अध्याय 14 / 30
करीब, बहुत करीब
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
रेयांश का भरोसा पा कर अद्विका उसकी जंग के और क़रीब खिंच आती है, वो उसे फ़ाइलों, फ़ैसलों और उन बेख़्वाब रातों में साथ रखने लगता है जो अब सिर्फ़ काम की नहीं रहीं, और उसी घमंडी आदमी के सामने अपने गुमनाम वारिस के डर का राज़ खोलते हुए वो अनजाने में उसी वारिस के और पास आता जाता है। नीचे तहख़ाने में बंसी की चुहलबाज़ी और शारदा ताई की डरी हुई चेतावनी इस उठती मोहब्बत को घेर लेती हैं, कि जिस हाथ को वो दिल दे रही है, उसी को एक दिन उसे ख़ाली करना है। रेयांश और उस साम्राज्य, दोनों पर अपना दावा फिसलता देख कर मल्विका शक से आगे बढ़ कर हरकत में आती है और अद्विका देशमुख का अतीत खोदने के लिए एक निजी जासूस छोड़ दे
उस रात के बाद के कुछ रोज़ यूँ बीते जैसे महल की छत के नीचे कोई नई हवा बहने लगी हो। ... साल पूरा होने में अब तीन सौ तीस रातें बची थीं। ... जिस आदमी ने पूरे महल में सिर्फ़ उस पर भरोसा जताया था, वो अब उसे अपने हर फ़ैसले के पास खड़ा रखता था।
रेयांश अब उसे सिर्फ़ पानी भरने वाली नौकरानी की तरह नहीं देखता था। ... चेन बचाने की जो जंग वो अकेले लड़ रहा था, अब उसमें वो उस लड़की को साथ खींचने लगा था। ... और इस महल की मालकिन अपना ही साम्राज्य उसी के हाथों से सीखती रही, चेहरा शांत रखे।
" इधर आओ, अद्विका। ज़रा इन बिलों पर नज़र डालो।" ... रेयांश ने मेज़ पर वेंडर फ़ाइलों का ढेर फैला दिया। " पिछले तीन साल से हर महीने एक ही फ़र्म को दुगना भुगतान जाता है, समझ नहीं आता क्यों। ... तुम तहख़ाने की दुनिया से हो, तुम्हें इन चीज़ों की नब्ज़ पता है।"
अद्विका ने काग़ज़ों पर नज़र दौड़ाई, और उसका दिल एक धड़कन को ठिठका। " सर, मैं ठहरी छोटी सी नौकरानी... पर अगर पूछ ही रहे हैं..." ... " जिस फ़र्म को माल की डिलीवरी का पता तक नहीं, उसे भुगतान पूरा जाता है। मरा हुआ पता, ज़िंदा रक़म। कोई अंदर बैठा इसे सँभाल रहा है।"
रेयांश ने काग़ज़ से नज़र हटा कर उसे देखा, हैरानी में। " यही बात मेरे पाँच अफ़सर हफ़्तों में नहीं पकड़ पाए, और तुमने एक मिनट में कह दी।" ... आँखें उस पर गड़ी। " तुम्हारे अंदर एक ऐसी अक़्ल छुपी है, अद्विका, जो किसी वर्दी में फ़िट नहीं बैठती।"
और सुनने वाला जानता था कि यह इस कहानी की सबसे ज़ालिम बात थी। ... इस महल की मालकिन उसी आदमी के साथ उन्हीं गिद्धों से लड़ रही थी जो उसी को निगलने बैठे थे। ... और रेयांश इसे साथ कहता था, यह न जानते हुए कि जिसका ताज वो बचा रहा है, वो उसी का है।
" जिस घर की दीवारें अंदर से खोखली हों, सर, उसे बाहर वाले नहीं गिराते।" ... उसने काग़ज़ करीने से लगाए। " उसे वो गिराते हैं जिन्हें घरवाला अपना समझ कर अंदर बिठा लेता है। दुश्मन को पहचानना आसान है, सर, अपनों को नहीं।"
रेयांश खिड़की की तरफ़ मुड़ा, शहर की रौशनी पर नज़र। " जानती हो, इन फ़ाइलों से भी बड़ा एक डर है मेरे सीने में।" ... " उस बंद वसीयत में जो गुमनाम वारिस दफ़्न है, वो किसी दिन इसी दरवाज़े से आएगा, और यह सब जो मैंने जाग-जाग कर बचाया है, पल भर में उसका हो जाएगा।"
और वो वारिस उससे चार क़दम पीछे खड़ी थी, हाथ में वही ट्रे, सीने में वही तूफ़ान। ... एक लफ़्ज़ में वो उसका डर मिटा सकती थी, पर वही लफ़्ज़ उन दोनों को भी मिटा देता। ... सो उसने वही जवाब दिया जो एक नौकरानी दे सकती थी।
" हो सकता है वो वारिस आपसे यह छीनने नहीं, बाँटने आए, सर।" ... आवाज़ धीमी, नज़र उसकी पीठ पर टिकी। " हर वारिस लुटेरा नहीं होता। कुछ तो बस अपना खोया हुआ घर ढूँढ रहे होते हैं।"
रेयांश पलटा, और उसकी आँखों में वो ठंडक अब नहीं थी जो पहले दिन थी। " तुम्हारे मुँह से हर बात यूँ निकलती है जैसे तुमने ज़िंदगी को मुझसे क़रीब से देखा हो।" ... " इस पूरे महल में बस तुम्हारे सामने मैं थका हुआ दिख सकता हूँ। यह कमज़ोरी है या राहत, मुझे ख़ुद नहीं पता।"
तीन मंज़िल नीचे, तहख़ाने की दुनिया की अपनी ही अदालत लगी हुई थी। ... हर ज़ुबान पर एक ही चर्चा थी, कि छोटी सी अद्विका आजकल बड़े साहब की मंज़िल से नीचे उतरती ही नहीं। ... और इस चर्चा का सरदार था बंसी।
" मैं कहता हूँ न, कुछ तो पक रहा है ऊपर!" ... बंसी ने आँखें नचाईं, चम्मच हवा में लहराते हुए। " कल रात दो बजे मैंने ख़ुद देखा, साहब ने अपने हाथ से कॉफ़ी बना कर इसे थमाई! ... जिस आदमी ने कभी 'शुक्रिया' नहीं बोला, वो कॉफ़ी बना रहा है? शादी के कार्ड छपवा लो, भाइयों!"
" बंसी! ज़ुबान को लगाम दे।" ... अद्विका ने उसकी बाँह खींच कर उसे कोने में घसीटा, गाल तपते हुए। " साहब मुझसे फ़ाइलों का काम लेते हैं, बस। और तू अगली बार यह कहानी सुनाएगा तो पूरी लॉबी की झाड़ू तुझसे लगवाऊँगी।"
" अच्छा अच्छा, फ़ाइलें! ठीक है, फ़ाइलें ही सही।" ... बंसी ने आँख दबाई। " पर सुन, छोटी। जिस दिन तू सचमुच इस महल की मालकिन बन जाए न, ... तो इस बंसी को मत भूल जाना।" ... और वो हँसता हुआ भागा, यह जाने बिना कि उसका मज़ाक़ कितना सच था।
बंसी के मज़ाक़ में एक धार थी जो उसे कभी न दिखती। ... अद्विका की हँसी एक पल को काँपी, क्योंकि जिसे सब मज़ाक़ समझ रहे थे, वही उसका सबसे भारी सच था। ... और एक औरत ऐसी थी जो हँस नहीं रही थी, दरवाज़े की ओट से चुपचाप देखती, शारदा ताई।
शारदा ताई ने चुपचाप उसका हाथ पकड़ा और उसे कपड़ों वाले सुनसान कमरे में खींच लिया। ... वो औरत जो अब सब जानती थी, कि यह लड़की छोटे मालिक अर्नव की बेटी है, देवनारायण का अपना ख़ून। ... उसकी आवाज़ धीमी और डरी हुई थी।
" मैं चालीस साल से इस घर की दीवारें पढ़ रही हूँ, बेटी।" ... " और मैं देख रही हूँ तेरी आँखें उसे कैसे देखती हैं। रुक जा, अद्विका। ... जिस दिन तू अपना नाम कहेगी, उसी दिन उसका सब कुछ छिन जाएगा। तू उसी हाथ को दिल दे रही है जिसे एक दिन ख़ाली करना है।"
" मैं जानती हूँ, ताई।" ... आँखें भर आईं, आवाज़ भर्रा गई। " रोज़ ख़ुद से कहती हूँ कि यह गुनाह है, कि मैं उसकी दुश्मन हूँ। ... पर वो थका हुआ आदमी जब मेरे सामने अपना डर खोलता है, तो मेरा दिल भूल जाता है कि वो डर मैं ही हूँ।"
" मैं तेरे बाप को गोद में खिला चुकी हूँ, अद्विका।" ... " मैं तेरे और इस राज़ के बीच दीवार हूँ, हथियार नहीं। पर दिल एक ऐसी दीवार है जो मैं भी नहीं बचा सकती। ... सँभल जा, वरना यह मोहब्बत तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाएगी, और इस महल में कमज़ोरियाँ बिकती हैं।"
और शारदा ताई का डर बेवजह न था, क्योंकि इसी महल में एक और जोड़ी आँखें उसी मोहब्बत को तौल रही थीं। ... मल्विका राठौर ने भी वही देखा था जो पूरे स्टाफ़ ने, कि रेयांश की नज़र अब उस नौकरानी पर ठहरती है, और जो बात नौकरों को मीठी लगती थी, उसे ज़हर की तरह चुभती थी।
वो रेयांश को भी चाहती थी, और उस साम्राज्य को भी, और आज उसे दोनों फिसलते महसूस हुए। ... एक बहाने से वो ऊपर आई और दरवाज़े पर ठिठक गई। ... अंदर रेयांश उस लड़की के साथ फ़ाइलों पर झुका था, दोनों के सिर बहुत पास, और मल्विका की मुट्ठियाँ भिंच गईं।
" वाह रेयांश, चेन डूब रही है और तुम एक वेट्रेस के साथ बहीखाते पढ़ रहे हो।" ... मल्विका मुस्कुराई, पर आँखें अद्विका पर टिकी थीं। " ट्रस्ट की बैठक याद है? या आजकल तुम्हारे अहम फ़ैसले यही... पानी पिलाने वाली करने लगी है?"
" यह क्या पढ़ती है और किसके साथ बैठता हूँ, मल्विका, यह मेरा फ़ैसला है, तुम्हारे बाप का नहीं।" ... रेयांश ने फ़ाइल बंद तक नहीं की। " और जिसे तुम पानी पिलाने वाली कह रही हो, उसने वो पकड़ा जो तुम्हारी पूरी बोर्ड नहीं पकड़ पाई। कुछ और?"
" और तुम, अद्विका देशमुख..." ... मल्विका उसके इतने पास आई कि उसका परफ़्यूम अद्विका के गले तक पहुँचा। " इतनी छोटी सी लड़की, और इतने बड़े लोगों की ज़िंदगी में इतनी गहरी। ... मुझे तुम जैसी लड़कियाँ पसंद हैं। इनकी कहानियाँ खोदने में बड़ा मज़ा आता है।"
" मेरी कोई कहानी नहीं, मैडम। मैं तो बस काम करती हूँ।" ... अद्विका ने नज़र झुकाए रखी, पर रीढ़ सीधी रही। " और जिनकी कोई कहानी न हो, मैडम, उनकी किताब खोदने में आपका क़ीमती वक़्त ही ज़ाया होगा।"
और वही न झुकने वाला ठहराव अद्विका की एक ग़लती बन गया। ... कोई सच्ची नौकरानी किसी राठौर को यूँ जवाब नहीं देती, और मल्विका ने वही बात पकड़ ली जो रेयांश पहले दिन से पकड़ता आया था। ... वो मुस्कुराई, कुछ न बोली, चली गई, और वो ख़ामोशी सबसे ख़तरनाक थी।
अपने कमरे में अकेली, मल्विका ने फ़ोन उठाया। " बस, शक करना बंद। अब खोदना शुरू।" ... " एक लड़की है, अद्विका देशमुख, तीन महीने पहले राठौर ग्रैंड में भरती हुई। मुझे इसकी हर साँस चाहिए, जन्म से आज तक। ... जो काग़ज़ यह छुपा रही है, वही सबसे पहले। पैसा जितना लगे, लगेगा।"
और उसी एक फ़ोन कॉल के साथ मल्विका ने एक निजी जासूस को शिकारी कुत्ते की तरह छोड़ दिया, अद्विका देशमुख के बचपन की तरफ़ बढ़ता एक हाथ। ... और उसी पल से दो घड़ियाँ साथ चलने लगीं, वसीयत की, और शिकारी की।
उसी रात, जब नीचे शहर में एक जासूस उसका अतीत खोद रहा था, ऊपर उसका हाल एक और ही मोड़ ले रहा था। ... काम कब का ख़त्म हो चुका था, पर उनमें से कोई उठा नहीं था, बीच में बस मेज़ की एक बत्ती और वो सब जो अनकहा था।
" पता है, महीनों बाद आज पहली रात है जब मुझे यह महल जेल नहीं लग रहा।" ... रेयांश ने फ़ाइलें एक तरफ़ सरका दीं। " देवनारायण साहब के जाने के बाद मैंने सोचना छोड़ दिया था कि कोई मुझसे पूछेगा 'तुमने खाना खाया?' ... और आज तुमने पूछा। छोटी बात है, पर बड़ी है।"
" बड़े लोग यही तो भूल जाते हैं, सर, कि छोटी बातें ही ज़िंदगी होती हैं।" ... अद्विका ने कप उठाया, हाथ हल्का काँपा। " और आप उस इंसान से यह सब कह रहे हैं जिसका नाम तक आप नहीं जानते।"
" नाम से क्या होता है, अद्विका।" ... वो मेज़ घूम कर उसके सामने आ खड़ा हुआ। " मैंने नामों वाले हज़ार लोग देखे हैं, सब खोखले। और एक तुम हो, बेनाम, जिसके पास वो चीज़ है जो मुझे इस पूरे महल में नहीं मिली। ... सुकून।"
और वहीं हवा एक धागे जितनी पतली रह गई। ... उसका हाथ उठा और अनजाने में उसके गले के पुराने लॉकेट पर ठहर गया, उसके बाप की आख़िरी निशानी। ... उसे नहीं पता था कि जिसे वो छू रहा है, वही इस पूरे राज़ का सबूत है, और अद्विका की साँस उसके नीचे रुक गई।
" यह लॉकेट तुम कभी नहीं उतारतीं।" ... उसकी उँगली उस पर ठहरी रही, आँखें उसके होंठों पर। " जैसे इसके अंदर तुम्हारा पूरा अतीत बंद हो। ... कभी दिखाओगी मुझे, इसके अंदर कौन है?"
" नहीं, सर..." ... अद्विका ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया, लॉकेट को दोनों की मुट्ठी में बंद करते हुए, चेहरे एक साँस की दूरी पर। " इसके अंदर जो है, उसे देख कर आप मुझसे नफ़रत करने लगेंगे। ... और मैं आज वो एक रात और जी लेना चाहती हूँ जब आप मुझसे नफ़रत नहीं करते।"
दोनों उस कगार पर खड़े रहे, होंठ एक धड़कन दूर, और फिर भी किसी ने वो आख़िरी क़दम नहीं उठाया। ... दोनों अपनी-अपनी वजहों से डरे हुए थे, वो अपने ज़ख़्म से, वो अपने सच से। ... वो बोसा एक और मोड़ का इंतज़ार कर रहा था, और उसके साथ वो तबाही भी।
और जिस वक़्त वो दोनों कगार पर ठहरे थे, नीचे वो शिकारी अपना काम कर चुका था। ... दो दिन बाद, मल्विका की मेज़ पर एक सादा भूरा लिफ़ाफ़ा आ पड़ा, बिना किसी नाम के। ... जासूस की पहली रिपोर्ट।
मल्विका ने लिफ़ाफ़ा फाड़ा, अंदर से एक पुराना, पीला पड़ा काग़ज़ निकला, एक जन्म का रिकॉर्ड। " बाप का नाम... किसी ने स्याही से काट दिया है।" ... उसकी उँगली उस कटे नाम पर फिसली, और नीचे एक ही लफ़्ज़ बचा था जिसे मिटाया नहीं जा सका था। " पूरे काग़ज़ पर सिर्फ़ एक शब्द बचा है... राठौर।"
मल्विका ने वो लफ़्ज़ एक बार पढ़ा, फिर दो बार, और उसके होंठों पर एक ठंडी मुस्कान फैल गई। ... देशमुख नहीं, राठौर। वो नौकरानी जो किसी से नहीं डरती, वो लॉकेट, रेयांश की वो नज़र, सब एक सीध में आ गया। ... और उसने ख़ाली कमरे की तरफ़ यूँ फुसफुसाया जैसे अद्विका सामने खड़ी हो, " मिल गई तू।"
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