अध्याय 17 / 30
आधा सच
गुमनाम मालकिन द्वारा Avni Oberoi
रेयांश आधी रात अद्विका के तंग कमरे में उसका सच कोट में दबाए उतरता है, पर उसे बेनक़ाब करने के बजाय वो एक-एक कर के रहम के दरवाज़े खोलता है, लॉकेट, नाम, वो अनजाना साया, हर सवाल एक मौक़ा कि वो ख़ुद सच बोल दे और बच जाए। पर वसीयत की शर्त में बँधी अद्विका हर बार वही आधा सच चुनती है, हर लफ़्ज़ सच, पर असली नाम उसी के नीचे दफ़्न, और उसे अपनी आँखों में झूठ बोलते देख कर रेयांश टूट जाता है और तय करता है कि वो नहीं बताएगा कि वो जानता है, बस देखेगा, और कल की कोमलता एक ठंडे खेल में जम जाती है। आख़िर में दरवाज़े पर रुक कर वो देवनारायण का वो निजी नाम हवा में छोड़ देता है जिससे बूढ़ा अपनी खोई पोती को पुकारता था,
दस्तक की वो आवाज़ अभी लकड़ी में काँप ही रही थी कि अंदर अद्विका की आँख खुल गई। ... उसने काँपते हाथों से वो छोटा सा दरवाज़ा खोला, और सामने, तहख़ाने के उस मद्धम गलियारे में, बारिश की बूँदों से भीगा कोट पहने रेयांश खड़ा था, और उसकी आँखों में आज वो पुरानी आग नहीं, कुछ और ही सुलग रहा था।
"सर? आप..." ... अद्विका ने अपने कंधों पर पड़ा दुपट्टा कस कर लपेट लिया, दिल अचानक सीने में हथौड़े की तरह बजने लगा। " इस वक़्त, यहाँ, नीचे? अगर किसी ने आपको इस गलियारे में देख लिया, तो कल पूरे होटल में यही बात होगी।"
"तो होने दो, अद्विका।" ... वो बिना पूछे एक क़दम अंदर आ गया, और उस तंग से कमरे में उसकी मौजूदगी किसी दीवार की तरह भर गई। " एक टूटी सी खाट, एक सूटकेस, और एक लॉकेट। पूरी दुनिया में बस इतना ही है तुम्हारा?"
उसके कोट के अंदर वो नीली फ़ाइल किसी अंगारे की तरह उसके सीने से लगी थी, वही फ़ाइल जो मल्विका उसकी मेज़ पर छोड़ गई थी, उस लड़की की पूरी सच्चाई। ... वो ख़ुद नहीं जानता था कि वो उसे चेताने आया है या इस्तेमाल करने, और उन दोनों के बीच कल रात का वो बोसा किसी दीवार की तरह खड़ा था।
"कल रात के बाद..." ... अद्विका की नज़र एक पल को ज़मीन पर गिरी, फिर उठ गई। " मुझे लगा था आप मुझसे दोबारा कभी बात नहीं करेंगे, सर। मैं उस पल के लिए माफ़ी माँगती हूँ। वो नहीं होना चाहिए था, और आइंदा नहीं होगा।"
"कल रात को हम दोनों भूल जाते हैं।" ... उसने वो लफ़्ज़ ऐसे कहे जैसे उन्हें ज़ुबान पर लाने में उसे तकलीफ़ हो रही हो, फिर उसकी आवाज़ धीमी और गहरी हो गई। " पर एक बात है जो मैं भूल नहीं पा रहा, अद्विका। मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता। और आज रात, मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ। सच।"
वो आज मालिक बन कर नहीं आया था, वो एक ऐसा आदमी बन कर आया था जो उसके सामने एक-एक दरवाज़ा खोल रहा था, अंदर आ जाओ, सच बोल दो, बच जाओ। ... और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि उसका खोला हर दरवाज़ा एक ऐसी रहम था जिसे अद्विका क़बूल नहीं कर सकती थी।
"ये लॉकेट जो तुम कभी नहीं उतारतीं..." ... उसकी उँगली हवा में उसके गले की तरफ़ उठी, फिर बीच में ही रुक गई। " इसके अंदर जो चेहरा बंद है, वो किसका है? आज सच बता दो, अद्विका। सिर्फ़ आज रात के लिए, सिर्फ़ मुझे।"
"मेरे बाप का है, सर।" ... उसकी उँगलियाँ लॉकेट पर कस गईं, और आवाज़ में वो चट्टान लौट आई जो किसी नौकरानी की नहीं होती। " एक ऐसा आदमी जिसे उसके अपने ख़ून ने ठुकरा दिया था। दुनिया में यही एक निशानी है जो सच में मेरी अपनी है, और इसके बारे में बस इतना ही बता सकती हूँ।"
उसका एक-एक लफ़्ज़ सच था, और सबसे सच्चा लफ़्ज़ उसने अपने ही अंदर दफ़्न रखा। ... लॉकेट में बंद वो चेहरा अर्नव राठौर का था, देवनारायण का ठुकराया हुआ बेटा, उसका अपना बाप, पर वो नाम उसने ज़ुबान पर आने से पहले ही निगल लिया।
"और तुम्हारा नाम?" ... वो एक क़दम और पास आया, आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी जो उसे और ख़तरनाक बना रही थी। " 'अद्विका देशमुख।' ये तुम्हारे जन्म का नाम नहीं है, है ना? आज झूठ मत बोलो।"
"नहीं, सर।" ... उसने एक लंबी साँस ली, वही आधा सच दोहराते हुए जो वो उसे पहले भी दे चुकी थी। " देशमुख मेरी माँ का नाम है। मैं एक ख़तरनाक अतीत से छुप रही हूँ, ये मैं आपको उस रात भी बता चुकी थी। इससे ज़्यादा जान कर आप ख़ुद को भी ख़तरे में डालेंगे।"
"छुप रही हो..." ... उसने उस लफ़्ज़ को ऐसे चखा जैसे उसमें ज़हर घुला हो। " किससे, अद्विका? कौन है वो जो तुम्हें इतना डराता है कि तुम अपना नाम तक बदल कर, एक वर्दी में इस महल के सबसे नीचे छुप गई हो?"
"जो मुझे मिटा देना चाहते हैं, उनसे।" ... उसने ये कहते हुए एक पल को उसकी आँखों में सीधे देखा, फिर नज़र हटा ली। " कुछ लोग हैं, जिनके रास्ते में मेरा ज़िंदा होना ही एक रुकावट है। अगर उन्हें पता चल जाए कि मैं कहाँ हूँ, तो वो मुझे मिटा देंगे, सर। यही मेरा सच है।"
और यहीं वो सबसे बड़ी क्रूरता थी। ... अद्विका ने अभी-अभी सौ फ़ीसदी सच कहा था, वो गिद्ध जो वारिस को दावा करने से पहले ही मिटा देना चाहते थे, पर रेयांश ने उसमें सिर्फ़ एक डरी हुई लड़की का वही पुराना झूठ सुना, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि वो सच कितना असली और कितना जानलेवा था।
"दो रातें, अद्विका।" ... उसकी आवाज़ अब बमुश्किल एक फुसफुसाहट थी। " हीरों की चोरी वाली रात, और वो तख़्तापलट वाली बैठक। दोनों बार कोई था जिसने मुझे किसी साये की तरह बचाया, कोई जो हमेशा ऐन उसी जगह मौजूद था जहाँ मेरी जान अटकी थी। ... वो तुम थीं?"
"मैं एक मामूली नौकरानी हूँ, सर।" ... उसने अपनी आवाज़ को जितना बेरंग बना सकती थी, बना लिया। " मैं भला आपको कैसे बचाती? मैं तो बोर्डरूम के दरवाज़े के अंदर झाँक भी नहीं सकती। आपने मुझे किसी और समझ लिया है।"
और उसने उसे अपनी आँखों में आँखें डाल कर झूठ बोलते देखा, ये जानते हुए कि वो झूठ है। ... और उसके अंदर कुछ बिना आवाज़ के टूट गया, क्योंकि जिस चेहरे को उसने कल रात अपनी बाँहों में भरा था, वही चेहरा आज उससे झूठ बोल रहा था।
"अद्विका, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो।" ... उसने अपनी आवाज़ की सारी अकड़ उतार दी, और जो नीचे बचा, वो लगभग एक मिन्नत थी। " अगर तुम्हारे सिर पर कोई ख़तरा है, कोई ऐसा राज़ जो तुम्हें अंदर ही अंदर खा रहा है, तो अगर तुम मुझे अभी, इसी वक़्त, सब सच बता दो, तो शायद, सिर्फ़ शायद, मैं तुम्हें बचा सकूँ। इस पूरे महल में सिर्फ़ मैं।"
वो एक ऐसी पेशकश थी जो सब कुछ बदल सकती थी। ... अगर अद्विका उस एक पल में सिर्फ़ एक लफ़्ज़ कह देती, अपना असली नाम, तो जो आदमी उसकी पूरी तक़दीर अपनी मुट्ठी में लिए खड़ा था, वो उसकी ढाल बन सकता था, पर वही एक लफ़्ज़ उस वसीयत ने उसके होंठों पर ताला लगा कर बंद कर रखा था।
अद्विका के गले में एक पूरा नाम आ कर अटक गया, अद्विका राठौर, और उसके पीछे चार हज़ार चेहरे, बंसी, शारदा ताई, वो सब जो गिद्धों के जीतते ही सड़क पर आ जाते। ... " मेरे पास बताने को कुछ नहीं है, सर। जो था, वो मैं बता चुकी। ... आप बेकार में अपने आप को किसी ऐसी गुत्थी में उलझा रहे हैं जिसका कोई सिरा ही नहीं।"
और रेयांश समझ गया कि वो उससे अब भी झूठ बोलेगी, यहाँ भी, इस कमरे में भी, कल रात के उस बोसे के बाद भी। ... कोट के अंदर वो फ़ाइल और भारी हो गई, और बाहर वसीयत की घड़ी में अब तीन सौ बाईस रातें बची थीं, और एक आसान सच की उसकी आख़िरी उम्मीद उसी पल दम तोड़ गई।
"ठीक है।" ... वो एक क़दम पीछे हट गया, और उसकी आँखों की वो नरमी जमी हुई बर्फ़ में बदल गई। " तो फिर हम दोनों अपने-अपने राज़ अपने पास रखते हैं, अद्विका देशमुख। तुम्हारा तुम्हारे पास, और मेरा मेरे पास।"
वो उसकी सच्चाई अपने कोट में दबाए आया था, और अब उसे वापस अपने साथ ले जा रहा था, न चेताने के लिए, न अभी हथियार बनाने के लिए, सिर्फ़ देखने के लिए। ... अब उसके पास दो राज़ थे, एक दराज़ में ताला लगा कुणाल की ग़द्दारी का सबूत, और एक सीने में इस लड़की का सच, और जो कोमलता कल तक उन दोनों के बीच थी, आज एक ठंडे खेल में जम चुकी थी।
"सर, आप बदल गए हैं।" ... उसने उसे ग़ौर से देखा, और उसकी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। " कल रात तक आपकी आँखों में कुछ और था। और आज... आज आप मुझे ऐसे देख रहे हैं जैसे किसी मुजरिम को देखते हैं जिसका जुर्म साबित होना बस बाक़ी है।"
"थका हुआ हूँ, अद्विका। बस इतनी सी बात है।" ... फिर, जैसे यूँ ही, उसने वो नाम हवा में छोड़ दिया और उसका चेहरा पढ़ने लगा। " देवनारायण साहब भी अपने आख़िरी दिनों में ऐसे ही थके रहते थे। एक टूटा हुआ आदमी, जो अपने ही किए पर पछता-पछता कर मरा।"
उसने बूढ़े का नाम लिया और उसे उस तरह देखा जैसे कोई शिकारी पेड़ों की क़तार को देखता है, ज़रा सी हरकत के इंतज़ार में। ... और अद्विका ने, जिसने पूरे एक साल में अपने चेहरे को एक ठहरा हुआ तालाब बनाना सीख लिया था, उसे बिलकुल ठहरा रखा, वैसे ही जैसे उस रात जब 'दादाजी' उसके होंठों तक आ कर 'दासी' बन गया था।
"मैंने उन्हें कभी देखा नहीं, सर।" ... उसने कंधे उचकाए, आवाज़ को पत्थर की तरह सपाट रखते हुए। " बस सुना है, बहुत बड़े आदमी थे। चाय की एक दुकान से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया। हम जैसों के लिए वो किसी क़िस्से का नाम हैं, बस।"
और वो बेदाग़ ठहराव ही उसका आख़िरी सबूत बन गया। ... किसी सच्ची नौकरानी का चेहरा उस नाम पर इतना ठहरा हुआ नहीं रहता, इतना तराशा हुआ, और रेयांश ने वो ठहराव देख लिया, और चुपचाप दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया।
"जाता हूँ। सो जाओ।" ... उसने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा, फिर एक पल के लिए रुक गया, पीठ अभी भी उसकी तरफ़। " अच्छा... एक आख़िरी बात, अद्विका।"
और फिर, दहलीज़ पर, वो उस एक लफ़्ज़ के साथ पलटा जिसे वो किसी छुरे की तरह अपने साथ नीचे लाया था। ... एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे सिर्फ़ वो मरा हुआ बूढ़ा और उसका खोया हुआ ख़ून जानता था, और उसने उसे सीधे अद्विका की आँखों में उतार दिया।
"देवनारायण साहब के पास एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर थी।" ... उसकी आवाज़ अब बर्फ़ जैसी नरम थी, और आँखें सुई जैसी तीखी। " अपने आख़िरी दिनों में वो उस तस्वीर को सीने से लगाए घंटों बैठे रहते थे, और अपनी उस पोती को एक ही नाम से पुकारते थे जिसे वो कभी अपनी गोद में नहीं ले पाए। ... 'गुड़िया।' वो उसे 'गुड़िया' कहते थे।"
और एक धड़कन के लिए वो ठहरा हुआ तालाब टूट गया। ... क्योंकि 'गुड़िया' वही नाम था जो उसकी मरी हुई माँ उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए फुसफुसाया करती थी, और वही नाम, जो अब उसे इसी पल समझ आया, उसका दादा उसे पुकारने को तरसता रहा और मर गया, और दोनों मुर्दे उस एक लफ़्ज़ में से एक साथ उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा बैठे। उसकी साँस रुक गई, उसका हाथ अपने आप लॉकेट पर जा पड़ा, बस एक धड़कन के लिए, उससे ज़्यादा नहीं।
"मैं... मैं समझी नहीं, सर।" ... उसने अपनी आवाज़ को वापस समेटने की कोशिश की, पर वो एक पल गुज़र चुका था। " कौन गुड़िया? आप किसकी बात कर रहे हैं? रात बहुत हो गई है, मुझे नींद आ रही है।"
पर वो देख चुका था। ... पेड़ों की क़तार हिल गई थी, और शिकारी ने वो हरकत पकड़ ली थी, पूरे एक साल का ठहराव एक अकेले लफ़्ज़ से टूट गया था, एक अकेली धड़कन से, एक अकेले हाथ से जो अपने मरे हुए बाप के लॉकेट पर जा गिरा था।
रेयांश ने उसे एक लंबे, ख़ामोश पल तक देखा, न कोई इल्ज़ाम, न कोई गुस्सा, बस एक गहरी चोट। ... फिर उसने वो तीन लफ़्ज़ कहे, लगभग अपने आप से, लगभग नरमी से, लगभग टूट कर। " ...अब समझ आया।"
तीन लफ़्ज़, और मालिक और नौकरानी के बीच की वो आख़िरी दीवार पिघल कर कुछ और ही ख़तरनाक चीज़ में बदल गई। ... अब वो जानता था, पूरी तरह, आख़िरकार, किसी जासूस के काग़ज़ से नहीं, बल्कि ख़ुद उसके अपने चेहरे से, और उसने वो नहीं कहा जो वो जानता था, बस पलट कर वो गलियारे के अँधेरे में उतरने लगा।
"सर..." ... उसके गले से बस इतना ही निकला, आधा, टूटा हुआ, पर गलियारा उसे तब तक निगल चुका था। " सर, रुकिए..." ... पर अब वहाँ सुनने के लिए कोई नहीं था।
और वो अँधेरे में उतर गया, तीन लफ़्ज़ों में उसकी पूरी ज़िंदगी समेटे, और अद्विका दरवाज़े के पास जड़ हो कर खड़ी रह गई, लॉकेट अपनी मुट्ठी में भींचे। ... वो समझ गई थी कि आख़िरी दीवार अब गिर चुकी है, कि वो आदमी अब उसका पूरा सच जान चुका है और आज रात के लिए ख़ामोश रहना चुन बैठा है। और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि 'अब समझ आया' कोई अंत नहीं, बल्कि सबसे ख़तरनाक खेल की शुरुआत थी, क्योंकि जो आदमी अब सब कुछ जान चुका था, वही उससे मोहब्बत करता था, और उसी का सब कुछ उसी दिन छिन जाना था जिस दिन वो अपना नाम वापस लेती।
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