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अध्याय 6 / 30

मालिक की परछाईं

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

"इधर आ, छोटी, ज़रा सीधी खड़ी हो।" ... बंसी उसकी नई इस्तरी की हुई वर्दी का कॉलर ठीक करते हुए बड़बड़ाया। "देख तो ज़रा! कल तक तहख़ाने में पोंछा मारती थी, और आज सीधे बड़े साहब की परछाईं बन गई! ... पूरे राठौर ग्रैंड में किसी नौकरानी को ये इज़्ज़त नहीं मिली, समझी?"

"इज़्ज़त, या फाँसी, भैया?" ... अद्विका ने हल्के से मुस्कुरा कर, अपनी वर्दी की सलवटें ठीक करते हुए कहा। "आप ही तो कल रात से डरा रहे हैं कि उस फ़्लोर पर कोई नौकर हफ़्ते भर से ज़्यादा टिकता ही नहीं।"

"मज़ाक़ नहीं कर रहा, छोटी।" ... बंसी ने इधर-उधर देख कर धीरे से कहा। "वो सिंघानिया साहब पत्थर के इंसान हैं। बड़े-बड़े मैनेजर उनके सामने पानी भरते हैं। ... और सुन, एक बात और। कल से मल्विका बीबीजी के आदमी तहख़ाने में तेरे बारे में सवाल पूछ रहे हैं। तेरा नाम, तेरे कागज़, कहाँ से आई। ... शारदा ताई ने कहलवाया है, सँभल के रहना।"

"पूछने दो, भैया।" ... अद्विका की आवाज़ शांत रही, पर उसका हाथ अनजाने में अपनी वर्दी के अंदर, दिल के ठीक ऊपर छुपे उस लॉकेट पर चला गया। "जिसके पास छुपाने को कुछ नहीं होता, वो सवालों से नहीं डरता। ... आप शारदा ताई से कहना, उनकी छोरी सँभली हुई है।"

और उसी सुबह, अद्विका पहली बार तहख़ाने की सीलन भरी दुनिया छोड़ कर राठौर ग्रैंड के सबसे ऊपरी फ़्लोर पर चढ़ आई, संगमरमर और शीशे का वो महल, जहाँ से पूरा मुंबई पैरों तले बिछा दिखता था। ... तीन सौ इक्यावन दिन बाक़ी थे। और अब वो उस आदमी के सबसे क़रीब खड़ी थी, जिसके पैरों तले से ज़मीन उसी दिन खिसकनी थी, जिस दिन वो अपना नाम वापस लेती।

रेयांश का दफ़्तर किसी जंग के मैदान जैसा लग रहा था। मेज़ पर फ़ाइलों के पहाड़, बुझी हुई कॉफ़ी के आधे प्याले। ... रेयांश ख़ुद वहीं बैठा था, कल वाली ही कमीज़ में, आँखों के नीचे नींद की जगह स्याह घेरे। पूरी दुनिया के सामने चट्टान, और इन बंद दरवाज़ों के पीछे, एक थका हुआ, अकेला इंसान।

"इस फ़्लोर के कुछ उसूल हैं।" ... रेयांश ने बिना सिर उठाए कहा, आवाज़ बर्फ़ जैसी सपाट। "मैं जो कहूँ, वो होना चाहिए, बिना सवाल, बिना आवाज़। जो भी मेरे साथ यहाँ काम करने आया, वो या तो हफ़्ते भर में टूट कर भाग गया, या मैंने ख़ुद निकाल दिया। ... देखते हैं, तुम कब तक टिकती हो।"

"जी सर।" ... अद्विका ने सिर झुकाया, पर उसके क़दम एक इंच पीछे नहीं हटे। "मैं टिकने नहीं, काम करने आई हूँ। ... आप हुक्म दीजिए, बाक़ी मुझ पर छोड़ दीजिए।"

रेयांश ने पहली बार नज़र उठाई, उसे सिर से पैर तक तौलते हुए। "बड़ी हिम्मत है एक पानी पिलाने वाली में।" ... उसके होंठ एक ठंडी मुस्कान में मुड़े। "इस महल में हर कोई अपनी औक़ात जानता है। तुम कोई नहीं हो, अद्विका। बस एक वर्दी। ये बात याद रखोगी, तो शायद ज़्यादा दिन चल जाओ।"

"आप ठीक कहते हैं, सर। मैं कोई नहीं हूँ।" ... अद्विका ने बड़ी नरमी से कहा, पर उसकी आँखों में एक गहराई तैर गई। "पर मैंने सुना है, इस महल की बुनियाद रखने वाला भी कभी सड़क किनारे चाय बेचता एक 'कोई नहीं' ही था। ... कोई नहीं से कोई बन जाना, यही तो इस पूरे घर की कहानी है, है ना सर?"

रेयांश का हाथ एक पल को रुक गया। ये लड़की जवाब नहीं देती थी, आईना दिखाती थी। ... और अद्विका, चुपचाप उसके प्याले में पानी भरते हुए, उस घमंड के पीछे का इंसान पढ़ रही थी, वो थकान जो हड्डियों तक उतर चुकी थी, वो अकेलापन जो हर फ़ाइल के नीचे दबा था।

"ये देखो।" ... रेयांश ने एक फ़ाइल मेज़ पर पटकी, आवाज़ में थकान और गुस्सा घुले हुए। "हर महीने करोड़ों का हिसाब, और हर महीने पैसा किसी काले कुएँ में गिर जाता है। ऊपर से मुनाफ़ा दिखता है, अंदर से ये होटल दीमक की तरह खोखला हो रहा है। ... और मैं महीनों से पकड़ नहीं पा रहा कि दीमक बैठी आख़िर कहाँ है।"

अद्विका की नज़र उस खुली फ़ाइल पर पड़ी, और उसका दिल एक पल को ठहर गया। तहख़ाने में बंसी जिस लूट की बात करता था, उसका एक सिरा यहीं इन काग़ज़ों में साँस ले रहा था। ... एक ही सप्लायर के दो बिल, एक ही सामान के दो दाम, और बीच का फ़र्क़ सीधे किसी बड़े बाबू की जेब में। उसकी अपनी विरासत, उसी की आँखों के सामने नोची जा रही थी।

"सर, माफ़ कीजिए, शायद मेरी ही ग़लती हो..." ... अद्विका ने डरते-डरते, एक अनपढ़ नौकरानी की तरह काग़ज़ पर उँगली रखी। "पर ये वाला बिल, और ये वाला... दोनों पर एक ही सामान लिखा है, पर दाम अलग-अलग। ... हमारे तहख़ाने में तो यही चीज़ आधे दाम में आती है, सर। मैंने तो बस देखा, इसलिए बोल दिया।"

रेयांश ने झपट कर दोनों बिल उठाए, और उसकी आँखें सिकुड़ गईं। महीनों से जो उसे नहीं दिखा था, एक नौकरानी ने पानी भरते-भरते पकड़ लिया था। ... उसने धीरे से सिर उठा कर उसे देखा, एक अजीब सी उलझन के साथ। "तुम्हें देख कर लगता है, अद्विका... जैसे मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ। ... पर याद नहीं आता, कहाँ।"

"हम जैसे चेहरे एक जैसे होते हैं, सर।" ... अद्विका ने फ़ौरन नज़र झुका ली, दिल सीने में हथौड़े की तरह बजते हुए। "भीड़ में खो जाने के लिए ही बने होते हैं। ... आपने शायद किसी और को देखा होगा, किसी और वर्दी में।"

घंटे बीतते गए। एक-एक कर के फ़्लोर की बत्तियाँ बुझती गईं, मुलाज़िम घर लौट गए, और उस विशाल महल में सिर्फ़ दो लोग रह गए, वो आदमी जो सोना भूल चुका था, और वो लड़की जो उसे चुपचाप पढ़ रही थी। ... अद्विका ने बिना कहे एक गरम चाय उसके सामने रख दी।

"देवनारायण राठौर।" ... रेयांश ने चाय का प्याला दोनों हाथों में थामे, दूर कहीं देखते हुए कहा। "इस नाम का क़र्ज़ है मुझ पर। सड़क पर पड़े एक अनाथ को उठा कर उन्होंने बेटा बनाया, सब कुछ सिखाया, ये पूरा महल मेरे हाथ में थमा दिया। ... आज वो नहीं हैं, और ये डूबता जहाज़ बचाना मेरा फ़र्ज़ है। उनका दिया एक-एक निवाला आज मुझसे हिसाब माँगता है।"

"वो अच्छे इंसान रहे होंगे।" ... अद्विका ने बड़ी एहतियात से कहा, हर लफ़्ज़ को तौलते हुए। "जो किसी अनजान को उठा कर अपना ख़ून बना ले।" ... उसके अंदर कुछ मरोड़ खा गया। यही वो आदमी था जिसे उसके दादा ने बेटा बनाया था, और उसी के अपने बाप को इसी घर से निकाल दिया गया था।

"अच्छे?" ... रेयांश हल्के से हँसा, पर उस हँसी में कोई ख़ुशी नहीं थी। "वो फ़ौलाद के इंसान थे। ज़िद्दी, अकेले। ... पर एक ग़म उन्हें अंदर ही अंदर आख़िरी दम तक खाता रहा। किसी से कहते नहीं थे, बस रात-रात भर एक पुरानी तस्वीर को देखते रहते थे।"

"कैसा ग़म, सर?" ... अद्विका का गला सूख गया, पर उसने बड़ी मासूमियत से पूछ लिया। "इतना बड़ा आदमी, जिसके पास सब कुछ था... उसे आख़िर किस बात का ग़म?"

"किसी अपने का।" ... रेयांश ने कंधे उचकाए, पर उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। "कोई था, जिसे उन्होंने अपने ही हाथों खोया था। एक बेटा, कहते हैं। मैंने कभी नाम नहीं पूछा, और उन्होंने कभी बताया नहीं। ... बस इतना जानता हूँ कि इस पूरे महल में, उस एक अधूरी कहानी का बोझ, अब सिर्फ़ मेरे कंधों पर टिका है।"

रेयांश उठ कर उस बड़ी शीशे की दीवार के पास जा खड़ा हुआ, जहाँ से रात का मुंबई हीरों की तरह जगमगा रहा था। ... अद्विका पानी की सुराही थामे उसके पीछे खड़ी रही, ख़ामोश। उसे नहीं पता था कि अगले कुछ ही पलों में, यही आदमी उससे वो राज़ बाँटने वाला था, जो ख़ुद उसी के सीने में साल भर से दफ़न था।

"एक डर है, जो मुझे रातों को सोने नहीं देता।" ... रेयांश ने शहर की रौशनियों की तरफ़ देखते हुए, लगभग ख़ुद से कहा। "देवनारायण की वसीयत। कहते हैं, उन्होंने ये सारा साम्राज्य किसी और के नाम कर दिया है। कोई गुमनाम वारिस, जिसे मैंने कभी देखा नहीं, जाना नहीं। ... वो किसी भी दिन इसी दरवाज़े से अंदर आ सकता है, और जिस चीज़ के लिए मैंने अपना ख़ून जलाया, वो एक पल में छीन कर ले जा सकता है।"

अद्विका के हाथ में सुराही एक पल को भी नहीं काँपी। ... उसने चुपचाप उसका ख़ाली गिलास भरा, चेहरा पत्थर की तरह शांत रखते हुए, जबकि उसके सीने में एक तूफ़ान उठ रहा था। जिस गुमनाम वारिस से ये आदमी इतना डरता था, वो उसी के पीछे खड़ी, उसका पानी भर रही थी।

"कभी-कभी सोचता हूँ, है कौन वो।" ... रेयांश की आवाज़ और धीमी हो गई। "कोई लालची रिश्तेदार? कोई अजनबी? ... या कोई ऐसा, जिसका इस घर पर सच में हक़ है, मुझसे भी ज़्यादा? ... मैं बस एक बार उसका चेहरा देखना चाहता हूँ। ताकि जान सकूँ, जिससे मैं लड़ रहा हूँ, वो मेरा दुश्मन है, या... मेरी अपनी क़िस्मत।"

और वो चेहरा उसकी पीठ के ठीक पीछे खड़ा था, बस हाथ भर की दूरी पर। ... अद्विका को अपने ही दिल की धड़कन कानों में सुनाई दे रही थी। एक लफ़्ज़, एक ग़लत साँस, और ये पूरा राज़ बिखर जाता। पर उसने अपने चेहरे को फ़ौलाद बना लिया, जैसे उसके दादा कभी बनाते रहे होंगे।

रेयांश अचानक पलटा, और सीधे उसकी आँखों में देखा। "तुम बताओ।" ... उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थकी हुई ईमानदारी थी। "अगर तुम वो वारिस होती, जिसके पास अचानक इतना बड़ा साम्राज्य आ जाता... तो तुम क्या करती? छीन लेती सब कुछ, उन लोगों से, जिन्होंने इसे बरसों सींचा?"

अद्विका ने एक पल को उसकी आँखों में देखा, और फिर बहुत धीरे से बोली, "मैं छीनती नहीं, सर।" ... "मैं पहले देखती, कि इस घर में कौन अपना है और कौन चोर। ... फिर जिसने इसे ईमानदारी से सींचा, उसका हक़ लौटाती, और जिसने इसे नोचा, उससे एक-एक पाई का हिसाब लेती। ... क्योंकि विरासत छीनने की चीज़ नहीं होती, सर। वो तो सिर्फ़ सँभालने की अमानत होती है।"

रेयांश कुछ पल बस उसे देखता रहा। एक पानी पिलाने वाली नौकरानी के मुँह से निकले ये लफ़्ज़, किसी बादशाह के जैसे थे। ... "अमानत," ... उसने धीरे से दोहराया, जैसे लफ़्ज़ को ज़बान पर चख रहा हो। "देवनारायण भी बिल्कुल यही कहते थे। ... तुम बात करती हो, तो लगता है, जैसे कोई और तुम्हारे अंदर से बोल रहा है।"

दोनों के बीच का फ़ासला जैसे अपने आप सिमट आया था। कमरे की उस ख़ामोशी में सिर्फ़ खिड़की से टकराती बारिश की आवाज़ थी, और दो साँसें, जो अनजाने में एक ही लय में चल रही थीं। ... रेयांश की आँखें उस लड़की के चेहरे पर टिकी थीं, और न वो जानता था वो क्या महसूस कर रहा है, न वो इसे कोई नाम देना चाहता था।

तभी रेयांश ने मेज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और उसकी कोहनी से टकरा कर वो मोटी फ़ाइल फ़र्श पर जा गिरी, वसीयत से जुड़े काग़ज़, हवा में बिखरते हुए। ... और दोनों, एक ही पल में, उसे उठाने के लिए झुक गए।

और उसी लम्हे, फ़र्श पर, एक ही काग़ज़ पर, उनके हाथ आपस में मिल गए। ... रेयांश का हाथ अद्विका के हाथ पर आ कर रुका, और रुका रह गया। एक पल... दो पल... एक साँस ज़्यादा।

रेयांश ने सिर उठाया, और उनके चेहरे अब बस कुछ इंच की दूरी पर थे। ... "तुम काँप क्यों नहीं रहीं?" ... उसने बहुत धीरे से पूछा, आवाज़ में अब बर्फ़ नहीं, एक अजीब सी गर्मी थी। "इस महल में हर कोई मुझसे नज़रें चुराता है। और तुम... तुम मेरी आँखों में सीधे देखती हो, जैसे तुम्हें कोई डर ही नहीं।"

और उसी लम्हे, उस आदमी की थकी आँखों में अपने दादा के अकेलेपन का साया देख कर, उस अधूरी कहानी का दर्द अपने अंदर महसूस कर के, अद्विका के होंठों से एक लफ़्ज़ अपने आप निकलने को हुआ, वो लफ़्ज़ जो उसने आज तक किसी ज़िंदा इंसान के सामने नहीं कहा था, जो उसके सीने में साल भर से क़ैद था...

"दा..." ... लफ़्ज़ आधा ही निकला था कि अद्विका ने उसे गले में ही दबा लिया, जैसे किसी ने जलती लौ पर अचानक हाथ रख दिया हो। एक पल की हड़बड़ाहट... और फिर उसने ख़ुद को सँभाल लिया। "...दासी हूँ मैं इस घर की, सर। बस एक दासी। इसीलिए नहीं काँपती, क्योंकि जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता, वो किसी से नहीं डरता।"

पर रेयांश ने वो टूटा हुआ आधा लफ़्ज़ सुन लिया था। उसने उसकी आँखों में वो एक पल की दरार देख ली थी, वो जो एक मामूली 'दासी' के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए थी। ... उसके हाथ पर उसकी पकड़ हल्की सी और कस गई। "तुम कुछ और कहने वाली थीं।" ... "क्या कहने वाली थीं, अद्विका? पूरा करो।"

दोनों वहीं जमे रह गए, फ़र्श पर, बिखरी हुई वसीयत के काग़ज़ों के बीच, उसका हाथ अब भी उसके हाथ पर, और आँखों में आँखें गड़ी हुईं। ... वो आधा लफ़्ज़, 'दा...', अब भी उनके बीच हवा में लटका था, किसी नंगी तलवार की तरह। रेयांश की नज़र उसके चेहरे की एक-एक लकीर पढ़ रही थी, और अद्विका जानती थी, वो ज़रूरत से कहीं ज़्यादा क़रीब आ गया है। ... साल भर का सच, और उसकी अपनी जान, दोनों अब सिर्फ़ एक साँस की दूरी पर थे। और इस बार, वो परछाईं में छुप नहीं सकती थी।

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