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Chapter 19 of 30

बंसी का राज़

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

कल रात का वो मख़मली हुक्म सुबह की रौशनी में भी कहीं नहीं गया था। ... और तहख़ाने में बेख़बर अद्विका ने ट्रे उठाई, ऊपर से ख़ास फ़रमाइश थी, मल्विका मैडम की सुबह की चाय, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि शिकार ख़ुद चल कर शिकारी के कमरे में जा रहा है।

ऊपर वाले सुइट में मल्विका खिड़की के पास बैठी थी, गोद में वही बंद फ़ाइल जिसमें एक कटा हुआ नाम साँस ले रहा था। ... दस्तक हुई, और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जो आँखों तक नहीं पहुँची। बिल्ली ने अपना दूध ख़ुद चूहे के हाथों मँगवाया था।

"आओ। ... वहीं मेज़ पर रख दो।" ... मल्विका ने नज़र फ़ाइल से उठाई तक नहीं। " रुको। ... तुम वही हो ना, रेयांश के फ़्लोर वाली? आजकल हर जगह दिख जाती हो। ... नाम क्या बताया था तुमने?"

"अद्विका, मैडम। अद्विका देशमुख।" ... अद्विका ने प्याली में चाय उतारी, हाथ ठहरे हुए, नज़रें नीची। " हुक्म मिला था कि आज की चाय मैं ले कर आऊँ।" ... पर उसकी रीढ़ को वो सुनसान गलियारा याद था, और वो धमकी भी, 'तुम जो भी हो, मैं पता लगा कर रहूँगी।'

"देशमुख..." ... " अजीब बात है ना... कुछ नाम ज़ुबान पर चढ़ते ही नहीं। और कुछ... लाख कोशिश करो, भूलते नहीं।" ... " एक काम करो। पहला घूँट तुम पियो। ... ज़माना ख़राब है। आजकल चाय में पता नहीं क्या-क्या घुला मिल जाता है।"

कमरा एक पल को बहुत ख़ामोश हो गया, एक क़ातिल अपने शिकार से ज़हर चखवा रही थी, और सिर्फ़ सुनने वाला उस जुमले के सारे छुरे गिन सकता था। ... अद्विका ने बिना पलक झपकाए घूँट भरा, आँखें सीधी मल्विका की आँखों में।

"चाय बिलकुल ठीक है, मैडम।" ... " वैसे भी, इस होटल की किसी चीज़ से मुझे डर नहीं लगता। ... ये घर मुझे कभी नुक़सान नहीं पहुँचाएगा।" ... और मल्विका की मुस्कान एक धड़कन काँप गई, उस लहजे में कुछ ऐसा था जो नौकरानियों में नहीं होता।

"जाओ।" ... दरवाज़ा बंद होते ही मल्विका शीशे में अपने ही अक्स से फुसफुसाई। " इतना ठहराव... काश तुम सच में सिर्फ़ एक नौकरानी होतीं, अद्विका राठौर।" ... " पापा ने कहा है, दावे से पहले। ... और मल्विका राठौर अपने पापा को कभी मायूस नहीं करती।"

नीचे, भाप भरी दुनिया में लौटते हुए अद्विका की उँगलियाँ काँप रही थीं, चेहरा नहीं। ... मन ही मन उसने रातें गिनीं, तीन सौ उन्नीस, और गिनते-गिनते वो लफ़्ज़ फिर चुभ गया जो दो रातों से नहीं निकला था, 'गुड़िया', और वो आदमी भी, जो 'अब समझ आया' कह कर अँधेरे में उतर गया था, और तब से बस... देखता था।

"इधर आ।" ... " सुन बेटी, ऊपर कुछ बदला है। वो स्लेटी सूट वाला अब बाहर नहीं, अंदर घूम रहा है, कैंटीन में, हाथ में नई भरती वाली लड़कियों की तस्वीरें। ... और आज मल्विका बिटिया ने ख़ुद तेरी ड्यूटी का काग़ज़ मँगवाया। चालीस साल से इस घर की हवा सूँघ रही हूँ... ये हवा ठीक नहीं।"

"ड्यूटी का काग़ज़..." ... अद्विका के हाथ में चादर की तह बिगड़ गई। " इसीलिए आज की चाय ऊपर से माँगी गई थी, ताई। वो मुझे पास से देखना चाहती थी। जैसे... क़साई बकरे को तौलता है।" ... " मुझे वकील साहब तक ख़बर पहुँचानी होगी। आज ही।"

"पागल हो गई है?" ... " बाहर वो जासूस, अंदर ये मल्विका, और ऊपर वो रेयांश जिसकी आँखें आजकल तुझ पर गड़ी रहती हैं... छोड़। ... मिलना ही है तो होटल से दूर, पटरियों के पार, और अकेली मत जाना। और सुन..." ... और तभी पीछे ट्रे गिरने का ऐसा धमाका हुआ जैसे बादल फट पड़ा हो।

आलमारी की ओट में बंसी खड़ा था, पैरों में गिरी ट्रे, चेहरे पर तश्तरियों जितनी बड़ी आँखें। ... वो कब से खड़ा था, ये उसके खुले मुँह से ज़ाहिर था, काफ़ी देर से, और काफ़ी कुछ सुन चुका था।

"जासूस..." ... " वकील साहब... मल्विका मैडम तेरा काग़ज़... तस्वीरें... पटरियों के पार छुप कर मिलना..." ... " हे भगवान। ... हे भगवान! मुझे सब समझ आ गया!"

"बंसी, सुन, जो तूने सुना वो..." ... अद्विका ने हाथ बढ़ाया, पर बंसी दो क़दम पीछे हटा, आलमारी से टकराया, और एक और ट्रे झन्ना कर गिरी। " धीरे बोल। पूरी बात सुने बिना कुछ मत सोच।"

"सोचना क्या है, सब शीशे की तरह साफ़ है!" ... " या तो तू ठगनी है जो होटल का ख़ज़ाना लूटने आई है... या सी.बी.आई. की जासूस है जो गिद्धों की चोरियाँ पकड़ने आई है... या फिर... तू रेयांश सर की छुपाई हुई बीवी है जिसे खानदान वाले रास्ते से हटाना चाहते हैं! ... मैंने सेम-टू-सेम क़िस्सा एक फ़िल्म में देखा था!"

"चुप, बेसुरे ढोल!" ... " सुन, एक ही बार में। ना ये ठगनी है, ना जासूस, ना छुपी बीवी। ... इस बच्ची की जान को ख़तरा है। बड़े लोगों की दुश्मनी, बस इतना समझ। ... और तेरी इस बारह इंच की ज़ुबान से एक लफ़्ज़ भी बाहर गया ना, तो बचा-खुचा ख़तरा मैं ख़ुद बन जाऊँगी।"

बंसी की सारी थिएटर वाली हवा एक साँस में उतर गई। ... " जान को ख़तरा? ... हमारी अद्विका की जान को?" ... " माँ क़सम, ताई। ये राज़ मेरे साथ चिता पर जाएगा। ... पर एक शर्त है। आज से इसका बॉडीगार्ड मैं हूँ। बंसी बहादुर, चौबीस घंटे ड्यूटी, तनख़्वाह सिर्फ़ दो वक़्त की चाय।"

"मुझे बॉडीगार्ड नहीं चाहिए, बंसी।" ... अद्विका हँस पड़ी, और उस हँसी में एक नमी थी जिसे उसने पलकों में वापस धकेल दिया। " पर... शुक्रिया। माँ के जाने के बाद मेरे लिए लड़ने वाला कोई नहीं था। अब एक पूरी फ़ौज है... जिसे ये भी नहीं पता कि जंग किस बात की है।"

और उस दिन तहख़ाने में एक ख़ामोश मुनादी फिर गई, बिना किसी सच के, बस इतनी सी, कि अपनी अद्विका पर आँच नहीं आनी चाहिए। ... रसोई से लॉन्ड्री तक हर आँख उसका पहरा बन गई, और पहरे के आगे-आगे चलता था बंसी, मसख़रे की टोपी पहने एक सच्चा सिपाही।

दोपहर की कैंटीन में स्टील के गिलासों की खनक के बीच वो स्लेटी सूट ऐसे चलता था जैसे दूध में गिरी मक्खी। ... उसने मेज़ पर नई भरती वाली लड़कियों की तस्वीरों की गड्डी रखी, और रसोइए से पूछने लगा, कौन कहाँ सोती है, किससे मिलती है। ... और गड्डी में तीसरी तस्वीर अद्विका की थी।

"अरे साहब! चाय? गरम समोसा?" ... " ये तस्वीर? ... अरे ये तो मेरी ममेरी बहन है, गाँव से आई है, बेचारी गूँगी है। ... अच्छा वो नहीं, ये वाली? ये तो रात की शिफ़्ट में आती ही नहीं... मतलब आती है पर दिखती नहीं... मतलब दिखती है पर होती नहीं..." ... बंसी अपने ही झूठ में हाथ-पाँव मारने लगा।

और स्लेटी सूट की नज़र धीरे से उठी, सीधी उस लड़की पर जिसे ये मसख़रा इतनी मेहनत से छुपा रहा था। ... अद्विका ने ऐन उसी पल पीठ घुमा कर किसी की थाली में दाल परोसनी शुरू कर दी, गर्दन झुकी, सौ नौकरानियों जैसी एक नौकरानी। ... वो नज़र उस झुकी गर्दन पर एक साँस ठहरी... और आगे सरक गई।

"तू मुझे बचा रहा है या मेरे सिर पर बोर्ड लगा रहा है कि यही है, इसी को देखो?" ... अद्विका ने उसे बर्तनों के पीछे खींचा, आवाज़ में हँसी और ग़ुस्सा गुँथे हुए। " गूँगी? ममेरी बहन? वो आदमी पेशेवर शिकारी है, बंसी, और तू... चलता-फिरता लाउडस्पीकर।"

"ग़लती हो गई, मानता हूँ।" ... बंसी ने कान पकड़े, पर आवाज़ में मज़ाक़ की जगह पहली बार सच का डर था। " पर तूने देखा नहीं... उसकी गड्डी में तेरी तस्वीर थी। तेरी। ... वो तुझ तक पहुँच चुके हैं। अब बता, बॉडीगार्ड चाहिए कि नहीं?"

और कैंटीन के ऊपर, मेज़ानाइन की रेलिंग पर, वो आदमी खड़ा था जो अब सब कुछ जानता था। ... रेयांश ने दूर से पूरा खेल देखा, स्लेटी सूट, गड्डी, बंसी का शोर, और वो लड़की जो ऐन वक़्त पर पीठ घुमा गई, और वो कुछ नहीं बोला। ... एक दराज़ में ग़द्दार का सबूत, सीने में इस लड़की का राज़, और आँखों में वो ठंडा खेल।

शाम ढलते-ढलते अद्विका ने फ़ैसला कर लिया। ... पिछली गली के अख़बार वाले के हाथ एक पुर्ज़ा वकील साहब तक पहुँचा, चार लफ़्ज़, 'ईरानी कैफ़े। आठ बजे।' ... और रात को स्टाफ़ गेट से निकलती उस परछाईं के पीछे, बीस क़दम पर, एक और परछाईं निकली, हाथ में छाता, आँखों पर रात के आठ बजे... काला चश्मा।

"बंसी।" ... अद्विका बिना पलटे रुक गई, और पीछे वाली परछाईं फ़ौरन एक खंभे से ऐसे चिपक गई जैसे उससे बरसों पुराना रिश्ता हो। " काला चश्मा। रात में। बारिश में। ... घर जा।"

"पहचान कैसे लिया?" ... बंसी खंभे के पीछे से निकला, चश्मा माथे पर चढ़ाते हुए। " ताई का हुक्म है, अकेली नहीं जाएगी। ... ठीक है, अंदर नहीं आऊँगा। बाहर खड़ा रहूँगा। पेड़ बन कर। ... नहीं, हवा बन कर! तू ही बता, हवा कभी दिखी है किसी को?"

पटरियों के पार वाला पुराना ईरानी कैफ़े भाप और बन-मस्के की ख़ुशबू में डूबा था, शीशों पर बारिश की टेढ़ी लकीरें। ... कोने की मेज़ पर विश्वनाथ बैठा था, चाय अनछुई, और अद्विका को लगा कि दो दिनों में वो एक और बरस बूढ़ा हो गया है।

"बैठो, बेटी। ... वक़्त कम है।" ... " जयदेव ने अदालत में अचानक मुस्कुराना बंद कर दिया है। नई तारीख़ों पर ज़ोर नहीं, नए काग़ज़ नहीं, कुछ नहीं। ... चालीस साल की वकालत ने एक बात सिखाई है, जब जयदेव जैसा आदमी अदालत में चुप हो जाए, तो उसने कोई और रास्ता चुन लिया है। ... और उस रास्ते पर अदालतें नहीं होतीं।"

"और उस रास्ते पर होता क्या है, वकील साहब?" ... अद्विका ने पूरा दिन मेज़ पर रख दिया, स्लेटी सूट अब होटल के अंदर, गड्डी में उसका चेहरा, मल्विका की वो चाय, वो 'पहला घूँट तुम पियो'। " वो मुझे पास से तौल रही थी। मैं उस कमरे से ज़िंदा निकली हूँ, बस इतना जानती हूँ।"

"उस रास्ते पर गवाह नहीं होते, बेटी। ... सिर्फ़ हादसे होते हैं।" ... " आज से नए क़ायदे। मुझसे कोई मुलाक़ात नहीं, जब तक मैं ख़बर न भेजूँ। कोई नया चेहरा दोस्ती बढ़ाए, तो दो क़दम पीछे। रात में अकेली कहीं नहीं। ... कुछ भी अजीब लगे, तो सीधे शारदा के पास।" ... उसने एक पुर्ज़ा उसकी हथेली में दबाया। " ये नंबर याद कर के जला देना।"

"तीन सौ उन्नीस रातें, वकील साहब।" ... अद्विका ने पुर्ज़ा मुट्ठी में बंद कर लिया। " कभी लगता है, गिन-गिन के पार कर लूँगी। कभी लगता है, एक-एक रात एक-एक पहाड़ है। ... पर फ़िक्र मत कीजिए। जिस लड़की को उन्होंने बारिश में फेंका था, वो अब चार हज़ार छातों के नीचे खड़ी है।"

"तुम्हारे दादा को तुम पर फ़ख़्र होता, गुड़िया।" ... वो लफ़्ज़ बूढ़े के मुँह से बेइरादा निकला, और अद्विका की साँस एक पल रुकी। " हाँ... देवनारायण साहब यही कहते थे आख़िरी दिनों में, कि एक दिन अपनी गुड़िया को उसका घर लौटा दूँगा। ... बस तीन सौ उन्नीस रातें और। फिर कोई अद्विका देशमुख नहीं। सिर्फ़ अद्विका राठौर।"

और बाहर, कैफ़े के ठीक सामने, एक पेड़ बहुत ही ज़्यादा दिखाई दे रहा था। ... बंसी हर आने-जाने वाले को कस्टम अफ़सर की तरह घूर रहा था, एक भिखारी को 'ये मेरी पोस्ट है' कह कर आगे बढ़ा चुका था। ... और गली के दूसरे सिरे पर, बंद दुकान की ओट में, वो स्लेटी सूट खड़ा था, जो कैंटीन से ही इस शोर मचाते पहरेदार के पीछे यहाँ तक चला आया था।

स्लेटी सूट ने पहले मसख़रे को देखा, फिर काँच के पार कोने वाली मेज़ को। ... एक चेहरा उसकी गड्डी की तीसरी तस्वीर से हू-ब-हू मिलता था। और दूसरा... वो उसने अदालत में देखा था, हाथ में सीलबंद लिफ़ाफ़ा थामे। ... वारिस की परछाईं और वसीयत का रखवाला, एक ही मेज़ पर। उसने बहुत धीरे से अपना फ़ोन उठाया।

अंदर, विश्वनाथ ने बिल के पैसे रखे और जाते-जाते एक पल अद्विका के सिर पर हाथ रखा, जैसे कोई बिन कही दुआ। ... अद्विका मुस्कुराई, दो दिनों में पहली सच्ची मुस्कान, ये जाने बिना कि शीशे के उस पार एक फ़ोन का कैमरा उन दोनों के चेहरों पर ठहर चुका है।

काँच पर बहते पानी ने तस्वीर को धुँधलाने की पूरी कोशिश की, पर लम्हा साफ़ था, गुमनाम वारिस और वसीयत का रखवाला, एक मेज़, एक दुआ, एक मुस्कान। ... शटर की आवाज़ बारिश से भी धीमी थी, इतनी धीमी कि पेड़ बने खड़े बंसी बहादुर ने भी नहीं सुनी। ... क्लिक।

लौटते हुए बंसी पूरे रास्ते अपनी बहादुरी के क़िस्से सुनाता रहा, 'एक परिंदा भी पर नहीं मार पाया, बंसी बहादुर ड्यूटी पर था', और अद्विका बारिश में हल्का हँसती रही। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि जिस पहरे पर बंसी को फ़ख़्र था, वही पहरा शिकारी को सीधे शिकार तक ले आया था, और वो तस्वीर, जो सब कुछ साबित कर सकती थी, ठीक इसी पल मल्विका राठौर के नाम रवाना हो चुकी थी।

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