Chapter 15 of 30
पहली दहलीज़
पंद्रह रातों से रुकी वो दहलीज़ आख़िरकार पार हो जाती है, कुणाल की ग़द्दारी का फंदा साथ मिल कर कसते-कसते रेयांश और अद्विका के बीच वो बोसा उतर आता है जिसका दोनों को इंतज़ार था, और एक पल को दोहरी ज़िंदगी ख़ामोश पड़ जाती है, बस दो लोग जिन्होंने एक-दूसरे को चुन लिया। पर यही मध्य-बिंदु है, मंज़िल नहीं, उसी रात वो बोसा ज़हर बन जाता है, क्योंकि अद्विका उसी आदमी से मोहब्बत कर बैठी है जिसका सब कुछ उसे एक दिन छीनना है, वो राज़ अब उसके मुँह में सीसे सा भारी है, और वो टूट कर उसे रोक देती है। उधर पूरे महल में मल्विका अपने हथियार को छुरी में बदल चुकी है, कटे हुए नाम, स्कूल के रिकॉर्ड और लॉकेट को जोड़ कर वो गु
उस रात के बाद मल्विका राठौर की नींद उड़ चुकी थी, पर सुकून उसके चेहरे पर पत्थर सा जमा था, जो नाम जयदेव की पूरी फ़ौज महीनों में नहीं ढूँढ पाई, वो पीला काग़ज़ अब उसकी दराज़ में बंद था। ... और वो जानती थी कि ऐसा हथियार जल्दबाज़ी में नहीं, धीरे-धीरे तराशा जाता है, जब तक उसकी धार क़ातिल न बन जाए।
" जो काग़ज़ तुमने भेजा, उसमें बाप का नाम स्याही से कटा है। मुझे कटा हुआ नहीं, पूरा नाम चाहिए।" ... मल्विका खिड़की के पास खड़ी थी, फ़ोन कान से लगाए। " उस लड़की के स्कूल का रिकॉर्ड, उसका पुराना पता, उसकी माँ, सब। ... मुझे 'अद्विका देशमुख' और उस बचे हुए लफ़्ज़ 'राठौर' के बीच की एक-एक कड़ी चाहिए, इससे पहले कि मैं ये पत्ता खोलूँ।"
और मल्विका ने ये राज़ अपने बाप जयदेव को नहीं बताया था, अभी नहीं।
क्योंकि जयदेव के हाथ लगते ही ये सिर्फ़ एक क़त्ल बन जाता, पर उसके अपने हाथ में यही पत्ता दोनों खेल जिता सकता था, साम्राज्य भी, और रेयांश भी।
" बेचारा रेयांश। इतना घमंडी, और इतना अंधा।" ... उसकी बर्फ़ीली मुस्कान गहरी हुई। " जिस लड़की के लिए तू मेरी तरफ़ पीठ कर रहा है, उसी का हाथ थाम कर तू अपनी क़ब्र खोद रहा है। ... और मैं वो दिन देखूँगी जब तुझे ख़ुद अपने हाथों से उसे उस क़ब्र में उतारना पड़ेगा।"
और उसी महल की तीन मंज़िल नीचे, तहख़ाने की दुनिया में मौसम कुछ और ही था, वसीयत की घड़ी में अब तीन सौ चौबीस रातें बची थीं, पर हँसी के शोर में वो टिक-टिक किसी को सुनाई नहीं देती थी। ... और सबसे ऊँची आवाज़, हमेशा की तरह, बंसी की थी।
" मैं तो कहता हूँ छोटी, अब तेरी क़िस्मत का ताला खुल गया!" ... बंसी ने कड़छी हवा में घुमाई, आँखें नचाते हुए। " कल साहब ने पूरी लिफ़्ट रोक कर तेरा इंतज़ार किया, मैंने अपनी इन्हीं आँखों से देखा! ... जिस दिन तू ब्याह कर ऊपर वाली मंज़िल पर पहुँचेगी न, ये बंसी तेरे दरबार का पहला वज़ीर बनेगा, अभी से लिख के रख ले!"
" वज़ीर? तू तो पूरी रसोई अकेले चट कर जाएगा, बंसी।" ... अद्विका हँसी, पर वो हँसी आधे रास्ते ठिठक गई, जैसे किसी काँटे से अटक गई हो। " और ये सपने मत बुना कर। अपने जैसों के लिए ऊपर वाली मंज़िलें बनती नहीं, बस झाड़ू लगाने भर को खुलती हैं।"
पर उस पूरे शोर में एक जोड़ी आँखें हँस नहीं रही थीं, शारदा ताई ने उस सुबह कुछ देखा था जो उसके चालीस साल के तजुर्बे को काँटे की तरह चुभ गया था। ... उसने चुपके से अद्विका की कलाई थामी और उसे सीढ़ियों की ओट में खींच लिया।
" बेटी, आज सुबह एक अजनबी नीचे रिकॉर्ड वाले बाबू से तेरे बारे में पूछ रहा था।" ... शारदा ने उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में कस लिया। " देशमुख नहीं, वो तेरा पुराना पता पूछ रहा था, तेरे स्कूल का नाम। ... कोई है जो तुझे जड़ से खोद रहा है, अद्विका। सँभल जा। ये महल जितना ऊपर से चमकता है, नीचे से उतना ही निगलता है।"
" जानती हूँ, ताई।" ... उसने शारदा की काँपती हथेली को थपथपाया, अपनी घबराहट को भीतर ही भीतर दबाते हुए। " बस कुछ महीने और। इतनी मोहलत तो है कि वो मेरे अतीत तक पहुँचें, उससे पहले वो साल पूरा हो जाएगा। ... और उस दिन खोदने वाले नहीं, मैं तय करूँगी कि इस महल में कौन किसका पता पूछेगा।"
उसी रात, महल की सबसे ऊँची मंज़िल पर एक अकेली बत्ती जल रही थी, और रेयांश की उस बंद दराज़ में वो फ़ाइल पड़ी थी जिसे वो किसी को छूने नहीं देता था, अपने सबसे भरोसेमंद कुणाल की ग़द्दारी का सबूत। ... और आज रात वो चुपचाप उसी फंदे का आख़िरी सिरा कस रहा था, अकेला नहीं, उसके साथ वो लड़की थी।
" मिल गया, अद्विका। जिस फ़र्ज़ी फ़र्म को हर महीने दुगना पैसा जाता था, उसके काग़ज़ों पर कुणाल के अपने दस्तख़त हैं।" ... उसने एक काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया, आवाज़ में बरसों का ज़ख़्म। " जिस आदमी को मैंने अपना भाई माना, वही जयदेव का ख़रीदा हुआ छुरा निकला। ... बस एक और टुकड़ा, और मैं उसे उसी की मेज़ पर बेनक़ाब करूँगा।"
अद्विका ने काग़ज़ पर नज़र दौड़ाई, और एक टूटी हुई कड़ी चुपके से जोड़ दी। " सर, अकेला दस्तख़त अदालत में कमज़ोर पड़ जाता है।" ... उसने उँगली एक तारीख़ पर रखी। " इसी तारीख़ को वो फ़र्म काग़ज़ों में जन्मी, और ठीक इसी हफ़्ते कुणाल के खाते में दुगनी रक़म आई। पैसा झूठ नहीं बोलता, सर। यही उसका असली फंदा है।"
रेयांश ने काग़ज़ से नज़र उठाई और कुछ पल बस उसे देखता रहा, जैसे पहली बार देख रहा हो। " तुम्हें पता है तुमने अभी क्या कर दिया? मेरे वकीलों की पूरी फ़ौज हफ़्तों में जो नहीं जोड़ पाई, वो तुमने एक साँस में जोड़ दिया।" ... आवाज़ धीमी हो गई। " कभी-कभी लगता है, अद्विका, इस डूबते महल को बचाने के लिए मेरी नहीं, तुम्हारी ज़रूरत है।"
और सुनने वाले का दिल एक बार फिर उसी ज़ालिम सच पर ठहर गया। ... जिस साम्राज्य को बचाने के लिए वो उसकी ज़रूरत बता रहा था, वो पहले से ही उसी लड़की का था, और रेयांश उस मालकिन को उसका ही घर बचाना सिखा रहा था, इसकी ख़बर तक न रखते हुए।
" और ये सब बचा कर भी, अद्विका, एक डर है जो सीने से जाता ही नहीं।" ... उसने उस बंद वसीयत की तरफ़ इशारा किया जो उसके ज़हन में हमेशा खुली रहती थी। " कि एक दिन वो गुमनाम वारिस इसी दरवाज़े से आएगा, और जिस जंग में मैं अपना ख़ून जला रहा हूँ, उसकी सारी जीत उसकी झोली में गिर जाएगी। ... न जाने वो कौन है, कहाँ छुपा बैठा है।"
अद्विका की साँस एक पल को रुकी, पर चेहरा पत्थर बना रहा। " हो सकता है, सर, वो वारिस इस लड़ाई से उतना ही थका हो जितने आप।" ... उसने सीधे उसकी आँखों में देखा, आवाज़ धीमी। " और हो सकता है वो पहले से ही यहीं कहीं हो, आपके इतने पास कि आप देख कर भी न देख पाएँ।"
और उस एक जुमले के बाद कमरे की सारी हवा बदल गई, रेयांश ने उसे कुछ ज़्यादा ही देर तक देखा, जैसे उन लफ़्ज़ों के नीचे कोई और आवाज़ सुन रहा हो। ... महीनों का वो सारा ज़ब्त, वो हर रुका हुआ क़दम, आज रात एक धागे जितना पतला रह गया।
" हर बार तुम कुछ ऐसा कह जाती हो कि मेरे पैरों तले की ज़मीन हिल जाती है।" ... वो मेज़ घूम कर उसके सामने आ खड़ा हुआ, इतने पास कि उसकी साँस अद्विका के माथे को छू रही थी। " मैंने पूरी उम्र हर चीज़ को दिमाग़ के तराज़ू पर तौला है, अद्विका। पर जब तुम्हें तौलने बैठता हूँ, तो दिमाग़ हर बार हार जाता है।"
अद्विका काँपी, पर इस बार पीछे नहीं हटी। " सर, ये... ये ठीक नहीं है।" ... उसके अपने ही लफ़्ज़ गले में टूट गए, क्योंकि दिल कुछ बिलकुल उलटा कह रहा था। " आप जो हैं, और मैं जो हूँ... इन दोनों के बीच एक पूरी दुनिया खड़ी है।"
" इस एक पल में न कोई मालिक है, न कोई नौकरानी।" ... उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर आ ठहरीं, आँखें उसके होंठों पर टिकीं। " बस तुम हो, और मैं हूँ, और ये एक रात, जो न किसी वसीयत की मोहताज है, न किसी नाम की।"
और वो दहलीज़ जिस पर वो पंद्रह रातों से ठहरे थे, आज दोनों ने साथ पार कर ली। ... रेयांश ने उसके होंठों को अपने होंठों से छू लिया, और सारी दुनिया, महल, वसीयत, गिद्ध, नाम, सब एक पल को ख़ामोश पड़ गए। ... उस एक साँस में न कोई मालकिन थी, न कोई कार्यवाहक मालिक, बस दो लोग थे जिन्होंने एक-दूसरे को चुन लिया था।
बरसों से जिस दोहरी ज़िंदगी का बोझ उसके सीने पर धरा था, वो पहली बार पूरी तरह ख़ामोश पड़ गया, और अद्विका ने ख़ुद को इजाज़त दी कि वो सिर्फ़ महसूस करे, सोचे नहीं, डरे नहीं।
पर कोई बोसा किसी इतने भारी राज़ को ज़्यादा देर ख़ामोश नहीं रख सकता।
और फिर, जैसे किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी उँडेल दी हो, सारी दुनिया वापस लौट आई, और वो राज़ जो अब तक भारी था, इस बोसे के बाद उसके मुँह में पिघले सीसे की तरह भर गया। ... अद्विका एक झटके से पीछे हटी, हाथ अपने होंठों पर, आँखों में आँसू और दहशत एक साथ उमड़ते हुए।
" नहीं... ये मैंने क्या कर दिया।" ... उसकी आवाज़ काँपी, आँखें छलक आईं। " सर, आप नहीं जानते आप किसे चूम रहे हैं। जिस दिन आपको मेरा सच पता चलेगा, आप इस एक पल को अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती कहेंगे।"
" अद्विका, रुको तो। कौन सा सच?" ... उसने उसका हाथ थामना चाहा, पर वो हवा में ही रह गया। " मुझे तुम्हारे किसी सच से डर नहीं। मैंने तुमसे कहा था न, इस पूरे महल में पहली बार अगर किसी पर भरोसा है, तो वो सिर्फ़ तुम पर है।"
और वही भरोसा उस पूरी रात का सबसे तेज़ चाकू था। ... वो उस एक हाथ पर भरोसा कर रहा था जो एक दिन उसकी हर चीज़ ख़ाली कर देगा, और अद्विका उसकी मोहब्बत और उसकी तबाही, दोनों को एक साथ अपने सीने में नहीं ढो सकती थी।
" मुझे जाने दीजिए, सर। ... आज रात को यहीं, इसी दहलीज़ पर रोक दीजिए, इससे आगे मत बढ़िए।" ... उसने दरवाज़े की तरफ़ काँपते क़दम बढ़ाए। " क्योंकि मैं आपको इतना चाहने लगी हूँ कि आपको खोने से पहले ही आपको खोने के डर से मरी जा रही हूँ।"
और वो पलट कर भाग गई, और रेयांश उस अकेली बत्ती के नीचे खड़ा रह गया, हाथ अब भी आधे हवा में।
जो एक शुरुआत होनी चाहिए थी, वो किसी अलविदा जैसी लगी, बोसा आ चुका था, और उसी एक रात ने उसे ज़हर भी दे दिया था।
नीचे अद्विका अपने तकिये में सिसक रही थी, और ऊपर मल्विका का हथियार तराश कर तैयार हो चुका था, जासूस ने हर कड़ी जोड़ दी थी, कटा हुआ नाम, स्कूल का पुराना रिकॉर्ड, लॉकेट में बंद वही चेहरा। ... और अगली दोपहर वो एक पतली नीली फ़ाइल सीने से लगाए रेयांश के दफ़्तर की तरफ़ बढ़ी।
रेयांश रात भर सो नहीं पाया था, उसकी नज़र बार-बार उसी दरवाज़े पर जाती थी जिससे रात अद्विका भाग गई थी। ... बिना दस्तक के दरवाज़ा खुला, मल्विका अंदर दाख़िल हुई, और उसने वो नीली फ़ाइल उसकी मेज़ पर यूँ रखी जैसे शतरंज का आख़िरी मोहरा बिठा रही हो।
" बुरा वक़्त तो नहीं आई, रेयांश? तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि तुम रात भर किसी के ख़्याल में जागते रहे हो।" ... मल्विका ने टाँग पर टाँग रखी, नज़र उसके चेहरे पर गड़ाए। " मैं तुम्हारे लिए एक तोहफ़ा लाई हूँ। इस पूरे महल का सबसे बड़ा राज़, इस पतली सी फ़ाइल में बंद।"
" मल्विका, अगर ये तुम्हारी अगली कोई चाल है, तो मेरे पास आज इसके लिए वक़्त नहीं।" ... उसने फ़ाइल की तरफ़ नज़र तक नहीं उठाई। " अपने खेल अपने बाप के साथ खेलो। मेरा दिमाग़ आज कहीं और उलझा है।"
" तुम्हारा दिमाग़ कहाँ उलझा है, ये मुझे अच्छी तरह पता है, रेयांश। उसी नौकरानी में, है न?" ... उसने वो फ़ाइल उसकी तरफ़ सरका दी। " जिस गुमनाम वारिस के डर से तुम्हारी नींद उड़ी है, जिसे तुम्हारी पूरी फ़ौज नहीं ढूँढ पाई... उसे मैंने ढूँढ लिया है। और वो इसी महल में, तुम्हारी नाक के नीचे साँस ले रहा है।"
रेयांश के हाथ की क़लम रुक गई, उसने पहली बार सिर उठा कर उसे देखा, पर उसे अभी नहीं पता था कि जिस वारिस का ज़िक्र मल्विका कर रही है, और जिस लड़की के ख़्याल में वो रात भर जागा, वो दोनों एक ही हैं। ... और मल्विका ने वार से ठीक पहले का वो आख़िरी पल जी भर के जिया।
" रेयांश... जिस लड़की को तुम दिल दे बैठे हो..." ... उसने फ़ाइल का पहला काग़ज़ पलटा, वो कटा हुआ नाम, और उसके नीचे बचा वही एक लफ़्ज़, राठौर। " वही तुम्हारा सब कुछ छीनने वाली है। तुम्हारी 'अद्विका देशमुख', असल में अद्विका राठौर है, देवनारायण की इकलौती वारिस, इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन।"
और वो हथियार, जो पंद्रह रातों से चुपचाप तराशा जा रहा था, आख़िरकार सीधे उस मोहब्बत के सीने पर तन गया, और अब वो राज़, जो अब तक सिर्फ़ सुनने वाला जानता था, दुश्मन की मुट्ठी में था। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि रेयांश की पूरी दुनिया अभी एक छुरी की नोक पर रखी है, और वो नोक अब सीधे अद्विका के दिल की तरफ़ मुड़ने वाली थी।
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