अध्याय 13 / 30
दो किनारे
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
रेयांश अद्विका को रात के सन्नाटे में अपने कमरे में बुला कर कुणाल की वो फ़ाइल उसके सामने रख देता है, एक झूठा नाम, तीन गुमनाम बचाव, और यह डर कि कहीं वो उसी सीलबंद वसीयत के वारिस की भेजी जासूस तो नहीं। घिरी हुई अद्विका इनकार के बजाय एक आधा सच देती है, कि हाँ, नाम उसका जन्म का नहीं, और वो एक ख़तरनाक अतीत से छुप रही है, और असली राज़ उसी आधे सच के नीचे चीख़ता रहता है। तोड़ने के लिए शुरू हुई पूछताछ पिघल कर क़ुरबत बन जाती है, इल्ज़ाम भूख में बदल जाता है, और रेयांश उसका आधा झूठ इसलिए मान लेता है क्योंकि वो मानना चाहता है। आख़िर में वो फ़ाइल अपनी दराज़ में ताला लगा कर उसका राज़ उसी के पास रहने देता है,
रात के ग्यारह बज चुके थे, और राठौर ग्रैंड की सबसे ऊँची मंज़िल पर अब सिर्फ़ एक बत्ती जल रही थी। ... रेयांश के सामने वही फ़ोल्डर खुला पड़ा था, जो कल रात कुणाल छोड़ गया था, एक नाम पर लाल घेरा। ... उसने रात भर उसे तौला था, और अब एक ही रास्ता बचा था, उस लड़की को अपने सामने खड़ा कर के, ख़ुद उसकी आँखों में देखना।
अद्विका ट्रे थामे उस आख़िरी सीढ़ी तक आई, यह न जानते हुए कि आज का बुलावा चाय का नहीं था। ... साल पूरा होने में अभी तीन सौ पैंतीस रातें बाक़ी थीं, और उन रातों में से एक भी उसे इतनी भारी नहीं लगी थी जितनी यह लगने वाली थी। ... उसने दरवाज़ा खोला, और अंदर की हवा किसी अदालत की तरह ठंडी थी।
" दरवाज़ा बंद करो, अद्विका।" ... रेयांश ने ट्रे की तरफ़ देखा तक नहीं, उसकी उँगलियाँ उस खुले फ़ोल्डर पर टिकी थीं। " और वो ट्रे नीचे रख दो। आज मुझे चाय नहीं, जवाब चाहिए।"
अद्विका ने ट्रे मेज़ के कोने पर रखी, हाथ स्थिर रखने की पूरी कोशिश करते हुए। " कोई ग़लती हो गई सर मुझसे? ... जो हुक्म हो, बता दीजिए।" ... पर उसकी नज़र एक पल को उस लाल घेरे पर पड़ चुकी थी, और उसके अंदर कुछ जम गया।
रेयांश ने वो पन्ना उँगली से घुमा कर उसकी तरफ़ सरका दिया। " यह नाम पढ़ो। 'अद्विका देशमुख।'" ... उसने सीधे उसकी आँखों में देखा। " मैंने खुदवाया है। इस नाम का कोई स्कूल नहीं, कोई पुराना पता नहीं, कोई रिकॉर्ड नहीं। ... जैसे यह लड़की तीन महीने पहले हवा से बनी हो।"
अद्विका के पैरों तले ज़मीन एक बार फिर सरकी, और वसीयत की शर्त कानों में चीख़ी, एक लफ़्ज़ सच का, और सब ख़त्म। ... उसने अपने चेहरे को पत्थर में ढाल लिया, वही मुखौटा जो महीनों से उसका कवच था। ... क्योंकि वो नाम किसी रिकॉर्ड में इसलिए नहीं था, क्योंकि वो कभी था ही नहीं।
" और यह अकेली बात नहीं है।" ... रेयांश उठ खड़ा हुआ, उँगलियों पर गिनते हुए। " तूफ़ान की रात, किसी ने मुझे आगाह किया कि जो अंदर से खाता है वो भरोसेमंद चेहरे के पीछे छुपता है। बैठक में किसी ने फुसफुसाया कि मरी हुई फ़र्म ज़िंदा दस्तख़त नहीं करती। और कल रात, तिजोरी पर एक बेनाम काग़ज़। ... तीनों बार, अद्विका, हर सिरे के दूसरे छोर पर तुम खड़ी मिलती हो।"
" सर, मैं तो बस पानी भरती हूँ।" ... अद्विका ने नज़र नीची रखी, आवाज़ में वही सधी हुई आजिज़ी। " इतने बड़े महल में सैकड़ों लोग हैं। किसी की कही बात मेरे नाम क्यों मढ़ी जा रही है?"
" इसलिए कि मैंने जाँचा है।" ... रेयांश उसके सामने आ गया, आवाज़ चाकू की तरह। " सच बताओ। तुम्हें गिद्धों ने भेजा है? जयदेव ने? मल्विका ने? ... मुझ पर नज़र रखने, मेरे राज़ चुराने?"
और यहीं रेयांश का अपना शक उसी के ख़िलाफ़ मुड़ गया। ... क्योंकि जिस आदमी ने यह फ़ाइल बनाई थी, वो कुणाल था, वही ग़द्दार जिसका दस्तख़त हर चोरी के नीचे दबा था। ... तो यह लड़की क्या थी, वो साया जो उसे बचाता था, या वो प्यादा जो उसे मिटाने आया था?
" जानती हो, अद्विका, अजीब बात क्या है?" ... वो एक पल रुका, फ़ोल्डर की तरफ़ देखा। " यह फ़ाइल जिसने बनाई, मैं जानता हूँ वो ख़ुद बिका हुआ है। ... और जब एक ग़द्दार किसी की तरफ़ उँगली उठाए, तो या तो वो सच में मेरा दुश्मन है, या फिर वो मेरे लिए इतनी बड़ी ढाल है कि ग़द्दार भी उससे डरता है।"
पर इन सबके नीचे रेयांश के अंदर एक और डर सुलग रहा था, वो जो उसे रातों को सोने नहीं देता था। ... वो सीलबंद वसीयत, और उसमें दफ़्न वो गुमनाम वारिस, जो किसी भी दिन आ कर उसका सब कुछ छीन सकता था।
" और एक डर और है, अद्विका।" ... उसकी आवाज़ और नीची हो गई। " उस बंद वसीयत में एक गुमनाम वारिस का नाम दफ़्न है, जो किसी दिन आ कर यह पूरी चेन ले उड़ेगा। ... क्या पता, उसी वारिस ने तुम्हें एक जासूस बना कर मेरे इतने क़रीब बिठा दिया हो।"
और वो गुमनाम वारिस उसके ठीक सामने खड़ी थी, चेहरा पत्थर, दिल के अंदर ढोल बजता हुआ। ... उसे वही जवाब देना था जो एक नौकरानी का था, पर जिसकी असली क़ीमत सिर्फ़ इस महल की मालकिन जानती थी।
" मैं किसी वारिस को नहीं जानती, सर।" ... अद्विका ने अपनी आवाज़ को बर्फ़ की तरह ठहरा रखा। " मेरी दुनिया इस तश्तरी से बड़ी नहीं। जो ऊपर बैठे लोगों की जंग है, उसमें मुझ जैसी की क्या जगह? ... मैं न किसी की भेजी हूँ, न किसी की जासूस। और अगर मैंने कभी आपको बचाया भी हो, तो उसमें आपका नुक़सान क्या था?"
" तो फिर नाम क्यों बदला?" ... रेयांश की आवाज़ अब ऊँची थी, पर उसमें ग़ुस्से से ज़्यादा एक बेचैनी थी। " एक बेगुनाह अपना नाम नहीं छुपाता, अद्विका। तुम किससे भाग रही हो? ... और इस महल में, मेरे इतने क़रीब आकर, क्यों छुपी हो?"
दीवारें सिमट आईं, और अद्विका ने मन ही मन तौला, कितना सच वो दे सकती है, उस एक लफ़्ज़ को बचाते हुए जो पूरी वसीयत को राख कर देगा। ... उसके सामने हर रास्ता खुला था, सिवाय उस एक के, अद्विका राठौर।
" ठीक है, सर।" ... अद्विका ने एक गहरी साँस ली, और पहली बार उसकी आवाज़ से नौकरानी की परत थोड़ी सरकी। " हाँ। यह नाम मेरे जन्म का नहीं है। ... मैंने इसे इसलिए पहना, क्योंकि जिस नाम से मैं पैदा हुई, उसके पीछे कुछ लोग हाथ धो कर पड़े हैं।"
" कौन लोग?" ... रेयांश की आवाज़ अचानक धीमी पड़ गई, जैसे वो सच के बहुत क़रीब आ खड़ा हुआ हो।
" ऐसे लोग, सर, जो मुझे ढूँढ लें तो मिटा दें।" ... उसने लॉकेट को एक पल के लिए मुट्ठी में भर लिया। " मेरा एक पुराना अतीत है, जो अगर सामने आ जाए, तो मेरी जान पर बन आए। इसीलिए मैं गुमनाम हूँ, इसीलिए किसी झुके हुए सिर के पीछे छुपी रहती हूँ। ... आपसे यह छुपाया, इसकी माफ़ी चाहती हूँ। पर मैंने आपका कभी बुरा नहीं चाहा।"
" एक ख़तरनाक अतीत।" ... रेयांश ने वो लफ़्ज़ अपने अंदर तौले, और पहली बार उसका शक हिल गया। " तभी तुम किसी से डरती नहीं। क्योंकि जो मौत को पहले ही देख चुका हो, उसे धमकियाँ नहीं डरातीं।"
" मौत को देखने के बाद, सर, छोटी-छोटी धमकियाँ बेअसर हो जाती हैं।" ... उसने इस बार नज़र नहीं झुकाई। " मैंने अपना सब कुछ खोया है, इसीलिए अब किसी के छीनने का डर मुझे नहीं रहा।"
" मैंने बहुत लोग देखे हैं जो डर के मारे सिर झुकाते हैं, अद्विका।" ... रेयांश ने उसे नए सिरे से देखा। " पर तुम झुकाती हो तो सिर, आँखें नहीं। पहले दिन से यही बात मुझे चुभती है। ... तुम किसी नौकरानी की तरह मेरे सामने खड़ी नहीं होतीं।"
और सुनने वाला जानता था, उसके हर लफ़्ज़ में सच था, और फिर भी वो असली सच नहीं था। ... जो लोग उसे मिटा देना चाहते थे, वो वही गिद्ध थे जो इसी महल की छत के नीचे उसी वारिस को ढूँढ रहे थे, जो अभी रेयांश के सामने खड़ी अपना आधा-अधूरा सच उढ़ेल रही थी।
" एक झूठा नाम मेरे हाथ में है, अद्विका।" ... रेयांश ने वो पन्ना उठा कर उसकी आँखों के सामने किया। " इस काग़ज़ पर, मैं तुम्हें अभी इसी वक़्त बाहर फिंकवा सकता हूँ, जैसे मैं पहले कई को फिंकवा चुका हूँ।" ... पर उसने ऐसा किया नहीं था, और वो ख़ुद इस बात से उलझा हुआ था।
" तो फिंकवा क्यों नहीं देते, सर?" ... अद्विका ने उसकी आँखों से आँखें नहीं हटाईं। " काग़ज़ आपके हाथ में है। कोई भी दूसरा मालिक अब तक पहरेदारों को बुला चुका होता। ... फिर मैं अब भी इस कमरे में क्यों खड़ी हूँ?"
और उसी एक सवाल पर इल्ज़ाम पिघल कर क़ुरबत में बदल गया। ... जो ग़ुस्सा अब तक कमरे में भरा था, वो अब कुछ और हो चुका था, गरम, बेचैन, ख़तरनाक। ... दोनों के बीच अब सिर्फ़ दो साँसों का फ़ासला बचा था।
" इसलिए नहीं फिंकवाया..." ... रेयांश की आवाज़ भर्रा गई, और वो और क़रीब झुका। " क्योंकि जिस चीज़ पर मुझे सबसे ज़्यादा शक करना चाहिए, वही मुझे ज़िंदा रखे हुए है। ... तुमने दो बार मुझे बचाया, और बदले में कुछ नहीं माँगा। इस पूरे महल में, अद्विका, बस एक तुम हो जिसने मुझसे कभी कुछ नहीं चाहा।"
अद्विका की साँस अटक गई, वो इतना क़रीब था कि उसकी गरम साँस उसके माथे को छू रही थी। " सर... आप मुझसे बहुत ज़्यादा उम्मीद लगा बैठे हैं।" ... पर वो एक इंच भी पीछे नहीं हटी, और उसका न हटना ख़ुद एक इक़रार था।
और अद्विका का दिल उसी आदमी की तरफ़ झुक रहा था, जिसके पैरों तले से ज़मीन उसी दिन खिसकेगी जिस दिन वो अपना असली नाम कहेगी। ... दोनों के बीच वो पुराना लॉकेट लटका था, उसके बाप की आख़िरी निशानी, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि उसी लॉकेट में इस पूरी क़ुरबत का ज़हर छुपा है।
रेयांश का हाथ उसके चेहरे की तरफ़ उठा, ठोड़ी के नीचे एक पल को ठहरा, फिर रुक गया। " तुम्हारा नाम भले झूठ बोलता हो..." ... उसने बिलकुल पास से उसकी आँखों में देखा। " पर यह आँखें झूठ नहीं बोलतीं। और मैं... आज इन्हीं आँखों पर यक़ीन करना चाहता हूँ।"
" मत कीजिए यक़ीन, सर।" ... अद्विका की आवाज़ काँप गई, आँखें भर आईं। " कभी-कभी जिस पर हम सबसे ज़्यादा यक़ीन कर बैठते हैं, वही हमारा सबसे बड़ा नुक़सान बन जाता है।"
दोनों उस दहलीज़ पर ठहरे रहे, न कोई आगे बढ़ा, न कोई पीछे। ... और रेयांश उस पर यक़ीन करना चाहता था, इसलिए नहीं कि सबूत ऐसा कहता था, बल्कि इसलिए कि उसका अपना दिल उसे चाहने लगा था। ... और आज दिल ने दिमाग़ को हरा दिया।
रेयांश ने अपनी साँस पर क़ाबू पाया और एक क़दम पीछे हटा, जैसे किसी आग के किनारे से लौट रहा हो। " बहुत हुआ आज के लिए।" ... उसने वो फ़ोल्डर उठाया, और अद्विका की साँस रुक गई, कि अब वो उसे किसी और को सौंपेगा।
पर उसने वो फ़ाइल किसी को नहीं सौंपी। ... उसने उसे अपनी मेज़ की सबसे नीचे वाली दराज़ में डाला और उस पर ताला लगा दिया, ग़द्दार के बनाए उस सबूत को अपने ही सीने में दफ़्न करता हुआ। ... उसने सबूत के ऊपर उस लड़की को चुन लिया।
" यह फ़ाइल इस दराज़ से बाहर नहीं जाएगी।" ... रेयांश ने चाबी अपनी जेब में डाल ली। " तुम्हारा जो भी राज़ है, अद्विका, उसे अपने पास रखो। मैं और नहीं खोदूँगा। ... जिस दिन तुम ख़ुद बताना चाहोगी, उस दिन सुन लूँगा।"
" पर क्यों, सर?" ... अद्विका को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ, एक झूठे नाम के बावजूद वो उसे यूँ छोड़ रहा था। " आप... आप मुझे जानते तक नहीं। फिर यह भरोसा किस बिना पर?"
रेयांश दरवाज़े तक गया, फिर ठिठका, और बिना मुड़े कहा। " मैं नहीं जानता तुम कौन हो, अद्विका।" ... उसने एक पल रुक कर साँस ली। " पर पहली बार, इस पूरे महल में, मुझे किसी पर भरोसा है। ... और वो कोई और नहीं, तुम हो।"
और उस भरोसे में उसका अपना ज़ख़्म छुपा था। ... इस पूरे महल में जिस एक इंसान पर उसने भरोसा किया, वही वो थी जो एक दिन उसका सब कुछ छीन लेगी। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि यह भरोसा उसी दिन ख़ंजर बन जाएगा जिस दिन वो झूठा नाम सच बन जाएगा।
रेयांश निकल गया, और अद्विका दरवाज़े पर पत्थर बनी खड़ी रह गई, उसका भरोसा सीने में एक बोझ की तरह लिए। ... वो दोनों एक ही नदी के दो किनारों पर खड़े थे, और उनके बीच एक ताज बह रहा था, जो उसका हाथ थामते ही उसके किनारे की सारी ज़मीन डुबो देगा। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि वो बाढ़ आ चुकी थी, बस अभी उन दोनों को दिखी नहीं थी, इस महल की गुमनाम मालकिन के पास अब एक और राज़ था, उस आदमी का दिल।
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