अध्याय 22 / 30
खोया हुआ बाप
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
भागने की तैयारी करती अद्विका को शारदा ताई रोक कर उसके बाप अर्नव का असली सच बताती है, कि उसे कमज़ोरी के लिए नहीं, ग़रीबों की बस्ती को बुलडोज़र से बचाने के लिए, ज़मीर को ताज पर चुनने के लिए घर से निकाला गया था, और विश्वनाथ देवनारायण की वो आख़िरी चिट्ठी ला कर खोलता है जिसमें ये विरासत कोई इनाम नहीं, एक टूटी हुई माफ़ी और एक अधूरी ज़िम्मेदारी निकलती है। अद्विका का फ़ैसला भागने से पलट कर अपना नाम लेने पर जम जाता है, तभी रेयांश बदहवास अंदर आ कर ख़बर देता है कि जयदेव ने काग़ज़ की जंग छोड़ दी है, और उसके बीमार भाई सोनू को एक 'हादसे' में उठा लिया गया है।
सुबह की पहली सलेटी रौशनी तहख़ाने की उस तंग कोठरी की जाली से छन रही थी, जहाँ अद्विका एक बरस से सोई थी। ... उसके हाथ बहुत सधे हुए थे, जैसे किसी ने रात भर में सारे आँसू पी कर उन्हें पत्थर बना दिया हो, और वो अपनी वर्दी की तह लगा कर एक पुराने बैग में रख रही थी।
मेज़ पर इस्तीफ़े की एक अधूरी चिट्ठी पड़ी थी, बस दो लाइनें, और उनके नीचे वही झूठा नाम, अद्विका देशमुख। ... उसके पास रखा था वो लॉकेट, माँ की आख़िरी निशानी, जिसके अंदर एक धुँधला चेहरा एक बरस से इस महल का सबसे बड़ा राज़ छुपाए बैठा था।
'ये क्या हो रहा है यहाँ?' ... शारदा ताई देहरी पर खड़ी थी, और उसकी आँखें उस अधबंधे बैग और अधूरी चिट्ठी पर एक ही पल में जम गईं। ... 'बोल, बेटी। ये बैग किसके लिए बँध रहा है?'
'मैं जा रही हूँ, ताई।' ... अद्विका ने नज़रें नहीं उठाईं, बस तह लगाना जारी रखा। ... 'कोई और शहर, कोई और काम। ये जगह अब मेरे लिए ठीक नहीं। साल पूरा होने से पहले ही निकल जाना बेहतर है, सबके लिए।'
'भाग रही है।' ... शारदा ने बैग को मेज़ पर दबा दिया, और उसका हाथ अद्विका की कलाई पर कस गया। ... 'मुझसे झूठ मत बोल। मैं वो औरत हूँ जिसने इसी लॉकेट से तेरा सच पहचाना था। तू भाग नहीं रही, तू किसी को बचाने के लिए ख़ुद को मिटा रही है।'
वो पकड़ ठीक वैसी थी जैसी उस पहली रात थी, जब शारदा ने उसके लॉकेट को रौशनी में घुमा कर एक मरा हुआ नाम फुसफुसाया था, अर्नव। ... ये औरत उसका राज़ हथियार बना सकती थी, पर उसने हर बार दीवार बनना चुना था।
'तू यहाँ से एक क़दम नहीं हिलेगी।' ... शारदा की आवाज़ काँपी, पर उसमें लोहा था। ... 'पहले ये जान कि तू किसकी बेटी है। तेरा बाप कौन था, अर्नव बाबा, ये मैं तुझे आज बताऊँगी, आख़िरी लफ़्ज़ तक। उसके बाद जहाँ जाना हो, जाना।'
शारदा उस पतली चारपाई के किनारे बैठ गई, और उसकी उँगलियाँ आँचल के छोर को यूँ मरोड़ने लगीं जैसे वहीं कहीं चालीस साल दबे हों। ... जो नाम उसने बरसों किसी के सामने खुल कर नहीं लिया था, वो अब उसकी आवाज़ में उतरने लगा।
'छोटे मालिक... अर्नव बाबा।' ... शारदा की आँखों में एक भीगी हुई मुस्कान तैर गई। ... 'मैंने उन्हें अपनी गोद में खिलाया है, बेटी, इसी होटल के आँगन में, जब ये चेन बस एक होटल हुआ करती थी। वो हँसते तो पूरा तहख़ाना हँस पड़ता। नौकरों के साथ ज़मीन पर बैठ कर खाते थे।'
'कैसे दिखते थे वो?' ... अद्विका के हाथ तह लगाते-लगाते रुक गए, और उसकी आवाज़ किसी बच्ची जैसी छोटी हो गई। ... 'मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, ताई। बस इस लॉकेट का धुँधला चेहरा। माँ भी उनका नाम कभी ज़ुबान पर नहीं लाई।'
'बिल्कुल तेरे जैसे, बेटी। वही ठुड्डी, वही न झुकने वाली गर्दन।' ... शारदा की आवाज़ भारी हो गई। ... 'सब कहते हैं वो कमज़ोर था, नालायक़। सच सिर्फ़ हम पुराने नौकर जानते हैं। तेरे बाप को इसलिए नहीं निकाला गया कि वो कमज़ोर था, बल्कि इसलिए कि वो इस ख़ानदान में सबसे मज़बूत था।'
अद्विका ने उम्र भर एक ही कहानी सुनी थी, अपनी माँ की चुप्पी में, कि उसका बाप घर से निकाला गया एक नाकाम बेटा था। ... और अब ये बूढ़ी औरत उस पूरी कहानी को जड़ से उलट रही थी।
'बड़े मालिक समंदर के किनारे वाली उस बस्ती को गिराना चाहते थे।' ... शारदा की मुट्ठी आँचल पर कस गई। ... 'मछुआरों की सैकड़ों पुरानी झोंपड़ियाँ। वहाँ अपनी सबसे बड़ी होटल खड़ी करनी थी। और बुलडोज़रों के ठीक सामने जो हाथ फैला कर खड़ा हो गया, वो देवनारायण का अपना ख़ून था, अर्नव।'
'बड़े मालिक ने कहा, हट जा। ये कीड़े-मकोड़े हैं, इनकी जगह एक महल राठौर नाम को आसमान पर ले जाएगा।' ... 'अर्नव बाबा ने कहा, ये कीड़े नहीं, इंसान हैं, बापू। अगर राठौर का महल इनकी लाशों पर खड़ा होगा, तो मुझे वो ताज नहीं चाहिए। ... उसी रात उन्हें हमेशा के लिए घर से निकाल दिया गया।'
शारदा ने बताया कि जिस रात छोटे मालिक ने घर छोड़ा, वो ख़ुद दरवाज़े की ओट में खड़ी रो रही थी। ... अर्नव न पैसा ले गया, न नाम, बस एक रसोइए की बेटी का हाथ, जो अद्विका की माँ बनी, और एक ज़मीर जो किसी ताज के बदले नहीं बिका।
'तो जिसे सब उम्र भर कमज़ोर, बिगड़ा हुआ कहते रहे...' ... अद्विका की आवाज़ काँपी, और आँखों में पहली बार आँसू नहीं, आग थी। ... 'वो बुलडोज़र के सामने अकेला खड़ा वो आदमी था, जिसने ग़रीबों के लिए सब कुछ लुटा दिया। जिस ख़ून पर मुझे शर्मिंदा होना सिखाया गया, वो इस महल में सबसे ऊँचा था।'
'सबसे ऊँचा, बेटी।' ... शारदा ने उसका चेहरा अपनी खुरदरी हथेलियों में ले लिया। ... 'और वो ऊँचाई तेरे अंदर साँस ले रही है। जिस दिन तूने पहली बार बिना डरे उस घमंडी रेयांश की आँखों में देखा, उसी दिन मैंने तुझमें अर्नव बाबा को देख लिया था।'
तभी कोठरी के अधखुले दरवाज़े पर एक धीमी दस्तक हुई, और एक थका, जाना-पहचाना साया देहरी पर आ खड़ा हुआ। ... विश्वनाथ, देवनारायण का बरसों पुराना वकील, अपने भारी कोट में सिकुड़ा, हाथ में एक पीली पड़ चुकी बंद चिट्ठी थामे।
'शारदा ने सुबह ही मुझे ख़बर भिजवाई कि तुम जाने की तैयारी में हो।' ... विश्वनाथ की आँखें उस अधबंधे बैग पर ठहर गईं। ... 'देवनारायण एक हुक्म दे गए थे, बेटी। ये चिट्ठी तुम्हें तभी देना, जिस दिन तुम टूट कर भागने का सोचो। ... लगता है वो दिन आज है।'
'कैसी चिट्ठी?' ... अद्विका ने उस पीले लिफ़ाफ़े को देखा, और उसका दिल एक पल को रुक गया। ... 'उस आदमी की, जिसने मुझे कभी देखा तक नहीं? जो मेरे बाप को निकाल कर ख़ुद ताज पहने बैठा रहा?'
'बैठ कर सुनो, बेटी।' ... विश्वनाथ ने वो लिफ़ाफ़ा उसके हाथों में रख दिया, और ख़ुद चारपाई के सिरे पर बैठ गया। ... 'ये उस आदमी के आख़िरी दिनों के लफ़्ज़ हैं, जब उसका घमंड टूट चुका था और पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचा था। पढ़ूँ?'
अद्विका के काँपते हाथ लिफ़ाफ़ा नहीं खोल पाए, तो विश्वनाथ ने उसे धीरे से लिया, और मोम की मुहर एक हल्की चटख़ के साथ टूट गई। ... अंदर एक काँपती लिखावट थी, किसी बूढ़े, बीमार हाथ की।
'मेरी गुमनाम बच्ची...' ... विश्वनाथ की आवाज़ भारी थी, जैसे वो ख़ुद उस मरे हुए आदमी की जगह बोल रहा हो। ... 'जब तू ये पढ़ेगी, मैं जा चुका हूँगा, और शायद तू मुझसे नफ़रत करती होगी। मैंने अपने घमंड में तेरे बाप को ख़ुद से दूर कर दिया, सिर्फ़ इसलिए कि वो मुझसे बेहतर इंसान था।'
'मैंने पूरी उम्र ईंटें जोड़ीं, और अपना इकलौता बेटा खो दिया।' ... विश्वनाथ एक पल रुका। ... 'मैं मरने से पहले तुझे ढूँढता रहा, अपनी उस गुड़िया को, जिसे मैंने कभी गोद में नहीं लिया। ये पूरा साम्राज्य तेरे लिए इनाम नहीं है, बेटी। ये मेरी माफ़ी है, तेरे बाप के नाम की एक टूटी हुई, देर से माँगी गई माफ़ी।'
गुड़िया। ... वही लफ़्ज़ जो रेयांश ने एक रात उसके दरवाज़े पर छोड़ा था, और जिसे सुन कर उसका हाथ अपने-आप लॉकेट पर चला गया था। ... अब वो लफ़्ज़ एक क़ब्र से आ रहा था, और पहली बार अद्विका समझी कि वो सचमुच उसी का था।
'उन्होंने मुझे कभी देखा नहीं।' ... अद्विका की आँखों से आँसू बह निकले, और इस बार उसने उन्हें रोका नहीं। ... 'और फिर भी वो मरते-मरते मुझे ढूँढते रहे, मुझे गुड़िया कहते रहे। ... मैं उनसे नफ़रत करने आई थी, ताई, और अब मैं उनके लिए रो रही हूँ।'
'और आख़िरी बात, मेरी बच्ची।' ... विश्वनाथ की आवाज़ में एक अजीब सख़्ती आ गई। ... 'जिन ग़रीबों के लिए तेरे बाप ने मेरा घर छोड़ा, मैंने उम्र भर उन्हें कुचला। तू मत कुचलना। जो काम तेरा बाप अधूरा छोड़ गया, तू पूरा करना। यही मेरी असली वसीयत है, बाक़ी सब सिर्फ़ काग़ज़ है।'
ये विरासत कोई इनाम नहीं थी, कोई छीना हुआ ताज नहीं। ... ये एक बाप की अधूरी लड़ाई थी, और एक दादा की आख़िरी माफ़ी, एक ज़िम्मेदारी जिसे उठाने के लिए वो पैदा हुई थी।
अद्विका ने आँसू पोंछे, और जब उसने सिर उठाया, तो उस चेहरे पर वो टूटी हुई लड़की नहीं थी जो रात भर वर्दी की तह लगा रही थी। ... कल रात गलियारे में सब छोड़ कर चले जाने का जो फ़ैसला उसने किया था, वो अभी-अभी उसकी आँखों के सामने राख हो गया।
'मैं भागने वाली थी, ताई।' ... अद्विका ने वो अधूरी इस्तीफ़े की चिट्ठी उठाई, जैसे किसी अजनबी की लिखी हो। ... 'रेयांश को बचाने के नाम पर, गिद्धों के डर से, मैं चोरों की तरह निकल जाने वाली थी। अपने बाप की लड़ाई से मुँह मोड़ कर।'
'पर तू नहीं भागी।' ... शारदा ने उसके हाथ से वो चिट्ठी लगभग छीन ली। ... 'अर्नव बाबा की बेटी भागती नहीं, बेटी। वो बुलडोज़र के सामने खड़ी होती है।'
'मैं नहीं जाऊँगी।' ... अद्विका खड़ी हो गई, और उसने वो अधबंधा बैग एक तरफ़ पटक दिया। ... 'मैं ये साल पूरा करूँगी। अपने ज़ख़्म के लिए नहीं, अपने बाप के उस अधूरे काम के लिए, उन चार हज़ार नौकरों के लिए, उस बस्ती के लिए जिसके लिए वो सब कुछ हार गए। ... मैं अपना नाम वापस लूँगी, ताई।'
अद्विका ने वो इस्तीफ़े की चिट्ठी दो टुकड़ों में फाड़ दी, और वो काग़ज़ फ़र्श पर बिखर गया। ... और उसका हाथ लॉकेट पर जा पड़ा, पर इस बार उसे छुपाने के लिए नहीं, उसे थामने के लिए, जैसे कोई झंडा थामता है।
'तो फिर सुन लो, मालकिन।' ... विश्वनाथ धीरे से मुस्कुराया, पर आँखों में एक चेतावनी थी। ... 'आज की सुबह के साथ, तीन सौ पंद्रह रातें बाक़ी हैं। जयदेव, मल्विका, और तुम्हारा नाम खोदता कुणाल, तीनों तुम्हें ढूँढ रहे हैं। ये रास्ता आसान नहीं होगा, बेटी।'
'आसान होता, तो मेरा बाप इसे अधूरा छोड़ कर न मरता।' ... अद्विका ने विश्वनाथ की आँखों में सीधे देखा। ... 'अब कोई अद्विका देशमुख चोरों की तरह नहीं भागेगी, वकील साहब। तीन सौ पंद्रह रातें, और उसके बाद मैं इसी महल की सबसे ऊँची मेज़ के सिरे पर खड़ी हो कर अपना पूरा नाम लूँगी।'
एक बरस से जो घड़ी उसके सिर पर एक सज़ा की तरह लटकी थी, वो पहली बार एक मक़सद बन गई थी। ... शारदा ने उसके सिर पर हाथ रखा, वैसे ही जैसे बरसों पहले छोटे मालिक के सिर पर रखा होगा, और उस कोठरी में एक पल के लिए एक गरम सुकून उतर आया।
और ठीक उसी पल, उस सुकून को चीरते हुए, गलियारे में तेज़, बदहवास क़दमों की आहट उठी। ... कोठरी का दरवाज़ा दस्तक के बिना ज़ोर से खुला, और देहरी पर रेयांश खड़ा था, हाँफता हुआ, चेहरा राख की तरह सफ़ेद।
'अद्विका...' ... रेयांश की आँखें कमरे में शारदा और विश्वनाथ को देख कर एक पल ठिठकीं, फिर सीधे अद्विका पर टिक गईं। ... 'मैं तुम्हें ये कैसे बताऊँ। जयदेव ने काग़ज़ों की जंग छोड़ दी है। वो अब असल दुनिया में उतर आया है।'
'क्या मतलब?' ... अद्विका का वो अभी-अभी बना हौसला एक पल को डगमगाया। ... 'रेयांश, साफ़-साफ़ बोलो। क्या हुआ है?'
'तुम्हारा भाई।' ... रेयांश ने आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लिया, जैसे वो गिर न जाए। ... 'सोनू। उसके हॉस्टल से ख़बर आई है। एक ट्रक... पुलिस कह रही है दुर्घटना, पर मुझे ख़बर करने वाले ने कहा कि वो ट्रक जयदेव के आदमियों का था। ... उन्होंने तुम्हारे भाई को उठा लिया है।'
सोनू। ... वो बीमार छोटा भाई, जिसकी फ़ीस के लिए अद्विका ने अपनी पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी थी, जो इस जाल से कोसों दूर एक हॉस्टल में साँस ले रहा था। ... अठारहवीं रात जयदेव ने मख़मली आवाज़ में जो हुक्म दिया था, दावा करने से पहले वारिस को तोड़ दो, वो अब काग़ज़ से उतर कर उन लोगों तक पहुँच गया जिन्हें अद्विका सबसे ज़्यादा चाहती थी। ... उसने अभी-अभी लड़ने का फ़ैसला किया था, और जंग ने अभी-अभी अपना पहला निशाना चुन लिया, उसका इकलौता भाई।
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