अध्याय 7 / 30
नौकरी या जंग
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
मल्विका, अद्विका को ख़तरा मान कर उसके बंद लॉकर में एक मेहमान के हीरे रखवा कर चोरी का इल्ज़ाम मढ़ देती है, और इस बार फ़ैसला ख़ुद रेयांश को सुनाना है, जो पहली बार किसी को बेइज़्ज़त करने से पहले ठिठक जाता है। अद्विका गिड़गिड़ाने के बजाय मास्टर चाबी के रजिस्टर पर मल्विका के ही आदमी का नाम रौशनी में ले आती है, अपना पहला ख़ामोश तमाचा, पर उसी रात मल्विका उसे सुनसान गलियारे में घेर कर धमकी देती है कि उसका हर छुपा राज़ वो खोद कर निकाल कर रहेगी।
वक़्त जैसे उस कमरे में जम गया था। फ़र्श पर बिखरी वसीयत के काग़ज़, दो झुके साये, और उन दोनों के बीच वो आधा टूटा लफ़्ज़, 'दा...', अब भी किसी नंगी तलवार की तरह हवा में लटका हुआ। ... रेयांश की उँगलियाँ अब भी अद्विका के हाथ पर थीं, और उसकी आँखें उसके चेहरे की एक-एक लकीर पढ़ रही थीं, जैसे किसी बंद ताले की चाबी ढूँढ रहा हो।
"दासी..." ... अद्विका ने बहुत धीरे से कहा, और उसी नरमी में अपना हाथ उसके हाथ के नीचे से खींच लिया। "बस यही कहने वाली थी, सर। दासी हूँ इस घर की। ... रात के इस पहर में एक थके इंसान को हर अधूरे लफ़्ज़ में कोई पूरा राज़ सुनाई देने लगता है।"
"झूठ।" ... रेयांश ने उसका हाथ एक पल के लिए फिर थाम लिया, आवाज़ धीमी पर पत्थर जैसी। "तुम्हारे लफ़्ज़ 'दासी' कहते हैं, अद्विका... पर तुम्हारी आँखें कुछ और। ... मैंने इस महल में सैकड़ों नौकर देखे हैं। कोई मेरी आँखों में ऐसे नहीं देखता, जैसे उसे किसी से डरने की ज़रूरत ही न हो।"
अद्विका ने आख़िरी काग़ज़ फ़ाइल में रख कर उसे मेज़ पर रखा, नज़र झुकाए बिना। "शायद इसलिए, सर, क्योंकि जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता, उसकी आँखों में डर उगता ही नहीं। ... आप कई रातों से सोए नहीं। थकी आँखों को कभी-कभी हर चेहरे में कोई पुराना चेहरा दिखने लगता है।"
तभी मेज़ पर रखा इंटरकॉम तेज़ बज उठा, और उस कमरे में जमा वक़्त अचानक बिखर गया। ... रेयांश ने रिसीवर उठाया, और अद्विका ने उसी पल को अपनी ढाल बना कर, दो क़दम पीछे हट कर, फिर से एक मामूली परछाईं बन गई।
रेयांश ने रिसीवर रखा। "जाओ। ... रात बहुत हो गई।" ... और जब अद्विका दरवाज़े तक पहुँची, उसकी आवाज़ ने उसे पीछे से रोका। "अद्विका।" ... उसने पलट कर देखा। "मैं चीज़ें भूलता नहीं। एक बार जो मेरी आँख में खटक जाए... उसका पीछा तब तक नहीं छोड़ता, जब तक उसे पूरा जान न लूँ।"
उस रात के बाद के दिन एक अजीब कशमकश में बीते। अद्विका दिन-रात उस आदमी की परछाईं बनी रही, और रेयांश चुपचाप उन दो बिलों के पीछे पड़ गया जो उसने पकड़वाए थे, उस काले कुएँ की तह तक जाने की कोशिश में जिसमें हर महीने करोड़ों गिर रहे थे। ... तीन सौ अड़तालीस दिन बाक़ी थे।
पर इस महल में एक और जोड़ी आँखें भी अब अद्विका पर गड़ चुकी थीं। मल्विका राठौर देख रही थी, कि किस तरह रेयांश की सख़्त नज़र उस नौकरानी पर आ कर नरम पड़ जाती है, और किस तरह उसी की उँगलियाँ इस होटल के हिसाब-किताब के ख़तरनाक हद तक क़रीब पहुँच रही हैं।
राठौर ग्रैंड के सबसे आलीशान कमरे में, शीशे के सामने बैठी मल्विका अपने गले का हीरों का हार खोल रही थी। ... उसके पीछे खड़ा उसका ख़ास आदमी सिर झुकाए, चुपचाप हुक्म का इंतज़ार कर रहा था।
"एक लड़की," ... मल्विका ने आईने में अपने अक्स से कहा, हर लफ़्ज़ शहद में डूबा और ज़हर से भरा। "एक मामूली वेट्रेस, जिसका घमंड मुझे फूटी आँख नहीं सुहाता। रेयांश की नज़र उस पर ठहरती है, और उसकी उँगलियाँ हमारे कारोबार के काग़ज़ों पर। ... दोनों मुझे मंज़ूर नहीं।" ... उसने हार मुट्ठी में भींचा। "गुस्ताख़ नौकरों को ठिकाने लगाने का एक ही पुराना तरीका है। उन्हें चोर साबित कर दो। ... कल ये काम रेयांश ने किया था। आज मैं करूँगी।"
मल्विका की चाल दोहरी थी। किसी बड़े मेहमान के हीरे, चुपके से उस लड़की के बंद लॉकर में, और फ़ैसला ख़ुद रेयांश को करना था। ... वो उसे चोर मान कर निकाल दे, तो मल्विका का काँटा निकल जाए। और वो उसे बचा ले, तो साबित हो जाए कि सीईओ का दिल एक वेट्रेस पर आ गया है, और वो कमज़ोरी भी मल्विका का हथियार बने। ... जीत दोनों तरफ़ मल्विका की थी।
अगली शाम वही राठौर ग्रैंड फिर रौशनियों में नहाया था, जब ऊपर के एक सुइट से एक चीख़ गूँजी। शहर की एक रईस मेहमान, श्रीमती ओबेरॉय, का हीरों का हार ग़ायब था। ... और जैसे किसी अनदेखे हाथ ने वो ख़बर सीधा नौकरों के कमरों की तरफ़ मोड़ दी हो, हर उँगली सर्वेंट लॉकरों की तरफ़ उठ गई।
"तलाशी लो।" ... मल्विका बड़ी तहज़ीब से लॉबी में उतरी, आवाज़ में रेशम लिपटा हुआ। "हर नौकर का लॉकर खोलो। ... मुझे यक़ीन है हमारे किसी ईमानदार मुलाज़िम ने ऐसा नहीं किया होगा। पर मेहमान की इज़्ज़त सबसे पहले है, है ना?" ... और कहते-कहते उसकी नज़र भीड़ में एक ही चेहरे पर ठहर गई, अद्विका पर।
एक-एक कर लॉकर खुलते गए, और फिर वो पल आया जिसकी पटकथा पहले से लिखी जा चुकी थी। अद्विका का लॉकर खुला, और उसमें से लिपटा वो हीरों का हार, सैकड़ों आँखों के सामने, फ़र्श पर आ गिरा। ... एक सामूहिक आह पूरी लॉबी में दौड़ गई। और अद्विका वहीं जड़ खड़ी रह गई, ठीक वैसे जैसे उस पहली रात, जब उस पर शराब गिराने का इल्ज़ाम लगा था। उसका हाथ अनजाने में वर्दी के अंदर उस लॉकेट पर चला गया, अपने बाप की आख़िरी निशानी पर।
भीड़ चीरता हुआ रेयांश वहाँ पहुँचा, और पूरी लॉबी साँस रोक कर रुक गई। यही वो आदमी था जिसने कुछ हफ़्ते पहले, इसी जगह, एक वेट्रेस का बैज नोच कर उसे बारिश में फेंक दिया था, बिना एक पल सोचे। ... सब जानते थे आगे क्या होगा। पर आज कुछ अलग था।
"सबूत सामने है, रेयांश।" ... मल्विका आगे बढ़ी, आवाज़ में अब एक तेज़ धार। "हार इसी के लॉकर से निकला है। पुलिस बुलाओ, और इसे अभी, इसी वक़्त, इस महल से बाहर करो। ... या अब राठौर ग्रैंड में चोरों के लिए भी कोई रियायत है?"
"रुकिए।" ... रेयांश की आवाज़ धीमी थी, पर उसने पूरी लॉबी को जकड़ लिया। उसकी नज़र गिरे हार पर नहीं, उस लड़की पर टिकी थी, जो न रो रही थी, न गिड़गिड़ा रही थी, बस सीधी उसकी आँखों में देख रही थी। ... "इल्ज़ाम लगाना आसान है, मल्विका। सज़ा सुनाने से पहले, मैं इसका जवाब सुनूँगा।"
और उसी पल, पूरे महल ने वो देखा जो पहले कभी नहीं देखा था। जो रेयांश किसी का जवाब सुने बिना बैज नोच लेता था, वो आज एक मामूली नौकरानी को बोलने का मौक़ा दे रहा था। ... और मल्विका का जाल ठीक उसी की उम्मीद के मुताबिक़ चल रहा था।
अद्विका ने एक गहरी साँस ली, और उसकी आवाज़ काँपी नहीं। "मैं गिड़गिड़ाऊँगी नहीं, सर, क्योंकि मैंने कुछ किया ही नहीं।" ... उसने सीधे रेयांश की तरफ़ देखा। "बस एक बात पूछती हूँ। आज शाम, जब वो हार चोरी हुआ, उस वक़्त मैं कहाँ थी? ... आप बताइए, सर। पूरी शाम मैं किसकी नज़रों के सामने खड़ी थी?"
रेयांश एक पल ठिठक गया। ... क्योंकि उस सवाल का जवाब वो ख़ुद था। "...ये मेरे फ़्लोर पर थी।" ... उसने धीरे से कहा, आवाज़ में एक अजीब भारीपन। "पूरी शाम। मेरी नज़रों के सामने। ये उस सुइट के आस-पास भी नहीं फटकी।"
"तो किसी और से करवाया होगा!" ... मल्विका की आवाज़ में पहली बार एक हल्की दरार आई। "ख़ुद न सही, अपने किसी साथी के हाथों। ... सामान तो आख़िर इसी के लॉकर से निकला है, रेयांश।"
"बिल्कुल सही, बीबीजी। हार मेरे लॉकर से निकला।" ... अद्विका ने बड़े इत्मीनान से कहा, और अब पहली बार उसकी आवाज़ में एक हल्की धार आ गई। "पर मेरा लॉकर बंद था, और उसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास है, यहीं, मेरे गले में।" ... उसने गले से लटकती छोटी चाबी दिखाई। "तो सवाल ये नहीं कि हार अंदर कैसे आया। सवाल ये है, कि मेरे बंद लॉकर को, मेरी चाबी के बिना, खोला किसने?"
"इस महल में हर लॉकर सिर्फ़ एक ही दूसरी चाबी से खुलता है, सर, हाउसकीपिंग की मास्टर चाबी से। और उसका हर हिसाब एक रजिस्टर में लिखा जाता है। ... वो रजिस्टर मँगवा लीजिए। आज दोपहर वो चाबी किसके हाथ में गई थी, वो काग़ज़ ख़ुद बता देगा।"
रेयांश का जबड़ा सख़्त हुआ। उसके इशारे पर हाउसकीपिंग की हेड शारदा ताई वो मोटा रजिस्टर लिए पहुँची, और चुपचाप उसे रेयांश के हाथ में रख दिया। ... रेयांश ने उस दिन का पन्ना खोला, और मास्टर चाबी के आख़िरी दस्तख़त पर उसकी उँगली रुक गई। दोपहर तीन बजे, वो चाबी एक ऐसे नाम पर निकली थी, जिसे इस तहख़ाने का हर नौकर जानता था। मल्विका राठौर का ख़ास आदमी।
रेयांश ने धीरे से सिर उठाया, और उसकी बर्फ़ जैसी नज़र सीधे मल्विका के चेहरे पर जा टिकी। "दोपहर तीन बजे, हाउसकीपिंग की मास्टर चाबी..." ... उसने रजिस्टर से नाम पढ़ा, और रुक गया। "...तुम्हारे आदमी के हाथ में थी, मल्विका। ठीक उसी वक़्त, जब कोई इस लड़की का बंद लॉकर खोल रहा था।"
मल्विका एक पल पत्थर हो गई, फिर वही मँजी मुस्कान लौट आई। "मेरे आदमी ने?" ... उसने हल्के से हँसते हुए कहा, पर उस हँसी की तह में बर्फ़ थी। "ज़रूर कोई ग़लती हुई होगी, रेयांश। मैं ख़ुद जाँच करवाऊँगी।" ... पर जब उसकी नज़र अद्विका पर पड़ी, उसमें अब कोई तहज़ीब नहीं थी, सिर्फ़ एक नंगी, ठंडी तलवार।
"मैंने किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाया, बीबीजी।" ... अद्विका ने बड़ी नरमी से, नज़र झुकाए कहा। "मैंने तो बस सच को रौशनी में रख दिया। ... और सच की एक ही आदत होती है। वो सबसे बंद, सबसे गहरे लॉकर में भी क़ैद नहीं रहता। एक न एक दिन, बाहर आ ही जाता है।"
"अद्विका देशमुख पर कोई इल्ज़ाम नहीं।" ... रेयांश ने रजिस्टर बंद करते हुए, पूरी लॉबी को सुनाते हुए कहा। "मामला यहीं ख़त्म। सब अपने काम पर लौटें।" ... और फिर एक पल के लिए उसकी नज़र उस लड़की पर ठहर गई जिसे उसने अभी बचाया था, बिना ये जाने कि यही वो चेहरा है जिसे उसने कुछ हफ़्ते पहले, इसी जगह, निकाला था।
और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था इस लम्हे का पूरा मज़ाक़। जिस लड़की को इस आदमी ने चोर कह कर बारिश में फेंका था, आज उसी को, उसी जगह, उसी इल्ज़ाम से, उसी ने बचा लिया था। ... और अद्विका के सिवा किसी को इसकी ख़बर तक न थी।
और उस रात, तहख़ाने की दुनिया में एक ख़ामोश जश्न था। जो बात ऊपर दबे-दबे फुसफुसाई गई थी, नीचे वो शेर की दहाड़ बन गई।
"देखा! देखा, मैंने कहा था ना!" ... बंसी दोनों हाथ हवा में लहराते हुए बोला। "अपनी छोटी है ना... शेरनी है शेरनी! मल्विका बीबीजी जैसी बड़ी मछली को ऐसे पानी से बाहर खींच कर पटका, कि पूरी लॉबी दंग रह गई! ... मैं तो कहता हूँ, एक दिन ये लड़की इस पूरे होटल की मालकिन बन कर बैठेगी, देख लेना!"
"बस करो, भैया।" ... अद्विका हल्के से हँस दी। "मैंने कुछ नहीं किया। बस एक चाबी का हिसाब पूछ लिया। ... और मालकिन-वालकिन के सपने रहने दो। हम जैसों के नसीब में तो बस यही वर्दी लिखी है।"
"हँसी-मज़ाक़ छोड़, बेटी।" ... शारदा ताई ने उसे एक तरफ़ ले जा कर धीरे से कहा। "वो रजिस्टर मेरी ही अलमारी में रहता है। और आज दोपहर मल्विका के आदमी को उस चाबी को छूते मैंने ख़ुद देखा था। तूने हिम्मत कर के रजिस्टर माँगा, तो मैंने भी सच छुपने नहीं दिया।" ... उसकी बूढ़ी उँगलियाँ एक पल अद्विका की वर्दी के अंदर छुपे लॉकेट पर ठहरीं। "पर सुन ले। आज तू बच गई। मल्विका हार कर पीछे हटने वाली औरत नहीं। ... वो अब और भी ज़हर ले कर आएगी। सँभल के, मेरी बच्ची।"
और शारदा ताई की बात उसी रात सच होने लगी। मल्विका ने भरी लॉबी में शोर नहीं मचाया, चीख़ी नहीं। उस जैसी औरतें खुले में वार नहीं करतीं, वो इंतज़ार करती हैं। ... और देर रात, जब राठौर ग्रैंड के गलियारे सुनसान हो गए, मल्विका ने अद्विका को अकेला एक कोने में जा घेरा।
"आज तुमने जीत लिया, लड़की।" ... मल्विका की आवाज़ अब रेशम नहीं, नंगा फ़ौलाद थी। वो धीरे-धीरे चलती हुई अद्विका के बिल्कुल क़रीब आ गई। "मैं मानती हूँ। एक मामूली वेट्रेस ने आज मल्विका राठौर को भरी लॉबी में मात दे दी। ... पर एक बात कान खोल कर सुन लो।"
अद्विका ने अपनी नज़र एक इंच नहीं झुकाई। "सुन रही हूँ, बीबीजी।" ... उसने उस शांत आवाज़ में कहा जो किसी तूफ़ान से पहले होती है। "कहिए।"
मल्विका ने अपना चेहरा अद्विका के चेहरे के बिल्कुल क़रीब लाया, आँखों में एक ठंडी, ख़तरनाक आग। "तुम जो भी हो, अद्विका देशमुख... या जो भी तुम्हारा असली नाम हो..." ... उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट में उतर आई, ज़हर से भरी। "मैं पता लगा कर रहूँगी। तुम्हारी हर परत, हर झूठ, हर छुपा राज़। ... इस होटल का हर राज़ मेरी मुट्ठी में है। और अब मैं तुम्हारा राज़ भी खोद कर निकालूँगी, चाहे इसके लिए तुम्हारी पूरी ज़िंदगी उधेड़नी पड़े।"
और उस सुनसान गलियारे में मल्विका के लफ़्ज़ किसी नंगी तलवार की तरह लटक गए। अद्विका का चेहरा शांत रहा, पर उसकी वर्दी के अंदर, दिल के ठीक ऊपर, वो लॉकेट जैसे आग सा दहक उठा। ... क्योंकि सिर्फ़ सुनने वाला जानता था, कि अगर मल्विका ने उस राज़ की एक भी परत उधेड़ ली, तो जो निकलेगा वो एक नौकरानी का झूठ नहीं होगा। ... वो इस पूरे राठौर ग्रैंड की गुमनाम मालकिन होगी। और उसी दिन, इस महल की हर सल्तनत, और अद्विका की अपनी जान, सब एक साथ ख़ाक हो जाएगी।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।