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अध्याय 20 / 30

बेनकाब होते होते

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

रात के ग्यारह बजे, ऊपर वाले सुइट में मल्विका के फ़ोन की स्क्रीन जगमगाई, और एक तस्वीर धीरे-धीरे खुलती चली गई। ... काँच पर बहते पानी के पीछे दो चेहरे, एक मेज़, गुमनाम वारिस और वसीयत का रखवाला, और नीचे बस दो लफ़्ज़, 'मिल गई।'

"तो ये रही तू।" ... मल्विका ने उँगली से तस्वीर बड़ी की, अद्विका के चेहरे पर, फिर उस बूढ़े वकील पर। " पंद्रह रातों से जिस साये का पीछा कर रही थी, आज वो काग़ज़ पर उतर आया। ... एक चाय पिलाने वाली, और वही वकील जो अदालत में सीलबंद लिफ़ाफ़ा थामे बैठा था। ... इससे साफ़ सबूत और क्या होगा।"

और मल्विका जानती थी कि इस धुँधली तस्वीर की असली ताक़त कहाँ है। ... शर्त सीधी थी, वारिस को साल भर गुमनाम रहना है, नाम खुला तो वसीयत रद्द, और साम्राज्य सीधा गिद्धों की झोली में। ... बस इस लड़की का असली नाम भरी महफ़िल में लेना था, और खेल ख़त्म।

"पर चुपचाप नहीं।" ... मल्विका के होंठों पर वो मुस्कान लौटी जो आँखों तक नहीं पहुँचती। " पापा कहते हैं, दावे से पहले उसे ग़ायब कर दो। ... पर ग़ायब लाश सवाल छोड़ जाती है। ... मैं इससे बेहतर करूँगी। जिस लड़की ने अपना नाम एक साल के लिए दफ़ना दिया, उसका नाम मैं वहीं खोदूँगी जहाँ सबसे ज़्यादा चुभे।"

उसने फ़ोन उठाया, दूसरी तरफ़ जयदेव की वो मख़मली आवाज़ थी। ... उसने पापा को बताया, वारिस मिल गई है, और वो उसे ग़ायब नहीं, बेनक़ाब करेगी, ताकि वसीयत ख़ुद रद्द हो जाए, बिना किसी ख़ून के। और फ़ोन के उस पार एक ठंडी, ख़ुश हँसी गूँजी।

एक मंज़िल नीचे रेयांश के दफ़्तर की बत्तियाँ आधी रात को भी जल रही थीं। ... उसकी दराज़ में दो राज़ बंद थे, ग़द्दार कुणाल के दस्तख़तों वाली फ़ाइल, और उस लड़की का सच जिसे वो हफ़्तों से जानता था और किसी से नहीं कहता था। ... तभी बिना दस्तक दरवाज़ा खुला।

"देर तक जाग रहे हो, रेयांश।" ... मल्विका ने वो तस्वीर उसकी मेज़ पर सरका दी। " पहचानते हो इसे? ... तुम्हारे अपने फ़्लोर की नौकरानी, अद्विका देशमुख, और साथ में देवनारायण की वसीयत का वकील। ... वो गुमनाम वारिस जिसका तुम्हें सालों से डर था, रोज़ सुबह तुम्हें चाय पिला रही थी।"

रेयांश की उँगलियाँ तस्वीर के किनारे पर जम गईं। ... ये वो हफ़्तों से जानता था, उस रात से जब उसने 'गुड़िया' कहा था और उसका पत्थर चेहरा एक धड़कन को दरका था। पर किसी और के मुँह से, मेज़ पर पटका हुआ, वो सच फिर चुभा। ... चेहरा उसने पत्थर रखा।

"एक धुँधली तस्वीर। एक सस्ता कैफ़े। दो लोग चाय पीते हुए।" ... रेयांश ने एक उँगली से तस्वीर वापस उसकी तरफ़ सरका दी। " इससे क्या साबित होता है, मल्विका? कि एक थकी नौकरानी किसी बूढ़े के साथ बैठी थी? ... अदालत ऐसे धब्बों पर चालीस साल के साम्राज्य नहीं पलटती।"

"अकेली ये तस्वीर नहीं।" ... मल्विका उसकी मेज़ पर झुक आई, आवाज़ नीची और ज़हरीली। " कटा हुआ जन्म-रिकॉर्ड, बचा इकलौता लफ़्ज़, 'राठौर'। स्कूल के काग़ज़ जो उसके झूठे नाम से मेल नहीं खाते। और अब ये वकील। ... सारी कड़ियाँ जुड़ चुकी हैं। कल रात दावत में मैं ये नाम सबके सामने रख दूँगी।"

"सोलह रातें पहले मैंने तुम्हें एक रास्ता दिया था। ... मेरा साथ दो, और तुम इस चेन के मालिक, और मेरे। ... या उस वर्दी वाली के पीछे खड़े रहो, और उसी दिन सब गँवा दो जिस दिन वो अपना नाम वापस लेगी। ... कल रात तुम्हें चुनना है, रेयांश। मेरे साथ ऊपर, या उसके साथ मिट्टी में।"

"सबूत।" ... रेयांश ने कुर्सी पीछे धकेली, आवाज़ बर्फ़ की तरह सपाट। " मैं अफ़वाह और धुँधली तस्वीरों पर अपनी कुर्सी दाँव पर नहीं लगाता। ... कल दावत तक मुझे पुख़्ता काग़ज़ चाहिए। ... तब देखेंगे कौन किसके साथ खड़ा है।"

मल्विका मुस्कुराई, उसे लगा बर्फ़ के नीचे लालच पिघल रहा है, और वो तस्वीर मेज़ पर छोड़ कर चली गई। ... दरवाज़ा बंद होते ही रेयांश की साँस टूट गई। सामने एक हिसाब जो हल नहीं होता था, वो लड़की, या वो सब कुछ जो एक बूढ़े ने उसे यतीम से उठा कर दिया था।

"तीन सौ सत्रह रातें और, दादाजी।" ... रेयांश ने तस्वीर उठा कर बहुत देर तक देखा। " अगर मैं चुप रहा, तो कल रात वो बेनक़ाब हो जाएगी, और ये सारा महल मेरा। ... सब कुछ, सिवाय उस एक चेहरे के जो अब मुझे हर फ़ाइल में दिखता है। ... और अगर मैंने उसे बचाया, तो मैं अपने ही हाथों वो कुर्सी काट दूँगा जिस पर बैठा हूँ।"

उस रात रेयांश सोया नहीं। ... सुबह उसने वो तस्वीर अपने कोट की अंदरूनी जेब में रख ली, न मल्विका को लौटाई, न फाड़ी, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि जिस साम्राज्य को बचाने में उसने ख़ून जलाया था, आज रात वो उसे अपने ही हाथों दाँव पर लगाने जा रहा था, एक वर्दी वाली के लिए।

अगली रात राठौर ग्रैंड का दावत-कक्ष रौशनी में नहाया था, झाड़-फ़ानूस, निवेशक, ट्रस्टी। ... यही वो संगमरमर था जहाँ एक बरस पहले एक वेट्रेस पर शराब गिराने का इल्ज़ाम मढ़ा गया था, और वही वेट्रेस आज फिर उसी फ़र्श पर ट्रे थामे खड़ी थी।

अद्विका सफ़ेद दस्ताने पहने मेज़ों के बीच घूम रही थी, नज़रें झुकी, चाल नपी-तुली। ... एक तरफ़ बंसी शरबत की ट्रे को थामे था जैसे क़िला, 'बंसी बहादुर ड्यूटी पर' बुदबुदाता, और दूसरी तरफ़ शारदा ताई की चील जैसी नज़र भीड़ को नहीं, अपनी बच्ची को टटोल रही थी।

"तीन सौ सत्रह।" ... अद्विका ने एक ख़ाली गिलास ट्रे पर उठाया और एक पल उस चमकते कमरे पर नज़र दौड़ाई। " एक-एक रात एक पहाड़ है, ठीक है। पर हर पहाड़ के पीछे एक रात कम हो जाती है। ... आज की भी कट जाएगी। बस सिर झुका रहे।"

तभी हॉल के दूसरे सिरे पर मल्विका उठी, हाथ में एक पतला रिमोट, चेहरे पर वही आँखों तक न पहुँचने वाली मुस्कान। ... उसने काँटे से गिलास पर थाप दी, और उस खनक ने पूरे कमरे को चुप करा दिया। पीछे की बड़ी स्क्रीन झिलमिलाई।

"माफ़ कीजिए, दोस्तो। ... सिर्फ़ एक ज़रूरी बात।" ... सारी निगाहें मल्विका पर टिक गईं। " इस चेन की एक वसीयत अदालत में है, एक गुमनाम वारिस के नाम, जिसे आज तक कोई नहीं जानता। ... पर आज मैं आपको बताऊँगी कि वो वारिस कोई अजनबी नहीं। वो इसी कमरे में है, इसी वक़्त, आपके बीच, आपको खाना परोस रही है।"

सैकड़ों गर्दनें घूमीं, फुसफुसाहट की एक लहर दौड़ी, स्क्रीन पर वो धुँधली तस्वीर उभरने लगी। ... क़तार में अद्विका की साँस थम गई, ट्रे हाथों में पत्थर हो गई, और एक बरस की बनाई दीवार एक धड़कन में दरकती महसूस हुई। मल्विका की उँगली नाम लेने को उठी।

"और उस वारिस का नाम है..." ... मल्विका की उँगली सर्विस की क़तार की तरफ़ मुड़ी, ठीक उस लड़की पर जिसके हाथ में ट्रे काँप रही थी। " अद्विका... रा... राठौ..."

"बस, मल्विका!" ... रेयांश की आवाज़ पूरे हॉल में गरजी, और वो भीड़ को चीरता हुआ ठीक स्क्रीन और सर्विस की क़तार के बीच आ खड़ा हुआ। " मेहमानों के सामने ये घटिया तमाशा? ... शर्म आनी चाहिए इस खानदान को।"

"रेयांश, हट जाओ मेरे रास्ते से।" ... मल्विका की मुस्कान एक पल को काँपी। " मेरे पास सबूत है। ये लड़की वही गुमनाम वारिस है, और ये तस्वीर उसे साबित करती है, सबके सामने..."

"तस्वीर?" ... रेयांश एक ठंडी, तीखी हँसी हँसा और भीड़ की तरफ़ मुड़ा। " देवियो और सज्जनो, यही वो शाख़ है जो महीनों से अदालत में इस चेन को हड़पने की कोशिश कर रही है। ... और अब जब क़ानून में हार रहे हैं, तो एक गढ़ी हुई तस्वीर ले कर एक नौकरानी पर उँगली उठा रहे हैं, ताकि आपका पैसा डोल जाए। ... ये सबूत नहीं, ये हताशा है। स्क्रीन बंद करो।"

एक इशारे पर स्क्रीन बुझ गई, तस्वीर अँधेरे में गुम हो गई, और यही वो पल था जिसकी क़ीमत रेयांश जानता था। ... ट्रस्टियों के चेहरे सख़्त पड़ गए, और निवेशक आपस में खुसुर-पुसुर करने लगे।

किसी बूढ़े ट्रस्टी ने साफ़ सुना दिया, 'कार्यवाहक सीईओ भरी महफ़िल में अपने ही परिवार से भिड़ रहा है, इसका दिमाग़ ठिकाने पर है?' ... रेयांश ने अपनी तटस्थता और भरोसा, सब उस एक झूठ पर लगा दिया कि तस्वीर बनावटी है।

"तुमने अभी-अभी क्या कर दिया, रेयांश?" ... मल्विका की आवाज़ बर्फ़ में लिपटी छुरी थी। " तुमने उस वर्दी वाली को बचाने के लिए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी। ... मैं समझ गई। और जिस दिन ये समझ पापा तक पहुँचेगी, तुम दोनों एक साथ डूबोगे।"

रेयांश ने मुस्कुरा कर हाथ उठाया, संगीत फिर बहने लगा, वेटर फिर घूमने लगे, और दावत ने काँपते हुए साँस ली। ... पर क़तार में जमी अद्विका ने सब देखा था, और उसे समझ नहीं आया कि जिस आदमी ने बीच में आ कर उसका नाम निगल लिया, उसने ऐसा किया क्यों।

घंटे भर बाद, आख़िरी मेहमान के जाते ही, अद्विका दावत-कक्ष के पिछले सुनसान गलियारे में अकेली खड़ी थी, दस्ताने अब भी हाथ में, टाँगें काँपती हुई। ... एक बरस की चुनी हुई दीवार आज एक उँगली की दूरी पर गिरते-गिरते बची थी। तभी गलियारे के सिरे पर एक परछाईं आ रुकी।

"सर।" ... अद्विका ने फ़ौरन नज़रें झुकाईं, आवाज़ को नौकरानी की सादगी में लपेट लिया। " आज... आपने वहाँ जो किया। ... मैं नहीं जानती वो सब क्या था, पर मल्विका मैडम की उँगली मुझ पर उठी थी, और आपने उसे रोक दिया। ... मैं शुक्रगुज़ार हूँ। पता नहीं क्यों, पर आपने मुझे बचा लिया।"

रेयांश धीरे-धीरे उसके पास आया, और पहली बार उसकी आँखों में वो ठंडा खेल नहीं था जो हफ़्तों से जमा हुआ था। ... बस थकन थी, और एक नरमी जो उसने किसी और के सामने नहीं खोली थी। वो उसके ठीक सामने आ रुका।

"आप ऐसे क्यों देख रहे हैं, सर?" ... अद्विका ने ट्रे को सीने से यूँ लगा लिया जैसे कोई आख़िरी ढाल। " मैं... मैं वापस काम पर लौट जाऊँ? बहुत बर्तन बाक़ी हैं अंदर।"

"मत जाओ।" ... रेयांश ने बहुत हौले से कहा। " उस रात, तुम्हारे कमरे के दरवाज़े पर, मैंने एक लफ़्ज़ हवा में छोड़ा था। गुड़िया। ... और तुम्हारा हाथ अपने-आप लॉकेट पर चला गया था। ... मैंने वो दरार उसी रात देख ली थी, अद्विका। और तब से हर रात देखता रहा हूँ।"

"वो... वो सिर्फ़ एक लफ़्ज़ था, सर। किसी का भी नाम हो सकता है।" ... पर उसकी अपनी आवाज़ ने उसका साथ छोड़ दिया, और लॉकेट पर रखा हाथ बेइरादा काँप उठा। " इसका मुझसे कोई... कोई मतलब नहीं।"

अद्विका के हाथ से ट्रे फिसलते-फिसलते बची। ... उसे याद आया कि उसका असली नाम एक दराज़ में बंद पड़ा है, और उस दराज़ की चाबी इसी आदमी के पास है। ... वो पत्थर चेहरा, जो अभी-अभी मल्विका की उँगली के सामने नहीं टूटा था, इस एक बूढ़े लफ़्ज़ पर काँप गया।

"आज रात मैंने अपने ही हाथों वो कुर्सी काट दी जिस पर मैं बैठा हूँ, अद्विका।" ... " मैंने ट्रस्टियों के सामने खड़े हो कर झूठ बोला, अपना भरोसा गँवाया, अपनी सारी शाख़ जला दी। ... एक धुँधली तस्वीर के लिए नहीं। ... तुम्हारे लिए।"

"सर, आप... आप बहुत थके हुए हैं। आज की रात आप पर बहुत बोझ था।" ... अद्विका ने पीछे हटना चाहा, पर पैर फ़र्श से नहीं उठे। " और मैं... मैं कोई मालकिन-वालकिन नहीं हूँ, सर। मैं बस यहाँ काम करती हूँ। बस इतना ही।"

गलियारे की एक बत्ती टिमटिमाई, कहीं दूर बर्तनों की खनक थम गई, और दो साँसों के बीच पूरी दुनिया एक पल को रुक गई। ... हफ़्तों से जो एक लफ़्ज़ उसने सीने में दबा रखा था, अब वो उसके होंठों तक चला आया।

"अब और नाटक नहीं, अद्विका।" ... रेयांश ने सीधे उसकी आँखों में देखा, और वो लफ़्ज़ कह दिया जो एक बरस से सिर्फ़ सुनने वाला जानता था। " मैं जानता हूँ तुम कौन हो। ... मालकिन।"

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