अध्याय 24 / 30
बिछा हुआ जाल
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
अद्विका का दस्तख़त किया काग़ज़ एक जाल निकलता है, जिसने जयदेव की धमकी और अपहरण को रिकॉर्ड पर ला दिया है, और बीमार भाई सोनू छुड़ा लिया जाता है। अद्विका, रेयांश, विश्वनाथ और तहख़ाने का परिवार जालसाज़ी, तख़्तापलट, ज़बरदस्ती और बरसों की लूट के सारे सबूत जमा कर के तय करते हैं कि सब कुछ राठौर ग्रैंड की शताब्दी दावत में खोला जाएगा, ठीक उसी दिन जब अद्विका का एक साल पूरा होता है और वो क़ानूनन अपना नाम ले सकती है, और अद्विका ख़ुद उसी बोर्डरूम की सेवा के लिए अपना नाम, आख़िरी बार, ड्यूटी-सूची में लिख देती है।
उसी शाम कोलाबा की एक तंग गली में एक काली गाड़ी रुकी, ठीक वैसे जैसे जयदेव ने वादा किया था, शाम तक लड़का अपने बिस्तर पर। पर वो बिस्तर जयदेव के नक़्शे में कहीं नहीं था। रेयांश का आदमी वहाँ दो घंटे से खड़ा था, और जिस पल गाड़ी का दरवाज़ा खुला, सोनू अपने दुश्मनों के हाथ से फिसल कर अपनों के हाथ में आ गिरा।
'अरे मैंने पकड़ लिया! मैंने!' ... बंसी ने सोनू को यूँ थामा हुआ था जैसे कोई काँच की मूरत हो, आँखों में आँसू पर मुँह पर एक चौड़ी मुस्कान। 'अद्विका दीदी, वो गाड़ी वाले तो ऐसे भागे जैसे भूत देख लिया हो! मैंने बस एक ज़ोर की आवाज़ लगाई, और साहब का आदमी भी साथ था। ... अब लड़का हमारा है। हमारा।'
अद्विका दौड़ कर सोनू के पास ज़मीन पर गिर पड़ी और उसका चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया। 'सोनू... सोनू, मेरी तरफ़ देख। मैं आ गई, देख, मैं आ गई। ... तुझे किसी ने कुछ कहा? कहाँ लगी है, बता मुझे।' उसकी उँगलियाँ उसके माथे के उस ज़ख़्म पर काँप रही थीं जो एक पट्टी के नीचे छुपा था।
सोनू के सूखे होंठ हिले, और उनसे बस एक कमज़ोर सी 'दीदी' निकली, इतनी धीमी कि हवा में घुल गई। और तभी अद्विका के अंदर कुछ टूट गया। सुइट में जो आँसू उसने जयदेव के सामने एक हथियार की तरह बहाए थे, वो नक़ली थे। ये, जो अब उसकी ठोड़ी से टपक कर सोनू के हाथ पर गिर रहे थे, असली थे, और इन्हें रोकने की उसने कोई कोशिश नहीं की।
'वो सुरक्षित है, अद्विका।' ... रेयांश उसके पीछे आ खड़ा हुआ, उसके काँधे पर एक हाथ रखते हुए। 'मेरे आदमी उसे सीधे एक भरोसे के डॉक्टर के पास ले जा रहे हैं, अपने अस्पताल नहीं, एक निजी जगह, चौबीस घंटे पहरे में। जयदेव को लगेगा कि उसने लड़का लौटा दिया। उसे कभी पता नहीं चलेगा कि सोनू अब उसकी पहुँच से बाहर है।'
बंसी ने दोनों को, और उनके बीच की उस अनकही चीज़ को देखा, और उसकी आँखें बड़ी हो गईं। 'मैंने पहले ही शारदा ताई से कहा था, कुछ तो चल रहा है इन दोनों में! सीईओ साहब ख़ुद एक वेट्रेस के भाई को बचाने... अरे बाप रे। दीदी, तुम कहीं चुपके से मालकिन-वालकिन तो नहीं बन गईं?' ... और अद्विका के दिल में वो मज़ाक़ एक ठंडी सच्चाई बन कर उतर गया।
उसी रात, तहख़ाने के उस पुराने रिकॉर्ड कमरे में, जहाँ चालीस साल की धूल और राज़ एक साथ साँस लेते थे, चार लोग एक मेज़ के गिर्द जमा थे। राहत की उम्र इस कमरे में बहुत छोटी थी। सोनू बच गया था, पर विश्वनाथ का बूढ़ा चेहरा बता रहा था कि असली खेल अभी शुरू भी नहीं हुआ था।
'तुमने कहा था, उसके अपने मुँह से हर लफ़्ज़ निकलवा लेना।' ... अद्विका ने आँचल की गाँठ खोली और एक छोटा सा फ़ोन निकाल कर मेज़ पर, ठीक बीचों-बीच रख दिया। 'तो मैंने निकलवा लिए। जिस वक़्त मैं उसके सामने गिड़गिड़ा रही थी, उस पूरे वक़्त ये मेरे आँचल में चल रहा था। जयदेव राठौर की एक-एक बात... यहाँ बंद है।'
'हर लफ़्ज़।' ... रेयांश ने फ़ोन उठा कर हथेली में पलटा, जैसे कोई हीरा तौल रहा हो। 'एक बीमार बच्चे को उठाना, उसकी जान की क़ीमत पर दस्तख़त करवाना, और वो लफ़्ज़, जिस-जिस को तुम प्यार करती हो एक-एक कर के जलेगा। ये अब धमकी नहीं रही, अद्विका। ये जुर्म का इक़बाल है, ख़ुद जयदेव की आवाज़ में।'
'और वो काग़ज़, जिस पर उसने तुमसे दस्तख़त करवाए...' ... विश्वनाथ ने ऐनक ठीक की, होंठों पर एक थकी मुस्कान आई। 'वो किसी वसीयत का हिस्सा था ही नहीं, बेटी। जिस नाम से तुमने दस्तख़त किया, अद्विका देशमुख, वो क़ानून की किसी किताब में है ही नहीं, वो काग़ज़ ख़ुद में एक रद्दी है। पर उस रद्दी को उसने जिस दबाव में गढ़वाया, उसका पूरा सबूत अब इस फ़ोन में है। जयदेव ने अपने ही हाथों अपनी क़ब्र खोदी है, और समझ रहा है कि ताज पहन लिया।'
जिस काग़ज़ को जयदेव ने दोपहर किसी जीते हुए तमग़े की तरह तह करके जेब में रखा था, वो असल में उसी के गले का फंदा था। अद्विका ने उसे जीतने दिया था, ठीक वैसे जैसे कोई शिकारी जाल का दरवाज़ा जान-बूझ कर खुला छोड़ देता है। सुनने वाला जानता था कि सुइट में बहे वो आँसू, वो झुका सिर, सब इसी एक पल के लिए थे।
'उसने मेरे भाई को छुआ, और उसे लगा वो जीत गया।' ... अद्विका की आवाज़ में अब न आँसू थे, न कँपकँपी, बस वो पत्थर था जो साल भर में तराशा गया था। 'कल तक मेरे पास सिर्फ़ एक तना हुआ तमाचा था, जो चल नहीं सकता था। आज उसने ख़ुद मेरे हाथ में उसे चलाने की वजह थमा दी है। अब मैं रुकूँगी नहीं।'
और फिर वो मेज़, जिस पर अभी तक सिर्फ़ एक फ़ोन पड़ा था, धीरे-धीरे काग़ज़ों से भरने लगी। रेयांश ने कोट से एक लिफ़ाफ़ा निकाला, विश्वनाथ ने अपना चमड़े का बैग खोला, और एक-एक करके साल भर के वो सारे राज़ रौशनी में आने लगे जो इस महल ने अपनी दीवारों के पीछे दबा रखे थे।
'ये देखो।' ... रेयांश ने फ़र्ज़ी भुगतान की एक मोटी फ़ाइल मेज़ पर खोली, जिसके हर पन्ने पर एक ही दस्तख़त बार-बार लौट रहा था। 'बरसों से इस चेन को अंदर से जो खाया जा रहा था, हर फ़र्ज़ी वेंडर, हर झूठे बिल के नीचे मेरे अपने दाएँ हाथ कुणाल का दस्तख़त है, जयदेव का ख़रीदा हुआ आदमी। जिसकी पीठ पर भरोसा करके मैं सोता था, वही छुरा था।'
'और ये, वो जाली ऑडिट...' ... विश्वनाथ ने एक और फ़ाइल आगे सरकाई, जिस पर एक बर्ख़ास्त फ़र्म की मुहर लगी थी। 'जिसके सहारे इन्होंने ट्रस्ट की बैठक में तुम्हें ही चेन का लुटेरा साबित करने की कोशिश की थी, रेयांश। एक मरी हुई फ़र्म के नाम पर ज़िंदा दस्तख़त। जयदेव और मल्विका, दोनों के हाथ इस साज़िश पर हैं, और अब वो भी हमारे पास काग़ज़ पर है।'
'और वो नीली फ़ाइल, जो आज जयदेव के हाथ में थी।' ... रेयांश की आवाज़ में एक ठंडी धार उतर आई। 'वो जन्म का रिकॉर्ड, जिसमें तुम्हारे बाप का नाम स्याही से काटा गया, उसे मल्विका के जासूस ने खोदा और कुणाल ने इस महल के अपने रिकॉर्ड से चुराया। एक वारिस को ग़ैर-क़ानूनी ढूँढना, धमकाना, उसका अपहरण... ये सब भी अब उन्हीं के ख़िलाफ़ एक कड़ी है।'
'जालसाज़ी। ट्रस्ट के साथ धोखा। अपहरण। ज़बरदस्ती वसूली। बरसों की लूट।' ... विश्वनाथ ने हर जुर्म यूँ गिना जैसे माला के मनके फेर रहा हो। 'चालीस साल मैंने देवनारायण के लिए क़ानून की किताबें पढ़ीं, और आज पहली बार हर किताब हमारे साथ खड़ी है। पर इस सबूत के लिए एक मंच चाहिए, और एक ऐसा दिन जब तुम अपना नाम ले सको, बिना दादा की वसीयत तोड़े।'
विश्वनाथ यहाँ रुका, और उसने अपने बैग से एक सुनहरे किनारे वाला निमंत्रण-कार्ड निकाला, जो अभी छप कर आया था। उसने उसे मेज़ पर रखा, और अद्विका ने देखा कि उस पर राठौर ग्रैंड का पुराना निशान चमक रहा था, और नीचे एक तारीख़ लिखी थी, जिसे देख कर विश्वनाथ की आँखों में कुछ नम हो आया।
'राठौर ग्रैंड के सौ साल पूरे हो रहे हैं।' ... विश्वनाथ ने उस कार्ड पर उँगली रखी। 'अगले हफ़्ते, इसी होटल में, शताब्दी की एक भव्य ट्रस्टी दावत है, जिसमें हर बड़ा निवेशक और अख़बार होगा। और उस दावत की तारीख़, बेटी, ठीक वही दिन है जिस दिन तुम्हारा एक साल पूरा होता है, जिस दिन तुम गुमनामी छोड़ कर अपना नाम ले सकती हो और वसीयत फिर भी बची रहेगी। देवनारायण को शायद पता था, शायद नहीं... पर घड़ी और इंसाफ़ एक ही रात पर आ मिले हैं।'
'तो वहीं।' ... रेयांश ने वो कार्ड उठा कर अद्विका की ओर बढ़ाया। 'जिस बोर्डरूम में इन्होंने तुम्हारे बाप को मिटाया, उसी दावत में, हर ट्रस्टी के सामने, हम सब खोल देंगे। तुम अपना नाम लोगी, और ठीक उसी साँस में जयदेव की जालसाज़ी, अपहरण, साज़िश, सब मेज़ पर आ गिरेगी। एक ही वार में गिद्ध और उनका झूठ, दोनों ख़त्म।'
'ये सिर्फ़ मेरे लिए नहीं है।' ... अद्विका की उँगलियाँ उस कार्ड के पुराने निशान पर ठहर गईं। 'इस चेन के चार हज़ार नौकर, बंसी, शारदा ताई, तहख़ाने का हर चेहरा, वो बस्ती जिसके लिए मेरे बाप ने अपना घर छोड़ दिया। अगर गिद्ध जीते, तो सब सड़क पर। ये साल मैंने अपने लिए नहीं काटा, विश्वनाथ जी। वो दावत मैं अपने लोगों के लिए जीतूँगी।'
और तभी दरवाज़े की चौखट से एक धीमी आवाज़ आई, वो आवाज़ जो साल भर से इस लड़की की ख़ामोश ढाल बनी हुई थी। शारदा ताई वहीं खड़ी थी, चाबियों का एक पुराना गुच्छा थामे, और उसकी आँखें उस लॉकेट पर टिकी थीं जो अद्विका के गले में झूल रहा था, छोटे मालिक की आख़िरी निशानी।
'तेरे बाप ने भी एक बार ऐसे ही सबके ख़िलाफ़ खड़े होने की ठानी थी, बेटी।' ... शारदा ने अंदर आ कर अद्विका के गाल पर हाथ रखा। 'अर्नव बाबा, छोटे मालिक, ने एक ग़रीब बस्ती के लिए अपना ताज ठुकरा दिया था। और मरते वक़्त देवनारायण साहब एक ही नाम पुकारते रहे, वो नन्ही गुड़िया जिसे वो कभी गोद में नहीं ले पाए। ... वो गुड़िया आज इसी मेज़ पर बैठी है। जा, बेटी। इस बार तुझे कोई नहीं मिटा पाएगा।'
अद्विका ने अपने लॉकेट को मुट्ठी में भर लिया, और एक पल के लिए उसकी आँखें बंद हो गईं। 'चालीस साल आपने इस घर की रखवाली की, ताई। अब मेरी बारी है।' उसकी आवाज़ में एक ऐसी शांति थी जो सिर्फ़ उन्हें आती है जिन्होंने आख़िरकार जान लिया हो कि वो असल में कौन हैं।
पर उस पूरी मेज़ पर एक सच ऐसा भी था जिसे कोई ज़ोर से नहीं कह रहा था। जिस दिन अद्विका अपना नाम लेगी, उसी दिन रेयांश, जिसे देवनारायण ने यतीम से बेटा बनाया था, इस साम्राज्य से बेदख़ल हो जाएगा। और वो आदमी, सब जानते-बूझते, अपने ही हाथों उस दावत की तैयारी कर रहा था।
'मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो।' ... जब बाक़ी सब जा चुके थे, रेयांश अद्विका के पास आ खड़ा हुआ। 'जिस दिन तुम मालकिन बनोगी, उस दिन मैं कुछ नहीं रहूँगा। पर वो चुनाव मैंने बहुत पहले कर लिया था, अद्विका। इस महल ने मुझे सब कुछ दिया, पर वो कभी नहीं दिया जो तुमने दिया। मैं ये चेन अपने हाथों तुम्हारे नाम करूँगा, चाहे उसके बाद मेरे पास कुछ न बचे।'
अद्विका ने उसकी आँखों में देखा, और वो ज़हर जो पंद्रहवीं रात के बोसे के बाद उनके बीच खड़ा था, पहली बार पिघलता लगा। 'मुझे तुम्हारा ताज नहीं चाहिए, रेयांश,' उसने फुसफुसा कर कहा, उसके सीने पर हाथ रखते हुए। 'मुझे बस तुम चाहिए, उस सब के बाद भी जो बचेगा।' ... और एक पल को वो दोनों उसी दहलीज़ पर आ ठहरे, जहाँ से आगे बढ़ना अभी बाक़ी था।
अगले कुछ दिनों में राठौर ग्रैंड के सुनहरे शताब्दी-निमंत्रण पूरे मुंबई में बँट गए, मंत्रियों तक, अख़बारों तक, हर उस बड़े नाम तक जिसने कभी इस महल की चौखट चूमी थी। सात दिन। बस सात दिन बाद वो रात आने वाली थी जब एक साल की गुमनामी ख़त्म होगी, और उसी रात इस पूरे महल का हिसाब भी।
'तुम उस कमरे में मत रहना, अद्विका।' ... शताब्दी की रात की ड्यूटी-सूची बोर्ड पर लग चुकी थी, और रेयांश उसे एक तरफ़ ले जा कर धीरे से बोला। 'जयदेव और मल्विका घिर चुके हैं, और घिरा हुआ जानवर सबसे ख़तरनाक होता है। उस रात तुम मेरी नज़र के सामने रहोगी, उस बोर्डरूम से दूर। मैं तुम्हें दोबारा किसी जाल में नहीं जाने दूँगा।'
'नहीं।' ... अद्विका ने चुपचाप बोर्ड पर लगी ड्यूटी-सूची से क़लम उठाई और उस बोर्डरूम की सेवा के सामने अपना नाम ख़ुद लिख दिया। 'उसी कमरे में मैं रहूँगी, रेयांश। जहाँ एक साल पहले उन्होंने मुझे पैरों की धूल समझा था, उसी मेज़ पर मैं आख़िरी बार ट्रे रखूँगी, और फिर उसे उठाऊँगी नहीं। मैं वहाँ नौकरानी बन कर जाऊँगी, और मालकिन बन कर निकलूँगी।'
उसने वो झूठा नाम, अद्विका देशमुख, आख़िरी बार लिखा और क़लम रख दी। सात दिन बाद, उसी बोर्डरूम में वो एक नौकरानी की वर्दी में दाख़िल होगी, हाथ में एक ट्रे, गले में अपने बाप का लॉकेट, और अपने नाम की आख़िरी रात। और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि जिस ट्रे को वो उठाएगी, उसके नीचे एक साल का बाँधा हुआ तमाचा रखा था, जो अब किसी शर्त से नहीं, सिर्फ़ सात रातों से बँधा था।
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