अध्याय 26 / 30
गुमनाम मालकिन
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
शताब्दी की भरी बोर्डरूम दावत में जब जयदेव वारिस को एक भूत बता कर पूरी चेन हड़पने खड़ा होता है और मल्विका उसी वर्दी वाली लड़की को पानी लाने का हुक्म देती है, अद्विका ट्रे मेज़ पर रख कर अपना नाम ले लेती है, अद्विका राठौर, देवनारायण की पोती और राठौर ग्रैंड की इकलौती मालकिन, साल पूरा और वसीयत ज़िंदा। विश्वनाथ क़ानूनन उसकी घड़ी की मुहर लगाता है, मल्विका का बेनक़ाबी वाला हथियार एक घंटे की देरी से मुर्दा पड़ जाता है, और कुणाल की जालसाज़ी, तख़्तापलट और जयदेव की अपनी ज़बरदस्ती वाली रिकॉर्डिंग एक ही साँस में गिरती है, जिससे गिद्ध अपनी ही कुर्सी में राख हो जाता है। आख़िर में रेयांश, जो इसी तबादले से क़ान
सौ साल के उस पहले घंटे की गूँज अभी संगमरमर में काँप ही रही थी कि बोर्डरूम के भारी दरवाज़े पूरे खुल गए, और अद्विका, हाथ में चाँदी की ट्रे, नौकरानी की उसी वर्दी में, उस लंबी मेज़ की दुनिया में दाख़िल हुई। सौ मोमबत्तियाँ, शहर के सबसे बड़े निवेशक, अख़बारों के कैमरे, ट्रस्ट के बूढ़े चेहरे, और मेज़ के सिरे पर, सौ साल की उस कुर्सी के पास, जयदेव राठौर खड़ा हो रहा था। किसी ने उस वर्दी वाली लड़की की तरफ़ देखा तक नहीं।
'साथियों, आज इस राठौर ग्रैंड के सौ साल पूरे हुए।' ... जयदेव ने दोनों हाथ फैलाए, आवाज़ मख़मल में लिपटी हुई। 'और मेरे बड़े भाई देवनारायण की उस अजीब वसीयत को भी आज ठीक एक साल हो गया। वो एक भूत का नाम ले कर मरे, एक ऐसी वारिस का जो पूरे साल कभी सामने आई ही नहीं। शर्त साफ़ थी, एक साल में वारिस अपना दावा ले कर आए, वरना ये पूरी चेन राठौर परिवार को, यानी मुझे, लौट आएगी। साल पूरा हुआ, कोई नहीं आया। तो आज, इन सब गवाहों के सामने, मैं इस साम्राज्य की बागडोर अपने...'
'दिन अभी ख़त्म नहीं हुआ, जयदेव जी।' ... रेयांश खड़ा हो गया, चेहरा पत्थर, अंदर तूफ़ान। 'वसीयत की उस शर्त में दिन के बारह बजे तक का वक़्त है। जब तक ये घड़ी अपना पूरा साल नहीं जी लेती, इस मेज़ पर आप कोई दावा नहीं ठोक सकते। ये शताब्दी की रात है, कोई जल्दबाज़ी की अदालत नहीं।'
'बैठ जाओ, रेयांश। तुम्हारा वो भूत अब नहीं आएगा।' ... मल्विका ने एक ठंडी मुस्कान के साथ उसे देखा, फिर लापरवाही से उँगली उठा कर उस वर्दी वाली लड़की की ओर की। 'और तुम... हाँ, तुम, नौकरानी। खड़ी क्या मुँह ताक रही है? बड़े साहब का गला सूख रहा है, पानी ला। ये मेज़ बड़े लोगों की है, यहाँ तमाशे नहीं, सेवा होती है। जा।'
अद्विका एक पल के लिए रुकी। फिर उसने वो चाँदी की ट्रे किसी को थमाई नहीं, न पानी लाने मुड़ी, उसे उस लंबी मेज़ के ठीक बीचोंबीच रख दिया, बहुत धीरे से, जैसे कोई हथियार म्यान में रखता है। सौ मोमबत्तियों की रौशनी में उसके गले का वो पुराना लॉकेट चमका। और पूरे एक साल में पहली बार, उसने अपना सिर नहीं झुकाया।
'पानी बाद में, छोटी मालकिन।' ... उसकी आवाज़ धीमी थी, पर पूरे बोर्डरूम में साफ़ गूँजी। 'पहले एक नाम, जो इस मेज़ ने बहुत देर से सुना है। मेरा नाम अद्विका देशमुख नहीं है। मैं अद्विका राठौर हूँ। अर्नव राठौर की बेटी, देवनारायण राठौर की पोती, और आज इसी घड़ी से, इस पूरी राठौर ग्रैंड चेन की इकलौती मालकिन।'
एक पल को पूरा बोर्डरूम पत्थर हो गया। निवेशकों की फुसफुसाहट थम गई, कैमरों की चमक रुक गई, और मेज़ के सिरे पर जयदेव का हाथ हवा में वहीं ठहर गया, आधे दावे पर। मल्विका का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, क्योंकि पूरे कमरे में सिर्फ़ वही जानती थी कि जिस लड़की को उसने अभी-अभी पानी लाने भेजा था, उसका साल आज आधी रात ठीक बारह बजे पूरा हो चुका था। उसका हथियार, बेनक़ाबी, अब मुर्दा था।
'ये... ये पागलपन है।' ... जयदेव हँसा, पर वो हँसी काँप रही थी। 'एक नौकरानी, एक वर्दी वाली, बोर्ड की मेज़ पर खड़ी हो कर ख़ुद को राठौर बता रही है। ये कोई सस्ता नाटक है, कोई ब्लैकमेल की चाल। गार्ड! इस लड़की को अभी बाहर निकालो। और ये कैमरे बंद करो, फ़ौरन।'
'कोई गार्ड नहीं हिलेगा।' ... भीड़ को चीरते हुए विश्वनाथ आगे आया, एक हाथ में वही सीलबंद लिफ़ाफ़ा, दूसरे में एक मोटी फ़ाइल। 'मैं विश्वनाथ, देवनारायण राठौर की वसीयत का क़ानूनी अमलदार। ये रही वो मुहरबंद वसीयत, आज तक अनखुली, और ये रहा जन्म का वो रिकॉर्ड, जिस पर काटा हुआ नाम अर्नव राठौर है और बेटी का नाम अद्विका। शर्त थी एक साल गुमनाम सेवा। वो एक साल आज आधी रात पूरा हुआ, और शर्त पूरी होने के बाद, इसी दावत में, इस लड़की ने अपना नाम लिया है। एक पल पहले लेती, तो शर्त टूटती और सब आपका होता। इसने ठीक अपनी घड़ी पर नाम लिया, जयदेव जी। वसीयत ज़िंदा है, और क़ानूनन इस चेन की मालकिन अद्विका राठौर है।'
'नहीं... ये नहीं हो सकता।' ... मल्विका की आवाज़ पहली बार काँपी। 'मैं जानती थी! मैं महीनों से जानती थी ये कौन है, इसका कटा हुआ नाम, इसका लॉकेट, इसका झूठा स्कूल रिकॉर्ड, सब मेरी उस नीली फ़ाइल में था! अगर मैंने इसे कल रात, बारह बजने से पहले बेनक़ाब कर दिया होता, तो...'
'तो शर्त टूट जाती, है ना, छोटी मालकिन?' ... अद्विका उसकी तरफ़ मुड़ी, आवाज़ में बर्फ़। 'इसीलिए तो मैं पूरे साल तुम्हारे सामने पानी भरती रही, तुम्हारी चाय में मुस्कुराती रही, और तुम्हें वो एक रात कभी नहीं दी जिसका तुम्हें इंतज़ार था। तुम मुझे कल बेनक़ाब करना चाहती थीं, और आज तुमने ख़ुद, इन सैकड़ों गवाहों के सामने, मुझसे पानी माँगा। तुमने अपने ही हाथों मुझे इस मेज़ के सिरे तक पहुँचा दिया, ठीक बारह बजने के बाद।'
मल्विका धीरे से अपनी कुर्सी में धँस गई, उसका पूरा साल एक घंटे की देरी से हार गया था। पर मेज़ के सिरे पर जयदेव अभी हारा नहीं था। वो अब भी उस जाली ऑडिट की ढाल पकड़े खड़ा था, जिसके सहारे उसने सालों इस चेन को अंदर से लूटा और रेयांश को लुटेरा साबित करने की चाल चली थी। और तभी अद्विका ने विश्वनाथ के हाथ से वो मोटी फ़ाइल ले ली।
'नाम तो मैंने ले लिया, बड़े दादाजी। अब ज़रा हिसाब भी हो जाए।' ... उसने फ़ाइल खोल कर मेज़ पर पन्ने फैला दिए। 'ये रहे वो जाली भुगतान जिनसे बरसों से ये चेन अंदर ही अंदर लुटती रही, और इन हर एक के नीचे दस्तख़त है कुणाल का, रेयांश के अपने सबसे भरोसेमंद दाएँ हाथ का, जिसे आपने ख़रीदा था। ये रही वो झूठी ऑडिट रिपोर्ट जिससे आपने पिछले साल रेयांश को लुटेरा साबित कर के कुर्सी से हटाना चाहा। लुटेरा ये मेज़ नहीं थी, बड़े दादाजी। लुटेरे तो आप थे, बरसों से।'
'तू... तू एक कमीनी नौकरानी...' ... जयदेव की आवाज़ फट पड़ी, चेहरा तमतमाया हुआ। 'ये सब झूठ है, गढ़े हुए काग़ज़! तुझे पता भी है मैं कौन हूँ? मैंने तेरे जैसी लड़की को उसकी औक़ात दिखाई थी। मैंने तो तेरे उस बीमार भाई तक को...'
जयदेव अपना वाक्य बीच में ही निगल गया, पर देर हो चुकी थी। रेयांश ने चुपचाप अपने फ़ोन पर एक बटन दबाया, और पूरे बोर्डरूम में जयदेव की अपनी वो मख़मली आवाज़ गूँज उठी, उसी रात की, जब उसने अद्विका के बीमार भाई सोनू को बंधक बना कर उसे अपना दावा छोड़ने पर मजबूर किया था।
'दावेदारी चुपचाप छोड़ दे, तो सब ज़िंदा रहेंगे। वरना जिन-जिन को तू प्यार करती है, एक-एक कर के जलेंगे। सबसे पहले तेरा वो बीमार भाई, सोनू। सोच ले, बेटी, बहुत सोच-समझ कर दस्तख़त करना।'
वो आख़िरी लफ़्ज़, 'सोनू', पूरे बोर्डरूम में एक तमाचे की तरह गूँजा, और फिर सन्नाटा। कैमरे जयदेव की तरफ़ मुड़ गए, ट्रस्टियों के बूढ़े चेहरे नफ़रत से सिकुड़ गए, और जयदेव, जो एक पल पहले सौ साल की उस कुर्सी पर हाथ रखे खड़ा था, धीरे-धीरे अपनी ही कुर्सी में गिरता चला गया, राख की तरह। उसकी वो मख़मली आवाज़, जिसने साल भर इस महल को डराया था, हमेशा के लिए बुझ गई।
'एक साल पहले, इसी छत के नीचे, इसी चेन के सीईओ ने मुझे एक ऐसे जुर्म के लिए बारिश में निकाल दिया था, जो मैंने किया ही नहीं।' ... अद्विका ने पूरे बोर्डरूम पर नज़र घुमाई। 'आप सबने मुझे पैरों की धूल समझा। पर इसी एक साल में मैंने इस महल का हर कटा हुआ वेतन देखा, हर लुटा हुआ नौकर देखा। बंसी, शारदा ताई, तहख़ाने का हर वो चेहरा जो इस मेज़ के लिए सिर्फ़ एक वर्दी था। मैं ये चेन आज अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेने वापस नहीं ले रही। मैं इसे उन चार हज़ार लोगों के लिए ले रही हूँ, जिनकी रोज़ी इन गिद्धों के हाथ में जाने वाली थी।'
और वो हो गया, जिसका पूरे साल सिर्फ़ सुनने वाला इंतज़ार कर रहा था। जिस लड़की को उन्होंने एक साल पहले बारिश में कुत्ते की तरह निकाला था, वो अब इस पूरे राठौर ग्रैंड की मालकिन थी, और वही बोर्डरूम, जो अभी उसे पानी लाने का हुक्म दे रहा था, अब उसके एक इशारे पर टिका था। एक बरस की हर छोटी-छोटी बेइज़्ज़ती इस एक पल में सूद समेत चुका दी गई थी। पर जीत की उस चमक के ठीक बीच एक आदमी अब भी ख़ामोश खड़ा था, वो आदमी जिसे इस एक पल ने सबसे ज़्यादा लूटा था। रेयांश।
क्योंकि उस वसीयत का एक ही मतलब था। जो कुछ आज तक रेयांश का था, ये कुर्सी, ये चेन, वो नाम जो देवनारायण ने उसे यतीम से बेटा बना कर दिया था, वो सब इसी एक पल में अद्विका राठौर के नाम हो चुका था। जिस डूबते साम्राज्य को उसने बेख़्वाब रातों में अकेले अपने कंधों पर उठाया था, वो अब उसका नहीं था। और फिर, पूरे बोर्डरूम के सामने, रेयांश आगे बढ़ा।
'ट्रस्ट के सामने, ये रहा मेरा इस्तीफ़ा।' ... रेयांश ने अपने कोट से एक काग़ज़ निकाल कर मेज़ पर रखा, फिर देवनारायण की वो पुरानी मुहर, चेन की असली चाबी, अद्विका की ओर बढ़ाई। 'मैं रेयांश सिंघानिया, आज इस पूरी चेन का कार्यभार इसकी असली मालकिन, अद्विका राठौर, को सौंपता हूँ। देवनारायण ने मुझे यतीम से उठा कर बेटा बनाया था, पर ये साम्राज्य कभी मेरा था ही नहीं। ये हमेशा से इसका था। मैं इसे इसके सही हाथों में लौटाता हूँ, आज, अपनी मर्ज़ी से।'
पूरे बोर्डरूम की साँस रुक गई। जिस आदमी को इस पूरे शहर ने राठौर ग्रैंड का अगला मालिक माना था, उसने अपने ही हाथों, सैकड़ों गवाहों के सामने, वो पूरा साम्राज्य एक वर्दी वाली लड़की की हथेली में रख दिया। कैमरे चमकते रहे, निवेशक फुसफुसाते रहे। पर उस पूरी भीड़ में सिर्फ़ दो लोग जानते थे कि अभी-अभी असल में क्या हुआ था।
अद्विका ने वो मुहर ली, और एक पल के लिए उसकी उँगलियाँ रेयांश की उँगलियों से छू गईं। 'तुमने अभी-अभी अपना सब कुछ मेरे हाथ में रख दिया,' ... उसने बहुत धीरे से कहा, सिर्फ़ उसके लिए, जिसे उस भीड़ में कोई और नहीं सुन सकता था। 'जिस दिन से मुझे पता चला मैं कौन हूँ, मैं इसी एक पल से डरती थी। मैंने आज पूरा साम्राज्य जीत लिया, रेयांश। और उसी एक साँस में तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीन लिया।'
'तो अब हम बराबर हैं।' ... रेयांश हल्के से मुस्कुराया, पर उस मुस्कान के पीछे कुछ चुपचाप टूट रहा था। 'तुमने एक साल पहले, इसी छत के नीचे, सब कुछ खोया था। और आज मैंने। शायद अब, पहली बार, हम एक-दूसरे को ठीक से समझ पाएँगे, मालकिन।'
और वहीं, सौ मोमबत्तियों की रौशनी में, कैमरों की चमक में, पूरे राठौर परिवार के सामने, वो एक तस्वीर खिंच गई जिसका इंतज़ार पूरे साल सिर्फ़ सुनने वाला कर रहा था। एक तरफ़ अद्विका राठौर, हाथ में पूरा साम्राज्य, वो गुमनाम मालकिन जो आख़िरकार अपने नाम के साथ इस मेज़ के सिरे पर खड़ी थी। और ठीक उसके सामने रेयांश, वो आदमी जिससे उसने अभी-अभी उसका सब कुछ छीन लिया था, और जिसे वो इस पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहती थी। जीत और ज़ख़्म, एक ही फ़्रेम में। उसने आज सब कुछ पा लिया था। और ठीक उसी पल, उसे पहली बार समझ आया कि उस 'सब कुछ' की असली क़ीमत किसका चेहरा है।
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