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Chapter 18 of 30

ताज की कीमत

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

उस रात नींद अद्विका के तंग कमरे के दरवाज़े तक आई ही नहीं, उसी दरवाज़े तक, जहाँ से रेयांश 'अब समझ आया' कह कर अँधेरे में उतर गया था। ... अभी पौ फटी भी नहीं थी कि दरवाज़े के नीचे से एक मुड़ा हुआ पुर्ज़ा सरक आया, विश्वनाथ की टेढ़ी लिखाई में सिर्फ़ तीन लफ़्ज़, 'पिछली गली। अभी।'

होटल की पिछली गली में, कचरे के पीपों और भीगी दीवारों के बीच, विश्वनाथ की पुरानी स्लेटी गाड़ी एक थके जानवर की तरह खड़ी थी। ... अद्विका चुपके से अगली सीट पर जा बैठी, और बूढ़े वकील का चेहरा देख कर उसका दिल बैठ गया, वो एक ही रात में कई साल बूढ़ा हो गया लगता था।

"इतनी सुबह, इस तरह... सब ठीक तो है, वकील साहब?" ... अद्विका ने काँच पर गिरती बूँदों के पार होटल की उस पिछली दीवार को देखा, जो अब भी सो रही थी। " आपने ऐसा पुर्ज़ा पहले कभी नहीं भेजा।"

"जयदेव ने अदालत को हिला दिया है, बेटी।" ... उसने अपने चश्मे के पीछे से उसे देखा, आवाज़ में चालीस साल की थकान भरी थी। " वसीयत की चुनौती अब सुनवाई तक पहुँच गई है। आज सुबह, इसी शहर की अदालत में। और उन्होंने घड़ी सबके सामने मेज़ पर रख दी है, तीन सौ बीस रातें, अद्विका। उसके बाद अगर कोई वारिस सामने न आई, तो ये पूरा महल जयदेव का।"

"तीन सौ बीस रातें..." ... उसने वो लफ़्ज़ ऐसे दोहराए जैसे कोई फंदा गिन रहा हो। " और अगर वारिस सामने आ जाए, तो वसीयत की शर्त टूट जाए, और सब कुछ फिर भी जयदेव का। सामने आऊँ तो मरूँ, छुपी रहूँ तो मरूँ। ये कैसी शर्त रख गए दादाजी।"

"इसीलिए आज मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी आँखों से सब देखो।" ... उसने गाड़ी स्टार्ट की, और वाइपर बारिश से लड़ने लगे। " गैलरी में, एक आम औरत की तरह, सिर ढाँप कर बैठना। कोई तुम्हें नहीं पहचानेगा। पर तुम्हें सुनना होगा कि वो तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं, ता कि तुम समझ सको कि तुम किसके ख़िलाफ़ खड़ी हो।"

"और अगर मल्विका के आदमी वहाँ हुए, और उन्होंने मुझे पहचान लिया..." ... उसने लॉकेट को दुपट्टे के नीचे और गहरा सरका लिया, फिर जबड़ा सख़्त कर लिया। " चलिए। जो लोग मुझे मिटाने की बात करते हैं, उनकी शक्ल तो मैं देखूँ।"

शहर की पुरानी अदालत का वो कमरा वकीलों की काली कोटों से भरा था, छत के पंखे सुस्ती से घूम रहे थे। ... अद्विका सबसे पीछे की बेंच पर, सिर ढाँपे, एक बार फिर एक गुमनाम चेहरा बन गई, और मेज़ के उस पार, मख़मली सफ़ेद कुर्ते में जयदेव राठौर बैठा था, वैसे ही ठहरा जैसे मौत ठहरी होती है।

"जज साहब, मेरे भाई की ये वसीयत एक मज़ाक़ है।" ... वो इत्मीनान से खड़ा हुआ, हर लफ़्ज़ शहद में डूबा हुआ। " एक गुमनाम वारिस, जिसका न कोई नाम, न चेहरा, न कोई सबूत। एक भूत, जिसे मेरे भाई के सठिया जाने ने गढ़ा। वो वारिस कहाँ है? है, तो सामने आए। नहीं है, तो ये पूरा साम्राज्य उसके असली ख़ून का है, यानी मेरा।"

उसका एक-एक लफ़्ज़ अद्विका के गले में उतरता चला गया, और वो पत्थर बनी बैठी रही। ... क्योंकि वो 'भूत' यहीं बैठा था, इसी बेंच पर साँस ले रहा था, पर खड़े हो कर 'मैं हूँ' कहते ही वसीयत की शर्त राख हो जाती, और सब कुछ इसी मख़मली आदमी की मुट्ठी में।

"वारिस का होना और वारिस का सामने आना, दो अलग बातें हैं, जज साहब।" ... विश्वनाथ धीरे से उठा, हाथ में एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा थामे। " देवनारायण राठौर ने पूरे होश-ओ-हवास में ये शर्त रखी कि वारिस एक साल गुमनाम रहेगी। ये कोई फ़रेब नहीं, एक बाप की आख़िरी परख है। और क़ानून किसी वसीयत को सिर्फ़ इसलिए रद्द नहीं कर सकता क्योंकि उसकी शर्त जयदेव राठौर के सब्र को रास नहीं आती।"

तभी दलील के बीच, पीछे खड़े एक स्लेटी सूट वाले आदमी ने मुड़ कर गैलरी की हर बेंच पर नज़र दौड़ाई, वही स्लेटी सूट जो कभी रिकॉर्ड रूम में उसकी फ़ाइल तक पहुँचा था। ... अद्विका ने फ़ौरन सिर झुका कर होंठ हिलाए, जैसे कोई दुआ पढ़ रही हो, और भीड़ के सौ गुमनाम चेहरों में घुल गई, और वो नज़र उस पर एक पल ठहर कर आगे बढ़ गई।

"परख?" ... जयदेव हल्के से मुस्कुराया, और वो मुस्कान पूरे कमरे को ठंडा कर गई। " या पर्दा, वकील साहब? आपका वारिस सच्चा है, तो उसे इस मेज़ पर ला खड़ा कीजिए। ला नहीं सकते? क्योंकि या तो वो है ही नहीं, या आप जानते हैं कि सामने आते ही वो सब कुछ हार जाएगी। दोनों सूरतों में, ये चेन मेरी है।"

जज ने अपनी ऐनक ठीक की और एक तारीख़ हवा में टाँक दी, साल पूरा होने तक अगर कोई वारिस अपना दावा ले कर अदालत के सामने न आई, तो सीलबंद शर्त अपने आप ख़त्म, और चेन जयदेव के नाम। ... अद्विका की पूरी छुपी जंग को अब एक खुली, क़ानूनी तारीख़ मिल गई थी, और उसके दोनों रास्ते एक ही खाई में गिरते थे।

बाहर, अदालत की सीढ़ियों पर बारिश अब एक स्लेटी धुंध में बदल चुकी थी, अद्विका एक खंभे से टिकी खड़ी थी, साँस भारी। ... विश्वनाथ फ़ाइलें समेटे उसके पास आया, और उसने जो अगली बात कही, वो अदालत की हर दलील से भारी थी।

"एक ताज के लिए इतनी लड़ाई, वकील साहब।" ... उसने धुंध में डूबे शहर को देखा, आवाज़ में एक थकी हुई कड़वाहट थी। " कभी-कभी जी करता है, छोड़ दूँ ये सब। मैंने कभी ये महल माँगा ही नहीं था। जिस दादा की शक्ल तक नहीं देखी, उसकी दी हुई सज़ा मैं क्यों काटूँ।"

"तुम समझ रही हो कि जयदेव को ये चेन चलानी है। नहीं, बेटी।" ... उसने अपनी फ़ाइल खोली, काग़ज़ों की मोटी गड्डी दबी थी। " उसे ये चेन चलानी नहीं, बेचनी है। टुकड़े टुकड़े कर के, ज़मीनें बिल्डरों को, इमारतें विदेशी हाथों को। और जिस दिन ये बिकेगी, इस चेन के चार हज़ार नौकर एक झटके में सड़क पर होंगे। बंसी, शारदा ताई, तहख़ाने का हर वो चेहरा जो तुम्हें अपना मानता है।"

चार हज़ार। वो लफ़्ज़ अद्विका के अंदर किसी मंदिर के घंटे की तरह गूँजा। ... और एक पल में उसकी सारी थकान पीछे छूट गई, क्योंकि अब ये उसके अपने ज़ख़्म की लड़ाई नहीं, उन चार हज़ार लोगों की लड़ाई थी जिनका उस महल के सिवा कोई घर नहीं था।

"मैं अब तक ये लड़ाई ग़लत वजह से लड़ रही थी, वकील साहब।" ... वो सीधी हो गई, धुंध के पार देखते हुए, और उसकी रीढ़ में एक नई मज़बूती उतर आई। " मैं सोचती रही कि ये मेरे और उस दादा के बीच का हिसाब है। पर ये तो उन सबका घर है जिन्होंने मुझे उस रात बारिश से उठा कर अपना बना लिया। अब मैं ये साल अपने लिए नहीं, उनके लिए पूरा करूँगी।"

बूढ़े वकील की आँखों में एक नमी तैर गई, उसने अपनी ऐनक उतार कर धीरे से पोंछी। " तुम्हारे बाप ने भी ठीक यही कहा था, बेटी। उस दिन, जब देवनारायण ने उसे बेदख़ल किया था। कि इमारतें पत्थर की नहीं होतीं, लोगों की होती हैं। ... आज पहली बार, मुझे यक़ीन हुआ कि देवनारायण साहब ने सही वारिस चुना।"

उसी शाम, संगमरमर के नीचे, तहख़ाने की उस भाप भरी दुनिया में लौटते ही अद्विका को बंसी मिला, हमेशा की तरह ज़ुबान चलाता हुआ, पर आज उसकी आँखों में एक डर था। ... वो एक अफ़वाह को किसी गीले कपड़े की तरह मुट्ठी में भींचे खड़ा था।

"अद्विका, सुना तूने? ऊपर बड़े लोग कह रहे हैं कि होटल बिक सकता है!" ... बंसी ने इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाया, हाथ हवा में नाच रहे थे। " अगर ये नौकरी गई ना, तो मेरी माँ का ऑपरेशन कौन कराएगा? छोटी की शादी इसी तनख़्वाह के भरोसे जोड़ रहा हूँ। मैं तो कहता हूँ ये सब वही गिद्ध रिश्तेदार करा रहे हैं... अरे, तू सुन भी रही है?"

"सुन रही हूँ, बंसी। और तू ज़रा भी फ़िक्र मत कर।" ... उसने उसके काँपते हाथ पर अपना हाथ रखा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब यक़ीन था, जो किसी नौकरानी का नहीं होता। " ये होटल कहीं नहीं बिकेगा। तेरी माँ का ऑपरेशन भी होगा, और छोटी की शादी भी। मेरा वादा है।"

"तू बोलती ऐसे है जैसे ये पूरा होटल तेरे बाप का हो!" ... बंसी हैरानी से हँसा। " पर पता नहीं क्यों, जब तू कहती है ना, तो यक़ीन आ जाता है। चल, कर लेता हूँ तेरी बात पर यक़ीन, मालकिन जी!" ... और मज़ाक़ में कहा वो लफ़्ज़ उसे पता ही नहीं था कि कितना सच था।

एक नौकरानी एक स्टीवर्ड से पूरे महल को बचाने का वादा कर रही थी, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि वो वादा हवा में नहीं था। ... क्योंकि जो लड़की बंसी का काँपता हाथ थामे खड़ी थी, इन्हीं दीवारों की मालकिन वही थी, और वो अब अपने ज़ख़्म के लिए नहीं, अपने लोगों के लिए ये साल जीतेगी।

और उसके ऊपर, उन्हीं संगमरमर के फ़र्शों पर, वो आदमी घूम रहा था जो अब उसका पूरा सच जान चुका था, रेयांश, जिसने कल रात 'गुड़िया' कह कर उसका पत्थर चेहरा तोड़ा था, और फिर भी ख़ामोश रह गया था। ... एक दराज़ में ताला लगा कुणाल की ग़द्दारी का सबूत, एक सीने में इस लड़की का राज़, और बाहर तीन सौ बीस रातों की घड़ी, सब एक साथ टिक रहे थे, और अद्विका को नहीं पता था कि इनमें से कौन पहले फटेगा।

उसी रात, नौकरों की उस दुनिया से बहुत ऊपर, राठौर ग्रैंड के सबसे ऊँचे सुइट में, जहाँ हवा में पैसे और इत्र की ख़ुशबू घुली थी, जयदेव राठौर खिड़की के पास खड़ा शहर की रौशनियाँ देख रहा था। ... दरवाज़ा खुला और मल्विका अंदर आई, अदालत की आज की जीत अभी भी उसकी ज़ुबान पर तैर रही थी।

"अदालत का क्या हुआ?" ... जयदेव ने शहर की रौशनियों से नज़र हटाए बिना पूछा, आवाज़ में वो ठहराव था जो सिर्फ़ बहुत ताक़तवर या बहुत ख़तरनाक लोगों में होता है। " पूरी बात बताओ।"

"आज हमारा पलड़ा भारी रहा, पापा। वो बूढ़ा वकील बस शर्त की आड़ में छुप रहा है।" ... वो पास आई, पर उसकी आँखों में एक बेचैनी थी। " पर जब तक वो वारिस कहीं ज़िंदा है, ये जीत अधूरी है। और मुझे यक़ीन है, वो बहुत पास है। शायद हमारे सोचने से भी ज़्यादा पास।"

"पास।" ... जयदेव खिड़की से मुड़ा, और पहली बार उसकी आवाज़ से शहद उतर गया। " बेटी, मैं सत्तर बरस का हूँ, मेरे पास 'पास' और 'शायद' के लिए वक़्त नहीं है। ये अदालतें बरसों घसीटती हैं। और कुणाल कहता है कि वारिस के होने का शक अब चेन के अंदर तक पहुँच चुका है। रेयांश भी उसी को ढूँढ रहा है। अगर वो हमसे पहले उस तक पहुँच गया..."

"तो आप क्या कहना चाहते हैं, पापा?" ... मल्विका की आवाज़ धीमी हो गई, और उसके होंठों पर एक बहुत हल्की, बहुत ठंडी रेखा उभर आई। " अब तक हम पर्दे के पीछे खेल रहे थे। नाम, काग़ज़, अफ़वाहें। पर मुझे लगता है, अब आप कुछ और कहना चाहते हैं।"

और बूढ़े ने वो बात कही जिसने पूरे शिकार को जानलेवा बना दिया। ... उसने उसे उसी लहजे में कहा जिस लहजे में वो अपनी सुबह की चाय माँगता था, बिना किसी काँप के, बिना पलक झपके, जैसे किसी रद्दी काग़ज़ को टोकरी में फेंकने का हुक्म दे रहा हो।

"सुथराई बहुत हो गई, मल्विका।" ... वो वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया, और अपनी उँगलियाँ आपस में मिला लीं। " अगर वारिस मिल गई है... तो उसे दावा करने का मौक़ा मत देना। दावे से पहले उसे ग़ायब कर दो। जो साँस ही नहीं ले रही, वो किसी वसीयत पर दस्तख़त नहीं करती।"

और मल्विका ने पलक तक नहीं झपकी, वो सिर्फ़ मुस्कुराई। ... क्योंकि उस पूरे कमरे में सिर्फ़ वही जानती थी कि वो गुमनाम वारिस कोई भूत नहीं, एक कटे नाम वाला असली चेहरा है, और वो चेहरा इसी महल के तहख़ाने में, एक वर्दी पहने, एक टूटी खाट पर सो रहा था।

"जैसा आप कहें, पापा।" ... वो दरवाज़े की तरफ़ मुड़ी, और उसकी आवाज़ रेशम में लिपटी एक छुरी बन गई। " वैसे भी, मुझे उस लड़की से एक पुराना हिसाब चुकाना ही था। बस अब हिसाब चुकाने का तरीक़ा बदल गया है।"

और नीचे, अँधेरे में, वो वारिस सो रही थी, उन्हीं चार हज़ार चेहरों के सपने में डूबी जिन्हें बचाने की उसने आज क़सम खाई थी, ये जाने बिना कि उसकी अपनी साँसों की क़ीमत अभी अभी, ठीक उसके सिर के ऊपर, एक मख़मली आवाज़ में तय हो चुकी है। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि वो 'ग़ायब कर दो' वाला हुक्म किसी भूत के लिए नहीं, उस लड़की के लिए था जो कल सुबह मुस्कुरा कर मल्विका को उसकी चाय पेश करेगी।

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