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Chapter 6 of 13 8 min read

स्पॉन्सर का जाल

सो मत जाना by Avni Oberoi

"ले लीजिए।"

कबीर ने वो काग़ज़ सितारा की मेज़ पर रखा, वो नंबर ऊपर की तरफ़, ताकि वो उसे देख सके। पर रखते वक़्त उसने सितारा की आँखों में नहीं देखा, और सितारा को ये अजीब लगा, क्योंकि कबीर मेहरा हमेशा आँखों में देखकर बात करता था। आज उसके हाथ में वो काग़ज़ था, और उसकी आवाज़ में कुछ और था, कुछ जो हुक्म नहीं था। डर।

"पूरे साल का sponsorship। आपका शो बच जाएगा, मिस वर्मा। चिंटू की नौकरी बच जाएगी। आप जो चाहती थीं, शुरू से, वो मिल रहा है। बस ले लीजिए।"

"और मेहक?"

कबीर ने एक पल के लिए आँखें मूँदीं, जैसे ये एक ही नाम उसे शारीरिक रूप से चोट पहुँचा रहा हो।

"एक मरी हुई लड़की वापस नहीं आएगी, चाहे आप कुछ भी करें," उसने कहा, और उसकी आवाज़ नीची और तंग थी। "पर एक ज़िंदा औरत बर्बाद हो सकती है। या उससे भी बुरा। आप समझ क्यों नहीं रही हैं कि ये लोग कैसे हैं?"

"मुझे लगता है आप बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि ये लोग कैसे हैं," सितारा ने कहा, धीरे से, उसकी आँखों में सीधे देखते हुए। "इतनी अच्छी तरह, कि मुझे डर लगता है। आप कैसे जानते हैं, मिस्टर मेहरा?"

और एक पल के लिए, कमरे में सच लगभग आ गया। वो उसके होंठों पर था, सितारा देख सकती थी। वो आदमी कुछ कहने वाला था।

फिर उसने नहीं कहा।

"मैं आपका boss हूँ," कबीर ने कहा, और दीवार वापस आ गई, हर बार से ऊँची। "और मैं आपको आदेश दे रहा हूँ। ये कहानी बंद। आज से।"

"आप मुझे आदेश दे सकते हैं," सितारा ने काग़ज़ उठाया, और उसे वापस कबीर की तरफ़ बढ़ा दिया, बिना उस पर दस्तख़त किए। "पर आप मुझे ख़रीद नहीं सकते। और न ही वो।"

कबीर ने वो काग़ज़ नहीं लिया। वो बहुत देर तक उसे देखता रहा, और फिर कुछ ऐसा कहा जो आदेश नहीं था, जो धमकी नहीं था, जो लगभग एक मिन्नत थी।

"वो आपको चोट पहुँचाएँगे, नैना।"

"तो फिर अच्छा है कि मेरी फ़िक्र करने वाला कोई है," उसने कहा।

और कबीर के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

डीडी सर अगले दिन आए, बिना किसी चेतावनी के, जैसे राजा आते हैं।

सितारा ने उन्हें hoardings पर हज़ार बार देखा था, पर सामने वो अलग थे। सत्तर के क़रीब, सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद बाल, और एक चेहरा जो इतना दयालु, इतना पितृ-तुल्य था कि एक पल के लिए सितारा को ख़ुद पर शक हुआ। ये आदमी? ये नरम, मुस्कुराता हुआ बुज़ुर्ग, जो हर किसी का नाम जानता था, जिसने रिसेप्शन वाली लड़की से उसकी बीमार माँ का हाल पूछा?

पर फिर उन्होंने सितारा को देखा, और मुस्कुराए, और उस मुस्कान के पीछे, बहुत गहरे, कुछ ऐसा था जो बिल्कुल गर्म नहीं था।

"तो ये हैं हमारी सितारा," उन्होंने कहा, उसका हाथ दोनों हाथों में लेते हुए, गर्म, सूखे हाथ। "बेटा, मैं तुम्हारा शो सुनता हूँ। सच में। मुझे नींद कम आती है, बुढ़ापे की बीमारी है, और तुम्हारी आवाज़... उसमें कुछ है। एक सच्चाई। आजकल दुर्लभ है।"

"शुक्रिया, सर।"

"बैठो, बैठो।" वो ऐसे बैठे जैसे ये उनका दफ़्तर हो, और सितारा मेहमान। "मैं ज़्यादा वक़्त नहीं लूँगा। मैं बस... तुमसे मिलना चाहता था। पैंतालीस साल से मैं इस शहर के बच्चों को पढ़ा रहा हूँ, बेटा। पैंतालीस साल। मेरे पढ़ाए बच्चे आज collector हैं, डॉक्टर हैं, इस शहर के SP साहब मेरे student रह चुके हैं। मंत्री जी पिछले हफ़्ते मेरे घर खाना खाने आए थे।" उन्होंने ये सब बहुत प्यार से कहा, बिना किसी ज़ोर के, जैसे कोई दादा अपने पोते को अपनी पुरानी तस्वीरें दिखा रहा हो। "मैंने हज़ारों ज़िंदगियाँ बनाई हैं।"

"और एक तोड़ी," सितारा ने कहा, बहुत शांति से।

कमरा एक पल के लिए जम गया।

डीडी सर की मुस्कान नहीं हिली। वो आगे झुके, और उनकी आवाज़ और भी नरम हो गई, और इसीलिए और भी डरावनी।

"मैंने तुम्हारे बारे में थोड़ा पता किया, बेटा। बुरा मत मानना। मैं हर उस इंसान के बारे में जानना चाहता हूँ जिसे मैं पसंद करता हूँ।" वो रुके। "तुम्हारी माँ हाल ही में गुज़रीं। मुझे अफ़सोस है, बेटा। सच में। माँ का जाना... इंसान को अकेला कर देता है। और अकेले इंसान को कभी कभी ग़लत बातें सच लगने लगती हैं। पुरानी कहानियाँ, अफ़वाहें, मरे हुए लोगों के नाम।" उन्होंने उसके हाथ को थपथपाया, एक बार, धीरे से। "तुम एक होशियार लड़की हो। तुम्हारे आगे एक पूरी ज़िंदगी है। एक अच्छा करियर। शायद एक दिन एक घर, बच्चे। ये सब बहुत क़ीमती है, बेटा। इसे किसी ऐसी चीज़ के लिए मत गँवाना जो... तुम्हारी है ही नहीं।"

वो उठे, और दरवाज़े पर जाकर रुके।

"मेरे घर कभी खाने आना," उन्होंने कहा, फिर से मुस्कुराते हुए, फिर से वो दयालु बुज़ुर्ग। "मेरी पत्नी बहुत अच्छा गाजर का हलवा बनाती हैं।"

और वो चले गए, और कमरे में उनकी मौजूदगी की एक ठंडक छोड़ गए, जो उनके जाने के बाद भी काफ़ी देर तक रही।

सितारा अपनी कुर्सी पर बैठी रही, हाथ काँपते हुए, और सोचती रही कि वो आदमी, जिसने उसे एक बार भी धमकी नहीं दी थी, इस दुनिया का सबसे डरावना आदमी क्यों लगा।

और फिर उसे एक बात समझ आई। वो डरावने इसलिए नहीं थे कि वो ग़ुस्सैल थे। वो डरावने इसलिए थे कि वो शांत थे। उन्होंने हज़ारों बच्चों को बनाया था, और एक को तोड़ा था, और रात को उन्हें बहुत अच्छी नींद आती थी।

उस रात, सितारा को डर लगा। और जब सितारा को डर लगता था, तो वो वही करती थी जो वो हमेशा करती थी। वो माइक के सामने बैठ जाती थी।

"आज रात एक कहानी," उसने on air कहा, अपनी सबसे गर्म, सबसे शांत आवाज़ में। "एक शहर की कहानी, जहाँ एक बहुत बड़ी, बहुत सुंदर इमारत थी। सब उसे पूजते थे। पर उस इमारत की नींव में एक झूठ दबा था। एक लड़का, जो उस इमारत का चेहरा था, जो असल में कभी था ही नहीं। और एक लड़की जिसने वो झूठ देख लिया।"

स्टूडियो में सिर्फ़ उसकी आवाज़ थी, और पूरे शहर की चुप्पी, और सितारा जानती थी कि एक घर में, गाजर के हलवे की महक के बीच, एक बुज़ुर्ग आदमी ये सुन रहा था।

"मैं इस कहानी का अंत नहीं जानती, दोस्तों," उसने कहा। "अभी नहीं। पर मैं एक बात जानती हूँ। झूठ की इमारतें कितनी भी ऊँची हों, उनकी एक ही कमज़ोरी होती है। जिस दिन एक भी आवाज़, सिर्फ़ एक, ये कहने की हिम्मत कर ले कि नींव खोखली है, बाक़ी शहर सुनना शुरू कर देता है। और इमारत को गिराने के लिए धक्के की ज़रूरत नहीं होती। बस... सच की ज़रूरत होती है।"

उसने एक गाना चढ़ाया, और पीछे टिक गई, और उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, क्योंकि उसने अभी अभी, पूरे शहर के सामने, इस शहर के सबसे ताक़तवर आदमी से कहा था, मैं बिकूँगी नहीं।

अब उसे सिर्फ़ इंतज़ार था। दो बजे का। अजनबी का।

ठीक दो बजे, सितारा ने बोर्ड को देखा।

कोई लाइन नहीं जली।

दो बजकर एक मिनट। दो बजकर दो। दो बजकर पाँच।

अजनबी ने फ़ोन नहीं किया।

और सितारा के पेट में एक ठंडा डर फैलने लगा, क्योंकि वो हर रात आता था, ठीक दो बजे, और आज, उस रात के बाद जब उसने पूरे शहर के सामने वर्धन को ललकारा था, उस रात की चुप्पी किसी आवाज़ से ज़्यादा ज़ोर से चीख़ रही थी। कहाँ था वो? क्या उन्होंने उसे ढूँढ लिया? क्या उन्होंने...

दो बजकर सात मिनट पर, एक लाइन जली।

सितारा ने राहत की एक साँस ली और लगभग गिरते हुए बटन दबाया।

"आप कहाँ थे?" उसने कहा। "मैं डर गई थी कि..."

"सितारा जी।"

और सितारा रुक गई, क्योंकि वो आवाज़ अजनबी की नहीं थी।

ये आवाज़ सपाट थी। ठंडी। बिना किसी जल्दबाज़ी के, बिना किसी डर के, बिना किसी भावना के। ये किसी ऐसे इंसान की आवाज़ थी जिसके लिए ये बस एक काम था।

"आप बहुत अच्छा बोलती हैं," उस आवाज़ ने कहा। "रात भर लोगों को जगाए रखती हैं। उन्हें सोने नहीं देतीं।"

सितारा का हाथ माइक पर जम गया।

"पर आज मेरी बारी है। तो आज मैं आपसे कहता हूँ।" एक पल की चुप्पी, और फिर वो आवाज़ और भी धीमी हो गई, लगभग कोमल।

"सो जाइए, सितारा जी। हमेशा के लिए।"

लाइन कट गई।

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