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Chapter 9 of 30

झूठ का घर

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

पटरियों के उस पार, जहाँ राठौर ग्रैंड की संगमरमरी रौशनी कभी नहीं पहुँचती, अद्विका आधी रात के बाद अपने किराए के कमरे की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। ... दिन भर वो उस महल की गुमनाम मालकिन रहती थी, और रात को यहाँ लौट कर, बस अद्विका। ... पर आज दरवाज़ा खोलते ही उसे लगा, जैसे अँधेरे में कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो।

तभी कमरे की पीली बत्ती एक झटके से जल उठी, और सामने जूही बैठी थी, दोनों हाथ सीने पर बाँधे, ठीक किसी पुरानी फ़िल्म के जासूस की तरह। ... मेज़ पर दो ठंडी चाय के कप पड़े थे, और उसकी आँखों में नींद नहीं, सवाल थे।

"आ गईं मोहतरमा?" ... जूही ने भवें चढ़ा कर कहा, आवाज़ में नक़ली गुस्सा और असली फ़िक्र दोनों घुले हुए। "रात के साढ़े बारह बज रहे हैं, अद्विका। ... कौन सी नौकरी है, जो सुबह अँधेरे में शुरू हो और आधी रात को ख़त्म?"

अद्विका ने कंधे से बैग उतारा और हल्के से मुस्कुराई। " होटल की नौकरी ऐसी ही होती है, जूही। ... मेहमान सोते नहीं, तो हमें भी कहाँ सोना नसीब।" ... "तूने खाना खाया कि नहीं?"

"खाना छोड़ खाना।" ... जूही उठ कर उसके पीछे रसोई तक चली आई। "तीन हफ़्ते से देख रही हूँ। फ़ोन आता है, तू गली में जा कर बात करती है। कोई बूढ़ा आदमी तुझे काली गाड़ी में लेने आता है। ... और परसों तेरे भाई की पूरे साल की फ़ीस एक झटके में जमा हो गई। इतना पैसा एक वेट्रेस के पास आया कहाँ से?"

अद्विका का हाथ एक पल को ठिठका, फिर उसने बहुत सहजता से कहा। " नई जगह अच्छी तनख़्वाह है, जूही। और वो बूढ़े... मेरे नए मालिक के मुनीम हैं, बस।" ... और उसे हैरानी हुई कि झूठ अब कितनी आसानी से ज़बान पर आता था।

जूही ने उसका हाथ पकड़ा और फुसफुसा कर कहा, जैसे दीवारों के भी कान हों। " सच बता मुझे। ... तू किसी ग़लत काम में तो नहीं फँस गई? वो हवाला, स्मगलिंग, वैसा कुछ? ... रोज़ अख़बार में पढ़ती हूँ, सीधी-सादी लड़कियाँ कैसे फँसाई जाती हैं।"

अद्विका के मुँह से एक थकी हुई हँसी निकल गई। " हे भगवान, जूही। ... तेरी वो जासूसी वाली वेब सीरीज़ अब बंद करवानी पड़ेगी।" ... उसने जूही को गले लगा लिया। "मैं बिल्कुल ठीक हूँ, पगली।"

जूही पीछे हटी और उसकी आँखें सिकुड़ गईं। " अगर ग़लत काम नहीं है... तो एक ही बात बचती है।" ... उसने उँगली अद्विका की तरफ़ तानी, आधी शरारत, आधा शक। " तेरा वो नया मालिक। तू उससे इश्क़ तो नहीं कर बैठी? ... सच बता, वो तेरा बॉस है ना?"

और मज़ाक़ में फेंका हुआ वो तीर, अनजाने में, ठीक उस जगह जा कर लगा, जहाँ अद्विका ख़ुद देखने से डरती थी। ... एक पल को उसकी आँखों के सामने रेयांश का वो थका चेहरा तैर गया, वो आदमी जिससे उसका नाम वापस लेते ही सब कुछ छिन जाना था।

" बकवास मत कर, जूही।" ... फिर उसने अपनी आवाज़ नरम की। " वो घमंडी आदमी और मैं? ... वो तो अपने नौकरों को इंसान भी नहीं समझता। सो जा अब।"

पर उस रात अद्विका को नींद नहीं आई। ... जूही दूसरे पलंग पर गहरी नींद सो रही थी, वही जूही जिससे वो अब हर साँस के साथ झूठ बोल रही थी। ... पहली बार उसे लगा कि उसने सिर्फ़ अपना नाम नहीं छुपाया, अपने चारों तरफ़ झूठ का एक पूरा घर खड़ा कर लिया।

अगली रात, शहर के एक पुराने हिस्से में, वकील विश्वनाथ के उस बंद दफ़्तर में, जहाँ पुरानी फ़ाइलों और स्याही की गंध हवा में जमी रहती थी, अद्विका उसके सामने बैठी थी। ... और आज विश्वनाथ के चेहरे पर वो सूखी हँसी नहीं थी, जो हमेशा रहती थी।

" एक बुरी ख़बर है, बेटी।" ... विश्वनाथ ने अपनी ऐनक उतार कर मेज़ पर रखी। "जयदेव के आदमी अब तेरे बचपन की खुदाई कर रहे हैं। ... उन्हें एक तस्वीर मिल गई है। तेरे बाप की, तेरी माँ की, और एक नन्ही बच्ची की। ... और वो नन्ही बच्ची, अद्विका, तू है।"

अद्विका का हाथ बेसाख़्ता उसके गले तक चला गया, वहाँ, जहाँ वर्दी के नीचे वो लॉकेट छुपा था। " कौन सी तस्वीर, वकील साहब? ... माँ के पास तो बस एक ही तस्वीर बची थी..."

" वही, जिसमें तेरी माँ के गले में ये लॉकेट है।" ... विश्वनाथ ने उसके गले की तरफ़ इशारा किया। "जो लॉकेट इस वक़्त तेरे गले में है, बेटी। ... जिस दिन किसी ने उस तस्वीर वाले लॉकेट को तेरे इस लॉकेट से मिला लिया, उसी दिन ये गुमनाम मालकिन का खेल ख़त्म।"

और यही उस सारे जाल की सबसे कड़वी बात थी। ... देवनारायण ने अपने आख़िरी महीनों में, पछतावे में डूब कर, अपनी खोई पोती को गली-गली ढूँढा था। ... और उसी बूढ़े की मोहब्बत ने जो लकीर छोड़ी, अब वही पकड़ कर गिद्ध उस तक आ रहे थे। जिस प्यार ने उसे ढूँढा, वही अब उसे मरवा सकता था।

" अब मेरी बात ध्यान से सुन।" ... विश्वनाथ आगे झुका। "तेरे बचपन का हर निशान मिटाना होगा, इससे पहले कि उनके जासूस उस बच्ची को इस होटल की भरती वाली फ़ाइलों से जोड़ पाएँ। ... वो पुराना पता, तेरे स्कूल का रिकॉर्ड, वो जन्म का काग़ज़। सब कुछ, हवा में।"

" और वो फ़ाइल, वकील साहब, जो मैंने इसी होटल में नौकरी के वक़्त जमा की थी?" ... अद्विका की आवाज़ में एक नई घबराहट थी। "उसमें मेरे स्कूल का सर्टिफ़िकेट लगा है। ... और उस पर, फीकी स्याही में, वही नाम आज भी दबा पड़ा है, जिसे हम मिटाने की कोशिश कर रहे हैं।"

विश्वनाथ एक पल चुप रहा, और वो चुप्पी किसी भी जवाब से ज़्यादा डरावनी थी। " तो सबसे पहले वही फ़ाइल सुरक्षित करनी होगी। कल सुबह मैं अपना आदमी भेजता हूँ।" ... उसने घड़ी की तरफ़ देखा। "साल पूरा होने में अभी तीन सौ अड़तीस दिन बाक़ी हैं, बेटी। ... इतने लंबे रास्ते पर एक भी नाम हमारे ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहिए।"

और उस रात एक ख़ामोश दौड़ शुरू हो गई। ... एक तरफ़ विश्वनाथ के आदमी अद्विका की ज़िंदगी के हर पुराने निशान को चुपचाप मिटाने में जुट गए। ... और दूसरी तरफ़, तीन मंज़िल ऊपर उसी महल में, गिद्धों के जासूस उसी बच्ची के आख़िरी निशान की तरफ़ रेंगते आ रहे थे।

दो रातें बाद, अद्विका जब घर लौटी, तो जूही इस बार चाय ले कर नहीं, एक छोटे से काग़ज़ के टुकड़े के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी। ... और इस बार उसके चेहरे पर वो शरारत नहीं थी। इस बार आँखों में कुछ और था, कुछ भारी।

" ये तेरी जेब से गिरा था, अद्विका।" ... जूही ने वो पुराना विज़िटिंग कार्ड उठा कर दिखाया। "विश्वनाथ, एडवोकेट। वकील। ... एक वेट्रेस को हर हफ़्ते एक वकील से चोरी-छिपे क्यों मिलना पड़ता है? ... तू किसी मुसीबत में है ना?"

अद्विका ने वो कार्ड उसके हाथ से लेने के लिए हाथ बढ़ाया, पर जूही ने उसे पीछे खींच लिया। " जूही, वो कार्ड मुझे दे दे। ... ये सब तू नहीं समझेगी। बस इतना यक़ीन कर ले, कि मैं जो कर रही हूँ, अपने भले के लिए कर रही हूँ।"

" तो समझा दे न मुझे, अद्विका।" ... जूही की आँखें भर आईं। "हम दस साल से एक छत के नीचे हैं। तेरी माँ के जाने पर भी मैं तेरे साथ थी। ... और आज तू मुझसे नज़रें चुरा रही है? ... जो भी है, बता दे। क़सम से, किसी को नहीं बताऊँगी।"

और उस एक पल में, उसका पूरा सच उसके होंठों तक चला आया। ... जी चाहा कि वो जूही का हाथ पकड़ कर सब कह दे, कि वो अद्विका देशमुख नहीं, अद्विका राठौर है, उसी राठौर ग्रैंड की मालकिन, जिसने उसे कुत्ते की तरह निकाला था। ... लफ़्ज़ उसकी ज़बान की नोक पर थरथरा रहे थे।

" जूही... अगर मैं तुझे सच बता दूँ न... तो तू..." ... अद्विका की आवाज़ बीच में ही काँप कर टूट गई, और वो रुक गई।

और तभी वसीयत की वो क्रूर शर्त उसके गले में फंदे की तरह कस गई। ... एक बार भी सच बोला, तो वसीयत रद्द, और सब कुछ गिद्धों के हाथ। ... और उससे भी बड़ा डर, कि जूही को सच पता चला, तो वो भी इन्हीं गिद्धों के रास्ते में आ जाएगी। ... इसलिए उसने वो पूरा सच एक घूँट में उतार लिया।

" सच ये है, जूही... कि मैं एक पुराने डर से भाग रही हूँ।" ... और जो कहा, वो झूठ नहीं था, बस पूरा सच नहीं था। "कुछ लोग हैं, जो मेरे ख़ानदान से हिसाब चुकाना चाहते हैं। वो वकील मेरी हिफ़ाज़त कर रहा है। ... तू जितना कम जानेगी, उतनी महफ़ूज़ रहेगी।"

जूही ने आँखें पोंछीं और एक टेढ़ी सी मुस्कान के साथ कहा। " ठीक है, बाबा। नहीं पूछूँगी अब कुछ।" ... "पर एक बात कान खोल कर सुन ले, पगली। ... तेरी ये लड़ाई जो भी है, तू उसमें अकेली नहीं है। ये घर, और तेरी ये जूही, हमेशा तेरे पीछे खड़ी रहेगी।"

और जूही की उस मोहब्बत ने अद्विका को किसी बेइज़्ज़ती से ज़्यादा गहरा घाव दिया। ... क्योंकि जिसने अभी कहा था कि वो अकेली नहीं है, उसी से वो अपना सबसे बड़ा झूठ बोल रही थी। ... और उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसके झूठ के उस घर की एक दीवार, ठीक उसी वक़्त, तीन मंज़िल ऊपर दरकने वाली थी।

अगली सुबह, राठौर ग्रैंड की उन्हीं दीवारों के पीछे, स्टाफ़ के रिकॉर्ड वाले उस छोटे कमरे में, जहाँ सैकड़ों नौकरों की फ़ाइलें अलमारियों में क़ैद थीं, शारदा ताई अकेली खड़ी थी। ... वो किसी के कहने पर नहीं आई थी। जब से उसने उस लॉकेट में छोटे मालिक का चेहरा पहचाना था, उसका दिल एक पल चैन से नहीं बैठा था।

उसकी काँपती उँगलियाँ अलमारी में से एक पतली फ़ाइल खींच लाईं। ... अद्विका देशमुख। ... सबसे ऊपर भरती का फ़ॉर्म, और उसके ठीक नीचे, स्कूल का एक पुराना सर्टिफ़िकेट, जिसकी फीकी स्याही में, बाप के नाम की जगह, एक आधा-कटा नाम दबा था, जिसे ये महल चालीस बरस से भूलने की कोशिश कर रहा था। ... शारदा की साँस रुक गई।

" अरे मेरे मालिक..." ... शारदा ने वो सर्टिफ़िकेट अपने काँपते हाथों में थाम लिया। "तो तूने अपने बाप का नाम यहीं, इसी काग़ज़ में दबा रखा था, बेटी। ... मेरी भोली बच्ची। अगर ये किसी ग़लत हाथ लग गया..."

और ठीक उसी पल, कमरे का दरवाज़ा खुला। ... दहलीज़ पर एक अजनबी खड़ा था, स्लेटी सूट में, आँखों में वो ठंडक जो सिर्फ़ पैसे से ख़रीदी जाती है। ... शारदा ने वो फ़ाइल बेसाख़्ता अपने आँचल की ओट में कर ली।

" माफ़ कीजिए, माताजी।" ... उस आदमी ने इत्मीनान से अंदर आते हुए कहा। "मुझे मैनेजमेंट की तरफ़ से एक जाँच में भेजा गया है। ... मुझे पिछले दो महीनों में इस होटल में भरती हुई हर औरत की फ़ाइल चाहिए। एक-एक करके, अभी।"

" फ़ाइलें, साहब?" ... शारदा ने अपनी आवाज़ को बूढ़ा और भोला बना लिया, जबकि आँचल के नीचे उसकी मुट्ठी उस एक फ़ाइल पर लोहे की तरह कस गई। "मैं तो बस झाड़-पोंछ करने वाली बुढ़िया हूँ। रिकॉर्ड वाले बाबू तो अभी आए ही नहीं..."

" रिकॉर्ड वाले बाबू को यहाँ आने से मैंने ही रोका है, माताजी। और कमरे की चाबी उन्होंने आपके हाथ में थमाई है।" ... उस आदमी ने सीधे अलमारी की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "तो सारी फ़ाइलें निकालिए। ... और जो इस वक़्त आपके हाथ में छुपी है, शुरुआत उसी से कीजिए।"

और उस कमरे में, शारदा की मुट्ठी में, वो एक फ़ाइल किसी जलते अंगारे की तरह दबी थी। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि शारदा जिस फ़ाइल को साँस रोके छुपा रही थी, उसी के अंदर, भरती के फ़ॉर्म से एक परत नीचे, इस पूरे राठौर ग्रैंड की गुमनाम मालकिन का असली नाम दबा साँस ले रहा था। ... और वो अजनबी हाथ, ठीक उसी फ़ाइल की तरफ़, बढ़ चुका था।

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