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अध्याय 27 / 30

जीत की चोट

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

सौ मोमबत्तियों की वो भरी दावत अब टूट रही थी। कैमरों की चमक, निवेशकों की फुसफुसाहट, और मेज़ के सिरे पर जयदेव राठौर को दो वकील और एक पुलिस अफ़सर घेरे खड़े थे, उसकी वो मख़मली आवाज़ अब हमेशा के लिए बुझ चुकी थी, और मल्विका उसी भीड़ में सिर झुकाए, राख की तरह बैठी थी। पर उस पूरे शोर को चीरते हुए, बोर्डरूम के पिछले दरवाज़े से, तहख़ाने की पूरी दुनिया एक साथ अंदर घुस आई, और सबसे आगे था बंसी, आँखों में आँसू और चेहरे पर एक पागल सी हँसी।

'मालकिन! ओ मेरी मालकिन!' ... बंसी लगभग गिरते-गिरते बचा, हाथ जोड़े, फिर छोड़े, फिर सिर पर रख लिए। 'मैंने कहा था ना! मैं पहले दिन से जानता था इस लड़की में कोई बड़ी बात है! अरे शारदा ताई, मैं तो इसका बॉडीगार्ड था, बॉडीगार्ड! और ये... ये तो सीधा पूरे महल की मालकिन निकली! हे भगवान, मैंने कल ही तो इसको झाड़न पकड़ाई थी। झाड़न! मालकिन के हाथ में झाड़न! अब तो मेरी नौकरी गई।'

'चुप कर, बंसी, दो मिनट चुप कर।' ... शारदा ताई की आवाज़ काँप रही थी, आँखें लबालब भरी हुई, और उसने अद्विका का चेहरा अपनी दोनों काँपती हथेलियों में भर लिया। 'चालीस साल, बेटी... चालीस साल मैंने इस महल की सेवा की। जिस दिन तेरे बाप, छोटे मालिक अर्नव को इस घर से निकाला गया था, मैंने अपने इन्हीं हाथों उनका सामान बाँधा था, और छुप कर रोई थी। और आज उन्हीं की बेटी इस मेज़ के सिरे पर खड़ी है, अपने पूरे नाम के साथ। देवनारायण साहब जहाँ भी हैं, आज उनकी आत्मा को शांति मिली होगी।'

अद्विका की आँखें भर आईं, और एक पल के लिए वो अपने उन लोगों के बीच खो गई जिनके लिए उसने ये पूरा साल जिया था। बंसी हँस रहा था, शारदा ताई उसका माथा चूम रही थी, और तहख़ाने का हर वो चेहरा उसके इर्द-गिर्द रो रहा था, हँस रहा था, जिसे कल तक इस मेज़ ने सिर्फ़ एक वर्दी समझा था।

पर उस पूरी ख़ुशी के ठीक बीचोंबीच, अद्विका की नज़र बार-बार उस एक दरवाज़े की ओर लौट रही थी, जहाँ से थोड़ी देर पहले रेयांश चुपचाप निकल गया था। पूरा साम्राज्य अब उसकी मुट्ठी में था। पर उसका दिल उस ख़ाली दरवाज़े पर अटका हुआ था।

वो अपने लोगों की उस भीड़ से चुपचाप खिसक गई, संगमरमर की उन्हीं चौड़ी सीढ़ियों से ऊपर, उस कोने के दफ़्तर की ओर जो कल तक रेयांश का था। दरवाज़ा अधखुला था। अंदर, शहर की लाखों रौशनियों के सामने खड़ा, रेयांश अपनी मेज़ की दराज़ें एक-एक कर के ख़ाली कर रहा था, बिना किसी जल्दी के, बहुत शांत, जैसे कोई अपनी ही पूरी ज़िंदगी को एक बैग में समेट रहा हो।

'तुम यहाँ हो।' ... अद्विका दहलीज़ पर ठिठक गई, आवाज़ धीमी। 'नीचे पूरा राठौर ग्रैंड तुम्हें ढूँढ रहा है, रेयांश। और तुम यहाँ, अकेले, आधे अँधेरे में, अपनी दराज़ें ख़ाली कर रहे हो। आज की रात तो कम से कम रुक जाते।'

'ये अब तुम्हारा दफ़्तर है, मालकिन।' ... उसने मुड़े बिना कहा, आवाज़ पत्थर जैसी शांत। 'मैं बस अपना सामान हटा रहा हूँ, ताकि कल सुबह तक ये कमरा तुम्हारे लिए तैयार हो जाए।'

'नीचे निवेशक क्या कह रहे हैं, सुना तुमने? कि रेयांश सिंघानिया ने अपने ही हाथों पूरा साम्राज्य एक वेट्रेस को सौंप दिया।' ... एक ठंडी, बेजान हँसी उसके होंठों पर आई। 'कोई कहता है मैं महान हूँ, कोई कहता है मैं जन्म का बेवक़ूफ़, और कुछ फुसफुसाते हैं कि मैं शुरू से इस खेल में मिला हुआ था। तीनों में से एक भी बात अब मेरे लिए मायने नहीं रखती।'

'मुझे मालकिन मत कहो।' ... वो अंदर आ गई, दरवाज़ा पीछे छोड़ कर। 'तुम, इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ तुम, मुझे वो लफ़्ज़ मत कहो, रेयांश। कुछ घंटे पहले तुमने मुझे मेरे अपने नाम से बचाया था, भरी दावत के सामने। और अब तुम वही नाम एक दीवार बना कर मेरे और अपने बीच खड़ा कर रहे हो।'

रेयांश धीरे से मुड़ा, और पहली बार उसकी आँखों में वो थकान दिखी जो उसने साल भर छुपाई थी। 'दीवार मैं नहीं खड़ी कर रहा, अद्विका। सच खड़ा है, और सच से बड़ी कोई दीवार नहीं होती। पंद्रह साल की उम्र में देवनारायण मुझे सड़क से उठा कर इस महल में लाए थे। मैंने इस चेन की हर ईंट को जीना सीखा, हर बेख़्वाब रात, हर गिरता सौदा, हर डूबता बैंक, ये सब मैंने अकेले अपने कंधों पर उठाया, इसलिए नहीं कि ये मेरा था, बल्कि इसलिए कि इसके सिवा मेरे पास कुछ था ही नहीं।'

'आज सुबह तक मैं रेयांश सिंघानिया था, राठौर ग्रैंड का सीईओ।' ... वो एक पल रुका, आवाज़ भारी। 'और आज इस रात... मैं कौन हूँ, अद्विका? बता दो मुझे। इस पूरे महल में मेरा अपना अब क्या बचा है? मैं कौन हूँ?'

'कुछ घंटे पहले, उसी भरी मेज़ पर, तुमने कहा था अब हम बराबर हैं।' ... वो एक क़दम और पास आई। 'तो फिर बराबरी में मेरे साथ खड़े रहो, रेयांश। ये चेन मेरे नाम है, पर मैं इसे अकेले नहीं चला सकती, और सच कहूँ तो अकेले चलाना चाहती भी नहीं। तुम वो आदमी हो जिसने इस साम्राज्य को डूबने से बचाया। ये कुर्सी, ये दफ़्तर, ये सब हम दोनों मिल कर। जो देवनारायण और मेरे बाप एक-दूसरे के साथ कभी नहीं कर पाए, वो हम कर सकते हैं। साथ।'

एक पल के लिए रेयांश की आँखों में कुछ काँपा, कोई नरम चीज़, फिर बुझ गई। 'बराबरी?' ... उसने बहुत धीरे से लफ़्ज़ दोहराया, जैसे उसका स्वाद कड़वा हो। 'कल जब पूरा शहर अख़बार खोलेगा, तो एक ही कहानी होगी, अद्विका। नई मालकिन ने अपने पुराने सीईओ को तरस खा कर दफ़्तर में एक कुर्सी दे दी।'

'लोग तुम्हें मेज़ के सिरे पर देखेंगे, और मुझे तुम्हारे पीछे खड़ा पाएँगे, मालकिन का पाला हुआ आदमी।' ... उसकी आवाज़ में एक ठंडी नफ़रत थी, ख़ुद अपने लिए। 'जो कल तक इस महल का मालिक था, वो आज उसी महल में एहसान की रोटी पर जिएगा। नहीं, अद्विका। मैं वो आदमी बन कर हर सुबह आईने में ख़ुद को नहीं देख सकता।'

'ये एहसान नहीं है, रेयांश!' ... अद्विका की आवाज़ पहली बार टूटी। 'तुम्हें पता है मैं इस पूरी विरासत को छोड़ कर भाग क्यों जाना चाहती थी? ठीक इसीलिए! मुझे पता था कि जिस दिन मैं अपना नाम लूँगी, उसी दिन तुमसे तुम्हारा सब कुछ छिन जाएगा। मैंने तुमसे कहा था, याद है, कि मैं चुपचाप चली जाऊँगी ताकि हम दोनों बचे रहें। और तुमने कहा था तुम मुझे ये साल पार करवाओगे, चाहे इसमें तुम्हारा सब कुछ लुट जाए। तुमने अपना वादा निभा दिया। अब मुझे अपना निभाने दो।'

'और फिर हम दोनों पूरी उम्र एक ही सवाल के साथ जिएँगे।' ... वो खिड़की की ओर मुड़ गया, आवाज़ में एक थकी हुई धार। 'जिस दिन मैं तुम्हारा हाथ थामूँगा, दुनिया कहेगी रेयांश ने साम्राज्य के लिए मालकिन को चुना।'

'और उससे भी बुरा ये कि... एक रात मैं ख़ुद अपने आप से पूछूँगा।' ... उसकी आवाज़ लगभग टूट गई। 'क्या मैं तुम्हारे पास इसलिए हूँ कि मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ, या इसलिए कि तुम्हारे पास वो सब है जो कभी मेरा था। मैं ये एक सवाल तुम्हारे और अपने बीच ज़िंदा नहीं रहने दूँगा। इससे बेहतर है मैं ख़ाली हाथ जाऊँ, पर साफ़ हाथ ले कर।'

अद्विका वहीं जम गई। जयदेव की मख़मली धमकियाँ उन्हें नहीं तोड़ पाई थीं, मल्विका के हथियार उन्हें नहीं तोड़ पाए थे, पूरे एक साल की झूठ, डर और छुपी पहचान की दीवार उन्हें नहीं तोड़ पाई थी। पर आज, जीत की इसी रात, रेयांश का अपना घमंड और अद्विका का अपना अपराधबोध वो कर रहे थे जो कोई गिद्ध कभी नहीं कर पाया था। वो दोनों टूट रहे थे, और इस बार कमरे में कोई दुश्मन नहीं था जिस पर उँगली उठाई जा सके।

'तो ले लो।' ... अद्विका ने अचानक कहा, आवाज़ काँपती हुई पर सच्ची। 'ये पूरी चेन, ये कुर्सी, ये मुहर, ये सब ले लो, रेयांश। मैं आज ही, अभी विश्वनाथ जी से कह देती हूँ। मैंने ये साम्राज्य अपने लिए कभी नहीं चाहा था। मैंने बस एक घर चाहा था, एक ऐसी जगह जहाँ मुझे कोई पैरों की धूल न समझे। और वो घर तुम हो, ये मार्बल नहीं। अगर ये चेन हमारे बीच खड़ी होने वाली है, तो मैं इसे आज छोड़ देती हूँ।'

'और यही तो मैं कभी नहीं होने दूँगा।' ... रेयांश की आवाज़ एक पल को तेज़ हुई, फिर एकदम धीमी पड़ गई। 'तुम अपने दादा की, अपने बाप की विरासत मेरे घमंड के लिए छोड़ दोगी? वो चार हज़ार नौकर, बंसी, शारदा ताई, तहख़ाने का हर वो चेहरा, जिनके लिए तुमने ये पूरा साल एक नरक में जिया, उन्हें फिर से गिद्धों के मुँह में डाल दोगी? सिर्फ़ इसलिए कि मैं अपने सीने में अपना घमंड ले कर जी सकूँ? नहीं, अद्विका। तुम इस महल की मालकिन हो, और तुम्हें मालकिन ही रहना है। और ठीक इसीलिए मुझे जाना है।'

रेयांश ने मेज़ पर से अपना वो एक पुराना चमड़े का बैग उठाया, जिसमें उसकी पंद्रह साल की पूरी ज़िंदगी अब सिमट आई थी। दीवार पर से देवनारायण की वो पुरानी तस्वीर उसने उतारी नहीं, छोड़ दी, क्योंकि अब वो इस घर की थी, उसकी नहीं। दराज़ें ख़ाली थीं, कुर्सी ख़ाली थी। दरवाज़े पर पहुँच कर वो एक पल के लिए रुका, पीठ अद्विका की ओर।

'रेयांश... मत जाओ।' ... अद्विका की आवाज़ अब लगभग एक फुसफुसाहट थी। 'मैंने आज पूरी दुनिया जीत ली। और उस पूरी जीती हुई दुनिया से मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए थी। तुम। अगर तुम इस दरवाज़े से निकल गए, तो मैं सब कुछ की मालकिन बन कर भी इस महल की सबसे ग़रीब औरत रह जाऊँगी।'

रेयांश ने पीछे मुड़ कर उसे देखा, एक आख़िरी बार, और उस पूरे साल की सारी थकान, सारी दबी हुई मोहब्बत, सारा टूटा घमंड, सब उसकी आँखों में एक साथ उतर आया। 'तुम्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं है, अद्विका। तुम्हारे पास एक पूरा साम्राज्य है, चार हज़ार लोग हैं, एक नाम है जिसके लिए तुमने पूरे साल अपना ख़ून जलाया। तुमने मुझे कभी ज़रूरत में नहीं, बराबरी में चाहा था। और आज हम बराबर नहीं हैं। मैं उस चीज़ पर नहीं जी सकता जो मैंने खो दी, और तुम्हारी दया पर तो बिलकुल नहीं। ख़ुश रहो, मालकिन। इस पूरे साम्राज्य की तुम अकेली हक़दार थीं।'

और वो चला गया। उसके क़दमों की आवाज़ संगमरमर के उस लंबे गलियारे में धीरे-धीरे दूर होती चली गई, और फिर सन्नाटा। अद्विका उस ख़ाली दफ़्तर में अकेली खड़ी रह गई, शहर की लाखों रौशनियों के सामने, हाथ में देवनारायण की वो मुहर जिसके एक इशारे पर अब पूरा राठौर ग्रैंड टिका था।

ठीक एक साल पहले, इसी छत के नीचे, इस चेन ने उसे बारिश में कुत्ते की तरह बाहर फेंका था। और आज, जीत की इस रात, इस पूरे महल की मालकिन बन कर, उसने अपने ही हाथों से अपनी सबसे प्यारी चीज़ को इसी दरवाज़े से बाहर जाते देखा। उसने आज सब कुछ पा लिया था। और उसी एक पल में, वो अकेली चीज़ हार गई थी जो उसने इस पूरी दुनिया में कभी सच में चाही थी।

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