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अध्याय 16 / 30

जो जानता है

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

मल्विका के लफ़्ज़ अभी भी उस बड़े दफ़्तर की हवा में लटके हुए थे, गुमनाम मालकिन, और रेयांश को लगा जैसे किसी ने उसकी छाती में पिघला हुआ सीसा उँडेल दिया हो। ... और बाहर वसीयत की घड़ी में अब तीन सौ तेईस रातें बची थीं, पर अंदर, बस एक जुमले में, उसकी पूरी दुनिया की बुनियाद हिल कर रह गई थी।

" झूठ। ये सफ़ेद झूठ है, मल्विका।" ... उसने वो नीली फ़ाइल उठा कर वापस उसकी तरफ़ फेंक दी, आँखों में आग। " तुम्हारे बाप की पूरी जमात महीनों से इसी एक चाल पर उतरी है, कोई फ़र्ज़ी वारिस खड़ा करो, वसीयत तुड़वाओ। ... और आज वो घटिया काग़ज़ ले कर तुम मेरी उस लड़की पर उँगली उठा रही हो?"

" बैठ जाओ, रेयांश। सच को तुम्हारे यक़ीन की ज़रूरत नहीं होती।" ... उसने फ़ाइल उठाई तक नहीं, बस टाँग पर टाँग रखे उसे तड़पते देखती रही। " मुझे मालूम था तुम पहले इनकार ही करोगे। हर आदमी अपनी सबसे प्यारी चीज़ के बारे में पहले यही करता है, और तुम्हारी सबसे प्यारी चीज़ अब एक वर्दी में नीचे बर्तन धो रही है।"

" एक नौकरानी? जो मेरी मेज़ पर पानी रखती है, वो देवनारायण राठौर की इकलौती वारिस है?" ... वो हँसा, पर हँसी बीच में ही टूट गई। " तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम क्या बोल रही हो? पूरे हिन्दुस्तान में कोई इस बात पर यक़ीन नहीं करेगा।"

" यही तो उस बुड्ढे की असली चालाकी थी, रेयांश। साम्राज्य की वारिस को वहाँ छुपाओ जहाँ कोई ढूँढने की सोचे भी नहीं।" ... उसने आँखें सिकोड़ीं, आवाज़ पैनी हो गई। " सबसे नीचे। एक वर्दी में। तुम्हारी नाक के नीचे पानी भरती हुई, पूरे एक साल के लिए गुमनाम। जिसने ये शर्त लिखी, वो तुमसे कहीं ज़्यादा शातिर था।"

और फिर मल्विका ने वो फ़ाइल किसी जर्राह की तरह खोली, एक-एक काग़ज़ ठहर-ठहर कर मेज़ पर रखते हुए, और रेयांश के पैरों तले की ज़मीन हर पन्ने के साथ खिसकती गई।

" देखो। जन्म का रिकॉर्ड, बाप का नाम स्याही से काटा हुआ, और नीचे बचा हुआ एक ही लफ़्ज़, राठौर।" ... उसने अगला काग़ज़ रखा, फिर अगला। " 'अद्विका देशमुख' का दिया हुआ नाम उसके स्कूल के किसी रिकॉर्ड से नहीं मिलता। और वो लॉकेट जो वो गले में पहनती है, उसमें छोटे मालिक अर्नव का चेहरा बंद है, देवनारायण के उसी बेटे का, जिसे उसने घर से निकाल दिया था।"

रेयांश ने वो काग़ज़ लगभग उसके हाथ से छीन लिया, और अपनी आँखों से उस कटे हुए नाम को, और उसके नीचे बचे उस एक लफ़्ज़ को पढ़ा। " राठौर... ये किसी का भी हो सकता है। ये एक आम नाम है।" ... पर उसकी अपनी आवाज़ में अब वो पहले वाला यक़ीन नहीं बचा था।

और रेयांश जितना इनकार करना चाहता था, उसके ज़हन के टुकड़े उतने ही ख़ुद-ब-ख़ुद जुड़ने लगे। ... और एक-एक याद किसी कील की तरह उसके सीने में उतरती गई।

" उसका वो ठहराव..." ... वो खिड़की की तरफ़ मुड़ा, जैसे मल्विका से नहीं, ख़ुद से बात कर रहा हो। " एक नौकरानी, जो किसी चेयरमैन की तरह चलती है। जिसकी आँखें कभी नहीं झुकतीं। जिस दिन मैंने पूछा था, 'तुमसे पहले कहीं मिला हूँ,' जिस तरह उसने मेरी आँखों में देखा था... और दादाजी का नाम लेते ही जिस तरह उसका चेहरा एक पल को पत्थर हो गया था।"

और फिर वो सबसे भयानक कड़ी उसके सामने खुल गई। ... वो अनजाना साया जिसने उसे दो बार बचाया था, हीरों की चोरी वाली रात, और उस तख़्तापलट वाली बैठक में, जब कोई उसे किसी परछाईं की तरह बचा रहा था, और वो सोचता रह जाता था कि आख़िर उसकी पीठ पर पहरा कौन दे रहा है।

" वो साया... वही थी।" ... उसका गला सूख गया। " जिस गुमनाम वारिस के डर से मेरी नींद उड़ी हुई थी, जिसका ख़ौफ़ मैंने अपने दिल का दरवाज़ा खोल कर उसी को सुनाया था... वो वारिस मेरे ठीक सामने खड़ी मेरा पानी भर रही थी। और मैं उसी को उसी की मौत का डर बयान करता रहा।"

" अब समझे, रेयांश? वो तुम्हें बचा नहीं रही थी। वो अपनी विरासत बचा रही थी।" ... वो उसके कंधे के पास आ कर फुसफुसाई। " जिस दिन ये साम्राज्य डूबेगा, उसका ताज भी डूब जाएगा। तुम तो बस एक मोहरा थे, जिससे उसने अपनी बाज़ी बचाई। और तुम, बेवक़ूफ़, उसी मोहरे को दिल दे बैठे।"

पर मल्विका ने वो कड़ी ग़लत पढ़ी थी, और सिर्फ़ सुनने वाला ये जानता था। ... अद्विका ने रेयांश को इसलिए नहीं बचाया था कि उसका अपना ताज बचे, बल्कि इसलिए कि वो थका हुआ, बेख़्वाब आदमी बचे, जो उसी की तरह अकेला एक डूबते महल को अपने कंधों पर उठाए खड़ा था।

पर एक याद बाक़ी सब से ज़्यादा गहरी उतरी, ठीक कल रात की, जब वो बोसा उतरा था और फिर वो टूट कर उसके कमरे से भाग गई थी। ... उसने ख़ुद अपने होंठों से उसे चेताया था, और तब रेयांश उसे समझ नहीं पाया था।

" कल रात... भागते हुए उसने मुझसे कहा था..." ... उसकी आवाज़ काँप गई। " 'सर, आप नहीं जानते आप किसे चूम रहे हैं। जिस दिन आपको मेरा सच पता चलेगा, आप इस एक पल को अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती कहेंगे।' ... वो झूठ नहीं बोल रही थी, मल्विका। वो मुझे आगाह कर रही थी, और मैं समझा ही नहीं।"

" तो अब उस आगाही का क्या करोगे, रेयांश? रोओगे, या जीतोगे?" ... उसने सीधे उसकी आँखों में देखा, आवाज़ मख़मल में लिपटी छुरी। " साल पूरा होने में अभी वक़्त है। उस वारिस के सामने आने से पहले हम मिल कर वसीयत को झूठा साबित कर सकते हैं, उसके हर काग़ज़ को दाग़दार कर सकते हैं। एक बार वो शर्त टूटी, और ये पूरा साम्राज्य क़ानूनन तुम्हारा, और तुम्हारे साथ मैं, और जीतने वाली शाख़। या फिर एक वर्दी वाली के हाथों अपना सब कुछ लुटता देखो, वही, जिसे तुम कल रात चूम रहे थे।"

और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि मल्विका उसके हाथ में एक छुरी थमा रही थी, उसी औरत को क़त्ल करने के लिए जिससे वो मोहब्बत करता था, और उसे बचाव का नाम दे रही थी।

" तुम्हें लगता है मैं ये कर सकता हूँ? उसी लड़की को धोखा दूँ जिसने मुझे बार-बार बचाया?" ... पर लफ़्ज़ों के नीचे कहीं गहरे उस डूबते साम्राज्य का लालच भी सिर उठा रहा था, और यही उसे सबसे ज़्यादा डरा रहा था। " और सबसे बुरा ये है, मल्विका, कि एक पल के लिए... मैंने सोचा। ... पर मुझे सबूत चाहिए। किसी जासूस की जोड़ी हुई कहानी पर मैं किसी की ज़िंदगी नहीं उजाड़ता।"

" जितना चाहे सबूत जोड़ लो, रेयांश। सच वही रहेगा।" ... वो दरवाज़े पर रुकी, फ़ाइल उसकी मेज़ पर छोड़ते हुए। " पर याद रखना, घड़ी तुम्हारे लिए भी चल रही है। तीन सौ तेईस रातें, और फिर या तो ताज तुम्हारे सिर पर होगा, या उस लड़की के। सोच लेना किस तरफ़ खड़े होना है।"

और फिर वो चली गई, और रेयांश उस बड़े दफ़्तर में अकेला रह गया, वो फ़ाइल उठा कर उसने अपने कोट के अंदर सरका ली, जहाँ वो किसी अंगारे की तरह उसके सीने से लगी रही। ... अब उसके पास दो राज़ थे, एक दराज़ में कुणाल की ग़द्दारी का सबूत, और एक सीने में उस लड़की की सच्चाई, और वो नहीं जानता था कि कौन सा उसे ज़्यादा जलाएगा।

वो उस कमरे में एक पल और नहीं ठहर सका। ... और जो आदमी बरसों से सबसे ऊँची मंज़िल पर बैठा हुक्म चलाता था, वो आज ख़ुद नीचे उतर आया, उसी तहख़ाने में जहाँ उसकी वो लड़की साँस लेती थी, उसे एक बिलकुल नई नज़र से देखने।

" अरे साहब! आप... आप यहाँ, नीचे?" ... बंसी ने हड़बड़ा कर ट्रे सँभाली और अपनी वर्दी सीधी की। " कोई ग़लती हो गई क्या, सर? मैंने तो कहा था छोटी से, गिलास बाएँ से रखो, पर ये सुनती ही नहीं, अभी बुलाता हूँ उसे, अभी हाज़िर करता हूँ..."

और तभी उसकी नज़र उस पर पड़ गई। ... अद्विका कोने में खड़ी गिलास पोंछ रही थी, सिर झुकाए, और उसे अभी नहीं पता था कि जो आदमी अभी सीढ़ियों से उतरा है, वो अब इस पूरे महल का सबसे बड़ा राज़ जान चुका है।

" जी, सर। कोई काम था?" ... कल रात के बाद वो उसकी आँखों में आँखें नहीं डाल पा रही थी। " पानी ले आऊँ, या... आप ऊपर चलिए, मैं वहीं भिजवा देती हूँ।"

और अब उसका हर मामूली लफ़्ज़ रेयांश के कानों में किसी और ही मतलब से गूँज रहा था। ... 'कोई काम था, सर,' वो पूछ रही थी, और वो जानता था कि जिस महल का वो ख़ुद को मालिक समझे बैठा है, उसकी असली मालकिन यही है, जो उससे पानी के लिए पूछ रही है।

" वो लॉकेट..." ... उसकी नज़र उसके गले में लटके उसी पुराने लॉकेट पर ठहर गई, जिसके अंदर का चेहरा अब उसे मालूम था। " तुम इसे कभी नहीं उतारती। किसका है ये?"

" मेरे बाप का है, सर।" ... उसकी उँगलियाँ लॉकेट पर कस गईं, और आवाज़ में एक ऐसी चट्टान थी जो किसी नौकरानी की नहीं होती। " दुनिया में यही एक चीज़ है जो सच में मेरी अपनी है, इसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता। ... पर सर, आज आपकी आँखों में गुस्सा नहीं है। कुछ और है, जो मुझे डरा रहा है।"

और कल रात का वो बोसा दोनों के बीच किसी दीवार की तरह खड़ा था, जिसे न वो छू सकता था, न वो। ... रेयांश ने उस एक चेहरे में दो लोगों को देखा, वो वारिस जो एक दिन उसका सब कुछ छीन लेगी, और वो औरत जिसे वो कल रात अपनी बाँहों में भर बैठा था, और वो किसी से भी नफ़रत नहीं कर पा रहा था।

" अद्विका, अगर मैं तुमसे कहूँ कि मैं जानता हूँ कि तुम..." ... वो रुक गया, जुमला अधूरा छोड़ कर, जैसे किसी कगार पर आ कर पीछे हट गया हो। " ...रहने दो। जाओ, आराम करो। रात बहुत हो गई है।"

और वो पलट कर वापस अपनी उसी अँधेरी दुनिया की तरफ़ चढ़ गया, और अद्विका उसकी जाती हुई पीठ को देखती रह गई, ये न समझ पाते हुए कि आज उसकी आँखों में वो पुरानी आग क्यों नहीं थी, बस एक अजीब सी, गहरी चोट थी।

उस रात नींद उसके पास फटकी तक नहीं। ... वो फ़ाइल उसकी मेज़ पर खुली पड़ी थी, और उसमें से निकलते दो रास्ते उसे मुँह चिढ़ा रहे थे, एक जो उस लड़की को बचाता था, और एक जो ख़ुद उसे।

" अगर मैं मल्विका का साथ दूँ, तो ये साम्राज्य मेरा। वो सब कुछ जिसके लिए मैंने अपना ख़ून जलाया।" ... उसने अपने ही हाथों को देखा, जैसे उन पर किसी का ख़ून लगा हो। " और अगर मैं चुप रहूँ, तो जिस दिन वो अपना नाम लेगी, मैं कुछ भी नहीं रहूँगा। ... पर उस लड़की ने तो मुझे हर बार बचाया है। मैं उसका दुश्मन बनूँ, या... या उसे आगाह कर दूँ?"

और उस पूरे हिसाब-किताब के नीचे एक चीज़ थी जो चुप ही नहीं हो रही थी, कल रात का वही बोसा, वो एक साँस जिसमें न कोई मालिक था, न कोई मालकिन। ... वो एक पूरे साम्राज्य को तौल सकता था, पर उस एक साँस को नहीं।

और आधी रात के क़रीब वो आदमी एक बार फिर नीचे उतरा, इस बार बिलकुल चुपचाप, कोट के अंदर वो फ़ाइल दबाए। ... तहख़ाने के उस लंबे गलियारे के आख़िर में एक छोटा सा दरवाज़ा था, नौकरों की उस दुनिया का, जिसके पीछे इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन सो रही थी।

" मैं ख़ुद नहीं जानता मैं यहाँ क्यों आया हूँ।" ... उसने कोट के अंदर उस फ़ाइल पर हाथ रखा, जो अब भी किसी अंगारे सी जल रही थी। " उसे चेताने, या उसे इस्तेमाल करने? ... इस दरवाज़े के इस तरफ़ खड़ा मैं ख़ुद नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, उसका दुश्मन, या उसकी पनाह।"

और जिस आदमी ने पूरी उम्र हर चीज़ तौली थी, वो आज इस एक फ़ैसले को नहीं तौल पा रहा था। ... उसका एक हाथ उसे बचाना चाहता था, दूसरा उसे हथियार बनाना, और इन दोनों के बीच वो उस बंद दरवाज़े के सामने खड़ा काँप रहा था।

उसने अपने काँपते हाथ को उस लकड़ी के दरवाज़े की तरफ़ उठाया, और एक पल के लिए पूरा महल, पूरी वसीयत, पूरी जंग, सब उसी एक बँधी हुई मुट्ठी में सिमट आए।

और फिर, रात के उस सन्नाटे में, उसकी मुट्ठी उस दरवाज़े पर पड़ी, एक बार, दो बार, और वो आवाज़ पूरे ख़ामोश गलियारे में गूँज गई। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि उस दरवाज़े के पीछे कोई मामूली नौकरानी नहीं, इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन सो रही थी, और उस दस्तक के साथ वो आख़िरी दीवार, जो अब तक उन दोनों के बीच खड़ी थी, गिरने वाली थी।

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