Chapter 25 of 30
साल पूरा हुआ
शताब्दी से एक रात पहले पूरा साल ऐन बेनक़ाबी की दहलीज़ पर बिखरते-बिखरते बचता है, जब किनारे लगी मल्विका अद्विका को एक दिन पहले ही बेनक़ाब करने की आख़िरी चाल चलती है और जयदेव दावत रद्द करवाने के लिए ट्रस्ट की आपात बैठक बुलाता है, पर रेयांश अपनी कुर्सी और साख दाँव पर लगा कर वो एक रात ख़रीद लेता है। बेनक़ाबी की पूर्व-संध्या पर दोनों लीड अपनी सबसे सच्ची, तड़पती रात एक-दूसरे को चुन कर जीते हैं, और भोर में अद्विका आख़िरी बार वर्दी पहनती है, विश्वनाथ उसके हाथ में सीलबंद वसीयत रखता है, और वो बोर्डरूम के दरवाज़ों की ओर चल पड़ती है।
शताब्दी से ठीक एक रात पहले, राठौर ग्रैंड अपने सौ साल की सबसे बड़ी रात के लिए सज रहा था, सुनहरे झूमर, मख़मली परदे, और लॉबी में वो सौ साल पुराना घड़ियाल जो कल रात ठीक बारह बजे बजने वाला था। पर ऊपर, कार्यकारी मंज़िल के सन्नाटे में, एक तूफ़ान ऊँची एड़ियों में चलता हुआ रेयांश के दफ़्तर की ओर बढ़ रहा था। मल्विका।
'कल की रात बड़ी ख़ास है, है ना रेयांश?' ... मल्विका ने दरवाज़ा बिना खटखटाए खोला और अंदर आ गई। 'सब समझते हैं कल सिर्फ़ सौ साल की दावत है। पर तुम और मैं जानते हैं, कल वो दिन भी है जब उस बूढ़े की वसीयत पकती है, ठीक एक साल। जिस दिन तुम्हारी वो वर्दी वाली अपना नाम ले सकती है।'
'तुम्हें दावत की तैयारी छोड़ कर ये पुरानी कहानियाँ सुनाना अच्छा लगता है, मल्विका।' ... रेयांश ने नज़रें अपनी फ़ाइल से नहीं हटाईं। 'कोई वारिस नहीं है। सिर्फ़ एक सीलबंद काग़ज़ है और एक भूत, जिसे तुम्हारे पिता साल भर से अदालतों में ढूँढ रहे हैं। कल दावत है, बस इतना ही।'
'भूत?' ... वो उसकी मेज़ पर झुक आई, आवाज़ शहद से भी धीमी। 'फिर वो भूत तुम्हारी कॉफ़ी क्यों बनाता है, रेयांश? मैं जानती हूँ वो कौन है। और मैं इतनी बेवक़ूफ़ नहीं कि कल तक इंतज़ार करूँ, जब घड़ी उसके हक़ में हो जाए। मैं उसे आज रात बेनक़ाब करूँगी, बारह बजने से पहले, पूरे एक दिन पहले, और वो वसीयत काग़ज़ का एक जला हुआ टुकड़ा बन जाएगी।'
और यही वो एक चीज़ थी जिससे पूरे साल की योजना काँपती थी। अद्विका का नाम अगर आज रात, साल पूरा होने से एक रात पहले खुल जाता, तो गुमनामी की शर्त टूट जाती, वसीयत रद्द हो जाती, और सारा साम्राज्य बिना किसी लड़ाई के गिद्धों के हाथ आ गिरता। बस एक रात की दूरी पर पूरा खेल खड़ा था।
'और सिर्फ़ मैं नहीं।' ... मल्विका सीधी हुई, अपने नाख़ून मेज़ पर बजाती हुई। 'पिताजी ने आज रात के लिए ट्रस्टियों की एक आपात बैठक बुला ली है, अभी, कल की दावत से पहले। वो कहेंगे कि तुम चेन को डुबो रहे हो, और शताब्दी की आड़ में कोई साज़िश पक रही है। दावत रद्द, बोर्ड उनके क़ब्ज़े में, और तुम्हारी वो रात कभी आएगी ही नहीं।'
रेयांश पहली बार अपनी फ़ाइल से नज़र उठा कर खड़ा हुआ, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो उसने साल भर बचा कर रखी थी। 'तो सुन लो, मल्विका। वो आपात बैठक नहीं होगी। मैं कार्यकारी सीईओ हूँ, और शताब्दी की रात मैं किसी को इस चेन का तमाशा नहीं बनने दूँगा। तुम्हारे पिता को बैठक चाहिए, तो मेरे इस्तीफ़े के साथ, जो कल दावत के बाद ट्रस्ट के सामने रखा जाएगा, उससे एक मिनट पहले नहीं।'
रेयांश ने अभी-अभी अपनी वो आख़िरी चीज़ दाँव पर लगा दी थी जो उसके पास बची थी, अपनी कुर्सी, अपनी साख, अपना नाम। बस एक दिन ख़रीदने के लिए, उस लड़की के लिए, जिसके अपना नाम लेते ही वो ख़ुद इस महल में कुछ नहीं रह जाएगा। मल्विका ने उसकी आँखों में वो देखा, और उसकी मुस्कान एक पल को काँपी।
'तुम उसे बचा रहे हो।' ... मल्विका की आवाज़ से शहद उतर गया, नीचे सिर्फ़ बर्फ़ बची। 'तुम, जो कल सब कुछ खो दोगे। मैंने तुम्हें एक बार सौदा दिया था, उसके साथ या मेरे साथ। तुमने चुन लिया, ठीक है। तो आज रात मैं ख़ुद उसके तहख़ाने में उतरूँगी, और उसका नाम उसी के लोगों के सामने खोलूँगी। देखते हैं तुम कितनी बार बीच में आ पाते हो।'
उसी रात, तहख़ाने के लिनन-कमरे में, जहाँ साल भर की हर लड़ाई असल में लड़ी गई थी, अद्विका आख़िरी बार के तह किए हुए मेज़पोश गिन रही थी। और तभी, पहली बार, मल्विका ख़ुद नौकरों की उस सीढ़ी से नीचे उतरी, जहाँ उसके जैसे लोग कभी पाँव नहीं रखते।
'तो यहाँ छुपी बैठी है इस महल की मालकिन।' ... मल्विका ने एक तह किया हुआ मेज़पोश उठा कर घिन से नीचे गिरा दिया। 'अद्विका राठौर। ओह, माफ़ करना, अद्विका देशमुख। सिर्फ़ कल रात तक। मुझे सब पता है, तेरे कटे हुए बाप का नाम, वो लॉकेट, वो झूठा स्कूल रिकॉर्ड। एक इशारा, और मैं अभी, इसी वक़्त, तेरा सारा खेल तेरे इन्हीं झाड़ू वालों के सामने खोल दूँ।'
अद्विका ने न हाथ रोका, न नज़र उठाई, बस अगला मेज़पोश तह किया। 'छोटी मालकिन, आधी रात को तहख़ाने में एक नौकरानी को क्या समझाना चाहती हैं, मैं समझी नहीं। अगर मुझसे कोई ग़लती हुई है, तो सुबह मैनेजर साहब से कह दीजिएगा। मेरा नाम सूची में है, कल की ड्यूटी भी लगी है।'
'नाटक बंद कर।' ... मल्विका उसके क़रीब आई, आवाज़ एक फुसफुसाहट में उतर गई। 'तू सोच रही है कल तक बच जाएगी, तेरा साल पूरा होगा, तू अपना नाम ले लेगी। पर तेरे लिए कल आएगा ही नहीं, समझी? आज रात, बारह बजने से पहले, मैं तुझे बेनक़ाब कर दूँगी। पूरे एक दिन पहले। और तेरे दादा की वो वसीयत... राख।'
और यहाँ, इस एक फुसफुसाहट पर, पूरा साल एक घंटे की नोक पर आ कर ठहर गया। पर मल्विका के पास आज रात न ट्रस्टियों की वो बैठक थी, जिसे रेयांश ऊपर अपनी साख की क़ीमत पर रोक चुका था, न कोई मंच, न कोई गवाह। उसके पास सिर्फ़ ये धमकी थी, और एक नौकरानी जो पत्थर की तरह खड़ी थी।
अद्विका ने आख़िरकार नज़र उठाई, और सीधे मल्विका की आँखों में देखा। 'छोटी मालकिन, जो अपना घर बचाने के लिए आधी रात नौकरों के तहख़ाने तक ख़ुद उतर आए... शायद उसे अंदर से डर है कि घर पहले ही किसी और का हो चुका है। जाइए, आराम कीजिए। कल एक बहुत लंबा दिन है, आप सबके लिए।'
मल्विका ने वो लफ़्ज़ सुने, पर उनके नीचे दबा तमाचा नहीं सुना। वो एक पल ठिठकी, फिर पलट कर उन्हीं सीढ़ियों से ऊपर चली गई, ये सोचती हुई कि उसने लड़की को डरा दिया, ये जाने बिना कि जिसे वो कल बेनक़ाब करने चली थी, वो पहले ही उसके पैरों तले की ज़मीन अपने नाम कर चुकी थी। एक रात, बस एक रात बची थी।
रात के आख़िरी पहर में, जब पूरा महल सो गया था और सिर्फ़ दो दीये जल रहे थे, रेयांश तहख़ाने के उस तंग कमरे की चौखट पर आ खड़ा हुआ जहाँ अद्विका रहती थी। उस दिन की पूर्व-संध्या, जिसके ख़त्म होते ही वो कुछ नहीं रह जाएगा। उसके हाथ में कुछ नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई।
'मैंने आज रात वो बैठक रुकवा दी।' ... वो अंदर आया और दीवार से टिक कर बैठ गया, उससे बस एक हाथ की दूरी पर। 'कल दावत के बाद, जब तुम अपना नाम लोगी, ट्रस्ट के सामने मेरा इस्तीफ़ा रखा जाएगा। ये महल, ये कुर्सी, ये नाम जो देवनारायण ने मुझे दिया... कल के बाद कुछ मेरा नहीं होगा, अद्विका। और मैंने आज रात ख़ुशी-ख़ुशी उसकी आख़िरी क़िश्त चुका दी।'
'तुम मेरे लिए ये सब क्यों कर रहे हो?' ... अद्विका उसके पास ज़मीन पर आ बैठी, उसकी आवाज़ काँप रही थी। 'कल सुबह जो लड़की उस बोर्डरूम में ट्रे ले कर जाएगी, वही शाम तक तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीन लेगी। तुम ये जानते हो, और फिर भी तुम मेरे नाम की रखवाली कर रहे हो। ये मोहब्बत नहीं है, रेयांश, ये तो ख़ुदकुशी है।'
'शायद।' ... उसने हल्के से हँस कर उसके चेहरे पर गिरी एक लट पीछे की। 'पर मैंने पूरी ज़िंदगी एक मरे हुए आदमी का एहसान ढोया, एक ऐसा साम्राज्य संभाला जो कभी मेरा था ही नहीं। कल वो बोझ मेरे कंधों से उतर जाएगा। और उसकी जगह सिर्फ़ तुम बचोगी। कल के बाद मैं कोई सीईओ नहीं रहूँगा, पहली बार सिर्फ़ एक आदमी रहूँगा, जो तुमसे मोहब्बत करता है। मुझे उस आदमी से डर नहीं लगता, अद्विका।'
और उस एक बात पर साल भर का सारा कवच, दोनों का, आख़िरकार उतर गया। कल रात के बाद न कोई मालकिन थी, न कोई मालिक, न कोई नौकरानी, न कोई सीईओ। आज रात, इस आख़िरी रात, वो सिर्फ़ दो लोग थे जिन्होंने एक-दूसरे को उस सब के बावजूद चुना था जो कल उन्हें तोड़ने वाला था।
अद्विका ने अपना माथा उसके माथे से टिका दिया, उसकी साँस उसके होंठों पर काँप रही थी। 'मैं साल भर ख़ुद से कहती रही कि मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ, कि तुमने पहली रात मुझे बारिश में निकाला था। पर सच ये है कि मैं उसी आदमी से मोहब्बत कर बैठी जिसका सब कुछ मुझे छीनना है। और आज रात... आज रात मैं उसी सच के साथ जीना चाहती हूँ। कल की क़ीमत कल चुका लूँगी।'
रेयांश ने उसका चेहरा दोनों हथेलियों में भर लिया, और उनके बीच की वो आख़िरी दहलीज़ बस एक साँस की रह गई। 'तो कल को कल पर छोड़ दो।' ... उसकी आवाज़ भारी थी। 'सिर्फ़ आज रात, कोई वसीयत नहीं, कोई गिद्ध नहीं, कोई नाम नहीं। सिर्फ़ तुम और मैं। बस इतनी सी एक रात मुझे दे दो, अद्विका। बाक़ी पूरी दुनिया कल ले लेना।'
और फिर वो आख़िरी दहलीज़, जिस पर वो पंद्रह रातों से रुके हुए थे, इस बार कोई अलार्म, कोई तूफ़ान, कोई मल्विका उसे तोड़ने नहीं आई। दीये की लौ धीमी हुई, तहख़ाने का वो तंग कमरा दुनिया से कट गया, और उस पूरी रात में सिर्फ़ दो लोग थे जिन्होंने एक-दूसरे को चुना, उस सुबह से ठीक पहले जो एक को सब कुछ और दूसरे को कुछ नहीं देने वाली थी।
और फिर सुबह आ गई, शताब्दी की सुबह, राठौर ग्रैंड के सौ साल की सुबह। तहख़ाने के उस कमरे में एक धुली हुई नौकरानी की वर्दी तह करके रखी थी, आख़िरी बार। और उसके पास शारदा ताई खड़ी थी, आँखों में चालीस साल का पानी।
'अपना सिर ज़रा झुका, बेटी, ये आख़िरी बार।' ... शारदा ने काँपते हाथों से उसकी वर्दी का फ़ीता बाँधा, फिर लॉकेट को उसके गले में सीधा किया। 'इसी वर्दी में उन्होंने तुझे पैरों की धूल समझा था। आज इसी वर्दी में तू उस मेज़ तक जाएगी, और फिर कभी किसी के आगे नहीं झुकेगी। तेरे बाप की ये निशानी तेरे सीने पर है, और वो नन्ही गुड़िया, जिसे देवनारायण साहब मरते दम तक पुकारते रहे... आज घर लौट रही है।'
अद्विका ने आईने में अपने आप को देखा, नौकरानी की वही वर्दी, और उसके नीचे साल भर में तराशा हुआ पत्थर। 'चालीस साल आपने ये घर संभाला, ताई। बंसी ने बिना जाने मेरी पहरेदारी की, तहख़ाने के हर चेहरे ने मुझे अपना माना। आज मैं उस मेज़ पर उन सबके लिए जाऊँगी। जो लड़की एक साल पहले बारिश में निकाली गई थी, वो आज उसी दरवाज़े से अंदर जाएगी।'
और नौकरों की उसी सीढ़ी के सिरे पर विश्वनाथ खड़ा था, वही बूढ़ा वकील जिसने एक साल पहले बारिश में भीगी एक बेंच पर उसे उसका सच सौंपा था। उसके हाथ में वही सीलबंद लिफ़ाफ़ा था, देवनारायण की वसीयत, जो पूरे एक साल एक तिजोरी में साँस रोके पड़ी थी। आज उसकी मुहर टूटनी थी।
'एक साल पहले मैंने ये तुम्हारे हाथ में रखा था, और कहा था, एक साल गुमनाम रहना।' ... उसने वो लिफ़ाफ़ा उसकी हथेलियों में रखा और उस पर अपने दोनों बूढ़े हाथ रख दिए। 'वो साल आज पूरा हुआ, बेटी। शर्त पूरी हुई, वसीयत ज़िंदा है, और दादा का ख़ून अपने घर लौट आया है। आज के बाद कोई अद्विका देशमुख नहीं। सिर्फ़ अद्विका राठौर।'
अद्विका ने वो लिफ़ाफ़ा दोनों हाथों में यूँ थामा जैसे कोई अपने खोए हुए घर की चाबी थामे। 'अद्विका देशमुख।' ... उसने वो झूठा नाम आख़िरी बार धीरे से कहा, जैसे किसी पुरानी दोस्त को अलविदा कह रही हो। 'तूने मुझे एक साल ज़िंदा रखा, और अपना नाम मुझे उधार दिया। अब सो जा। यहाँ से आगे जो चलेगी, वो राठौर है।'
और फिर वो पलटी, ट्रे उठाई, और उस लंबे संगमरमरी गलियारे पर चल पड़ी जिसके सिरे पर बोर्डरूम के वो भारी दरवाज़े थे, वही दरवाज़े जिन्होंने एक साल पहले उसे बाहर धकेल दिया था। गले में बाप का लॉकेट, हाथ में एक ट्रे, और सीने में एक साल का बँधा हुआ तमाचा। और ठीक उसी पल, लॉबी में सौ साल पुराना वो घड़ियाल शताब्दी का पहला घंटा बजा उठा। डोंग... सौ साल का वो पहला गहरा घंटा पूरे महल में काँप गया, और उसकी उसी गूँज के साथ बोर्डरूम के भारी दरवाज़े अद्विका राठौर के आगे धीरे-धीरे खुलने लगे।
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