुख?"

अद्विका ने चौंक कर देखा। एक बूढ़ा आदमी, हाथ में एक काला छाता, बदन पर महँगा पर पुराना कोट, और आँखों में एक अजीब सी थकी हुई नरमी।

"आप कौन हैं? ... और मेरा नाम कैसे जानते हैं?"

"मैं तुम्हें पिछले तीन महीने से ढूँढ रहा हूँ, बेटी। ... और सच कहूँ, तो तुम्हें ढूँढना किसी गुमशुदा ख़ज़ाने को ढूँढने से मुश्किल निकला।"

उसने काँपते हाथों से कोट की जेब से एक कार्ड निकाला। विश्वनाथ। एडवोकेट।

"देखिए, वकील साहब। अगर किसी क़र्ज़ की वसूली के लिए आए हैं, तो ग़लत लड़की के पास आए हैं। मेरे पास देने को कुछ नहीं है। ... आज तो नौकरी भी नहीं रही।"

"मैं तुमसे कुछ लेने नहीं आया, अद्विका। ... मैं तुम्हें कुछ देने आया हूँ। ... वो, जो पिछले बरसों से सिर्फ़ तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"

बारिश और तेज़ हो गई। बूढ़े वकील ने अपना छाता झुका कर अद्विका के सिर पर कर दिया, अपने ही कंधे भिगोते हुए।

"एक नाम सुना है कभी? ... देवनारायण राठौर।"

अद्विका ने ना में सिर हिलाया। पर फिर रुक गई। राठौर। ... वो नाम तो अभी कुछ देर पहले उसकी अपनी वर्दी पर लिखा था। उसी होटल का, जिसने अभी उसे कचरे की तरह बाहर फेंका था।

"राठौर ग्रैंड वाले? ... मैं उनके होटल में काम करती थी। कल तक। ... पर मैं किसी देवनारायण राठौर को नहीं जानती।"

"पर वो तुम्हें जानते थे, बेटी। ... उन्होंने अपने आख़िरी दिन तुम्हारा चेहरा ढूँढते हुए गुज़ारे।"

अद्विका के हाथ में लॉकेट अब भी खुला था। वकील की नज़र एक पल को उस लॉकेट पर, उस धुँधली तस्वीर पर ठहरी, और उसकी बूढ़ी आँखें भर आईं।

पर उसने कुछ नहीं कहा। जैसे उस तस्वीर को पहचानता हो, और अभी बताना न चाहता हो। ... अभी नहीं।

"देवनारायण राठौर। राठौर ग्रैंड के बानी। एक चाय की टपरी से शुरू करके, पूरे मुल्क में फैली इस होटल चेन के मालिक। ... दो हफ़्ते पहले, वो गुज़र गए।"

"मुझे... मुझे अफ़सोस है। ... पर इस सबका मुझसे क्या लेना-देना, वकील साहब? मैं तो एक वेट्रेस हूँ।"

विश्वनाथ ने अपने कोट के अंदर हाथ डाला। और एक मोटा, सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला, लाल मोम की मुहर से बंद। बारिश की बूँदें उस पर गिरीं और फिसल गईं।

उसने वो लिफ़ाफ़ा बहुत आहिस्ता से, उस गीली बेंच पर, अद्विका की तरफ़ सरका दिया।

"ये देवनारायण राठौर की वसीयत है, अद्विका। उनकी आख़िरी ख़्वाहिश। ... और इसमें, पूरी राठौर ग्रैंड चेन का सिर्फ़ एक वारिस है।"

"कौन?"

"तुम, बेटी। ... सिर्फ़ तुम।"

अद्विका की उँगलियों से बारिश की बूँदें टपक रही थीं। उसे लगा उसने कुछ ग़लत सुन लिया।

"ये... ये कोई मज़ाक है। ... मैं एक वेट्रेस हूँ। मेरे पास किराए के दो कमरे हैं, एक बीमार भाई है, और एक टूटा हुआ नेम-बिल्ला। ... मैं किसी की वारिस नहीं हो सकती।"

"नहीं, बेटी। तुम देवनारायण राठौर की पोती हो। ... उनके इकलौते बेटे की, इकलौती औलाद।"

अद्विका के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। बारिश, ट्रैफ़िक, दुनिया, सब जैसे बहुत दूर कहीं चला गया।

बूढ़े वकील ने उस बंद लिफ़ाफ़े पर अपना हाथ रखा, और उसकी आवाज़ बारिश से भी नरम हो गई।

"जिस होटल ने आज रात तुम्हें कुत्ते की तरह निकाला, बेटी... कल से वो सारा तुम्हारा है।"

बारिश बरसती रही। बेंच पर बैठी वो भीगी हुई लड़की, जिसे कुछ ही घंटे पहले सबके सामने पैरों की धूल कह कर निकाला गया था... उस पूरे महल की, उस पूरे साम्राज्य की अकेली मालकिन थी।

उस लॉबी में अब भी संगीत बज रहा था। रेयांश सिंघानिया अब भी मल्होत्रा साहब को होटल का इतिहास सुना रहा था। ... किसी को नहीं पता था।

सिवाय एक बूढ़े वकील के... एक भीगी हुई लड़की के... और आपके।

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