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अध्याय 12 / 30

शक की आँच

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

राठौर ग्रैंड की सबसे ऊँची मंज़िल पर सुबह की पहली रौशनी रेंग रही थी, और रेयांश रात भर एक ही दराज़ के सामने बैठा रहा था। ... अंदर दबा वो फ़ोल्डर अब भी उसकी आँखों के पीछे जल रहा था, एक घेरा हुआ नाम, और नीचे उसके भरोसेमंद हाथ का दस्तख़त। ... ग़द्दार की गढ़ी फ़ाइल पर वो भरोसा नहीं करेगा, जो साया कल उसे बचा गया, उसे अपने हाथों ढूँढेगा।

दरवाज़ा खुला, और अद्विका सुबह की ट्रे लिए अंदर आई, क़दम हल्के, नज़रें नीची। ... पर आज हवा बदली हुई थी। कल रात जो गरमाहट जली थी, आज उसकी जगह एक ठंडी, तौलती नज़र थी, जो उसे दरवाज़े से मेज़ तक नापती चली।

" रुको।" ... रेयांश ने कप उठाया नहीं, बस उसे तौलता रहा। " कल बैठक में एक अजीब बात हुई, अद्विका। डूबते हुए मुझे किसी ने ऐन वक़्त एक सिरा थमा दिया, मरी हुई फ़र्म वाला। ... तुम उसी कमरे में थीं। कुछ देखा तुमने?"

अद्विका ने तश्तरी सीधी की, चेहरा पत्थर। " मैं तो बस पानी भर रही थी सर। ... बड़े लोगों की बातें मेरे कान से निकल जाती हैं, ठहरती नहीं।" ... पर अंदर उसका दिल ढोल बन गया, वो जानती थी, रेयांश सवाल नहीं, जाल बिछा रहा था।

" इस महल में कोई है, अद्विका।" ... रेयांश उठ कर धीरे-धीरे उसके पास आया, आवाज़ लगभग फुसफुसाहट। " कोई है जो मुझे एक साये की तरह बचा रहा है। ... और मैं क़सम खाता हूँ, मैं उसे ढूँढ निकालूँगा। ... चाहे वो इसी कमरे में मेरे सामने खड़ा हो।"

अद्विका को लगा जैसे वो जाल घूम कर सीधे उसी की तरफ़ मुड़ गया हो। ... चेहरा थामने को उसने मन ही मन रातें गिनीं, साल पूरा होने में अभी तीन सौ छत्तीस बाक़ी थीं, और अब हर रात उसी आदमी की नज़र से बचना था, जो ख़ुद उसकी तलाश में था।

अद्विका एक क़दम भी पीछे नहीं हटी। " जो आपको बचा रहा है सर, शायद वो आपका भला चाहता है। ... कभी-कभी जो छुप कर पहरा देता है, उसका छुपा रहना ही आपकी सबसे बड़ी हिफ़ाज़त है।" ... रेयांश की आँखें सिकुड़ गईं, एक वेट्रेस के मुँह में इतनी गहरी बात पर।

" शायद।" ... रेयांश मेज़ पर लौटा, और एक फ़ाइल जान-बूझ कर खुली छोड़ दी। " आज शाम वो पुराना राठौर हाउस वाला काग़ज़ मैं अकेले, बिना गवाह, तिजोरी से निकालूँगा। रात ठीक नौ बजे।" ... एक झूठ, फंदे की तरह बिछा, ये देखने को कि साया इस बार कहाँ हिलता है।

अद्विका ट्रे उठा कर निकल गई, और रेयांश दरवाज़े को बंद होने तक देखता रहा। ... वही पुरानी खटक उसके सीने में उठी, पर आज पहले से गहरी। ... फंदा बिछ चुका था, अब बस इंतज़ार।

और नीचे, तहख़ाने से लगे उस कमरे में शारदा ताई कब से एक झुर्रीदार लिफ़ाफ़ा आँचल में दबाए बैठी थी। ... वही काग़ज़, जो उसने स्लेटी सूट वाले जासूस के हाथ लगने से एक साँस पहले खींच लिया था। ... और आज उसका इंतज़ार ख़त्म हो रहा था।

" दरवाज़ा बंद कर, बेटी।" ... शारदा ने अद्विका के अंदर आते ही कहा, आवाज़ में चालीस साल का ठहराव। " और आज मेरी आँखों में देख कर एक बात सुन। भाग मत, टाल मत।"

अद्विका के हाथ कुंडी पर ठिठके। " क्या हुआ ताई? कोई ग़लती हो गई मुझसे?" ... उसने नौकरानी की सबसे महफ़ूज़ ज़ुबान ढूँढी, वो जो सवाल नहीं करती, बस सिर झुका कर माफ़ी माँग लेती है।

" ये लॉकेट।" ... शारदा ने काँपती उँगली से उसके गले के उस पुराने लॉकेट को छुआ। " इसके अंदर जो चेहरा है न बेटी, वो मैंने अपनी गोद में खिलाया है। छोटे मालिक, अर्नव बाबा। ... जिस दिन बड़े मालिक ने उन्हें घर से निकाला, मैं दरवाज़े की ओट में रो रही थी।"

अद्विका के पैरों तले फ़र्श हिल गया। ... वसीयत की शर्त कानों में चीख़ पड़ी, एक बार भी सच बोला, एक इंसान को भी बताया, और सब ख़त्म, सब गिद्धों के पास। ... और अब एक दूसरी रूह उसके राज़ की चौखट पर आ खड़ी थी।

" ताई... आप ग़लत समझ रही हैं।" ... अद्विका की आवाज़ लड़खड़ाई, नज़र फिर गई। " ये लॉकेट मुझे किसी पुरानी दुकान से मिला था, बस एक निशानी है। ... इसका किसी मालिक-वालिक से कोई नाता नहीं।"

" झूठ मत बोल, बेटी। कम से कम मुझसे नहीं।" ... शारदा ने आँचल से वो काग़ज़ निकाल कर रौशनी में खोला। " ये देख। तेरी भरती की फ़ाइल में, तेरे नाम के नीचे एक परत और दबी थी। एक बाप का नाम। ... अर्नव। ... मैंने इसे उस जासूस से एक साँस पहले खींच लिया, क्योंकि उसी दिन समझ गई थी, तू किसकी बेटी है।"

अद्विका देखती रह गई, अपने बाप का नाम, जो उसकी माँ ने ता-उम्र उसके कानों से दूर रखा था, अब एक बूढ़ी नौकरानी के हाथ में खुला पड़ा था, जिसे इन्हीं झुर्रीदार हाथों ने गिद्धों की खुदाई से बचाया था।

" ताई... अगर ये सच भी हो..." ... गले में आँसू अटक गए, पर लफ़्ज़ नहीं। " तो भी मैं इसे अपने मुँह से नहीं कह सकती। एक लफ़्ज़, और सब ख़त्म। ... मेरे दादा की एक शर्त मेरा गला घोंटे बैठी है। ... आप भी भूल जाइए, ताई, मेरी ख़ातिर।"

" मैं तुझसे कुछ कहलवाऊँगी नहीं, बेटी।" ... शारदा ने उसका चेहरा दोनों हथेलियों में भर लिया। " जो मैं जानती हूँ, वो मेरे और ऊपर बैठे भगवान के बीच दफ़्न रहेगा। ... तू कहना कुछ मत, बस जान ले, इस महल में अब तू अकेली नहीं है।"

एक दूसरा इंसान अब उस राज़ को जानता था, पर ये इंसान हथियार नहीं, दीवार बनना चुन चुका था। ... जो मोहब्बत शारदा ने उस निकाले बेटे से की थी, वो आज उसकी बेटी के सिर पर छत बन कर तन गई।

" पर सुन, बेटी। ख़तरा टला नहीं है।" ... शारदा ने वो काग़ज़ फिर आँचल में छुपा लिया। " जयदेव बाबू के जासूस अब भी हर नई भरती की तस्वीर खोद रहे हैं। इस बार मैं बचा ले गई, अगली बार शायद न पाऊँ। ... और उस रेयांश से ज़रा फ़ासला रख, उसकी नज़र तुझ पर बहुत देर से टिकी है।"

अद्विका ने महीनों में पहली बार अपने आप को उन बूढ़े कंधों पर टिका दिया। " मेरी माँ के जाने के बाद... किसी ने मुझे बेटी नहीं कहा था, ताई।" ... और शारदा ने इस पूरी चेन की मालकिन को यूँ सीने से लगाया, जैसे कोई खोई बच्ची घर लौट आई हो।

रात ठीक नौ बजे रेयांश उस तिजोरी वाले कमरे में अकेला पहुँचा। ... और वहाँ, तिजोरी के हैंडल पर, एक मुड़ा काग़ज़ फँसा था, जो सिर्फ़ उसी को मिलता जो ये दराज़ खोलने आता। ... किसी ने चोरी नहीं की थी, किसी ने उसे आगाह किया था।

रेयांश ने वो काग़ज़ खोला, और एक ही लाइन पढ़ी। " 'अकेले मत आइए। आज रात की आपकी बात ग़लत कानों तक पहुँच चुकी है।'" ... कोई नाम नहीं, कोई दस्तख़त नहीं। पर उन अक्षरों का ठहरा हुआ ढंग रेयांश अब पहचानने लगा था।

रेयांश ने तीनों सिरे मन ही मन जोड़े। ... तूफ़ान की रात किसी ने कहा था, 'जो अंदर से खाता है वो भरोसेमंद चेहरे के पीछे छुपता है', और वो सच निकला। बैठक में फुसफुसाया, 'मरी हुई फ़र्म ज़िंदा दस्तख़त नहीं करती', वो भी सच। ... और अब ये काग़ज़। तीनों बार, एक ही झुका चेहरा।

उसने घंटी बजाई, और थोड़ी देर में वही चेहरा दरवाज़े पर था, जो हर सिरे के दूसरे छोर पर खड़ा मिलता था। ... रेयांश ने वो काग़ज़ दो उँगलियों में उठाया और उसकी तरफ़ देखा, हर साँस तौलता।

" ये किसी ने तिजोरी पर छोड़ा था, ठीक उस लम्हे पर जब मैं वहाँ अकेला होने वाला था।" ... रेयांश उठ कर उसके ठीक सामने आ खड़ा हुआ, बहुत क़रीब। " अजीब है, अद्विका, कि आज सिर्फ़ तुमने कहा था, 'जो छुप कर पहरा देता है, उसका छुपा रहना ही आपकी हिफ़ाज़त है।' ... और आज रात, ठीक वैसा ही एक साया मुझे बचा गया।"

अद्विका की साँस एक पल रुक गई, वो बहुत क़रीब था। " सर, महल में सैकड़ों लोग हैं। कोई एक अच्छी बात कह दे, तो वो हर उस इंसान की हो सकती है जो आपका भला चाहता है।" ... पर वो एक इंच भी पीछे नहीं हटी, और उसका न हटना ख़ुद एक इक़रार था।

और उसी पल रेयांश जान गया। ... अभी काग़ज़ का सबूत नहीं था, पर उसके ख़ून में यक़ीन उतर गया, जो साया उसे दो बार बचा चुका था, वो यही लड़की थी। ... जो नौकरानी उसका पानी भरती थी, वही उसकी जान की ख़ामोश पहरेदार थी।

रेयांश एक क़दम पीछे हटा, चेहरा फिर पत्थर। " जाओ। ... पर एक बात याद रखना, अद्विका। इस महल में जो मुझे बचाता है, एक दिन मुझे उसका चेहरा देखना ही है। ... और उस दिन मैं यही पूछूँगा, उसने ख़ुद को मुझसे छुपाया क्यों।" ... और अद्विका वो लफ़्ज़ सीने में पत्थर की तरह लिए निकल गई।

गलियारे में अद्विका दीवार से टिक गई, रेयांश के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी कानों में गूँज रहे थे। ... वो उसे ढूँढ रहा था, और उसका पागल दिल उसी की तरफ़ झुक रहा था, जिसका सब कुछ उसके अपना नाम लेते ही छिन जाना था। ... अब उसके पीछे दो शिकारी थे, एक जो उसे बचाता, एक जो मिटाता।

रात गहरा गई, दफ़्तर ख़ाली हो गया, और तभी दरवाज़े पर वो दस्तक हुई जिसका असली चेहरा रेयांश कल रात ही देख चुका था। ... कुणाल अंदर आया, चेहरे पर वही पुरानी अपनाइयत, हाथ में एक फ़ोल्डर।

" सर, आपने कहा था न, हर उस हाथ का नाम चाहिए जो अंदरूनी वेंडर कोड तक पहुँच सकता है।" ... कुणाल ने फ़ोल्डर मेज़ पर रखा, आवाज़ में फ़िक्र की झूठी परत। " मैंने रात-दिन छानबीन की, सर। और एक बात निकली, जो आपको बतानी ही थी, आपकी हिफ़ाज़त के लिए।"

रेयांश ने चुपचाप देखा, वही आदमी जिसका दस्तख़त हर चोरी के नीचे दबा था, अपनी दग़ा को दवा की तरह पेश कर रहा था। ... वही फ़ोल्डर, जो उसने कल रात कुणाल की दराज़ में देखा था, आज ख़ुद चल कर उसकी मेज़ पर आ बैठा था।

" वो नई वाली, अद्विका देशमुख।" ... कुणाल ने वो पन्ना आगे सरका दिया, एक नाम पर लाल घेरा। " ये लड़की हर उस जगह मौजूद रहती है जहाँ आपका कोई राज़ खुलता है, सर। मैंने काग़ज़ खँगाले, भरती में जो नाम दिया, 'देशमुख', वो इसके स्कूल के किसी रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता। ... ये जो है, वो नहीं है जो बताती है। शायद गिद्धों की भेजी जासूस।"

और रेयांश की नज़र उस लाल घेरे पर जम गई, और उसके पैरों तले फ़र्श एक बार फिर खुल गया। ... जिस साये ने आज उसे दो बार बचाया, और जिस नाम को उसका अपना ग़द्दार झूठ साबित कर रहा था, वो एक ही औरत थी।

रेयांश ने वो पन्ना धीरे से उठाया, चेहरे पर एक लकीर नहीं हिली। " अच्छा किया जो बताया, कुणाल।" ... उसने फ़ोल्डर बंद कर अपनी तरफ़ खींच लिया। " इस लड़की का हिसाब अब मैं ख़ुद देखूँगा। तुम जाओ। ... और ये बात इस कमरे से बाहर न जाए।"

कुणाल संतुष्ट होकर निकल गया, बेख़बर कि जिस मेज़ पर वो एक नाम घेर गया था, उसका अपना नाम रेयांश के ज़हन में उससे कहीं गाढ़े घेरे में क़ैद था। ... और रेयांश उस नामुमकिन फ़ाइल के साथ अकेला रह गया।

रेयांश की उँगली उस लाल घेरे पर धीरे-धीरे फिरी, उस नाम पर जो किसी रिकॉर्ड में मौजूद नहीं था। " जो औरत मुझे बचा रही है... उसका अपना नाम ही एक झूठ है।" ... " तुम आख़िर हो कौन, अद्विका देशमुख? ... और किस चीज़ को इतनी बुरी तरह छुपाए बैठी हो?"

और सिर्फ़ सुनने वाला उसके सवाल का जवाब जानता था। ... 'अद्विका देशमुख' किसी रिकॉर्ड में इसलिए नहीं मिलती थी, क्योंकि वो नाम कभी था ही नहीं। जिसे रेयांश आज रात से ढूँढने निकल पड़ा था, उसका असली नाम अद्विका राठौर था। ... और जो आदमी उस झूठे नाम का पीछा कर रहा था, वो उसी दिन अपना सब कुछ खो देगा जिस दिन वो नाम सच बन जाएगा, इस महल की गुमनाम मालकिन का असली नाम।

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