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अध्याय 11 / 30

दग़ा की चाल

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

राठौर ग्रैंड की सबसे ऊँची मंज़िल पर, ट्रस्ट की बैठक से एक रात पहले, जयदेव राठौर की उँगलियाँ एक चमड़े की फ़ाइल पर थपकी दे रही थीं। ... उसके अंदर एक नक़ली फ़ॉरेंसिक ऑडिट थी, जो रेयांश को बरसों से चेन लूटने वाला साबित करती थी। ... एक-एक लफ़्ज़ झूठ, और सुबह वही झूठ रेयांश के गले की फाँस बन जाना था।

" चौंतीस साल।" ... जयदेव ने गिलास में बर्फ़ घुमाई, हर लफ़्ज़ चख कर। " चौंतीस साल मेरे भाई ने मुझे इस साम्राज्य की दहलीज़ पर बिठाए रखा, और मरते वक़्त सब कुछ एक ग़ायब वारिस के नाम कर गया, गद्दी सड़क से उठाए एक यतीम के हाथ।" ... " कल उसी यतीम को उसी की कुर्सी से मैं अपने हाथों उतारूँगा।"

" उतारना आसान है, पापा। कुर्सी ख़ाली रखना मुश्किल।" ... मल्विका ने वो फ़ाइल उठा कर पन्ने पलटे। " नौ में से पाँच वोट चाहिए। तीन हमारे हैं। दो अब भी रेयांश की उस 'साफ़-सुथरी छवि' के साथ हैं।" ... " कल सुबह ये काग़ज़ उस छवि को कीचड़ में गिरा देंगे।"

" और उन दो को हिलाने वाला हाथ?" ... जयदेव की आँखों में एक ठंडी चमक तैर गई। " रेयांश के अपने घर का आदमी हमारे साथ है, बेटी। ... जिस पर वो पीठ छोड़ कर सोता है, वही कल भरी बैठक में उसी पीठ में छुरा उतारेगा।" ... " और बेचारा समझेगा भी नहीं कि वार अपने घर से हुआ।"

" एक और बात, पापा।" ... मल्विका की उँगली फ़ाइल पर ठिठक गई, आवाज़ बदल गई। " कल रात पूरा शहर डूब रहा था, और हमारे 'ईमानदार' रेयांश एक बंद होटल में एक नौकरानी के साथ मोमबत्ती जला रहे थे। ... वही लड़की, जो हर मुसीबत की जड़ पर मौजूद होती है।" ... " कुर्सी मैं ले लूँगी, पर उस लड़की का हिसाब मेरा अपना है।"

" नौकरानियों में मत उलझ, मल्विका।" ... जयदेव खिड़की के पार सोते शहर को देखने लगा। " वो गुमनाम वारिस किसी भी दिन इस दरवाज़े से अंदर आ सकता है। ... उससे पहले चेन पर मेरी मुट्ठी बंद होनी चाहिए। कल रेयांश गिरेगा, और ये पूरा महल गिद्धों का।"

और उसी महल के तहख़ाने में, इस पूरी चेन की असली मालकिन अपनी वर्दी इस्त्री कर रही थी, बेख़बर कि सुबह क्या ला रही है। ... सुबह ट्रस्ट का बोर्डरूम संगमरमर और ठंडी रौशनी में जागा, मेज़ के दोनों ओर तलवारें म्यान से आधी बाहर थीं।

रेयांश अंदर आया, हर क़दम में वही ठहराव, अपने सबसे भरोसेमंद उप-प्रमुख कुणाल को बग़ल में लिए। ... और सेवा की क़तार में, जग थामे, अद्विका खड़ी थी, नज़रें नीची किए, कल रात की अधूरी बात दोनों सीने में दबाए।

" बैठक शुरू करें। पहला मुद्दा, पुराना राठौर हाउस, जिसे बेचने का प्रस्ताव है।" ... रेयांश ने फ़ाइल खोली, आवाज़ में कोई शक नहीं। " मेरे रहते वो पत्थर नहीं बिकेगा, जिससे देवनारायण राठौर ने ये सब खड़ा किया।"

" बेचने से पहले, एक काग़ज़ है जो ट्रस्ट को देखना चाहिए, रेयांश बेटा।" ... जयदेव ने वो फ़ाइल मेज़ पर सरका दी। " एक स्वतंत्र फ़ॉरेंसिक ऑडिट, जो बताती है कि इस चेन का करोड़ों रुपया फ़र्ज़ी ठेकेदारों के ज़रिए किसकी जेब में गया। ... तुम्हारी, रेयांश।"

वो फ़ाइल ट्रस्टियों के बीच घूमने लगी, और मेज़ के दोनों 'तटस्थ' चेहरे धीरे-धीरे पत्थर होते गए। ... रेयांश ने पन्ने पलटे, पहली बार उसके पैरों तले की ज़मीन हिली, हर आँकड़ा उसके अपने दस्तख़त की नक़ल के नीचे।

" ये झूठ है। एक-एक लफ़्ज़ गढ़ा हुआ।" ... रेयांश की आवाज़ शांत थी, पर उसके नीचे ज़मीन खिसक रही थी। " मैंने ज़िंदगी में इस चेन का एक पैसा नहीं छुआ। ये ऑडिट किसने बनाई? कौन सी फ़र्म?"

" काग़ज़ झूठ नहीं बोलते, बेटा। इंसान बोलते हैं।" ... जयदेव ने ट्रस्टियों की तरफ़ देखा, हर शब्द तौल कर। " मैं प्रस्ताव रखता हूँ, कि जाँच पूरी होने तक रेयांश को सीईओ के पद से तुरंत हटाया जाए। ... वोट, अभी।"

" ठहरिए... ये बहुत बड़ा इल्ज़ाम है।" ... कुणाल आगे झुका, चेहरे पर वफ़ादारी की एक परछाईं। " सर, मैं आपके साथ हूँ। ... पर काग़ज़ इतने पुख़्ता हैं कि मेरे पास भी इनका कोई जवाब नहीं। ट्रस्ट को शायद वोट लेना ही पड़े।"

दो तटस्थ ट्रस्टियों के हाथ वोट की तरफ़ उठने लगे, और रेयांश के पास उस झूठ का कोई सबूत नहीं था। ... और पानी की ट्रे के पास एक झुका चेहरा अचानक तेज़ हो गया, अद्विका की नज़र उस ऑडिट पर छपे फ़र्म के नाम पर जम गई।

तहख़ाने में बिल और रजिस्टर ढोते-ढोते उसने वो नाम पढ़ा था। ... वो ऑडिट फ़र्म, जिसके नाम पर ये झूठ खड़ा था, उसे कंपनी ने छह महीने पहले ख़ुद निकाल दिया था, उसी लूट का सिरा दबाने जो किसी बड़े बाबू की जेब में जाता था।

अद्विका उसका गिलास भरने झुकी, और होंठ मुश्किल से हिले। " माफ़ी सर... पर जिस पानी में मिलावट हो, उसका रंग ऊपर से नहीं, तह में बैठे नाम से पकड़ा जाता है। ... जिस फ़र्म के नाम ये ऑडिट है, उसे इसी कंपनी ने छह महीने पहले निकाल दिया था। ... मरी हुई फ़र्म ज़िंदा दस्तख़त नहीं करती, सर।"

रेयांश की नज़र एक पल को उठी, ठीक उसकी आँखों में, और कल रात की सारी आँच एक धड़कन में लौट आई। ... फिर उसने वो लम्हा निगल लिया, और उसकी उँगलियाँ ऑडिट के पहले पन्ने पर, फ़र्म के नाम पर जा टिकीं।

और अद्विका सीधी खड़ी हो गई, चेहरा फिर वही पत्थर, पर अंदर दिल ढोल की तरह बज रहा था। ... उसने अभी मालकिन की बात एक नौकरानी की फुसफुसाहट में उसी आदमी के कान में कह दी थी जिसे कल रात वो लगभग चूम बैठी थी।

" एक मिनट।" ... रेयांश ने वो पन्ना रौशनी में उठाया, आवाज़ में अब बर्फ़। " ये 'स्वतंत्र' ऑडिट जिस फ़र्म के लेटरहेड पर है, मेहता एंड कंपनी, उसे इसी ट्रस्ट ने छह महीने पहले बर्ख़ास्त किया था। ... एक बर्ख़ास्त फ़र्म ने पिछले महीने की ऑडिट कैसे बना दी?"

सचिव ने काँपते हाथ से रिकॉर्ड निकाला, और सच बर्ख़ास्तगी की तारीख़ के नीचे नंगा पड़ा था। ... जो ऑडिट रेयांश को डुबोने आई थी, वो ख़ुद जाली साबित हो गई, और दोनों तटस्थ चेहरे अब जयदेव से नज़रें चुरा रहे थे।

और सेवा की क़तार में, एक झुके चेहरे ने ख़ुद को एक छुपी गरमाहट दी। ... उसके दादा का वही छोटा भाई, जो उसे पैरों की धूल समझता था, अभी उसी धूल की एक फुसफुसाहट से मुँह के बल गिरा, और उसे कभी पता नहीं चलेगा।

" ये... ये महज़ एक तकनीकी चूक है। आँकड़े फिर भी..." ... जयदेव की आवाज़ पहली बार लड़खड़ाई। " जाँच तो फिर भी होनी चाहिए, तारीख़ चाहे जो हो।"

" जाँच ज़रूर होगी, जयदेव जी। इस बात की, कि मरी हुई फ़र्म के नाम पर जाली ऑडिट किसने गढ़ी, और इस मेज़ तक कौन लाया।" ... रेयांश ने फ़ाइल एक कील की तरह बंद कर दी। " जो हटाने का प्रस्ताव था, मैं उसे रद्द करने का प्रस्ताव रखता हूँ। वोट, अभी।"

दोनों तटस्थ हाथ अब जयदेव के ख़िलाफ़ उठे, और रेयांश को हटाने की चाल उसी मेज़ पर दम तोड़ गई। ... मल्विका मुस्कुराई, पर मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची, उसका सधा जाल एक फुसफुसाहट से कट चुका था, और वो जानती तक नहीं कि किसने काटा।

" कोई है, पापा। इस कमरे में कोई है जो रेयांश के पीछे खड़ा है।" ... मल्विका की नज़र धीरे-धीरे सेवा की क़तार पर फिसली, और उस झुकी हुई वर्दी पर एक पल ठहर गई। " और मुझे लगता है, मैं उस साये को पहचानने लगी हूँ।"

बैठक टूट गई, ट्रस्टी निकल गए, पर रेयांश कुर्सी पर जमा रहा, एक सवाल सीने में गड़ा हुआ। ... वो मरी हुई फ़र्म वाली बात उसके पास नहीं थी। किसी ने ऐन डूबते वक़्त उसके कान में वो सिरा डाला था। इस महल में कोई उसे साये की तरह बचा रहा था।

" कुणाल... आज कोई इस कमरे में मेरे साथ खड़ा था। और वो तुम नहीं थे, न मैं।" ... रेयांश ने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी की तरफ़ देखा। " जिसने ये ऑडिट गढ़ी, उसे चेन के अंदरूनी वेंडर कोड चाहिए थे, जो बस गिनती के हाथों में हैं। मुझे हर उस हाथ का नाम चाहिए।"

" बिलकुल सर। मैं आज ही सारे वेंडर रिकॉर्ड खंगालता हूँ।" ... कुणाल की आवाज़ में वही पुरानी वफ़ादारी थी। " पर सर, ये सिरा आपको मिला किससे? आज आपके इतने पास कौन था? ... कहीं ये मदद किसी और मक़सद से तो नहीं आई।"

और रेयांश की नज़र, बेइरादा, उस दरवाज़े की तरफ़ चली गई जहाँ से सेवा वाले निकल रहे थे। ... एक वर्दी, एक झुकी गर्दन, और वही पुरानी खटक फिर उसके सीने में उठी, जैसे तूफ़ान वाली रात उठी थी।

और उधर गलियारे में अद्विका दीवार से टिक कर साँस ले रही थी, हाथ अब भी काँप रहे थे। ... विश्वनाथ की गिनती उसके कानों में बजी, साल पूरा होने में अभी तीन सौ सैंतीस रातें बाक़ी थीं, और शारदा का बचाया वो काग़ज़ गिद्धों की खुदाई से बस एक साँस आगे था। ... और आज उसने फिर उसी आदमी को बचाया, जिसे एक दिन उजाड़ना उसकी क़िस्मत में लिखा था।

उस रात रेयांश ने जीत का जश्न नहीं मनाया। ... इतनी सफ़ाई से गढ़ी उस जाली ऑडिट के लिए चेन के अंदरूनी वेंडर कोड चाहिए थे, जो जयदेव तक बाहर से नहीं पहुँच सकते थे। कोई अंदर बैठा था, जिसने गिद्धों के लिए राज़ों की तिजोरी खोली थी।

रात के सन्नाटे में रेयांश ने ख़ुद वो असली वेंडर फ़ाइलें निकालीं, जिनसे नक़ल कर के वो झूठ गढ़ा गया था। ... और उसे एक नौकरानी के कहे लफ़्ज़ याद आए, जो अंदर से खाता है वो सबसे भरोसेमंद चेहरे के पीछे छुपता है।

" हर फ़र्ज़ी भुगतान... किसी न किसी ने अंदर से मंज़ूर किया है।" ... रेयांश की उँगली रजिस्टर की लाइनों पर उतरती गई, हर मंज़ूरी के नीचे एक दस्तख़त। " और हर दस्तख़त पर वही अक्षर... वही एक हाथ, बरसों से, हर चोरी के नीचे।"

रेयांश की उँगली रुक गई, और उसके पैरों तले फ़र्श खुल गया। ... जो दस्तख़त हर लूट के नीचे था, वो 'बड़ा बाबू' जो उसकी चेन को बरसों से अंदर से खा रहा था, कोई अजनबी नहीं था। ... वो उसका अपना दायाँ हाथ था। कुणाल। जिस पर वो पीठ छोड़ कर सोता था।

और उसी दराज़ में, रजिस्टर के नीचे, एक फ़ोल्डर दबा था जो चेन का नहीं था। ... रेयांश ने उसे खोला, ख़ून जम गया, अंदर तस्वीरें थीं, स्टाफ़ की सूची, और एक ही नाम पर बार-बार घेरा, अद्विका देशमुख।

उस फ़ाइल में कुणाल के अपने हाथ की लाइनें थीं, हर मुसीबत पर मौजूद, हर राज़ के पास खड़ी, इसका असली नाम इसके स्कूल के काग़ज़ों से नहीं मिलता। ... जो ग़द्दार उसकी पीठ में छुरा घोंप रहा था, वो अब उसी लड़की को खोद रहा था जिसने आज उसे बचाया।

" जिस लड़की ने आज मुझे बचाया..." ... रेयांश की मुट्ठी उस फ़ोल्डर पर भिंच गई। " और मेरा अपना आदमी चुपके से उसी की क़ब्र खोद रहा है।"

और ठीक उसी पल दरवाज़ा खुला, और वो छुरा मुस्कुराता हुआ अंदर आया। ... कुणाल, चेहरे पर वही पुरानी अपनाइयत, हाथ आगे बढ़ाए।

" सर, भगवान का शुक्र है, आज हम बच गए। ... मैंने कहा था न, आख़िरी साँस तक आपके साथ हूँ।" ... कुणाल ने अपना हाथ और आगे बढ़ाया। " इस पूरे महल में आप किसी पर भरोसा करें या न करें, सर... मुझ पर कर सकते हैं।"

रेयांश ने वो फ़ोल्डर चुपचाप वापस दराज़ में सरका दिया, चेहरा पत्थर कर लिया। " जानता हूँ, कुणाल।" ... उसने वो बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया, पकड़ बर्फ़ जैसी। " इस महल में अब मैं ठीक जानता हूँ, किस पर भरोसा करना है... और किस पर नहीं।"

दोनों हाथ मिले रहे, दोनों चेहरों पर मुस्कान थी, दोनों झूठ बोल रहे थे। ... जो छुरा बरसों से उसकी पीठ में था, आज पहली बार रेयांश उसका नाम जानता था, और उसने उसे म्यान में ही रहने दिया। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि उस छुपी फ़ाइल में जिस चेहरे पर घेरा था, वो इस महल की गुमनाम मालकिन का था।

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