अध्याय 28 / 30
दो नाम एक दिल
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
रेयांश के जाने के बाद टूटने के बजाय अद्विका शारदा ताई से वो पुराना ज़ख़्म समझती है, घमंड बनाम प्यार, जिसने देवनारायण और उसके बाप को अलग किया था, और अपनी पहली मालकिन वाली ताक़त नौकरों की कटी पगारें लौटाने और बाप के सपने वाली बस्ती को बुलडोज़र से बचाने में लगा देती है। फिर बारिश में रेयांश को रोक कर वो उसे दया नहीं, बराबरी और एक अधूरा काम देती है, दो नाम पर एक ही दिल, और जब उसका जवाब होंठों पर आता है तभी मल्विका का आख़िरी वार फट पड़ता है, एक क़ानूनी रोक जो पूरे राठौर ग्रैंड को सील कर देगी और सोनू की जान पर तना एक साया।
रेयांश के क़दमों की आख़िरी आहट को संगमरमर के उस लंबे गलियारे ने निगल लिया, और उस कोने के दफ़्तर में सिर्फ़ अद्विका बची, और उसकी हथेली में देवनारायण की वो ठंडी मुहर। खिड़की के बाहर मुंबई की लाखों बत्तियाँ जल रही थीं, और उसके ऐन सामने वो कुर्सी ख़ाली पड़ी थी जिस पर अभी घंटे भर पहले तक इस पूरे साम्राज्य का बोझ एक अकेले आदमी ने उठा रखा था। दूर, काले आसमान में कहीं, बारिश की पहली धीमी गड़गड़ाहट उठी, ठीक वैसी ही जैसी एक साल पहले उठी थी।
कोई और होता तो शायद उस ख़ाली कुर्सी के सामने बैठ कर बिखर जाता। पर अद्विका बिखरी नहीं। उसने वो मुहर बहुत धीरे से मेज़ पर रखी, और अपने भीतर उठते तूफ़ान को अंदर ही अंदर पी गई। रेयांश के पीछे दौड़ कर, आँसुओं से उसे रोकना आसान होता। पर अद्विका जानती थी कि रोते हुए माँगी गई चीज़ ठहरती नहीं, और जो आदमी अपने घमंड की वजह से जा रहा है, वो किसी की दया से कभी लौट कर नहीं आता।
तभी गलियारे में धीमे, थके क़दमों की आहट हुई, और दरवाज़े पर शारदा ताई आ खड़ी हुई, चेहरे पर वो फ़िक्र जो सिर्फ़ माँओं के चेहरों पर उतरती है। उसकी नज़र एक ही पल में उस ख़ाली कुर्सी पर, उन खुली दराज़ों पर, और दीवार पर टँगी देवनारायण की उस अकेली तस्वीर पर फिरी।
'नीचे पूरा तहख़ाना तुझे ढूँढ रहा है, बेटी।' ... शारदा की आवाज़ धीमी थी, और उसकी आँखें उस ख़ाली दफ़्तर को टटोल रही थीं। 'रेयांश बाबू... चले गए, है ना?'
'उसने कहा वो मालकिन का पाला हुआ आदमी बन कर नहीं जी सकता, ताई।' ... अद्विका की आवाज़ काँपी। 'मैंने उसे बराबरी दी, पूरा साम्राज्य उसके क़दमों में रख दिया, कहा साथ चलो... और वो फिर भी चला गया। मैंने आज पूरी दुनिया जीत ली, और जिस एक इंसान के लिए ये सब जीता था, वही हार गई।'
शारदा उसके पास आई, और उसने अद्विका के दोनों ठंडे हाथ अपनी झुर्रियों भरी हथेलियों में भर लिए। 'ये घमंड मैंने पहले भी इस घर को खाते देखा है, बेटी। ठीक इसी दफ़्तर में। पैंतीस साल पहले तेरे दादा देवनारायण और तेरे बाप अर्नव भी ऐसे ही आमने-सामने खड़े थे। एक के पास पूरा साम्राज्य था, दूसरे के पास सिर्फ़ अपना ज़मीर। और दोनों में से किसी ने झुक कर दूसरे का हाथ नहीं थामा।'
'नतीजा क्या हुआ? बाप ने बेटे को घर से निकाल दिया, और बेटा मरते दम तक लौट कर नहीं आया। दोनों अकेले मरे, एक ताज पकड़े, दूसरा ज़मीर पकड़े।' ... शारदा की आवाज़ भर्रा गई। 'और रेयांश? रेयांश उसी देवनारायण का पाला हुआ है, बेटी। उसने घमंड उसी आदमी से सीखा है जिसने अपने ही बेटे को ताज के लिए खो दिया। वो तुझसे मोहब्बत करना नहीं छोड़ पाया, वो बस इस डर से भाग रहा है कि कहीं तेरे साम्राज्य का एक पाला हुआ गहना बन कर न रह जाए।'
अद्विका की साँस एक पल को थम गई। 'दादाजी ने ये चेन मुझे इनाम में नहीं दी थी, ताई... है ना? ये माफ़ी थी। उस बेटे के नाम एक टूटी हुई माफ़ी जिसे उन्होंने अपने घमंड में खो दिया। और मैं... मैं तो ठीक वही ग़लती दोबारा करने जा रही थी। रेयांश को उसके घमंड के साथ अकेले उस दरवाज़े से जाने दे कर।'
'तेरे बाप ने ये महल इसलिए नहीं ठुकराया था कि उसे दौलत बुरी लगती थी, बेटी।' ... शारदा ने उसका चेहरा हौले से ऊपर उठाया। 'उसने इसलिए ठुकराया क्योंकि देवनारायण एक ग़रीबों की बस्ती पर बुलडोज़र चलाना चाहते थे, और अर्नव अपने ज़मीर को नहीं बेच सका। ये चेन कोई ताज नहीं है जिस पर बैठ कर राज किया जाए। ये एक अधूरा काम है जो तेरे बाप ने शुरू किया और पूरा नहीं कर पाया। जिस दिन तू इसे उस काम के लिए इस्तेमाल करेगी, उसी दिन तू सच में इसकी मालकिन बनेगी। और वो काम, मेरी बच्ची, तू अकेले नहीं कर सकती।'
अद्विका के गालों पर सूखते आँसुओं की जगह अब कुछ और उतर आया था, कुछ जो पूरे साल वर्दी के नीचे दबा पड़ा था। वो मेज़ के पीछे गई, पर उस बड़ी कुर्सी पर बैठी नहीं, उसने उसे छुआ तक नहीं। उसने विश्वनाथ का नंबर मिलाया, और जब लाइन जुड़ी, तो उसकी आवाज़ में पहली बार एक मालकिन का ठहराव था।
'विश्वनाथ जी, आज रात ही, अभी।' ... उसने एक-एक लफ़्ज़ नाप कर कहा। 'तहख़ाने के हर नौकर की जो पगार पिछले तीन साल से काटी जा रही थी, वो ब्याज समेत लौटाई जाएगी। बंसी, शारदा ताई, हर वो चेहरा जिसे इस मेज़ ने पैरों की धूल समझा, उसकी रोज़ी और उसकी इज़्ज़त दोनों वापस। और वो ग़रीबों की बस्ती जिसके लिए मेरे बाप ने अपना घर छोड़ा था, उस पर बुलडोज़र चलाने की हर फ़ाइल आज रात रद्द होगी। राठौर ग्रैंड अब किसी की झोपड़ी की नींव पर खड़ा नहीं रहेगा। ये मेरा पहला हुक्म है, और मेरे बाप का आख़िरी।'
शारदा ताई की आँखें फिर भर आईं, पर इस बार आँसू का रंग दूसरा था। 'चालीस साल इस घर की चौखट घिसी है मैंने, बेटी, और आज पहली रात है जब लगा कि ये चाबियाँ किसी सही हाथ में पहुँची हैं।' ... उसने अद्विका के माथे पर हाथ रखा, एक माँ का आशीर्वाद। 'अब जा। जिस आदमी को तूने बराबरी दी है, उसे बता दे कि बराबरी दया नहीं होती। जा, अपने रेयांश को वापस ले आ। पर मालकिन बन कर जा, गिड़गिड़ाती लड़की बन कर नहीं।'
अद्विका पलटी, और उन्हीं चौड़ी संगमरमर की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी जिन पर ठीक एक साल पहले उसका बैज नोच कर, उसे कुत्ते की तरह घसीट कर बारिश में फेंका गया था। आज वो उतर रही थी उसी लॉबी के चमकते फ़र्श को पार करती हुई, पर आज न कोई उसे रोक रहा था, न घसीट रहा था। आज ये पूरा फ़र्श उसका था।
और वहाँ, उन्हीं बड़े काँच के दरवाज़ों पर, कंधे पर वो पुराना चमड़े का बैग लटकाए, रेयांश बाहर की मूसलाधार बारिश में उतरने ही वाला था, पीठ महल की ओर, चेहरा तूफ़ान की ओर। आज वही दहलीज़ एक टूटे हुए आदमी को निगलने वाली थी।
'रुको, रेयांश।' ... अद्विका बारिश की परवाह किए बिना उसके पीछे पोर्टिको में निकल आई, और मोटी बूँदें उसके चेहरे पर, उसके बालों पर गिरने लगीं। 'एक साल पहले इसी बारिश ने मुझे तोड़ा था, इसी दरवाज़े ने बाहर फेंका था। और आज मैं, इस पूरे महल की मालकिन, अपने पैरों पर, अपनी मर्ज़ी से इसी बारिश में तुम्हारे पीछे खड़ी हूँ। इसलिए नहीं कि मैं टूट गई हूँ। इसलिए कि जो एक बात मुझे तुमसे कहनी है, वो कहे बिना मैं तुम्हें इस दरवाज़े से नहीं जाने दूँगी।'
रेयांश ठिठका, पर मुड़ा नहीं, उसके कंधे बारिश में भीगते रहे। 'हम ये सब कह चुके हैं, अद्विका। तुम्हारे पास एक साम्राज्य है, मेरे पास सिर्फ़ मेरा नाम, और वो दोनों एक ही कमरे में साँस नहीं ले सकते। मुझे तुम्हारी दया की कुर्सी नहीं चाहिए। जाने दो मुझे।'
'मैं तुम्हें कुर्सी दे ही कब रही हूँ, रेयांश?' ... वो तेज़ क़दमों से उसके सामने आ खड़ी हुई, दोनों बारिश में भीगते हुए, आमने-सामने। 'मैं तुम्हें एक अधूरा काम दे रही हूँ। सुनो मुझे, एक बार। ये चेन मेरे लिए कभी ताज नहीं थी। मेरे दादा और मेरे बाप, दोनों घमंड में अकेले मरे, क्योंकि किसी ने झुक कर दूसरे का हाथ नहीं थामा।'
'मैं वो ग़लती दोबारा नहीं दोहराऊँगी।' ... उसकी आवाज़ बारिश की गरज के ऊपर भी बिलकुल साफ़ थी। 'जो देवनारायण और अर्नव कभी नहीं कर पाए, घमंड और ज़मीर को एक ही मेज़ पर बिठाना, वो मैं और तुम कर सकते हैं। मैं तुम्हें अपने पीछे खड़ा होने के लिए नहीं बुला रही, रेयांश। मैं तुम्हें अपने बराबर, अपने साथ बुला रही हूँ, इस चेन को वो बनाने के लिए जो मेरे बाप का अधूरा सपना था। ये दया नहीं है। ये उस अधूरे काम का बोझ है जो अब सिर्फ़ मेरा नहीं, हम दोनों का है।'
रेयांश आख़िरकार मुड़ा, और बारिश उसके चेहरे पर बह रही थी, या शायद वो सिर्फ़ बारिश नहीं थी। 'तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम मुझसे क्या माँग रही हो?' ... उसकी आवाज़ भारी थी, टूटी हुई। 'मैं पूरी उम्र किसी का उठाया हुआ रहा हूँ, अद्विका। देवनारायण का एहसान मेरे कंधों पर एक ज़ंजीर की तरह बँधा रहा। और अब तुम मेरे सामने खड़ी हो कर कह रही हो कि... ये एहसान नहीं है? ये बराबरी है?'
'मैं कह रही हूँ कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत है, रेयांश।' ... वो एक क़दम और पास आई, इतनी पास कि बारिश अब दोनों के बीच से एक पतले धागे की तरह बह रही थी। 'ज़रूरत है, दया नहीं। ये चार हज़ार लोग, ये पूरा साम्राज्य, मैं इसे अकेले नहीं संभाल सकती, और मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगी कि संभाल सकती हूँ। जिस रात तुमने भरी दावत में मुझे मेरे अपने नाम से बचाया था, तुमने अपनी कुर्सी नहीं, अपना दिल दाँव पर लगाया था। तो अब वो दिल वापस ले लो, और मेरे साथ खड़े रहो। हम दो अलग नाम सही, रेयांश, पर एक ही काम, और एक ही दिल।'
रेयांश ने उसे देखा, बारिश में भीगती उस लड़की को, जो कभी उसकी नौकरानी थी, फिर उसकी दुश्मन, फिर उसकी जान, और आज उसके सामने पूरे राठौर ग्रैंड की मालकिन बन कर खड़ी थी, और फिर भी सिर्फ़ उसे, बस उसे माँग रही थी। उसकी आँखों में कुछ पिघला, साल भर का जमा हुआ कोई बर्फ़। उसके होंठ धीरे से खुले, और एक जवाब उसकी ज़ुबान की नोक पर आ गया, वो जवाब जिसका अद्विका को पूरे एक साल से इंतज़ार था।
और ठीक उसी पल, जब रेयांश का जवाब उसके होंठों पर आ कर काँपा, उसकी जेब में फ़ोन ज़ोर से थरथराया। फिर अद्विका का। फिर लॉबी के अंदर कहीं एक और, फिर एक और, फिर दसियों, जैसे पूरा राठौर ग्रैंड एक साथ चीख़ उठा हो। रेयांश ने बारिश में भीगे, काँपते हाथ से फ़ोन निकाला, और स्क्रीन की नीली रौशनी में उसका चेहरा एकदम पत्थर हो गया।
'मल्विका।' ... उसकी आवाज़ में बर्फ़ जैसी ठंडक थी। 'ये... ये उसने अभी, इसी वक़्त पूरे बोर्ड को, हर ट्रस्टी को, हर अख़बार को एक साथ भेजा है। जयदेव के हथकड़ी पहनने से ठीक पहले का उसका आख़िरी दाँव।'
अद्विका ने उसके फ़ोन की स्क्रीन पर वो लफ़्ज़ पढ़े, और बारिश की सारी ठंडक उसकी रगों में उतर गई। मल्विका का आख़िरी संदेश, ठंडा और मख़मली।
'बधाई हो, मालकिन।' ... स्क्रीन पर लफ़्ज़ जैसे साँस ले रहे थे। 'तुमने आज सब कुछ जीत लिया। पर जो वसीयत तुमने आज साबित की, उस पर आज रात मैंने अदालत से एक आख़िरी रोक लगवा दी है, और सूरज उगने से पहले पूरा राठौर ग्रैंड सील हो जाएगा, तेरे चार हज़ार लोगों समेत। और हाँ, तेरा वो बीमार भाई सोनू... आज रात उसे शताब्दी की मुबारकबाद देने कोई मेहमान पहुँच रहा है। अगर मैं डूब रही हूँ, अद्विका राठौर, तो अकेले नहीं डूबूँगी। तेरा पूरा महल, और तेरे सारे अपने, मेरे साथ ही डूबेंगे।'
रेयांश की नज़र स्क्रीन से उठ कर अद्विका के सफ़ेद पड़ चुके चेहरे पर आ टिकी, और वो जवाब जो अभी उसके होंठों पर था, कहीं खो गया। 'सोनू...' ... उसने बस इतना कहा, और उसका हाथ पहले ही अपनी कार की चाबी की ओर बढ़ चुका था। 'अद्विका, अभी, इसी वक़्त, चलो।'
जो जवाब पूरे एक साल की दूरी तय कर के रेयांश के होंठों तक आया था, वो अब तूफ़ान में कहीं बह गया था। और मल्विका का वो आख़िरी वार दोनों के बीच से गुज़र कर सीधे उस हर चीज़ पर तन कर खड़ा हो गया जिसे अद्विका ने कभी सच में चाहा था, उसका महल, उसके लोग, और उसका इकलौता बीमार भाई। रेयांश जो कहने वाला था, वो अब सुबह तक ठहर नहीं सकता था।
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