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अध्याय 23 / 30

आग से खेल

गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi

सोनू। ... वो एक नाम कोठरी की उस सुबह की सलेटी हवा में अब भी लटका था, जैसे किसी ने अभी-अभी काँच तोड़ा हो और टुकड़े गिरना अभी बाक़ी हों। अभी एक पल पहले अद्विका ने अपना नाम वापस लेने का फ़ैसला किया था, अपने बाप की अधूरी लड़ाई उठाने का, और ठीक उसी पल, जंग ने उसका इकलौता, बीमार भाई उसके हाथ से छीन लिया था।

'सोनू कहाँ है?' ... अद्विका ने रेयांश की कलाई पकड़ ली, और उसकी आवाज़ में वो मालकिन नहीं थी जो अभी बनी थी, बस एक बहन थी। 'वो कहाँ है, रेयांश? ज़िंदा है? तुमने कहा हॉस्टल से ख़बर आई है, कैसी ख़बर, साफ़ बताओ।'

'ज़िंदा है।' ... रेयांश ने उसके दोनों हाथ अपनी हथेलियों में जकड़ लिए। 'मेरे आदमी ने देखा, उसे एक गाड़ी में डाल कर ले गए, चोट है पर साँस चल रही थी। पुलिस इसे दुर्घटना लिख रही है, पर वो गाड़ी जयदेव की थी, अद्विका। ये हादसा नहीं, एक संदेश है।'

कोठरी के एक कोने में शारदा ताई ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया, और विश्वनाथ का बूढ़ा चेहरा और भी सलेटी पड़ गया। जिस काग़ज़ी जंग को ये दोनों बरसों से अदालतों में लड़ रहे थे, वो अभी-अभी अदालत की चौखट लाँघ कर एक बीमार लड़के के बिस्तर तक पहुँच गई थी।

'उसने मेरे भाई को छुआ।' ... अद्विका ने आँसू पोंछे नहीं, बस उन्हें अपनी आँखों में जमने दिया। 'जो आदमी एक बीमार बच्चे को उठा सकता है, वो किसी काग़ज़, किसी शर्त से नहीं रुकेगा। मुझे सोनू चाहिए, रेयांश। इस वक़्त बाक़ी सब बाद में।'

और ठीक उसी पल, रेयांश की जेब में रखे फ़ोन ने कँपकँपाना शुरू किया, एक धीमी, ज़हरीली थरथराहट। रेयांश ने स्क्रीन पलटी, और कमरे की हवा जम गई। स्क्रीन पर एक ही नाम जल रहा था, जयदेव राठौर।

'ये वही है।' ... रेयांश ने अद्विका की आँखों में देखा, फिर काँपते अँगूठे से कॉल उठा कर स्पीकर दबा दिया। 'बोलिए, जयदेव जी। इतनी सुबह-सुबह?'

'रेयांश, बेटा... इतने सख़्त क्यों?' ... फ़ोन से जयदेव की आवाज़ रेंगती हुई निकली, मख़मल में लिपटी। 'मेरे पास तुम्हारे तहख़ाने की एक चीज़ है, जो असल में मेरी अमानत है। एक बीमार लड़का। उसकी बहन को मेरे पास भेज दो, वही देशमुख वाली छोकरी। अकेले। ऊपर, मेरे सुइट में। ... और लड़का शाम तक अपने बिस्तर पर होगा।'

कॉल कट गई, और वो मख़मली धमकी कमरे में एक बदबू की तरह ठहर गई। जयदेव ने उसका असली नाम नहीं लिया था, पर उस एक फ़िक़रे में, उसकी बहन को भेज दो, साफ़ था कि वो जानता है सोनू किसका भाई है, और इसलिए जानता है अद्विका असल में कौन है।

'तुम अकेली उस आदमी के पास नहीं जाओगी।' ... रेयांश अद्विका के सामने आ खड़ा हुआ, जैसे दरवाज़ा रोक रहा हो। 'जिसने तुम्हारे भाई को उठाया है, तुम उसी के कमरे में अकेली जाओगी? या तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, या तुम नहीं जाओगी।'

'अगर तुम मेरे साथ ऊपर गए, रेयांश, तो वो समझ जाएगा कि सीईओ एक नौकरानी के लिए क्यों खड़ा है।' ... अद्विका ने उसके सीने पर हाथ रख कर उसे धीरे से पीछे किया। 'और जिस पल उसे यक़ीन हुआ कि तुम मेरे हो, उसी पल सोनू की साँस उसकी मुट्ठी में और कस जाएगी। मुझे अकेले ही जाना होगा।'

'और अगर उस कमरे में उसने तुम्हारे साथ...' ... रेयांश का गला रुक गया, और उसने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में ले लिया। 'मैं इस पूरे महल को हारने से नहीं डरता, अद्विका। मैं सिर्फ़ तुम्हें खोने से डरता हूँ। उस कमरे में तुम अकेली नहीं होगी, तुम्हारे साथ मेरा डर होगा।'

कल तक इन दोनों के बीच वो ज़हरीला अधूरा बोसा एक दीवार बना खड़ा था, वो सच जो दोनों को दुश्मन बनाता था। पर जयदेव की एक कॉल ने वो दीवार जला कर राख कर दी थी। अब न कोई मालिक था, न कोई मालकिन, बस दो लोग जिनका एक ही दुश्मन था।

'तो फिर ध्यान से सुनो।' ... अद्विका पीछे हटी, और उसकी आँखों में आँसू की जगह अब एक ठंडी चमक थी। 'वो चाहता है कि मैं टूट जाऊँ, गिड़गिड़ाऊँ, और अपनी विरासत छोड़ने के काग़ज़ पर दस्तख़त कर दूँ। तो मैं यही करूँगी। मैं उसके सामने वही मामूली, डरी हुई नौकरानी बन जाऊँगी जो वो देखना चाहता है।'

'तुम उसे जीतने दोगी।' ... रेयांश की आँखों में समझ की एक चिंगारी उतरी। 'और दबाव में किया गया कोई भी दस्तख़त... डर के साये में, अपने भाई की जान की क़ीमत पर... क़ानून की नज़र में सिर्फ़ एक झूठ है। विश्वनाथ यही कहेगा। तुम काग़ज़ पर नाम लिख दो, अद्विका, पर उससे पहले उसके अपने मुँह से हर लफ़्ज़ निकलवा लेना।'

रेयांश ने अपना माथा एक पल के लिए उसके माथे से टिका दिया, और उस अँधेरी कोठरी में दो साँसें एक हो गईं। ये कोई बोसा नहीं था, ये एक वादा था। जो साल भर एक-दूसरे से लड़ते रहे थे, वो पहली बार एक ही तरफ़ खड़े थे, कंधे से कंधा मिलाए।

'मैं एक टूटी हुई नौकरानी बन कर अंदर जाऊँगी।' ... अद्विका ने अपना आँचल सीधा किया, अपनी पीठ हल्की झुकाई, और एक पल में वो फिर वही अद्विका देशमुख बन गई। 'वो समझेगा कि उसने जीत लिया। और जब तक वो हँस रहा होगा, मैं अपने भाई को उसके पंजों से निकाल लूँगी। उसके बाद... हिसाब।'

लिफ़्ट तहख़ाने के सीलन भरे अँधेरे से निकल कर ऊपर, उस मंज़िल पर रुकी जहाँ हवा में इत्र और पैसे की महक थी। जयदेव का सुइट पूरे कोलाबा के समंदर पर झुका हुआ था, संगमरमर, रेशम, और एक बूढ़ा गिद्ध जो अपने शिकार का इंतज़ार कर रहा था, हाथ में एक गरम प्याली थामे।

'आओ, आओ... बैठो।' ... जयदेव ने बिना उठे, बस एक उँगली से सामने की कुर्सी की ओर इशारा किया। 'तो तुम हो वो... अद्विका। हम्म। देशमुख, है ना? बड़ा प्यारा नाम है। ... माँ की तरफ़ का, ऐसा सुना है।'

'जी, बड़े मालिक।' ... अद्विका दरवाज़े के पास ही खड़ी रही, हाथ आगे जोड़े, नज़रें उस बेदाग़ क़ालीन पर गड़ाए। 'आपने बुलाया... मैं आ गई। मेरा भाई... सोनू... वो ठीक तो है ना, साहब? मुझे बस उससे मिलना है।'

'भाई।' ... जयदेव मुस्कुराया, और उसने मेज़ पर पड़ी एक पतली नीली फ़ाइल की ओर देखा। 'बैठो, बेटी, और ये देशमुख वाला नाटक बंद करो। मेरे पास एक जन्म का रिकॉर्ड है, जिसमें बाप का नाम स्याही से काटा गया है, और पूरे काग़ज़ पर सिर्फ़ एक लफ़्ज़ बच रहा है। ... राठौर। ... देवनारायण का ख़ून।'

वो नीली फ़ाइल, जिसे मल्विका के जासूस ने खोदा था और जिसके नीचे कुणाल की ग़द्दारी की स्याही सूखी थी, अब जयदेव के हाथ में थी। पर अद्विका का चेहरा पत्थर बना रहा। साल भर की तपस्या जमी थी उस पत्थर में, और उसने एक भी दरार नहीं आने दी।

'साहब, मुझे... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।' ... अद्विका ने काँपते हाथ से आँख छुई, जैसे कोई ग़रीब लड़की किसी बहुत बड़े इल्ज़ाम से डर गई हो। 'कैसा राठौर? मैं तो बस एक वेट्रेस हूँ, बड़े मालिक। आपके ही होटल में पानी भरती हूँ। मेरा इतने बड़े ख़ानदान से भला क्या...'

'बस, बस।' ... जयदेव ने हाथ उठा कर उसे रोक दिया, और उसकी मख़मली आवाज़ में पहली बार एक ठंडी धार आई। 'मेरे भाई की सीलबंद वसीयत, वो एक साल की शर्त, वो गुमनाम रहने का खेल... मैं सब जानता हूँ, बेटी। तुम मुझसे झूठ नहीं बोल सकतीं। तुम्हारा साल पूरा होने में अभी कई महीने बाक़ी हैं... और इतने महीने तुम ज़िंदा रहोगी, इसकी कोई गारंटी नहीं।'

'पर मैं कोई ज़ालिम आदमी नहीं हूँ।' ... जयदेव ने वो नीली फ़ाइल खोल कर एक सादा काग़ज़ और एक क़ीमती क़लम मेज़ पर आगे सरका दी। 'ये देखो। एक काग़ज़, जिस पर लिखा है कि तुम अपनी सारी दावेदारी छोड़ती हो। इस पर चुपचाप दस्तख़त कर दो, और तुम्हारा सोनू आज शाम अपने बिस्तर पर होगा। तुम, तुम्हारी वो शारदा, वो बंसी, सब चैन से साँस लेते रहेंगे।'

'और अगर तुमने अपना नाम लेने की एक भी कोशिश की...' ... जयदेव आगे झुका, और उसकी आँखों में वो गिद्ध जागा जो अब तक मख़मल में छुपा था। 'तो जिस-जिस को तुम प्यार करती हो, एक-एक कर के जलेगा। सबसे पहले वो बीमार भाई। ये आग है, बेटी, और तुम इसके साथ खेल रही हो। समझदारी इसी में है कि आग को हवा देने से पहले बुझा दो।'

अठारहवीं रात जयदेव ने मल्विका को जो हुक्म मख़मल में लपेट कर दिया था, दावा करने से पहले वारिस को मिटा दो, वो अब सीधे अद्विका के सामने खुला पड़ा था। अगर वो दावेदारी छोड़ती, तो चार हज़ार नौकर, वो बस्ती, उसके बाप की अधूरी लड़ाई, सब गिद्धों के हवाले। अगर वो अड़ती, तो सोनू। हर दरवाज़े के पीछे एक लाश खड़ी थी।

'सोच क्या रही हो?' ... जयदेव ने उँगली से उस काग़ज़ पर एक हल्की थपकी दी, जैसे किसी बच्चे को खाना खिला रहा हो। 'एक तरफ़ एक मरे हुए बूढ़े का ताज है, जिसने तुम्हारे बाप को कुत्ते की तरह घर से निकाला था। दूसरी तरफ़ तुम्हारा जीता-जागता भाई। ... एक अक़्लमंद लड़की के लिए ये कोई मुश्किल हिसाब नहीं है। क़लम उठाओ।'

अद्विका ने उस क़लम को देखा, फिर उस बूढ़े गिद्ध को, जो अपनी जीत की मुस्कान पहले ही पहन चुका था। उसने वो नाम, वो आग, वो चार हज़ार लोग, सब एक पल के लिए अपने अंदर गहरे दफ़्न कर दिए, और सतह पर सिर्फ़ एक डरी हुई, टूटी हुई बहन को उभरने दिया।

'मुझे... मुझे कुछ नहीं चाहिए, बड़े मालिक।' ... अद्विका के घुटने काँपे, और वो लगभग उस कुर्सी पर गिर पड़ी, आँखों से आँसू बहने लगे। 'मैं एक मामूली लड़की हूँ। मुझे कोई होटल, कोई साम्राज्य नहीं चाहिए। मुझे बस मेरा भाई चाहिए। ... आप जो कहेंगे, मैं दस्तख़त कर दूँगी। बस उसे कुछ मत कीजिए।'

'देखा? कितनी आसानी हो गई।' ... जयदेव पीछे टिक कर मुस्कुराया, और उसने वो क़लम ख़ुद उठा कर बड़े प्यार से अद्विका के काँपते हाथ में रख दी। 'यही समझदारी है, बेटी। ख़ून में भले राठौर हो, पर औक़ात तुम्हारी एक नौकरानी की ही निकली। यहाँ दस्तख़त करो, इस लाइन पर।'

झुके हुए सिर के पीछे, बिखरे बालों की ओट में, अद्विका का दिमाग़ उस संगमरमर के फ़र्श जितना ठंडा और साफ़ था। उसके कानों में रेयांश के लफ़्ज़ गूँज रहे थे, डर के साये में, अपने भाई की जान की क़ीमत पर किया गया कोई भी दस्तख़त क़ानून की नज़र में सिर्फ़ एक झूठ है, और वो झूठ अब जयदेव अपने ही हाथों गढ़वा रहा था।

अद्विका ने काग़ज़ पर झुक कर, आँसुओं की एक बूँद जान-बूझ कर उस पर गिरने दी, और फिर धीरे-धीरे अपना वो झूठा नाम लिखा, अद्विका देशमुख। उसने सोच-समझ कर वही नाम लिखा जो किसी वसीयत में था ही नहीं, वो नाम जो क़ानून की किसी किताब में उसका था ही नहीं, और जयदेव उसे अपनी सबसे बड़ी जीत समझ कर देखता रहा।

और तभी, अपने झुके हुए सिर की ओट में, जहाँ जयदेव की नज़र नहीं पहुँच सकती थी, अद्विका के होंठों पर एक बहुत छोटी, बहुत ठंडी मुस्कान तैर गई। वो मुस्कान सिर्फ़ सुनने वाले ने देखी, जो जानता था कि ये आँसू नक़ली थे, ये हार एक जाल थी, और ये दस्तख़त एक तमाचा था जो अभी चला नहीं, बस तन कर तैयार खड़ा था।

अद्विका ने क़लम रखी, काग़ज़ जयदेव की ओर सरकाया, और पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा, आँखें अब भी गीली, आवाज़ अब भी झुकी हुई। 'जैसा आप कहें... बड़े दादाजी।'

जयदेव ने वो काग़ज़ उठाया, उसे किसी जीते हुए तमग़े की तरह तह किया, और उस बड़े दादाजी में उसे सिर्फ़ एक हारी हुई नौकरानी की इज़्ज़त सुनाई दी। पर उस एक लफ़्ज़ में, उस ठंडी मुस्कान में, एक और चीज़ छुपी थी जो सिर्फ़ सुनने वाला जानता था, कि जिस लड़की को उसने अभी-अभी तोड़ा हुआ समझ लिया है, वो इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन है, और उसने अभी-अभी आग से खेलना शुरू किया है।

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