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Chapter 29 of 30

आख़िरी वार

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

रेयांश की गाड़ी बारिश से भरी सड़कों को चीरती हुई भाग रही थी। अद्विका बराबर वाली सीट पर, हाथ में वो फ़ोन जिसकी स्क्रीन पर मल्विका के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी नीली रौशनी में साँस ले रहे थे। और एक साल की दूरी तय कर के रेयांश के होंठों तक आया वो जवाब अब उस भीगे पोर्टिको में कहीं छूट गया था।

'सोनू के फ़्लैट तक बीस मिनट, और मैं इसे दस में तय करूँगा।' ... रेयांश की आवाज़ पत्थर सी सपाट थी, नज़र सड़क पर गड़ी। 'तुम बस सोचो, अगर मल्विका का आदमी वहाँ हमसे पहले पहुँच गया तो, अद्विका, हम क्या करेंगे?'

अद्विका एकदम सीधी हो गई, जैसे किसी ने उसकी रीढ़ में बर्फ़ भर दी हो। 'रुको। गाड़ी रोको, रेयांश।' ... उसने स्क्रीन को घूरा। 'ये मल्विका मुझे बाँट रही है। एक तरफ़ सोनू, दूसरी तरफ़ चार हज़ार लोगों वाला महल। वो चाहती है मैं एक चुनूँ, और जो छोड़ूँ उसे जला दे। ठीक वैसे ही जैसे एक साल पहले उन्होंने मुझे तोड़ा था, एक झूठे इल्ज़ाम और एक चुनाव के बीच।'

अद्विका के ज़हन में एक साल पुरानी वो रात कौंध गई, वही राठौर ग्रैंड, वही चमकती दावत, वही साज़िश जिसने एक बेगुनाह लड़की को सैकड़ों लोगों के सामने कुत्ते की तरह निकलवा दिया था। पर आज वो मेज़ के नीचे बिछा हर मोहरा देख सकती थी। मल्विका का असली निशाना सोनू नहीं, सोनू सिर्फ़ चारा था, उसे महल से दूर खींचने का।

उसने काँपती उँगलियों से नहीं, एक मालकिन की मज़बूत उँगलियों से बंसी का नंबर मिलाया। 'बंसी! सुन, ध्यान से सुन। सोनू कहाँ है? सच बता, अभी इसी वक़्त।'

'मालकिन! अरे आप कहाँ हैं, पूरा तहख़ाना आपको ढूँढ रहा है!' ... बंसी की आवाज़ शोर में डूबी थी। 'सोनू बाबा तो यहीं हैं, महल के पीछे नौकर-क्वार्टर में, शारदा ताई ने तीन दिन पहले ही छुपा दिया था, बिलकुल महफ़ूज़! पर... पर मालकिन, अभी एक मेहमान आया है, कहता है शताब्दी की मुबारकबाद देने आया हूँ, हाथ में एक बड़ा तोहफ़े का डिब्बा है, और मुझे उसकी शक्ल एक रत्ती भर पसंद नहीं आई।'

अद्विका का ख़ून जम गया, पर आवाज़ नहीं काँपी। 'बंसी, सुन मेरी जान। उस मेहमान को उसके डिब्बे समेत वहीं रोको, छूना मत, बस घेर लो। शारदा ताई से कह, अभी इसी पल पूरे महल में आग वाला अलार्म बजाओ और हर मेहमान, हर नौकर को बाहर निकालो, सोनू को सबसे पहले। मैं दस मिनट में पहुँच रही हूँ। आज राठौर ग्रैंड के अंदर कोई नहीं मरेगा, बंसी। कोई नहीं।'

रेयांश ने बिना सवाल स्टीयरिंग पूरा घुमा दिया, और गाड़ी बारिश में एक लंबा घेरा काटती वापस महल की ओर मुड़ गई। 'मल्विका ख़ुद महल में है।' ... उसने दाँत भींच कर कहा। 'वो सोनू के बहाने हमें शहर के उस पार भेजना चाहती थी, ताकि उसका असली वार चले तब तुम वहाँ न हो। वो पूरे महल को हम दोनों समेत दफ़्न करना चाहती है।'

कुछ पल दोनों ख़ामोश रहे, और उस ख़ामोशी में वो अधूरा जवाब अब भी उनके बीच काँप रहा था, जो थोड़ी देर पहले रेयांश के होंठों पर आ कर रुक गया था। अद्विका ने एक पल उसकी ओर देखा, रेयांश ने भी, और दोनों ने बिना एक लफ़्ज़ तय कर लिया, वो जवाब अभी नहीं। पहले ये रात। पहले ये लोग।

दस मिनट बाद गाड़ी उन्हीं बड़े काँच के दरवाज़ों के सामने रुकी जहाँ से एक साल पहले अद्विका को बाहर फेंका गया था। पर आज वो दरवाज़े किसी को फेंक नहीं रहे थे, आज उनसे सैकड़ों मेहमान, वेटर, कुक, सब बदहवास बारिश में निकल रहे थे। और उस चमकती लॉबी में, जहाँ हमेशा ताज़े फूलों की महक रहती थी, आज जलते धुएँ की तीखी, काली बू तैर रही थी।

भीड़ को दरवाज़ों की ओर धकेलती शारदा ताई ने अद्विका को देखा और उसकी ओर लपकी, पल्लू धुएँ से काला पड़ा हुआ। 'बेटी! सोनू बाहर है, बंसी उसे गोद में उठा कर सबसे पहले निकाल ले गया। और वो हरामी मेहमान, उसके डिब्बे में तोहफ़ा नहीं, आग लगाने वाला सामान था, हमने उसे धर लिया है।' ... उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर हाथ स्थिर थे। 'पर आग सर्विस वाले गलियारे में लग चुकी है, और मल्विका बीबी... वो ऊपर, बड़ी सीढ़ी की तरफ़ गई है।'

अद्विका ने शारदा के दोनों कंधे थामे, एक पल के लिए एक बेटी और एक मालकिन दोनों बन कर। 'शाबाश, ताई। अब आख़िरी इंसान तक बाहर निकले, एक भी पीछे न छूटे, न मेहमान न नौकर। तुम बंसी के साथ नीचे का हर कोना ख़ाली कराओ, इस महल की नस-नस तुम जानती हो। मल्विका को मैं देखती हूँ।'

तभी बंसी धुएँ में से खाँसता हुआ प्रकट हुआ, चेहरा कालिख से पुता, पर आँखें जीत से चमकती हुईं। 'मालकिन, सोनू बाबा एकदम ठीक हैं, बाहर एम्बुलेंस के पास बैठे हैं! और वो आग वाला मेहमान... मैंने उसकी पेटी छीन कर उसी के सिर पर दे मारी!' ... वो रुका, फिर सीना फुला कर बोला। 'कहा था ना मैं आपका बॉडीगार्ड हूँ? आज पता चला बंसी किस मिट्टी का बना है!'

अद्विका ने एक पल उस काले, खाँसते, हँसते लड़के को देखा, और उसकी आँखें भर आईं। जिस तहख़ाने को इस महल ने हमेशा पैरों की धूल समझा, आज वही धूल इस पूरे महल और सैकड़ों मेहमानों की मौत के बीच एकलौती दीवार बन कर खड़ी थी। मल्विका का सबसे बड़ा वार उन्हीं हाथों नाकाम हुआ जिन्हें उसका घराना इंसान तक नहीं समझता था।

रेयांश ने कोट उतार कर एक गीला रूमाल अद्विका के मुँह और नाक पर बाँध दिया। 'ये बाँधे रखो।' ... उसकी आवाज़ में अब कोई घमंड नहीं, सिर्फ़ एक अटल इरादा था। 'जिस दिन इस चेन ने तुम्हें निकाला था, मैं चुपचाप खड़ा रहा था। आज नहीं। आज मैं तुम्हारे आगे-आगे चलूँगा।'

दोनों उस चौड़ी संगमरमर की सीढ़ी की ओर बढ़े, वही सीढ़ी जिस पर एक साल पहले अद्विका का बैज नोच कर उसे घसीटा गया था, और अब जिसके ऊपरी सिरे पर धुआँ एक काले परदे की तरह लटक रहा था। उस परदे के पार, सीढ़ी के सबसे ऊँचे पायदान पर एक अकेली परछाईं खड़ी थी। मल्विका।

मल्विका वहीं खड़ी थी, साड़ी धुएँ से मैली, बाल बिखरे, पर होंठों पर वही पुरानी बर्फ़ीली मुस्कान। 'आ गई, मालकिन?' ... उसकी आवाज़ आग की चटचटाहट के ऊपर तैर रही थी। 'देख, तेरा महल जल रहा है। जो चेन तूने मुझसे छीनी, आज वो न तेरी रहेगी न मेरी। मैंने अदालत से रोक लगवाई थी कि सूरज उगने से पहले ये सील हो जाए, पर आग तो अदालत से भी तेज़ है, है ना?'

अद्विका धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ती रही, नज़र मल्विका पर टिकी, आवाज़ बर्फ़ से भी ठंडी। 'तेरी वो रोक मर चुकी है, मल्विका। जिस पल तूने वो संदेश भेजा, उसी पल तेरे बाप जयदेव के हाथों में हथकड़ी पड़ चुकी थी, और उसकी ज़बरदस्ती की पूरी रिकॉर्डिंग अब जज के सामने है। जिस झूठ पर तेरी रोक खड़ी थी, वो राख हो गया। तेरे पास कोई काग़ज़ नहीं बचा, इसलिए तू आग ले आई।'

मल्विका का चेहरा एक पल दरका, और उस दरार से बरसों की जलन उबल पड़ी। 'हाँ! ले आई!' ... वो चीख़ी, और अब आवाज़ में कोई मख़मल नहीं था। 'क्योंकि मैं ये नहीं देख सकती कि जिस साम्राज्य को मैंने बचपन से अपना समझा, वो एक वर्दी वाली नौकरानी के पैरों में पड़ा हो! अगर ये मेरा नहीं हो सकता, अद्विका राठौर, तो किसी का नहीं होगा। न तेरा, न रेयांश का, किसी का नहीं!'

'तूने इस आग में चार हज़ार लोगों की जान डाल दी, मल्विका!' ... अद्विका की आवाज़ पहली बार गरजी, धुएँ को चीरती हुई। 'जिन लोगों ने तेरा कभी कुछ नहीं बिगाड़ा, जो सिर्फ़ अपनी रोटी के लिए यहाँ खटते थे! तेरी लड़ाई मुझसे थी, तो मुझसे लड़ती। पर तूने वही किया जो तेरा ख़ानदान हमेशा करता आया है, कमज़ोर को आग में झोंक कर अपना ताज बचाना।'

'ताज तो अब है ही नहीं, पगली!' ... मल्विका ने एक क़दम पीछे लिया, पीठ के पीछे आग की लपटें अब गैलरी की पुरानी लकड़ी को चाट रही थीं। 'मैंने कहा था ना, डूबूँगी तो अकेले नहीं। मैंने हर दरवाज़ा, हर आपात रास्ता अंदर से बंद करवा दिया था, ताकि आग लगे तो कोई बाहर न निकल पाए। यही था मेरा सील। तेरा पूरा महल एक जलता ताबूत बनने वाला था।'

पर मल्विका एक बात भूल गई थी, वो रास्ते सिर्फ़ ऊपर वालों को मालूम नहीं थे। जो तहख़ाने के लोग चालीस साल से इस महल की हर छुपी नस, हर पिछला दरवाज़ा जानते थे, उन्होंने मल्विका के बंद किए हर रास्ते को पहले ही खोल दिया था। नीचे, बंसी और शारदा की अगुवाई में आख़िरी मेहमान भी बारिश में निकल चुका था। मल्विका का जलता ताबूत ख़ाली था।

नीचे महल ख़ाली हो चुका था, पर ऊपर उस बड़ी सीढ़ी के इर्द-गिर्द आग तेज़ी से फैल रही थी, परदे, लकड़ी की पुरानी गैलरी, सब लपटों में घिरते जा रहे थे। अब उस जलते महल में सिर्फ़ तीन लोग बचे थे, अद्विका, रेयांश, और वो औरत जो उन्हें यहीं दफ़्न करने आई थी।

'तेरा ताबूत ख़ाली है, मल्विका।' ... अद्विका अब उससे कुछ ही क़दम दूर थी, और उसकी आवाज़ में एक अजीब नरमी थी, जीत की नहीं, तरस की। 'महल का हर इंसान बाहर है। तेरी आग एक ख़ाली महल जला रही है, और तेरा हर हथियार तेरे ही हाथ में टूट चुका है। जिन नौकरों को तूने पैरों की धूल समझा, आज उन्हीं ने तेरी सबसे बड़ी चाल मिट्टी में मिला दी। अब बस कर। नीचे चल, मेरे साथ।'

रेयांश ने अपना हाथ मल्विका की ओर बढ़ाया, वही आदमी जिसे उसने बरसों अपना साथी बनाना चाहा और जिसने हर बार इनकार किया। 'मल्विका, बस। मैंने ये पूरा साम्राज्य अपने हाथों छोड़ दिया, समझी? मुझे कभी ये ताज नहीं चाहिए था। तू भी छोड़ दे। हाथ पकड़, और चल। इस तरह जल कर किसी को कुछ नहीं मिलेगा।'

एक पल के लिए मल्विका की आँखों में कुछ काँपा, जैसे बरसों की जलन के नीचे दबी कोई थकी लड़की झाँकी हो। उसका हाथ आधा उठा भी, रेयांश के हाथ की ओर। पर ठीक उसी पल, उन तीनों के ऊपर, गैलरी की छत से बँधा शताब्दी का वो भारी झूमर, जिसकी ज़ंजीर को आग बरसों की भूख से चाट चुकी थी, एक लंबी, डरावनी चरचराहट के साथ हिला।

'मल्विका, हटो! रेयांश, पीछे!' ... अद्विका की चीख़ धुएँ को चीर गई, और वो बेइख़्तियार आगे लपकी, उस औरत की तरफ़ भी जो अभी उन सबको मार डालना चाहती थी। ऊपर, वो विशाल झूमर अपनी आख़िरी ज़ंजीर से टूट कर नीचे झुक गया, हज़ारों काँच के टुकड़े आग की रौशनी में एक पल जगमगाए।

और रेयांश, जिसका वो अनकहा जवाब पूरे एक साल से उसके होंठों पर अटका था, उसने वो जवाब अब लफ़्ज़ों में नहीं दिया। उसने ख़ुद को पूरी ताक़त से आगे फेंका, अद्विका की ओर, या शायद मल्विका की ओर, या शायद दोनों की, और उस धुएँ में किसी ने ठीक-ठीक नहीं देखा कि किसने किसे धकेला।

और फिर वो हुआ जिसका इस महल को अंदेशा तक नहीं था। वो हज़ार किलो का झूमर, अपने हज़ारों काँच के फूलों समेत, संगमरमर की सीढ़ी पर आ गिरा, और उसकी आवाज़ किसी बम जैसी थी। आग की गरज, काँच की किरचों की बौछार, लोहे के टकराने की चीख़, और उन सबके बीच कहीं एक इंसानी आवाज़, कोई नाम पुकारती हुई, जो उसी शोर में डूब कर टूट गई।

जब वो गड़गड़ाहट थमी, तो सीढ़ी पर धुएँ और काँच के उस ढेर के नीचे कुछ हिला, फिर स्थिर हो गया। एक जिस्म किसी दूसरे जिस्म के ऊपर पड़ा था, बचाने की उसी मुद्रा में जमा, पर उस धुएँ में यह पहचानना नामुमकिन था कि नीचे कौन था और ऊपर कौन।

आग का अलार्म अब भी पूरे ख़ाली महल में चीख़ रहा था, बारिश अब भी काँच की टूटी छत से अंदर गिर रही थी, बंसी की दूर से आती पुकार अब भी दोनों के नाम रट रही थी। पर उस सीढ़ी पर, काँच और धुएँ के उस ढेर के नीचे, कोई आवाज़ नहीं थी। कोई कराह नहीं, कोई साँस नहीं। पूरे शोर के ऐन बीच एक ऐसी ख़ामोशी उतर आई थी, जो बता ही नहीं रही थी कि उन दोनों में से कौन अभी भी साँस ले रहा है।

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