DesiHub

अध्याय 4 / 30

दीवारों के पीछे

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

राठौर ग्रैंड में गुमनाम बन कर काम करते हुए नौ दिन बीत चुके थे। और उस सुबह, जब ऊपर संगमरमर के महल में मेहमान अभी नींद में थे, तहख़ाने के सीलन भरे स्टोर-रूम में अद्विका एक खुली बोरी के सामने घुटनों के बल बैठी, चावल की बोरियाँ गिन रही थी। ... एक, दो, तीन... और फिर उसका हाथ रुक गया।

काग़ज़ पर लिखा था, चावल की बीस बोरियाँ आईं। फ़र्श पर सिर्फ़ बारह पड़ी थीं। बिल पूरे बीस का कटा था, दाम पूरे बीस का चुकाया गया था। ... आठ बोरियाँ हवा में ग़ायब थीं। और अद्विका को लगा, ये कोई पहली बार नहीं हुआ था।

तीन सौ छप्पन दिन बाक़ी थे। और जिस डूबते साम्राज्य को उसे एक साल बाद अपने कंधों पर उठाना था, वो उसकी अपनी आँखों के सामने, चुपचाप, अंदर ही अंदर, दीमक की तरह खोखला किया जा रहा था।

"ए छोटी! ... वहाँ क्या गिन रही है, हवा? ... रहने दे। इस स्टोर का हिसाब तो ऊपर वाला भगवान भी नहीं जानता। ... हर महीने माल आधा आता है, और बिल पूरे का पूरा चढ़ता है। पिछले हफ़्ते हमारी ओवरटाइम की पगार काट दी, बोले, होटल घाटे में है। और उधर ऊपर, हर दूसरे दिन जश्न है! ... घाटा, मेरी जूती!"

"आधा माल?" ... अद्विका ने बोरी से नज़र नहीं हटाई। "तो बाक़ी आधा जाता कहाँ है, बंसी भैया? ... किसी न किसी की जेब में तो गिरता ही होगा।"

"अरे यही तो सारा राज़ है, छोटी! ... सप्लाई का पूरा ठेका 'बड़े बाबू' के हाथ में है। पर्चेज़ मैनेजर। ... कहते हैं उसकी सलामी ऊपर तक पहुँचती है। जो भी ये खेल खेल रहा है ना, वो अकेला 'बड़ा बाबू' नहीं है। उसके पीछे कोई और है, बहुत बड़ा। ... पर बोलेगा कौन? बोलने वाले की तो मेरी तरह ओवरटाइम कटती है, और फिर नौकरी।"

अद्विका के हाथ में वो झूठा बिल काँपा नहीं। पर उसके अंदर कुछ जम गया। ये उसके दादा का बनाया साम्राज्य था। और कोई इसे अंदर से चाट रहा था। ... पगार गरीब नौकरों की कटती थी, और मलाई कोई और खाता था। और सबसे ऊपर, इस पूरी लूट का एक सिरा किसी बहुत बड़े हाथ में था।

"होटल घाटे में नहीं है, भैया।" ... वो बहुत धीरे से बोली, उस झूठे बिल को तह करते हुए। "इस होटल को कोई अंदर से लूट रहा है। ... और एक दिन, ये सारा हिसाब बराबर होगा। एक-एक पाई का।"

"वाह! सुनो इसकी बड़ी-बड़ी बातें!" ... बंसी हँस पड़ा। "तू पोंछा लगाने आई है कि होटल का ऑडिट करने, छोटी? ... चल छोड़ ये सपने, बाद में देखना। अभी तो शाम की एक बुकिंग का पहाड़ अपने सिर पर टूटने वाला है।"

और उस शाम, वो पहाड़ सचमुच सिर पर आ गिरा।

"छोटी! छोटी, अनर्थ हो गया! ... मल्होत्रा साहब ने अपनी बेटी की सगाई की पूरी दावत यहीं रखी थी, दो सौ मेहमान, हीरे जैसा ऑर्डर! ... और अभी ख़बर आई है, फूलों वाला ठेकेदार ऐन वक़्त पर मुकर गया, आधा स्टाफ़ ऊपर जयदेव साहब की पार्टी में खींच लिया गया, और मेन हॉल की आधी लाइटें जल ही नहीं रहीं! ... डेढ़ घंटे में मेहमान आएँगे, और हॉल किसी मातम-घर जैसा लग रहा है!"

मल्होत्रा। ... फिर वही नाम। जिस मेहमान की एक बूँद वाइन ने कभी उसे सड़क पर फेंका था, आज उसी की दावत इस डूबते साम्राज्य की अगली साँस थी। ... और वो दावत, चाहे किसी की भी हो, बचानी अद्विका को ही थी। क्योंकि जो आज रात डूबने जा रहा था, वो कोई और नहीं, उसका अपना था।

मेन बैंक्वेट हॉल में अफ़रा-तफ़री मची थी। फ़्लोर मैनेजर फ़ोन पर चीख़ रहा था, ठेकेदार का नंबर बंद जा रहा था, और मेज़ों पर आधे-अधूरे, मुरझाए फूल बिखरे पड़े थे। दो सौ मेहमानों की दावत, और सजावट एक तिहाई भी तैयार नहीं।

"बंसी भैया... रोओ मत, सुनो।" ... अद्विका की आवाज़ अचानक शांत और साफ़ हो गई। "फूल बाहर से नहीं आएँगे, अंदर से आएँगे। लॉबी, हेरिटेज लाउंज, और सीढ़ियों की हर सजावट उठा कर यहाँ ले आओ। मेहमान लॉबी से सीधे हॉल में आएँगे, दो जगह एक साथ थोड़ी देखेंगे। ... और वो लाइटें, वो बुझी नहीं हैं, भैया। किसी ने आधा सर्किट बंद कर रखा है। मुझे मीटर-रूम की चाबी चाहिए। अभी।"

"म... मीटर रूम? ... तुझे कैसे पता कि सर्किट बंद है, कोई फ़्यूज़ नहीं उड़ा? ... अरे रुक ज़रा, तू है कौन आख़िर? पहले दिन आई थी बाल्टी उठा के, और आज पूरे हॉल को हुक्म दे रही है!"

"मैं कोई नहीं, भैया। ... बस, जहाँ भी काम किया, वहाँ आँखें खुली रखीं। ... आधी दुनिया इसीलिए हार जाती है क्योंकि वो घबरा कर आँखें बंद कर लेती है। अब जल्दी करो, वक़्त हमारे साथ नहीं है।"

अगले सत्तर मिनट में उस दुबली सी नौकरानी ने वो कर दिखाया, जो पूरा मैनेजमेंट नहीं कर पाया था। उसने पूरे होटल की सजावट को एक हॉल में समेट दिया, बुझा हुआ आधा सर्किट ख़ुद ढूँढ कर चालू करवाया, और घबराए हुए नौकरों को नाम ले-ले कर काम बाँट दिया। ठीक वैसे, जैसे कोई मालकिन अपने ही घर की दावत सँभालती है।

जब मल्होत्रा साहब और उनके दो सौ मेहमान हॉल में दाख़िल हुए, तो वहाँ जगमगाती रौशनी थी, ताज़े फूलों की महक थी, और एक शाही शान थी। दावत बच गई। ... और उस रात, तहख़ाने का हर नौकर जान गया कि नई 'छोटी' कोई मामूली लड़की नहीं। जिस साम्राज्य ने उसे पैरों की धूल समझ कर फेंका था, उसी के नौकरों के दिल उसने एक शाम में जीत लिए थे।

और जिसने जान-बूझ कर वो दावत डुबोई थी, मुकरा हुआ फूलों का ठेका, कटा हुआ स्टाफ़, बुझा हुआ आधा सर्किट, उसकी वो चाल आज एक अनजान नौकरानी ने चुपचाप नाकाम कर दी थी। ... एक और अनदेखा जवाब, किसी बैंक में ब्याज समेत जमा।

दावत के बाद, जब हॉल ख़ाली हुआ और थके हुए नौकर मेज़ें समेटने लगे, तो एक और परछाईं धीरे-धीरे अद्विका की तरफ़ बढ़ी। ... शारदा ताई। इस पूरे महल की हेड हाउसकीपर। चालीस साल से इन्हीं दीवारों की रखवाली करने वाली, वो औरत जिसके एक इशारे पर बड़े-बड़े मैनेजरों की रीढ़ सीधी हो जाती थी।

"छोटी... सँभल के। ये शारदा ताई हैं।" ... बंसी की तेज़ ज़ुबान अचानक दब गई। "चालीस साल से यहाँ हैं। ख़ुद बड़े मालिक, देवनारायण साहब, इनकी बात नीचे सिर कर के सुनते थे। ... इनसे बच के रहना। इनकी नज़र से इस होटल का कोई कोना, कोई राज़ आज तक नहीं छुपा।"

"तो ये है वो नई छोरी।" ... शारदा की आवाज़ भारी और खुरदरी थी, पर उसकी तह में एक अजीब सी गर्माहट छुपी थी। "पूरा मैनेजमेंट हाथ पर हाथ धरे बैठा था, और दो सौ मेहमानों की दावत एक पोंछा लगाने वाली ने अकेले बचाई। ... तेरा नाम क्या है, बेटी?"

"अद्विका, ताई। ... अद्विका देशमुख।"

"देशमुख।" ... शारदा ने वो नाम धीरे से दोहराया, जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घुमा रही हो। "और ये सब... हॉल सँभालना, नौकरों को नाम ले कर हुक्म देना, सजावट की तमीज़... ये कहाँ से सीखा? ... तेरे हाथ नौकरानी के हैं, छोरी। पर तेरा ढंग किसी और ही घर का है।"

अद्विका की रीढ़ में एक हल्की सिहरन दौड़ गई। ये औरत उन मैनेजरों की तरह अंधी नहीं थी। ये चालीस साल से इंसानों को पढ़ती आई थी। ... पर उसकी उन्हीं तेज़ आँखों में एक ममता भी थी, जो अद्विका ने अपनी माँ के जाने के बाद किसी की आँख में नहीं देखी थी।

"बड़े घरों में काम किया है, ताई। ... वहीं देखते-देखते सीख गई। ... और भूखे पेट को हुक्म देना नहीं आता, बस चूल्हा जलाए रखना आता है। जहाँ पेट की आग हो, वहाँ हाथ अपने आप चलने लगते हैं।"

"हुँह। ज़ुबान तो बड़ी तेज़ है तेरी।" ... शारदा के होंठ ना चाहते हुए भी हल्के से मुस्कुरा दिए। "ये ले, पकड़। रसोई से बचा कर लाई हूँ, गरम है। ... इतनी दुबली है कि तेज़ हवा चले तो उड़ जाए। ... खा। और सुन, आज के बाद तू सीधे मेरे नीचे काम करेगी। इन गिद्धों के बीच अकेली मत घूमा कर, समझी?"

और उस एक पल में, इस पूरे पत्थर के महल में, अद्विका को दूसरी बार किसी की गर्माहट मिली। बंसी की आधी रोटी, और अब शारदा ताई की ये एक गरम रोटी। ... दो अजनबी, जो उसे बिना जाने अपना रहे थे। जबकि जो उसका अपना ख़ून था, वो उसे इस दुनिया से मिटा देने पर तुला था।

शारदा वहीं एक कुर्सी खींच कर बैठ गई, अद्विका को खाते हुए देखती रही, और उसकी आँखें कहीं दूर, बहुत पुराने दिनों में उतर गईं।

"इन दीवारों ने बहुत कुछ देखा है, बेटी।" ... वो धीमे से बोली। "बहुत हँसी, बहुत मातम। ... एक ज़माना था, जब इस महल में एक असली रौनक थी। असली दिल था। फिर वो चला गया, और पीछे ये सारा संगमरमर, ये सारा घमंड रह गया।"

"रौनक? ... कैसी रौनक, ताई? ... कौन चला गया?"

"जाने दे, बेटी। ... कुछ ज़ख़्म कुरेदने से फिर से हरे हो जाते हैं।" ... उसकी आवाज़ भारी हो गई। "इस घर का एक चिराग था, जो इस घर के अपने ही हाथों बुझा दिया गया। ... बस इतना जान ले। और उस दिन के बाद, इस महल में रौशनी तो बहुत रही, पर उजाला कभी नहीं लौटा।"

अद्विका जूठी थाली एक तरफ़ रखने को झुकी, और झुकते ही उसकी वर्दी का गला ज़रा सा खुल गया। और उसके अंदर छुपा वो पुराना लॉकेट, माँ की आख़िरी निशानी, बाहर झूल कर हॉल की मद्धम रौशनी में चमक उठा।

शारदा ताई की नज़र उस लॉकेट पर पड़ी। और... वहीं रुक गई। जो हाथ अभी थाली की तरफ़ बढ़ रहा था, वो बीच हवा में जम गया। उसके चेहरे का सारा रंग किसी बहते पानी की तरह उतर गया।

"ये..." ... उसकी भारी आवाज़ अचानक काँप गई। "ये लॉकेट... ये तेरे गले में... ये तेरे पास कहाँ से आया?"

"ये?" ... अद्विका ने फ़ौरन उसे अपनी मुट्ठी में छुपा लिया। "ये मेरी माँ की निशानी है, ताई। ... बचपन से मेरे गले में है। ... बस यही एक चीज़ है, जो मेरे पास मेरे बीते हुए कल की बची है। इसके सिवा मेरा कोई नहीं।"

पर शारदा उसकी एक बात नहीं सुन रही थी। वो एक क़दम आगे बढ़ी, और उसका काँपता हाथ अद्विका की कलाई पर आ कर कस गया। बहुत धीरे, पर बहुत मज़बूती से। जैसे कोई डूबता हुआ इंसान आख़िरी तिनके को थामता है।

"दिखा।" ... शब्द बमुश्किल उसके होंठों से निकला। "बस एक बार... मुझे इसे एक बार खोल कर देखने दे, बेटी। ... भगवान के लिए।"

उस काँपती आवाज़ के आगे अद्विका की उँगलियाँ अपने आप ढीली पड़ गईं। शारदा ने वो नन्हा लॉकेट अपनी खुरदरी हथेली में लिया, उसे रौशनी की तरफ़ घुमाया, और उसका छोटा सा ढक्कन खोला। अंदर वही धुँधला सा चेहरा था, जिसे अद्विका ज़िंदगी भर पहचान नहीं पाई थी।

पर शारदा उस चेहरे को अच्छी तरह जानती थी। चालीस साल। हर एक दिन। उस चेहरे को उसने एक नन्हे बच्चे से जवान होते देखा था, अपनी गोद में खिलाया था। और अब वही चेहरा एक मुर्दा से लॉकेट में क़ैद, एक अजनबी नौकरानी के गले से उतर कर, उसे वापस घूर रहा था।

"अर्नव..." ... शारदा के होंठ बमुश्किल हिले, और वो नाम किसी बरसों पुरानी दुआ की तरह हवा में तैर गया। "अर्नव बाबा।"

अद्विका का सारा ख़ून जम गया। अर्नव। ... ये नाम उसने आज तक किसी ज़िंदा इंसान के मुँह से नहीं सुना था। माँ ने कभी ज़ुबान पर नहीं लाया। विश्वनाथ 'वक़्त आने पर' कह कर हर बार टाल गया। ... और आज, इस बूढ़ी औरत की काँपती आवाज़ में, उसके उस अनजान बाप का नाम पहली बार साँस ले रहा था। वो बाप, जिसका सिर्फ़ एक धुँधला चेहरा उम्र भर उसके गले में लटका रहा था।

अद्विका के अंदर एक तूफ़ान चीख़ रहा था। पूछ ले। इस औरत से पूछ ले, अर्नव कौन था, मेरा बाप कैसा दिखता था, कैसे हँसता था, कैसे बोलता था। ... पर उसके सिर पर वो शर्त एक नंगी तलवार की तरह लटकी थी। एक भी सच्चा शब्द, और पूरा साल, पूरी वसीयत, सब राख। ... उसने अपने बिखरते चेहरे को ज़बरदस्ती पत्थर बना लिया।

"अ... अर्नव?" ... उसने बड़ी मुश्किल से कहा, आवाज़ को साधते हुए। "कौन अर्नव, ताई? ... ये तो... ये तो बस एक बहुत पुरानी तस्वीर है। मुझे तो ख़ुद नहीं पता ये कौन है। माँ ने कभी बताया ही नहीं।"

पर शारदा ने उसकी ये सफ़ाई सुनी ही नहीं। उसकी भीगी नज़र धीरे-धीरे उस धुँधली तस्वीर से उठी, और अद्विका के चेहरे पर आ कर टिक गई। पहली बार उसने उस लड़की के चेहरे को सचमुच देखा। वो माथा। वो आँखें। ठुड्डी की वो एक रेखा। ... और चालीस साल की एक दबी हुई याद, उसके सामने ज़िंदा हो कर काँप रही थी।

एक दूसरा इंसान अब उस राज़ का एक सिरा अपनी मुट्ठी में थामे खड़ा था। पर वो सिरा किसी दुश्मन के हाथ में नहीं था। वो उस औरत के हाथ में था, जिसने इस घर के बुझे हुए चिराग को कभी अपनी गोद में खिलाया था। एक ख़तरा, जो शायद एक ढाल बनने वाला था।

"तस्वीर?" ... शारदा की आँखें भर आईं, और उसकी काँपती उँगली पहले उस चेहरे पर, और फिर धीरे से अद्विका के चेहरे पर घूमी। "ये कोई तस्वीर नहीं है, बेटी। ... सच बता मुझे... ये तुझे कहाँ से मिला? ... ये तो छोटे मालिक का है।"

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।